Friday, July 9, 2021

गुरुदत्त-संजीव कुमार: दो जिंदगानी, इक सी कहानी, किस्मत है...

 



9 जुलाई गुरूदत्त और संजीव कुमार दोनों की ही जन्मतिथि है। दोनों ही अद्वितीय प्रतिभा के धनी कलाकार और दोनों ही लगभग समान मनोदशा से गुजरते असमय मृत्यु के आगोश में ही आखिरकार सुकून पा सके। 

किस्मत है...


वो मर गए, वो जिंदा हैं, खुश हैं, जिंदगी के साथ आगे बढ़ गए, जिंदगी के फ़लसफ़े पर ज्ञान देते हैं... किस्मत है...


हाँ, किस्मत ही है जो सीधे तो नहीं पर अप्रत्यक्ष रूप से दोनों को जोड़ती भी है। के आसिफ़ साहब ने 'Love And God' के लिए गुरुदत्त का चयन किया। उनकी मृत्यु के बाद संजीव कुमार के साथ यह फ़िल्म बननी शुरू हुई। 



इस फ़िल्म की भी अपनी ही किस्मत थी। फ़िल्म निर्माण के मध्य निर्माता-निर्देशक के आसिफ खुद ही दुनिया छोड़कर चले गए, 80 के दशक में उनकी पत्नी अख्तर आशिफ ने अपने पति के अधूरे ख्वाब को पूरा करने का फैसला किया। काफी कोशिशों और करीब 20 सालों से ज्यादा वक्त के बाद आखिरकार 1986 में ‘लव एंड गॉड’ प्रदर्शित हुई। यह फ़िल्म नौशाद और रफी की भी आखिरी फिल्म बनी, फिल्म की हिरोइन निम्मी की भी ये आखिरी फिल्म रही और अंततः इस फिल्म के हीरो संजीव कुमार भी इस फिल्म को नहीं देख पाए। रिलीज से पहले ही संजीव कुमार भी इस दुनिया में नहीं रहे।


किस्मत है...

Monday, June 21, 2021

हर वर्ग भेद की झलक 'रेलवे प्लेटफॉर्म' पर



6 जून को प्रसिद्ध अभिनेता सुनील दत्त की जन्मतिथि थी। फ़िल्म इंडस्ट्री के ये उन चंद नामों में है जिनके जीवन की कहानी भी पूरी फ़िल्मी यानी रोचक और प्रेरक है। मात्र 5 वर्ष की अल्पायु में पिता का साया सर से उठ गया, 18 की उम्र में बंटवारे के बाद बड़ी कठिनाईयों से पाकिस्तान से भारत पहुंचे, पढ़ाई पूरी की, रेडियो प्रस्तोता बने, उसी दौरान निर्देशक रमेश सैगल के संपर्क में आये और उनके साथ पहली फ़िल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' मिली। फिल्मों में उतार-चढ़ाव देखे, नायक, खलनायक, चरित्र अभिनेता होते राजनीति में पहुंचे, नर्गिस से प्रेम, विवाह, उनकी कैंसर से मृत्यु... और इन सबके बाद बेटे संजय दत्त को लेकर परेशानियां... एक फ़िल्म तो सिर्फ़ उनके ऊपर बननी चाहिए...

बहरहाल, उनकी स्मृति में उनकी पहली फिल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' देखी। 1955 में भी हमारा हिंदी सिनेमा कहानी, स्क्रिप्ट, प्रस्तुति आदि के मामले में कितना समृद्ध था! गीत-संगीत, अभिनय आदि तो थे ही... 


यह फ़िल्म भी किसी मायने में कम नहीं। एक ट्रेन अगले किसी स्टेशन पर बाढ़ से पटरी डूबे होने के कारण एक अंजान छोटे से स्टेशन पर रुक जाती है। ट्रेन जिसमें कि एक अमीर वर्ग है जिसमें से किसी को अगले दिन क्रिकेट मैच देखना है तो किसी के दोस्त के कुत्ते की मैरेज है। अब जब ट्रेन रुक ही गई है तो इनके लिए पिकनिक का ही स्कोप है। पानी नहीं है तो बियर पीने का भी...

