Tuesday, August 21, 2012

अविश्वास के ड्रैगन के पंजों में भारतीय समरसता...



कुछ माह पूर्व हमारे एक सशक्त पड़ोसी देश से जुड़ी एक खबर चर्चा में थी, जिसमें एक रिसर्च ग्रुप ने अपने शोध अध्ययन से निष्कर्ष निकाला था कि भारत सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विविधतापूर्ण देश है, अतः आने वाले समय में इसके इसी आधार पर कई भागों में विभक्त होने की संभावना काफी प्रबल है...।  अब यह संभावना ही मात्र इंगित की गई थी अथवा इस दिशा में प्रयास करने की भी नीति झलक रही थी – यह कहना सहज तो नहीं; मगर हाल ही में देश के पूर्वोत्तर सहित कई भागों में घटी हिंसक घटनाओं को इस परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है।

महज सोशल नेटवर्किंग साइट्स, या एसएमएस या एमएमएस के प्रभाव में अनगिनत लोगों का पलायन या हिंसा सिर्फ बाहरी षड्यंत्र ही नहीं मनोवैज्ञानिक रूप से आंतरिक अविश्वास भी दर्शाता है – अपने देशवासियों के प्रति भी। और निःसंदेह यह अविश्वास अपने ही लोकतंत्र पर आस्था और विश्वास से कहीं मजबूत हो गया है।

आजादी के पहले से ही हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने देश को एकसूत्र में पिरोने के जो प्रयास किए थे वो अब मात्र प्राथमिक कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों के अध्यायों और सतही शब्दों तक ही सीमित रह गए हैं।

आज जरूरत जातीय अथवा प्रांतीय विविधता के नाम पर कुछ राज्यों को शेष भारत से पृथक महत्व देने भर की नहीं, बल्कि सभी को समानता का बोध कराने की है। हिन्दी जैसी सर्वसुगम भाषा का प्रसार, आबादी का समानुपातिक सम्मिश्रण आदि प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति के आधार पर सुनीश्चित किए जाने चाहिए।

अफवाहों के सूत्र भले पाकिस्तान से मिलने के संकेत मिले हों, मगर उसके प्यादों की चाल कौन तय कर रहा है इसे भी समझना होगा। बार-बार हर जाँच का घुमफिरकर पाकिस्तान पर ही केंद्रित रह जाना इसके मूल नीतिकारों को आवरण प्रदान कर सकता है।  समस्या के मूल पर अभी और समय रहते ठोस प्रहार करने की जरूरत है, वरना भारत की ऐतिहासिक – सांस्कृतिक समरसता की विरासत हमारी आँखों के सामने ही ध्वस्त हो जाएगी..... 

Sunday, August 19, 2012

अन्ना आंदोलन या जनांदोलन : कोई दिशा निकलनी चाहिए...




जब मैं BHU में था, बनारस के मेहंदीगंज में कोका-कोला संयंत्र के सालाना विरोधी आयोजन में मेधा पाटेकर से मुलाकात हुई. उन दिनों मैं उनसे बड़ा प्रभावित था. मैंने उनसे पुछा कि जब मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से इतनी शिकायतें हैं तो आप जैसे लोग खुद चुनावों में उतर हमें उनको चुनने का विकल्प क्यों नहीं देते ? - उनका जवाब यही था कि उनका प्रयास सिर्फ जनजागरूकता का है और परिवर्तन का निर्णय जनता को ही करना है.

इस देश के अधिसंख्य मतदाता विभिन्न कारणवश विकल्पहीनता की सी ही स्थिति में पृथक राजनीतिक दलों को समर्थन देने पर विवश हैं. धार्मिक, सामाजिक, जातीय, आर्थिक किसी भी  वजह से किसी भी दल को समर्थन देते हुए भी बदलाव की एक उम्मीद कहीं-न-कहीं तो सभी के मन में थी.

अन्ना आंदोलन के प्रथम चरण को समर्थन के रूप में इन्ही भावनाओं का उभार दिखा. विभिन्न कारणों से दूसरे चरण को उसी स्तर का समर्थन न मिलता देख इस आकलन पर पहुंचना सही नहीं होगा कि जनता में विकल्प की चाहत खत्म हो गई है. यदि धर्म, संप्रदाय, जाति  आदि संकुचित भावनाओं के ‘ प्रकटीकरण ‘ के लिए तत्पर किसी समूह को राजनीतिक स्वीकार्यता मिल जा सकती है तब टीम अन्ना के पास तो ऐसी संकीर्ण मानसिकता से हटकर ही मुद्दे हैं. वैसे भी यह भारत है जहाँ हर मान्यता और विचारधारा के लिए समुचित स्थान की कभी कोई कमी नहीं रही है...

हमारा संविधान तो सदा से ही अलगाववादी और नक्सली विचारधारा को भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने को आमंत्रित करता रहा है, ऐसे में टीम अन्ना के राजनीति में आने पर इतनी हायतौबा भला कैसी !!!

