Saturday, April 3, 2010

सफ़र- ए-बनारस और 'अल्केमिस्ट'

 
अरुणाचल से बनारस वाया गोहाटी जाने के क्रम में गोहाटी स्टेशन पर आदतन 'व्हीलर स्टाल' पर थोड़ी तफरीह की. (व्हीलर नाम का क्या अब तक ब्रिटिश शासन से भी कोई संबंध है क्या !) 
इसी कम में 'पाओलो कोएलो' रचित 'अल्केमिस्ट' के उसी नाम के हिंदी अनुवाद पर नजर पड़ी. मूल रचना को हिंदी में प्रवाह के साथ पढने की प्रवृत्ति के कारण अनुवाद बहुधा आकर्षित ही करते हैं, और ऐसे में अनुवादक के रूप में 'कमलेश्वर साहब' के नाम ने पुस्तक को स्टाल से उठा मेरे हाथों तक पहुंचा ही दिया. मगर सफ़र के एक तिहाई से भी कम पलों में पुस्तक ने साथ छोड़ दिया मनो - मस्तिष्क पर एक यादगार छाप छोड़ कर.
 
सहज ही नायक से तादात्मय स्थापित कर लेने वाले आम हिंदी दर्शक या पाठक को कथानक न सिर्फ पूरी अवधि में बांधे रखता है,अपितु अंत में एक तृप्ति भरी मुस्कान को स्वतः ही अपने चेहरे पर ले आने का भरोसा भी देता है.  वैसे भी एक नियति, एक खजाने की तलाश तो हर मन में कहीं - न - कहीं तो रहती ही है.
 
उपन्यास पढता देवसाहब की 'गाईड' की भी बरबस याद आई और लगे हाथ एक विचार भी क़ि 'Slumdog Millionnaire' की जोड़ी के साथ इस उपन्यास पर फिल्म बनाने का आईडिया क्यों न दे दूँ. सुझाव देने में हम हिन्दुस्तानियों का कोई जोड़ है क्या !
 
चलते-चलते इस उपन्यास की एक प्रमुख उक्ति (जिसे शायद आपने कहीं सुना तो होगा... :-) ) 
 
"... जब तुम वास्तव में कोई वस्तु पाना चाहते हो तो संपूर्ण सृष्टि उसकी प्राप्ति में मदद के लिए तुम्हारे लिए षड्यंत्र रचती है "
 
(आपको नहीं लगता क़ि 'ओम शांति ओम' में 'साजिश' और यहाँ 'षड्यंत्र' शब्द का प्रयोग अनुवादात्मक त्रुटी है  ! )

Wednesday, February 17, 2010

अरुणाचल : तो बजरंग बली यहाँ तपस्यारत हैं !

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मान्यता है कि बजरंग बली भगवान श्री राम से आशीर्वाद प्राप्त कर अजर-अमर हो गए और हिमालय की ही किसी कन्दरा में तपस्यालीन हैं. इस मान्यता में सच्चाई कितनी है यह तो ज्ञात नहीं मगर अरुणाचल में एक स्थल है जहाँ पर्वतों पर ubhari एक छवि बजरंग बली के रूप में ही देखी जाती है.
 
अरुणाचल के प. सियांग जिले के एक महत्त्वपूर्ण स्थल मेचुका से लगभग 10 किमी. की दुरी पर हनुमान  कैंप है. उसके थोडा पहले ही एक view पॉइंट से सामने की पहाड़ी पर  पत्थरों की बनी एक मानवीय आकृति सा आभास मिलता है, जिसे बजरंग बली की छवि माना जाता है. आस्था और विज्ञान के सवालों से परे खुबसूरत वादियों और पहाड़ियों के बीच यह स्थल धार्मिक लिहाज से भी अनूठा है.