वहीं एक व्यापारी है जो इस आपदा में अवसर की संभावना देखते हुए एक छोटी राशन की दुकान और उससे लगा कुंआ भाड़े पर ले लेता है।

उसकी मान्यता है कि-


                                                                  
(सुण कर इस पापी को तानो/ बदल न लीजो अपणो ठिकाणो /
म्हारो थारो प्रेम पुराणो/ हम हैं थैले तुम हो खज़ानो /
भरते रहियो दास की झोली देते रहियो दान/ तुम्हारी जय जय हो भगवाण)








"बल बेचें बलवान जगत में

घर बेचें घरदार

अमन की रक्षक कौमें बेचें

ज़हरीले हथियार

हाँ तो फिर मैंने पानी बेचा

तो कैसी हाहाकार

फिर मैंने पानी बेचा

तो क्यों है इतनी हाहाकार

अंधेर नगरी चौपट राजा..."

एक पंडित जी हैं जो यहां भी धार्मिक क्रियाकलापों की संभावना निकाल दक्षिणा जमा करने की गुंजाइश भी निकाल लेते हैं।

इसी क्रम में कवि प्रदीप की प्रसिद्ध रचना 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान...' की साहिरमय पैरोडी 'देख तेरे भगवान की हालत क्या हो गई इंसान...' भी सामने आती है।

"उन्हीं की पूजा प्रभू को प्यारी

जिनके घर लक्ष्मी की सवारी

जिनका धन्धा चोर बज़ारी

हमको दें भूख और बेकारी

इनको दे वरदान

कितना बदल गया भगवान"

अमीरों और श्रमिकों के बीच एक मध्यवर्गीय नायक भी है पढ़ा-लिखा, बेरोजगार- 'त्रिशंकु'

यह भी गौरतलब है कि उस क्षेत्र का नाम है 'अंधेर नगरी'

"राजा जी ने कुछ हाथी और

कुछ घोड़े हैं पाले

इन्हें न कोई फ़िक्र न चिंता

ये हैं महलों वाले

इनके राज में पड़ गए हमको

अपनी जान के लाले

दोनों हाथों लूट रहे हैं

काले धंधों वाले

जिस मोल भाजी उस मोल खाजा हो       

अंधेर नगरी चौपट राजा

अंधेर नगरी चौपट राजा..."

फ़िल्म में सूत्रधार के रूप में एक कवि महोदय भी हैं, ये सलाह और टिप्पणी तो दे सकते हैं लेकिन दोनों हाथ न होने की वजह से और कुछ कर नहीं सकते। उनका फ़लसफ़ा है कि 2 और 2 सिर्फ चार ही नहीं 22 भी होते हैं।


(नैना, राजकुमारी और विमला: "विधाता ने तो तुम तीनों को एक जैसा बनाया है, अमीर-गरीब तो इंसान ने बनाया है।"- कवि)

फ़िल्म अंत आते-आते बॉलीवुड की सुखांत की परंपरा के अंतर्गत ही अपनी पटरी पर लौट आती है लेकिन तब तक उसे अपने सामर्थ्य में जो संदेश देना था दे चुकी होती है।

Wednesday, June 16, 2021

मल्टीनेशनल्स पर इशारों में वोकल- क्रिस्टियानो रोनाल्डो

 



यूरोपीय चैंपियनशिप में सबसे ज्यादा गोल करने का रिकॉर्ड बनाने वाले क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने एक सांकेतिक इशारे मात्र से कोका कोला को लगभग 4 अरब डॉलर का नुकसान पहुंचा दिया।

यूरो कप में सोमवार को पुर्तगाल और हंगरी के मैच से पूर्व संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करने के लिए रोनाल्डो आए। उनके सामने कोका-कोला की दो बोतलें रखी हुईं थीं। सवाल-जवाब का दौर शुरू होता इससे पहले ही रोनाल्डो ने कोका-कोला की दोनों बोतलों को हटाकर दूसरी ओर रख दिया। यही नहीं, उन्होंने मेज पर रखी पानी की बोतल को उठाकर दिखाया। उनके इस इशारे का मतलब था कि सॉफ्ट ड्रिंक की जगह पानी का इस्तेमाल करो। यहाँ यह भी गौरतलब है कि कोका- कोला यूरो कप के प्रायोजकों में भी शामिल है।

एक बड़े सितारे के एक छोटे से इशारे का असर यह हुआ कि यह शेयर बाजार में कंपनी के लिए 1.6% की भारी गिरावट का कारण बन गया। आर्थिक दृष्टि से, कोका-कोला के शेयर्स की कीमत 242 अरब डॉलर से घटकर 238 अरब डॉलर हो गई। यानी कंपनी को 4 अरब डॉलर (करीब 29 हजार 333 करोड़ रुपए) का घाटा हुआ।

