Friday, February 13, 2009

पराया नहीं है वैलेंटाईन डे

पराया नहीं है वैलेंटाईन डे


पश्चिम से आ रही किसी परम्परा के नाम पर अंधविरोधी मानसिकता पर पुनर्विचार की जरुरत है। जरा गौर से देखें तो वैलेंटाईन डे हमारी उसी प्राचीन परम्परा का वारिस है जो अतीत के किसी अध्याय में अपनी जड़ों से अलग हो आज पश्चिमी रास्तों से गुजरता अपनी जड़ों को धुन्धता वापस आ रहा है।
क्या कारण है की वैलेंटाईन डे तभी मनाया जाता है जब की हमारे यहाँ वसंत अपने पूरे शबाब पर होता है, जबकि पश्चिमी 'डेज' ऋतुओं पर आश्रित नहीं होते। हमारे यहाँ प्राचीन काल से ही वसंत में 'वन-विहार', 'झुला दोलन' , 'पुष्प-श्रृंगार' आदि की परम्परा रही है। 'मदन-उत्सव', 'शालभंजिका पर्व' आदि का उल्लेख हमारे आदि साहित्यिक और धार्मिक ग्रंथों में भी है। कालिदास व बाणभट्ट की रचनाओं तथा 'जातक कथाओं' में भी वसंत क्रीडाओं का अनूठा वर्णन किया गया है। 'वसंत पंचमी' से आरम्भ होकर'फाल्गुन पूर्णिमा' तक जारी रहने वाला प्रकृति के संग उल्लास का यह पर्व किसी विदेशी 'डे' या 'वीक' का मोहताज नहीं है।
अंध विरोध और गुंडागर्दी के साथ-साथ अत्याधुनिक होने के भ्रम में जीने वालों के लिए भी इस उत्सव का प्रतिषेध के बजाय इसका वास्तविक भारतीयकरण ही सही समाधान होगा. क्यों न हम मौका दें इस भटके हुए अतीत के एक अंश को उसका सुंदर स्वरुप लौटाने का ! मगर है कोई असली भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने में सक्षम कोई संगठन !
तो आइये हम हीं उत्सव मनाएं प्रकृति और प्रेम के इस मिलन का.....

Monday, February 9, 2009

रंग बसंती आ गया.....


जलवायु परिवर्तन की तमाम बहसों के परे जनमानस के बीच बसंत आ गया है। पीली सरसों, नए पुष्पों, नव पल्लवों के बीच कई सुकोमल भावनाओं में भी स्पंदन जागृत हो रहा है। प्रकृति दोनों हाथों से अपनी सुन्दरता के प्रदर्शन को प्रस्तुत है , मगर कंक्रीट के जंगलों के मध्य प्रकृति के लिए स्थान ही कहाँ बचा है!
तो आइये चलें बसंत-विहार के लिए उन आम जगहों से हट कर उस ओर जो तथाकथित विकास की काली छाया से थोड़े परे हैं। ऐसी ही एक खुबसूरत जगह है 'झारखण्ड के कश्मीर' के रूप में चर्चित 'हजारीबाग'। पाषाणयुगीन धरोहर और सांस्कृतिक विरासत को संजोये यह स्थल अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए भी प्रसिद्ध है। नेशनल पार्क, शालपर्णी, कन्हरि पहाड़ी जैसे पर्यटक स्थल ही नहीं छोटे-छोटे गावों और हरे-पीले खेतों में भी वैसी ही कशिश है, बस प्रकृति को निहारने वाली एक पारखी नजर चाहिए।
यह सहज-सरल सुन्दरता आपको अपने शहर के आस-पास भी मिल जायेगी, बस जरुरत है उसे मानवीय लोभ के दुष्प्रभाव से बचाने और संजोने की।
तो आइये मनाएं इस वसंत का उत्सव उसी अछूते सौंदर्य के साथ।

Thursday, February 5, 2009

और ये फरमाइश भेजी है झुमरीतिलैया के.....


