Thursday, February 27, 2014

शिव बारात: शिव जी के विराट व्यक्तित्व की झलक

त्रिमूर्ति, करोड़ों देवी-देवताओं और अवतारों की इस धरती पर राम, कृष्ण और
शिव का एक अलग ही स्थान रहा है. अपने ऐतिहासिक महापुरुषों, राजाओं के
बारे में हमारी स्मृतियाँ चाहे कितनी भी क्षीण हों इन प्रतीक पुरुषों को
इस देश की करोड़ों जनता पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी स्मृतियों में सहेजती आई है तो
इसके पीछे इनका व्यक्तित्व और वो आदर्श भी हैं जो इस देश की संस्कृति के
आधार हैं. आज अपने प्रतीकों के छिद्रान्वेषण का आधुनकितामय प्रचलन जरुर
बढ़ा है, इस बारे में फिर कभी; मगर आज इतना तो जरुर कि शिव इन अन्य
प्रतीकों से इस मामले में जरुर थोड़े ज्यादा सौभाग्यशाली माने जायेंगे कि
हम इंसानों ने अपनी तमाम बौद्धिकता के साथ भी इनके चरित्र में कोई ऐसी
विसंगति ढूँढने में सफलता नहीं पाई जितनी हम राम-कृष्ण आदि में ढूंढ अपने
प्रगतिशील होने का आत्मसुख तलाशते हैं ! अपने परिवार के साथ वैभव से अलग,
पर्वतों की चोटी पर विराजमान, संसार से अलग मगर जब सृष्टि को जरुरत पड़े
तो गंगा को बाँधने से लेकर गरल पीने को भी तत्पर और इस मंथन के परिणामों
से पूर्णतः अनासक्त भी ! शायद तभी जब हमारे प्राचीन ऋषियों को भारत को एक
सूत्र में पिरोने का विचार आया तो प्रतीक शिव को ही बनाया. कश्मीर से
कन्याकुमारी..., 12 ज्योतिर्लिंग और इसके बाद भी और स्पष्टता के लिए सती
से जुड़े 52 शक्तिपीठ भी. और अपने विवाह की बारात भी निकाली तो ऐसी जिसमें
कृत्रिमता, और रस्म अदायगी करने वाले भद्र बाराती ही नहीं बल्कि तमाम
भूत-प्रेत, पिशाच मानी जाने वाली नंग-धड़ंगों की टोली- जो जताती है कि
समाज के तमाम वंचित, पिछड़े तबकों को भी मस्ती के साथ लेकर चलने वाले हैं
शिव. यह काम और कोई अवतार करता नहीं दिख पाता. शिव ऐसा कर पाते हैं तो
शायद इसलिए कि वो भारत की मौलिक आत्मा हैं, मूल जीवनशैली -
जनजातीय/ट्राईबल शैली जो जीवन को आडंबर में नहीं बल्कि संपूर्णता में
जीना सिखाती है. इस नजरिये से शिव को देखें तो उनके विराट व्यक्तित्व के
कई राज समझ पाएंगे जो अन्य प्रतीक पुरुषों में नहीं दिखते... सभी को
सृष्टि के इस सबसे उल्लासमय उत्सव की बधाई.....

Monday, February 10, 2014

नर हो न निराश करो मन को...


