Wednesday, January 14, 2009

पतंग और पक्षी



मकर संक्रांति और पतंगबाजी का गहरा नाता है। B.Sc के दौरान मैंने आपने दोस्तों के साथ 'Dharohar' (An Amateur's Club) के नाम से एक ग्रुप बनाया था और पतंगोत्सव का आयोजन शरू किया था। यह बिना किसी सरकारी सहयोग के युवाओं द्वारा आयोजित झारखण्ड का शायद अकेला प्रयास था।
यही समय होता है जब प्रवासी पक्षी बड़ी तादाद में हमारे यहाँ पहुँचते हैं। पतंगबाजी शायद उनके साथ हमारी सहभागिता की प्रतिक भी है। मगर इस बार PETA (People for the Ethical Treatment of Animals) ने एक महत्वपूर्ण विषय को उठाया है. पक्षियों के समान हमारी भी आकाश में उड़ान की कामना की प्रतीक ये पतंगें इन मासूम परिंदों के लिए नुकसानदेह भी बन जाती हैं. धागे को धार देने के लिए मिलाये गए कांच के टुकड़े इन पंक्षियों को चोटिल कर देते हैं. अच्छी मेहमाननवाजी और सच्ची खेल भावना इसी में है कि हम ऐसी हरकतें न करें, और इस त्यौहार को पतंग उत्सव के रूप में मनाएं, पतंग प्रतियोगिता के रूप में नहीं. (PETA के इस नेक प्रयास में उसे समर्थन दें).
अरे-अरे वो देखिये...
चली-चली रे पतंग मेरी...........



Monday, January 12, 2009

युवा सन्यासी: स्वामी विवेकानंद


स्वामी विवेकानंद जिनकी पहचान तब तक अधूरी है जब तक इनके नाम के आगे 'युवा सन्यासी' की उपमा न लगा दी जाए, और अधूरी है भारत की पहचान भी जिसके बारे में कहा जाता है कि "भारत को जानना हो तो विवेकनानंद को जानो।" एक युवा दृष्टी से इस देश को देखते हुए पुरातन से नवीन के मन्त्र को ढूंढने और एक नए दृष्टिकोण को स्थापित करने में स्वामीजी का देश सदा ऋणी रहेगा। स्वामी जी ने न सिर्फ़ आध्यात्मिक जगत को प्रभावित किया बल्कि राजनीतिक जगत का एक वर्ग भी उनसे प्रेरणा पाता था, जिसकी स्वीकारोक्ति पं. नेहरू ने भी की थी। युवा भारत और युवा शक्ति का सपना देखने वाले स्वामीजी के 'उत्तिस्थत, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत' के जयघोष को आज पुनः आत्मसात करने की जरुरत है, तभी युवा भारत की अवधारणा सत्य हो पायेगी।
स्वामी जी की 146 वीं जयंती पर हमारा श्रद्धापूरित नमन।

Saturday, January 3, 2009

भारतीय चित्रकला की धरोहर- मंजीत बावा

     भारतीय चित्रकला के सशक्त हस्ताक्षर मंजीत बावा, जिन्हें आदर से लोग बाबा भी कहते थे नहीं रहे. ३ साल तक कोमा में रहने के पश्चात 29 दिसम्बर की सुबह उनका निधन हो गया. 
     पंजाब के धुरी में 1941 में जन्मे बाबा ने दिल्ली आर्ट कॉलेज और लन्दन स्कूल ऑफ़ प्रिंटिंग से चित्रकारी के गुर सीखे. 'प्यार और शान्ति', 'बांसुरी' , 'कृष्ण' आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ थीं. काली और शिव को वो भारत के प्रतीक के रूप में देखते थे. उनकी कला सूफी दर्शन, आध्यात्म और भारतीय मिथकों से प्रभावित रही. कैनवास पर तीखे रंगों की स्याही से उकेरी गई कला उनकी विशिष्टता थी. अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय चित्रकला को प्रसिद्धि दिलाने में उन्होंने अहम् भूमिका निभाई थी. हाल ही में लगभग १.५ करोड़ में नीलाम की जाने वाली अपनी एक पेंटिंग के लिए भी वो चर्चा में रहे थे.
     कला के इस अथक साधक को हमारी और से श्रद्धांजली.