     विविध भारती के अलावे कई अन्य रेडियो स्टेशनों पर यह पंक्ति हमने कई बार सुनी होगी. मगर क्या कभी यह भी जानने की कोशिश की है कि यह जगह आख़िर है कहाँ, या यह वास्तव में कहीं है भी या नहीं!
      झुमरी और तिलैया जो कि दो अलग-अलग गाँव हैं झारखण्ड के कोडरमा जिले के खुबसूरत जंगलों और पहाडों के बीच.  कहा जाता है कि इन दो क्षेत्रों के मध्य किसी राजा का कभी गढ़ था जिसके कारण यह क्षेत्र झुमरी तिलैया कहलाया.
     इस क्षेत्र के दो जुनूनी रेडियो श्रोताओं श्री रामेश्वर वर्णवाल और श्री गंगा प्रसाद मगधिया ने फ़रमाइश वाले  कार्यक्रमों में चिट्ठियां भेजना का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि हर रेडियो केन्द्र के ऐसे कार्यक्रमों में इस क्षेत्र का नाम होता ही था. ऐसा न हो पाने पर कभी-कभी उद्घोषक भी चर्चा करते थी कि आज झुमरी तिलैया से कोई फ़रमाइश नहीं आई है.
    इन जुनूनी श्रोताओं के जूनून को आज भी न सिर्फ़ उनके परिवार वाले बल्कि सारे क्षेत्र के लोग आगे बढ़ा रहे हैं.
    तो है न यह चिट्ठियों के माध्यम से अपने क्षेत्र को सारे देश में प्रसिद्धि दिलाने का अनूठा प्रयास.

Tuesday, February 3, 2009

सरस्वती पूजा और विद्यार्थी

     सरस्वती पूजा सोल्लास संपन्न हो गई. मगर अपने पीछे फ़िर छोड़ गई यह प्रश्न भी कि क्या पूजा के नाम पर युवा वर्ग इस पर्व के संदेश को आत्मसात कर पा रहा है. माँ की विदाई के समय जो भोंडा व्यवहार इन 'विद्यार्थियों' द्वारा दिखाया जाता है उसे देख क्या उनकी अपनी माँ को गर्व महसूस होता होगा! तब फ़िर माँ शारदे पर क्या गुजरती होगी!
     और विसर्जन के नाम पर स्थानीय नदियों और तालाबों की जो शामत आती है, क्या उस और देश के इस प्रबुद्ध भविष्य को नहीं सोचना चाहिए. क्या यह सम्भव नहीं कि मूर्तियों की जगह तस्वीरों का या ऐसे किसी वैकल्पिक माध्यम का प्रयोग किया जाए जिससे जल प्रदुषण में एक वर्ग की हिस्सेदारी आंशिक रूप से ही मगर कम तो हो.
    माँ शारदे सभी को सद्बुद्धि दें.

Friday, January 30, 2009

गांधीजी के साथ- गावों की ओर

(यह पोस्ट मेरे अन्य ब्लॉग gandhivichar.blogspot.com से)


भारत की आत्मा गावों में बसती रही है, मगर आजादी के बाद अर्थव्यवस्था का केन्द्र शहरों को मान विकास के मॉडल को अपनाया गया, जिसने देश की जड़ें खोखली कर दीं। यही कारण है कि आज विश्व के किसी दूसरे कोने में चले एक झोंके से भी हमारी विकास की ईमारत लड़खडाने लगती है।
भारत की आत्मा को आत्मसात करने वाले गांधीजी ने कहा था कि- " अब तक गाँव वालों ने अपने जीवन की बलि दी है ताकि हम नगरवासी जीवित रह सकें। अब उनके जीवन के लिए हमको अपना जीवन देने का समय आ गया है। ... यदि हमें एक स्वाधीन और आत्मसम्मानी राष्ट्र के रूप में जीवित रहना है तो हमें इस आवश्यक त्याग से पीछे नहीं हटना चाहिए। " "भारत गावों से मिलकर बना है, लेकिन हमारे प्रबुद्ध वर्ग ने उनकी उपेछा की है। ... शहरों को चाहिए कि वे गावों की जीवन-पद्धति को अपनाएं और गावों के लिए अपना जीवन दें। "
गांधीजी के विचारों को ही उनकी विरासत मानते हुए ग्रामोत्थान और 'ग्राम स्वराज' की दिशा में हमारा अंशदान ही उस महानात्मा के प्रति हमारी विनम्र श्रद्धांजलि होगी।