Sunday, February 14, 2010

हाँ मुझे मोहब्बत है - मोहब्बत

प्रेम के उल्लास का मौसम कहें, वसंतोत्सव कहें या वैलेंटाइन डे. यह माहौल प्रेम विषय पर एक पुनर्दृष्टि डालने को प्रेरित करता ही है। मैंने भी कई बार सोचा कि मेरे आस-पास की दुनिया जिस प्रेम की बात करती है, उसकी अनुभूति मुझे कभी क्यों नहीं हुई! मैं सायास किसी आकर्षण से इनकार नहीं करता, मगर औफिसिअल प्रेम जैसे किसी भाव को कभी महसूस नहीं कर पाया। और अब जब जिंदगी के साथ यहाँ - वहां भटकता फिर रहा हूँ , उसे पूरी तरह एन्जॉय करता हुए तो महसूस कर पा रहा हूँ कि - 'हाँ मैंने भी प्यार किया है'।
राष्ट्रवादी जैसे भारी-भरकम और lagbhag Copyrighted शब्द का इस्तेमाल तो मैं नहीं करूँगा; मगर हाँ मुझे प्यार है इस खुबसूरत धरती से, प्रकृति से, अपने इतिहास से, संस्कृति,से साहित्य से और अति समृद्ध विरासत से। इसके साथ मैं कभी खुद को अकेला नहीं मानता , मुझे किसी अंदरूनी खालीपन का एहसास नहीं सताता. मैं इसमें पूरी तरह डूब जाता हूँ एक प्रेमी की तरह ही.

शायद तभी किसी एक व्यक्तित्व के प्रति ही सीमित नहीं रह पाती मेरे प्रेम की परिभाषा।

हाँ मुझे प्रतीक्षा जरुर रहेगी ऐसे किसी चेहरे की जो पूर्ण रूप से स्वीकार कर सके मुझे और मेरे इस असीमित प्रेम को।
कोई है !!!!!

Friday, February 12, 2010

Heart of The Stones

Pattharon Ke Bhi Hote Hain Dil,
Magar Har Kisi Ko Numayan Nahin Karte;
Seene Mein Hain Inke Bhi Kai Nagme,
Magar Yun hi Sunaya Nahin Karte;
Koi Pyaar Se Tatole To Sahi,
Ye Haale-dil Chupaya Bhi Nahin Karte.

Saturday, January 30, 2010

अरुणाचल का 'पोदी-बारबी' पर्व

 
अरुणाचल में भी वसंत ने दस्तक दे दी है. शाखों पर नई पत्तियां और फूल दिखने लगे हैं. यहाँ - वहां घूमता प्रकृति के इन नजारों का आनंद उठा रहा हूँ, मगर दिल है कि कहीं दूर ' पलाश के फूल ' ढूंढ़ रहा है. अब भी याद आते हैं होली के समय पलाश के पीले फूलों का छा जाना और बच्चों का उनसे रंग तैयार करना.
खैर हाल ही में अरुणाचल का एक महत्वपूर्ण पर्व मनाया गया - 'पोदी - बारबी'.
यह यहाँ की बोकर जनजाति का एक प्रमुख पर्व है, जो हर वर्ष ५ दिसंबर को मनाया जाता है. मान्यता है फसल के देवता 'पोदी' और 'बारबी' इस अवसर पर स्वर्ग से धरती पर आकर उर्वरता, अच्छी फसल और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.
बोकर अरुणाचल की एक प्रमुख जनजाति है जो मंगोलियन मूल की है. यह वर्त्तमान में प. सियांग जिले के मेंचुका सब-डिविजन के मनिगोंग, पिदी, और टातो क्षेत्र में फैली हुई है.
आधुनिकता और धार्मिक prabhav ने पर्व कि मूल छवि को प्रभावित तो किया है, मगर लोगों के प्रकृति के प्रति अपने लगाव को प्रदर्शित करने का एक माध्यम तो है ही - 'पोदी - बारबी'.

Monday, January 11, 2010

गीत गाता चल

काफी समय बाद 2009 की चिट्ठी लिख पाया हूँ.
काफी कुछ दिया इस वर्ष ने, मगर बनारस से दूर होने की टीस अब भी बाकि है. इतना बड़ा खुद को नहीं समझता कि किसी को माफ़ करने के लायक खुद को मानूँ, मगर उन्हें भुलाने की कोशिश चार माह बाद भी जारी है. शायद इसीलिए दुनिया की मुख्यधारा से कट इस सुदूरतम स्थल पर आ गया हूँ.
अब बेहतर समझ पा रहा हूँ कि परिवर्तन को स्वीकार कर आगे बढ़ते जाना ही जिंदगी है, और मैं भी जिंदगी का साथ निभाता बढ़ता जा रहा हूँ.
हाँ ब्लॉग जगत की मधुर यादें एक खुशनुमा झोंके की तरह साथ हैं.
साहित्यिक दृष्टि से भी काफी सार्थक रहा यह साल.
जिस विषय से जुड़ा रहा, उसी में और अपनी रुची के करीब जॉब मिलना भी इस वर्ष की एक सौगात रही.
आशा है आप सभी ब्लौगर्स के लिए भी गुजरा साल बेहतर रहा होगा,
कामना करता हूँ कि नया साल भी आपके लिए मंगलमय हो.
शुभकामनाएं.
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