रोनाल्डो ने एक बार कहा था, ‘मैं अपने बेटे को लेकर बहुत सख्त हूं। कभी-कभी वह कोक और फैंटा पीता है। वह चिप्स खाता है। वह जानता है कि मुझे यह पसंद नहीं है।’

यह प्रकरण रोनाल्डो या किसी भी देश की आंतरिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि कारण से प्रभावित हो सकता है। कल को कोई दूसरा तर्क भी आ जायेगा।

पर इस कोरोना काल में हमने देखा है कि बहुप्रचारित और मल्टीनेशनल खान-पान की चीजें हमारे कितने काम आई हैं और इन्होंने हमारे शरीर पर क्या असर डाला है, चाहे इसके प्रचारक तथाकथित देवी-देवता या 'भगवान' ही रहे हों...

गर्मी के दिन हैं। गले को ठंडा करने की जरूरत महसूस होती ही है। मगर वास्तव में ठंडा मतलब क्या होना चाहिए? यहां तो हम 'लोकल पर वोकल' हो सकते हैं। हमारे फलों के जूस, सत्तू और बेल के शर्बत जैसे विकल्प पौष्टिक भी होंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहयोग देने वाले भी। सिर्फ व्हाट्सएप फॉरवर्ड ही नहीं, ऐसी छोटी-छोटी पहलें भी हमें एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में प्रदर्शित कर सकती हैं...

Sunday, June 6, 2021

आग: बात "100 साल पहले की जब मैं दस बरस का था..."

 



शीर्षक का डायलॉग मेरा नहीं भई अपने ही RK बैनर तले पहली ही फ़िल्म से निर्देशक के रूप में पारी शुरू करने वाले राज कपूर साहब का है। 2 जून को उनकी पुण्यतिथि पर 'आग' देखी। दर्शकों की कुल आयु के समकक्ष पुरानी यह फ़िल्म भविष्य में शो मैन बनने वाले नौजवान के आरंभिक सफ़र के आगाज़ को भी दर्शाती है।

 


आज भी कोई आम युवा अपनी प्रेरणा या कल्पना को किसी रचना के माध्यम से सामने लाना चाहता है तो कविता, कहानी आदि का सहारा लेता है। वो राज कपूर थे तो भले फ़िल्म ही बना दी, मगर उसमें उनके बचपन की किसी स्मृति, किसी चाहत का कोई अंश जरूर रहा होगा। और उनके जैसे रोमांटिक व्यक्ति के लिए यह अस्वाभाविक भी नहीं।

 


बचपन में बिछड़ चुकी एक दोस्त जिसके साथ एक नाटक बनाने का इरादा था, को उसके निक नेम के साथ युवावस्था में भी ढूंढ़ता एक नौजवान उनसे कहाँ अलग है जो आज भी किसी नाम को सोशल मीडिया में तलाशते रहते हैं। पिता की मर्जी के विरुद्ध सुरक्षित नौकरी का विकल्प छोड़ अपनी मर्जी से थियेटर चुनने के लिए घर छोड़ने की सोच 1948 में! यह उस राजकपूर का स्वर्णिम दौर था जो किसी दबाव में नहीं आया था।  

 अपनी पहली ही फ़िल्म में ख़ुद को आग में झुलसा कुरूप दिखाना भी सहज नहीं रहा होगा।

फ़्लैश बैक में चलती कहानियां मुझे बेहद पसंद हैं। इसमें पारंगत होने के दावे कईयों को लेकर किये जाते हैं लेकिन अपनी पहली ही फ़िल्म में एक युवा फ़िल्म मेकर का यह अंदाज चुनना अपनी कहानी कहने के प्रति पूर्ण आश्वस्ति ही दर्शाता है।



यह मात्र एक फ़िल्म नहीं एक युवा मन की अपनी भावना भरी कथा ही है जिसे अभिव्यक्त करने के लिए उसने रुपहले पर्दे के विकल्प को चुना है। इसे प्रस्तुत करने में उसका साथ छोटे भाई शशि कपूर और रिश्तेदार प्रेमनाथ ने दिया; तो यहीं से दोस्त के रूप में नर्गिस का भी साथ जुड़ा।


शोर-शराबे से दूर सरल बोल और सहज संगीत भी इस फ़िल्म की खासियत है जिसकी कमियों को दूर करते राजकपूर ने आगे चल अपने नौरत्न ही गढ़ लिए। यह भी समझा जा है कि देश विभाजन के उस उथल पुथल के दौर में फ़िल्म निर्माण को लेकर कितनी तकनीकी दिक्कतें भी सहनी पड़ी होंगीं!