Monday, December 29, 2008

ब्लौगिंग का सफर

ब्लौगिंग का सफर

एक और साल जाने को है, और आने को है एक नया साल। आज गुजरे वर्ष को एक बार जब पलट कर देखता हूँ तो ऐसा लगता है यह वर्ष शायद अब तक के जीवन का सबसे व्यर्थ वर्ष रहा होता। हाँ यह वर्ष भुला ही दिए जाने लायक रहता यदि इस वर्ष मैं ब्लौगिंग में न आया होता। क्योंकि उपलब्धि के नाम पर इस साल मेरे लिए मात्र ब्लौगिंग ही है।

2007 के अंत से ही ब्लौगिंग शुरू करने का प्रयास शुरू कर दिया था जो इस वर्ष स्वरुप ले सका। अपने युवा समूह 'धरोहर' (An Amateur's Club) को ब्लॉग के रूप में लाना इसे एक नया उत्साह देने के समान था।

विज्ञानं कार्यशाला के माध्यम से अरविन्द मिश्र, जाकिर अली 'रजनीश', जीशान जैदी, मनीष गोरे आदि जैसी हस्तियों से परिचय, राही मासूम रजा पर आधारित ब्लॉग और 'वांग्मय' के फिरोज़ अहमद साहब से संपर्क, धरोहर को सहेजने के मेरे प्रयास में 7 नए सहयात्रियों- केशव दयाल जी, परिमल जी, नीरज जी, विनीता यशश्वि जी, मेरी माला मेरे मोती ब्लॉग, मंसूर अली जी और अशोक कुमार पांडे जी का जुड़ना ब्लौगिंग के माध्यम से ही सम्भव हुआ। सचिन मल्होत्रा, रौशन जैसे मित्र और आशीष खंडेलवाल जैसे मार्गदर्शक भी ब्लौगिंग के माध्यम से मिले।

'भड़ास' और 'मेरे अंचल की कहावतें' ब्लॉग पर भी मुझे अभिव्यक्ति का अवसर मिला।

ब्लौगिंग में उत्साह बढ़ने वाले टिप्पणीकारों के प्रति भी मैं आभार प्रकट करता हूँ।

हाँ, नन्दलाल जी के 'जल संरक्षण अभियान' से जुड़ने और मेधा पाटेकर व संदीप पांडे से मुलाकात के लिए भी यादगार रहेगा यह वर्ष।

अब जैसी की परम्परा है आने वाले वर्ष पर ख़ुद से नए वादे करने की तो अपने कुछ शुभचिंतकों के आग्रह को स्वीकार करते हुए आप सभी ब्लौगर्स से भी वादा करता हूँ एक नया ब्लॉग 'गांधीजी' पर शुरू करने का। आशा है नव वर्ष में भी सभी ब्लौगर्स का सहयोग व प्रोत्साहन मिलता रहेगा।