Friday, January 23, 2009

विद्रोही सुभाष की दुविधा



अपने विद्रोही स्वाभाव से ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर देने वाले सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि किसी भी युग में युवाओं कि बुनियादी सोच समान होती है। उन्हें अंजान राहें ज्यादा लुभाती हैं, जबकि समाज उन्हें अपनी आजमाई हुई लकीर की ओर ही खींचना चाहता है।
असमंजस कि यह स्थिति सुभाष जी कि तरुणाई में भी देखने को मिलती है। लन्दन में ICS के प्रशिक्षण के दौरान ही देशसेवा में आने का उन्होंने निर्णय ले लिया था, किंतु यह किस रूप में हो इसे लेकर वह दुविधा में थे। तभी उन्होंने बंगाल के वरिस्थ नेता देशबंधु चित्तरंजन दास को पत्र लिखा कि - "नौकरी करने की उनकी इच्छा बिल्कुल नहीं है, और वे स्वतंत्रता संग्राम में किसी भी रूप में भागीदारी के इच्छुक हैं।" कोई प्रत्युत्तर न पाने और अपनी संभावित भूमिका कुछ और स्पष्ट होने पर उन्होंने पुनः देशबंधु से पत्रकारिता आदि से जुड़े क्षेत्र में अपनी सेवाएं देने की पेशकश की, और स्वीकृति मिलने पर ICS से इस्तीफा देकर भारत लौट आए।
नेताजी के जीवन से आज की पीढी यदि यह संदेश भी ले सके कि कोई जन्मजात महान नहीं होता, बल्कि लक्ष्य स्पष्ट हो तो राहें ख़ुद निर्धारित की जा सकती हैं; तो यह सुभाष जी के बलिदान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
नेताजी की कुछ पसंदीदा पंक्तियाँ दोहराते हुए-
कदम-कदम बढाये जा, खुशी के गीत गए जा;
ये जिंदगी है कौम की, तूँ कौम पर लुटाये जा।

Tuesday, January 20, 2009

गंगा पर रेतीला संसार



गंगा पर रेतीला संसार

कलाकार अपनी रचनाशीलता की अभिव्यक्ति के लिए कोई--कोई मंच ढूंढ़ ही लेते हैंपानी की कमी के कारण गंगा के बीच उभर आए रेत के टीलों को ही इसबार अपनी अभिव्यक्ति का मध्यम बना लिया गया, और सैकड़ों कलाकारों, स्कूली बच्चों और आम लोगों ने अपनी कल्पनाशीलता का साक्षी बनाया माँ गंगा कोअवसर था राम छात्पार कला न्यास की ओर से अपने गुरु के जन्मदिन 19 जनवरी को 'रेत में आकृति की खोज' विषय पर आयोजित कला प्रतियोगिता कावार्षिक आयोजन का रूप ले चुका यह कार्यक्रम काशी की उत्सवप्रियता और रचनाशीलता को एक नया आयाम देता है, और स्थानीय कलाकारों और नागरिकों को अपनी कला की अभिव्यक्ति का अवसर भीआशा है यह आयोजन अपनी निरंतरता बनते हुए अन्तराष्ट्रीय स्वरुप लेगाइस अभिनव सोच को क्रियान्वित करने वाले जज्बे को सलाम
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...