अवकाश में पुराने ख़तों को सहेजने सा अनुभव है ऐसी फिल्मों से गुजरना...

 

Sunday, May 30, 2021

चीन में एक प्राचीन बौद्ध स्तूप का पुनर्निर्माण

भारत और चीन विश्व की प्राचीनतम सभ्यताएं हैं तो इनके आपस में प्राचीन संबंध स्वाभाविक है। बीच-बीच में विवाद भी उठते रहते हैं, जो न होते तो इस उपमहाद्वीप की स्थिति और बेहतर होती। 

दोनों देशों को जोड़ने वाले विभिन्न सूत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका बौद्ध धर्म की भी है जिसे स्थापित करने में सम्राट अशोक की भी अहम भूमिका रही। माना जाता है कि महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात उनके अवशेषों को एकत्र कर उन्हें विश्व के विभिन्न हिस्सों में भेजा गया था, जिनपर 84000 स्तूपों का निर्माण हुआ था। 

कहते हैं चीन में इनके आधार पर 19 स्तूपों का निर्माण हुआ था, जिनमें से अधिकतर समय के साथ प्राकृतिक प्रभाव और समुचित देखरेख के अभाव के कारण ढ़ह गए। चार स्तूप जिनके प्रमाण आज शेष हैं चीनी शहरों- नांगचेन, शियान, नानजिंग और झेजिंयाग प्रांत के नजदीक आयुवांग में थे। नांगचेन स्तूप के अवशेष कई सालों से बिखरे पड़े थे, लेकिन यहाँ से एक स्तंभ जिसपर इसकी ऐतिहासिकता का उल्लेख था के पाये जाने से संबद्ध लोगों में इसके प्रति रुचि और जागरूकता बढ़ाई।
इसके परिणामस्वरूप ज्ञालवांग द्रुकपा जो बौद्ध धर्म की महायान शाखा से जुड़ी द्रुकपा परंपरा के धार्मिक प्रमुख हैं के प्रयासों से 2007 में इस स्तूप के जीर्णोद्धार के प्रयास आरंभ हुए। इस धार्मिक समुदाय के अंतर्गत हिमालय क्षेत्र के लगभग 1000 बौद्ध मठ आते हैं। पुनर्निर्माण की इस परियोजना में बुद्ध की एक विशाल स्वर्णिम प्रतिमा और अशोक स्तंभ की प्रतिकृति को भी शामिल किया गया है।
बौद्ध धर्म की जो शाखायें पूरे एशिया में फैली हैं उनका जड़ सभी को आपस में जोड़े रह सकता है। गौतम बुद्ध के शांति का संदेश को समझना और आचरण में लाना इस पूरे क्षेत्र के विकास को सुनिश्चित करेगा।

Tuesday, February 16, 2021

वैलेंटाइन डे पर हिरामन की तीसरी कसम

नाटक का आमंत्रण 

'मारे गए गुलफाम' जब फणीश्वरनाथ रेणु जी ने लिखी होगी उनकी एक भावना रही होगीजब शैलेंद्र ने इसपर फ़िल्म बनाने का सोचा होगा उनकी भी एक भावना रही होगीराजकपूर ने जब हिरामन की भूमिका चुनी होगीउनकी भी एक भावना रही होगी और जब वहीदा रहमान ने कहानी सुन भावुक होते हीराबाई के अपने रोल के लिए स्वीकृति दी उनकी भी एक भावना रही होगी। एक भावना प्रधान कहानी आज भी लोगों को अपने साथ बांध लेती है चाहे माध्यम जो भी हो। ऐसा ही फिर दिखा जब इस प्रसिद्ध कहानी का मंचन रंगमंच पर भी हुआ। 14 फरवरी की संध्या नई दिल्ली के LTG ऑडिटोरियम में मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के छात्रों की मैथिली लोकरंग (MAILORANG) के माध्यम से इस नाटक का मंचन किया। कथानक ही ऐसा है कि दर्शक तो मंत्रमुग्ध थे ही कलाकार भी स्पष्ट दिख रहा था कि काफी समय अपने किरदार से बाहर नहीं निकल पाए थे।