वर्षों पहले जब बनारस में था तो कभी-कभी मौर्निंग वाक के चुनिन्दा दिनों में एक-आध चक्कर सामने ही रहे जिम का भी लगा लेता था. एक दिन किसी लड़के को देखा अपने दोस्तों से कह रहा था- "मेरी तो जिंदगी ही बर्बाद हो गई..." ऐसा वो अपनी कम हाईट को लेकर कह रहा था क्योंकि उसके दोस्तों की नजर में उसकी मेहनत को उसकी हाईट का साथ मिला होता तो शायद उसकी पर्सनाल्टी और भी बेहतर होती. इसे सुन वहीँ खड़े एक इंस्ट्रक्टर ने हस्तक्षेप कर अपना उदाहरण देते हुए कहा कि क्या उनकी खुद की जिंदगी बर्बाद है ! नौकरी है, परिवार है, स्पोर्ट्स में भी पार्टिसिपेट करते हैं, हाईट को लेकर रोते रहते तो क्या यहाँ पहुँच पाते ! उस लड़के ने समझा या नहीं पता नहीं, मगर हाल ही एक न्यूज पढ़ ये घटना फिर याद आ गई. नई दिल्ली के एक BPO कर्मी ने हाईट और सर के बाल कम होने के कारण डिप्रेशन में आकर ख़ुदकुशी कर ली. स्कूल के दिनों में ही उसने सुसाइड का निर्णय ले लिया था और 6 महीने पहले डेट भी तय कर ली थी. सुसाइड नोट में यह भी लिखा पाया गया कि एक युवती को वो प्यार भी करता था, मगर अपनी हीनता के कारण पीछे हट गया.
वास्तविकता में हममें से कोई भी परफेक्ट नहीं होता. शारीरिक रूप से भी हममें से कई लोगों को कुछ समस्याएं होती ही हैं. मगर कहते हैं न कि ईश्वर अगर हमसे कुछ छीन लेता है तो कुछ अतिरिक्त दे भी देता है. तो जरुरत है कि अपनी उस मजबूती को पहचानें और सफलता की ओर आगे बढ़ें. सफलता से बड़ा कोई
आभूषण, कोई पहचान होती भी नहीं जो कई कमजोरियों को छुपा देती है. कई प्रसिद्ध और हमारे आस-पास भी ऐसे सफल उदाहरणों की कोई कमी नहीं. मगर ऐसे व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने में परिवार और मित्रों को भी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए. अपनी कमजोरियों से हतोत्साहित या निराश होने के बजाये अपनी क्षमताओं को पहचान सकारात्मक सोच के साथ सफलता का प्रयास करना ही जिंदगी है- आखिर "नर हो न निराश करो मन को..."

Sunday, February 2, 2014

कश्मीर की विरासत और आर्कियोएस्त्रोनौमी

 
"सुबह जाना काम पर, शाम को घर आना;
सबसे बुरा है- मुर्दा शांति से भर जाना "
 
तो अपने जिन्दा होने को कन्फर्म करने और शांत, ठहरे पानी में थोड़ी हलचल
जगाने के लिए कभी-कभी ऐसे अभियानों पर निकल ही जाता हूँ. आज जा पहुंचा
कश्मीर के सोपोर के उस स्थान पर जहाँ Palaeolithic और Neolithic काल के
कुछ अवशेष अभी भी अपने वास्तविक मूल्यांकन की राह तकते खड़े हैं. इस रौक
आर्ट में मानव और पशु आकृतियों के साथ कुछ गोल घेरे भी दिख रहे हैं.
पीर-पंजाल श्रेणी के वोल्केनिक रौक्स में अंकित किये गए इन चित्रों को
आकृति अपनी रचना शैली के कारण पुरातत्वविद Upper Palaeolithic Age के मान
रहे हैं. Concentric गोले संभवतः इस क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रमुख
झीलों का निरूपण हो सकती हैं. एक स्थानीय लोककथा के अनुसार कश्मीर का
स्थल पहले झील में डूबा हुआ था, जिसमें एक राक्षस का राज था. देवताओं ने
उसके वध के लिए एक दर्रे के माध्यम से सारा पानी निकलवा दिया और फिर उस
राक्षस का वध किया गया. कुछ लोग यहाँ की झीलों को meteorite effect से
जोड़ कर देख रहे हैं. तो क्या पुरामानवों ने यहाँ कोई उल्किय घटना देखी थी
और जिसका निरूपण इस भित्ति चित्र पर किया गया है ! कई Archaeoastronomers
इस दिशा में भी विचार कर रहे हैं, मगर इस सन्दर्भ में अभी कई भू-गर्भिक
और भू-भौतिक अध्ययन की आवश्यकता है.
 
इस स्थल के निकट से ही एक काफी ऊँचा Mound भी मिला है जिसे पुरातात्विक
दृष्टि से Neolithic माना जा रहा है और यहाँ से अब भी कई Black & Red
potteries मिल रहे हैं. इस क्षेत्र में अध्ययन करते रहे पुरातत्वशाश्त्री
डॉ. मुमताज बताते हैं कि 70 के दशक तक इस क्षेत्र में पुरातत्त्व की
दृष्टि से काफी काम हुआ, मगर 80 के बाद से इस दिशा में किये जा रहे
प्रयासों में काफी कमी आई है. निश्चित रूप से प्राकइतिहास के दृष्टिकोण
से कश्मीर में नए सिरे से और समग्र अध्ययन की जरुरत है, ताकि इतिहास के
बिखरे कई सूत्रों को जोड़ा जा सके...

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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