सभी ब्लौगर्स को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।


Thursday, December 25, 2008

राही मासूम रजा: हिंदुस्तानियत के प्रतीक पुरूष


राही मासूम रजा : हिंदुस्तानियत के प्रतीक पुरूष

राही मासूम रजा भारत की गंगा-यमुनी संस्कृति और हिन्दी व उर्दू की स्वाभाविक एकता के प्रतीक पुरूष थे। दुर्भाग्यवश उनको आज तक मुख्यतः ' आधा गाँव 'के लेखक या दूरदर्शन धारावाहिक 'महाभारत' तथा 'नीम का पेड़' के लेखक के रूप में ही जाना जाता रहा। सौभाग्य से यदि मुझे डॉ. एम. फिरोज़ अहमद के संपादन में आई त्रैमासिक 'वांग्मय' का 'राही मासूम रजा अंक' न मिला होता तो उनके बारे में मुझे भी मात्र यह सतही जानकारी ही रहती।
जयशंकर प्रसाद ने कहा था- 'हर अमंगल के पीछे मंगल कामना होती है.' राही साहब की जिंदगी इसकी प्रत्यक्ष मिसाल है. परिस्थितियों के दबाव ने यदि उन्हें अलीगढ छोड़ने को विवश न किया होता तो शायद हम हिन्दी सिनेमा के संभवतः सबसे रचनात्मक व्यक्तित्व से रूबरू न हो पाते।
क्या आप विश्वास कर पाएंगे कि हृषिकेश मुखर्जी की कालजयी कृति 'गोलमाल' के संवाद लेखक राही साहब थे ! सुभाष घई की 'क़र्ज़' अमिताभ की 'आखरी रास्ता', यश चोपडा की 'लम्हें' और बी. आर. चोपडा की 'निकाह' आदि उनकी बहुमुखी प्रतिभा की झलक मात्र हैं।
साहित्यकार के अलावे एक भाई, पति या पिता के रूप में उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को उनकी बहन और उनकी पत्नी के साथ लिए गए साक्षात्कारों के माध्यम से जानना एक नवीन अनुभव रहा. राही साहब के लेखों और साक्षात्कारों से उनकी इस देश की मिटटी और संस्कृति से जुड़े होने की कसक भी दिखी।
राही साहब के विविधतापूर्ण व्यक्तित्व को हम तक सहजता से उपलब्ध कराने के दुसाध्य प्रयास में सफलता के लिए 'वांग्मय' की पुरी टीम बधाई की पात्र है. आशा करता हूँ की इसके संपादक फिरोज अहमद जो स्वयं भी राही साहब के क्रितित्व पर आधारित ब्लॉग (rahimasoomraza.blogspot.com) का संचालन करते हैं, को उनके इस अभिनव प्रयास में अन्य साथी ब्लौगर्स का भी सक्रिय सहयोग व समर्थन मिलेगा.




Friday, December 19, 2008

प्रगति और प्रकृति: संपूरक या विलोम

ब्रेक के बाद
ब्रेक के दौरान पिछले दिनों दिल्ली जाना हुआ. वहाँ अपनी व्यस्तता से कुछ पल निकाल जंतर-मंतर गया। जंतर-मंतर की विशेषताओं का जिक्र अगली किसी पोस्ट में, मगर यहाँ जिस विषय को उठा रहा हूँ वह 'landscape' (भू-दृश्य) के संरक्षण को लेकर है। क्या हम ताजमहल को बड़ी-बड़ी इमारतों से घिरा हुआ देखने की वीभत्स कल्पना कर सकते हैं! यदि नहीं तो अपनी विरासत के प्रति हमारी उपेक्षा का क्या कारण है ? क्या प्रगति का अर्थ प्रकृति पर चढाई करना और उसपर विजय पाना ही है ?
कभी किसी गाँव जाना हुआ, वहां सड़क के किनारे एक पेड़ थोड़ा झुक सड़क की दूसरी ओर तक आ गया था। गाँव वाले अब थोड़ा घूम कर सड़क पार करने लगे थे। उनकी परेशानी को देख मैंने पूछा -" इस पेड़ को काट क्यों नही देते!" एक ग्रामीण ने जवाब दिया- " क्यों भला! देखिये तो कितना सुंदर लग रहा है।" क्या यह सौन्दर्यदृष्टि हम तथाकथित सभ्य शहरियों के पास है ?
मैं तो अपनी व्यस्तता के बाद वापस आ गया, मगर यदि अंधाधुंध भागते इस प्रगतिशील समाज ने थोडी देर ब्रेक ले अगर इन सवालों पर न सोचा तो प्रकृति उसे ब्रेक से वापस आने की फुर्सत नहीं देगी।

Tuesday, December 2, 2008

Just a Break

थोडी व्यस्तता की वजह से ब्लोगिंग से दूर हूँ। जल्द नए और रोचक पोस्ट्स के साथ नियमित होऊंगा.
सखेद-
अभिषेक मिश्र.
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