वहाँ पैदल ही जाना है... सजन रे झूठ मत बोलो... हीराबाई को ले जाता हिरामन 


कथानक ज्यादातर लोग जानते ही हैं कि कहानी एक गाड़ीवान हिरामन की है जो बैलगाड़ी चलाता है, चोरी का माल ढ़ोते हुए एक बार पुलिस पकड़ लेती है। इसके बाद हिरामन कभी भी चोर बाजारी से माल नहीं ढ़ोने की कसम खाता है। एक और कसम खाता है कि बांस की लदाई नहीं करेगा। लेकिन तीसरी कसम उसे किसी पुलिसिया चक्कर से परेशान होकर नहीं बल्कि दिल टूटने पर खानी पड़ती है, जब नौटंकी कंपनी में काम करने वाली हीराबाई उसकी बैलगाड़ी से सफर करती है। 

नौटंकी में प्रदर्शित एक नृत्य प्रस्तुति 


हिरामन का भोलापन हीराबाई को उसकी ओर आकर्षित करता है। रास्ते में वो उसे महुआ घटवारिन की कहानी सुनाता है जिसे एक सौदागर ने खरीद लिया था, और इस कारण उसका प्यार अधूरा रह जाता है। कहानी में खोया भावुक हृदय हिरामन उन दोनों के बीच अपने लिए एक कोमल रिश्ता महसूस करता है। 


पान खाये सैयां हमार...


उसपे विश्वास इतना करता है कि अपनी दिन भर की कमाई हीराबाई के पास जमा करवा देता है। कुछ दिन बाद पता चलता है कि वह किसी और मेले के लिए जा रही है। वह स्टेशन जाता है जहां हीराबाई की बातें सुनकर हिरामन का दिल टूट जाता है कि उसे भी एक सौदागर ने खरीद लिया है। आखिरी विदा देने के बाद हिरामन तीसरी कसम खाता है कि वह अब किसी भी नौटंकी वाली को गाड़ी पर नहीं बिठाएगा। 

सपने जगा के तूने कहे को दे दी जुदाई... 

पता नहीं वो समझ भी पाता है या नहीं कि व्यवहारकुशल हीराबाई को अपने पास रोके रख पाना उस जैसे हिरामनों के लिए संभव नहीं हो सकता। उसके इस हश्र को रेणु की ही कहानी 'रसप्रिया' का नायक मिरदंगिया भांप जाता है जो इस कहानी का सूत्रधार भी है और आजकल उसकी ही कहानी लोगों को सुनाता फिर रहा है। अपनी भी अधूरी कहानी लिए मिरदंगिया जानता है कि कोई भी कहानी अधूरी ही अच्छी लगती है। हिरामन की कहानी भी अधूरी ही छूट जाती है, जाने कभी पूरी हुई भी या नहीं। वैसे भी हिरामनों की कहानियां न तो पूरी होती हैं न कोई उनके अंत के बारे में जानने में दिलचस्पी ही रखता है...

काहे को प्रीत जगाई, काहे को दुनिया बनाई... हिरामन के मन के भाव जताता मिरदंगिया 

युवा निर्देशक राजीव रंजन झा और सह निर्देशक रितिका का निर्देशन प्रभावशाली था। संगीत में अनिल मिश्र का योगदान नाटक को काफी समृद्ध कर रहा था। सभी कलाकारों का अभिनय अच्छा था लेकिन हिरामन की भूमिका निभा रहे अक्षय सिंह ठाकुर और मिरदंगिया की भूमिका निभा रहे गौरव की भूमिका ने विशेष रूप से प्रभावित किया, जिनकी आँखें भी अभिनय में उनका न सिर्फ बखूबी साथ दे रही थीं बल्कि दर्शकों को खुद से बांध भी ले रही थीं...

नाटक की संगीत टीम

कुल मिलाकर नाटक एक अच्छा  था सिर्फ इस एक और राय के साथ कि नाटक में फ़िल्म से लिये कुछ गाने अच्छे तो लग ही रहे थे, नृत्य और संगीत संयोजन भी अच्छा था; लेकिन नाटक कहानी पर आधारित था फ़िल्म पर नहीं; ऐसे में स्वरचित रचनाओं को शामिल किये जाने की संभावनाओं पर विचार करना चाहिए था...

नाटक की पूरी टीम 

Thursday, November 26, 2020

तेरी तस्वीर मिल गई: उल्कापिंड के पहले फोटोग्राफ की वर्षगांठ


खगोलीय पिंडों में उल्का का एक अलग ही स्थान है जिससे गंभीर शोधकर्ता ही नहीं आम जन भी परिचित हैं। 

आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का (meteor) और साधारण बोलचाल में 'टूटते हुए तारे' अथवा 'लूका' कहते हैं। उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड (meteorite) कहते हैं। प्रायः प्रत्येक रात्रि को उल्काएँ अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं, किंतु इनमें से पृथ्वी पर गिरनेवाले पिंडों की संख्या अत्यंत अल्प होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से इनका महत्व बहुत अधिक है क्योंकि एक तो ये अति दुर्लभ होते हैं, दूसरे आकाश में विचरते हुए विभिन्न ग्रहों इत्यादि के संगठन और संरचना (स्ट्रक्चर) के ज्ञान के प्रत्यक्ष स्रोत केवल ये ही पिंड हैं।

यद्यपि मनुष्य इन टूटते हुए तारों से अत्यंत प्राचीन समय से परिचित था, प्राकएतिहासिक काल से ही इनके देखे जाने के संकेत उनकी रॉक आर्ट जैसी रचनाओं से मिलती रही हैं, तथापि आधुनिक विज्ञान के विकासयुग में मनुष्य को यह विश्वास करने में बहुत समय लगा कि भूतल पर पाए गए ये पिंड पृथ्वी पर आकाश से आए हैं। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में डी. ट्रौयली नामक दार्शनिक ने इटली में अल्बारेतो स्थान पर गिरे हुए उल्कापिंड का वर्णन करते हुए यह विचार प्रकट किया कि वह अंतरिक्ष से टूटते हुए तारे के रूप में आया होगा, किंतु किसी ने भी इसपर ध्यान नहीं दिया। सन् 1768 ई. में फादर बासिले ने फ्रांस में लूस नामक स्थान पर एक उल्कापिंड को पृथ्वी पर आते हुए स्वत: देखा। अगले वर्ष उसने पेरिस की विज्ञान की रायल अकैडमी के अधिवेशन में इस वृत्तांत पर एक लेख पढ़ा। अकैडमी ने वृत्तांत पर विश्वास न करते हुए घटना की जाँच करने के लिए एक आयोग नियुक्त किया जिसके प्रतिवेदन में फादर बासिले के वृत्तांत को भ्रमात्मक बताते हुए यह मंतव्य प्रकट किया गया कि बिजली गिर जाने से पिंड का पृष्ठ कुछ इस प्रकार काँच सदृश हो गया था जिससे बासिले को यह भ्रम हुआ कि यह पिंड पृथ्वी का अंश नहीं हैं। तदनंतर जर्मन दार्शनिक क्लाडनी ने सन् 1794 ई. में साइबीरिया से प्राप्त एक उल्कापिंड का अध्ययन करते हुए यह सिद्धांत प्रस्तावित किया कि ये पिंड खमंडल के प्रतिनिधि होते हैं। यद्यपि इस बार भी यह विचार तुरंत स्वीकार नहीं किया गया, फिर भी क्लाडनी को इस प्रसंग पर ध्यान आकर्षित करने का श्रेय मिला और तब से वैज्ञानिक इस विषय पर अधिक मनोयोग देने लगे। सन् 1803 ई. में फ्रांस में ला ऐगिल स्थान पर उल्कापिंडों की एक बहुत बड़ी वृष्टि हुई जिसमें अनगिनत छोटे-बड़े पत्थर गिरे और उनमें से प्राय: दो-तीन हजार इकट्ठे भी किए जा सके। विज्ञान की फ्रांसीसी अकैडमी ने उस वृष्टि की पूरी छानबीन की और अंत में किसी को भी यह संदेह नहीं रहा कि उल्कापिंड वस्तुत: अंतरिक्ष से ही पृथ्वी पर आते हैं।

अभी भी इनसे जुड़ी एक घटना इतिहास में जुड़नी शेष थी। 27 नवंबर, 1885 की तारीख को उल्कापिंड की पहली तस्वीर लिए जाने की तारीख के रूप में याद किया जाता है। यह तस्वीर Austro-Hungarian astronomer, Ladislaus Weinek द्वारा ली गई थी। 


यह उल्कापिंड Andromedids meteor shower से जुड़ा माना जाता है जो Biela's Comet से संबद्ध था; जिसके 6 दिसंबर, 1741 से ही देखे जाने का उल्लेख मिलता रहा है।

Lick Observatory और Meudon Observatory, की सहायता से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर Weinek ने चन्द्रमा का पहला एटलस भी तैयार किया। 

चंद्रमा का Crater Weinek और Asteroid 7114 Weinek का नामकरण उनके नाम के आधार पर ही किया गया।

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