           



हाँ, बेहतर होगा कि वो किसी ठोस रणनीति के साथ एक सार्थक विकल्प के रूप में चुनाव में उतरें. जनता उनका हर कदम एक अलग नजरिये से देख रही है, जो बाकि राजनीतिक दलों के प्रति दृष्टिकोण से अलग है. इस दबाव का इन्हें एहसास होना चाहिए. बदलाव की दिशा में एक छोटे कदम का भी अपना महत्व है, मगर इतिहास सफल लोगों को ही स्थान देता है. तो टीम अन्ना से भी बस एक हंगामा खड़ा करने वाली ही नहीं बल्कि तस्वीर बदलने वाली कोशिश पर खरे उतरने की भी अपेक्षा यह देश रखेगा.

और गांधीजी की यह उक्ति शायद उन्हें प्रेरित कर सके (यदि वो वाकई प्रेरणा पाना चाहें) कि – “ पहले वो आपको नजरअंदाज करेंगे, फिर वो आप पर हँसेंगे, इसके बाद वो आप से लड़ेंगे और फिर आपकी जीत होगी.....”

देश को कभी परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखलाने वाले आज उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, और उन्ही की ओर से इस नई कवायद का ज्यादा मुखर विरोध भी हो रहा है. भारतीय जनता के विश्वास को एक बार फिर से न छले जाने के उम्मीद व आग्रह के साथ एक सार्थक विकल्प दे पाने की शुभकामनाएं.....

Monday, August 13, 2012

एक महापाषाणीय स्थल की अभूतपूर्व पुनर्स्थापना.....





इस ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास मुख्यतः अपनी विरासत के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करना रहा है. ऐसी ही एक विरासत पंखुड़ी बरवाडीह, हजारीबाग; झाड़खंड के ‘स्टोन सर्कल’ भी हैं जिनका जिक्र मैंने अपनी ब्लौगिंग की प्रारंभिक पोस्ट में भी किया था. पुनः जब स्थानीय लोगों ने इसपर अपने प्रेम प्रदर्शन की निशानियाँ छोडीं तब भी ‘ विश्व विरासत दिवस ‘ के बहाने इस घृणित प्रवृत्ति पर भी मैंने चर्चा की.  कोल माइनिंग से संभावित खतरे और स्थानीय जनता तथा प्रशासन की उपेक्षा के बीच फिर भी इसके बरकरार होने की फिर भी कहीं एक मनबह्लाऊ तसल्ली थी, जो भी हाल में टूट सी गई जब इनमें से एक स्टोन (मेन्हीर) के गिर जाने की सुचना मिली. इन दोनों महापाषाणों के मध्य से बनी ‘V’ आकृति से समदिवारात्री  ( Equinox ) के कई दृश्यों को निहारने के संस्मरण मानसपटल पर उभर आये. दूर से ही इस स्थल को देख उभर आने वाला रोमांच अद्भुत था, मगर इस रोमांच का केन्द्र ‘V’ आकृति बनाने वाले मेनहीर में से एक के प्रकृति, प्रशासन और स्थानीय लोगों की अपेक्षाओं के बोझ तले ध्वस्त हो चुका था.  


ऐसे में राहत यह जानकर मिली कि हजारीबाग निवासी मेगालिथ अन्वेषक श्री शुभाशीष दास ने जिन्होंने इस स्थल के खगोलिय पक्षों को उभारने के महत्वपूर्ण प्रयास करते हुए राष्ट्रिय-अन्तराष्ट्रीय कई विशेषज्ञों का ध्यान इस ओर खिंचा था, के द्वारा इसे मूल स्वरुप वापस देने के त्वरित प्रयास शुरू किये गए. इन् महापाषाणों (Megaliths) को अपनी संतान सादृश्य मानने वाले श्री दास के लिए इनका ये स्वरुप देख पाना कितना कठिन रहा होगा इसकी कल्पना भी नाहीं की जा सकती. अपने कई कई वर्षों के सतत अध्ययन के दौरान इन्होने इन् मेगालिथ्स की दिशा, कोनों पर झुकाव जैसे कई तकनिकी देता संकलित कर रखे थे, वो अभी काम आये और संभवतः भारत में पहली बार किसी ध्वस्त महापाषाण को उसका मूल स्वरुप पुनः दे पाने का प्रयास किया गया. एक अमेचर मेगालिथ अन्वेषक के लिए यह कार्य कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा इसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है...


श्री दास के अनुसार इस संरचना को संपूर्ण वास्तविक स्वरुप दे पाना तो असंभव सा ही है, किन्तु इन्हें पूर्व सदृश्य स्वरुप तो दिया ही जा चूका है; और अब इसकी ‘ V ‘ आकृति में से ‘Equinox’ का अवलोकन पुनः संभव है.....


एक मेगालिथ अन्वेषक और एक जागरूक नागरिक के रूप में श्री दास ने अपनी जिम्मेवारी तो निभा दी, मगर क्या अब इन अपाहिज मेगालिथ्स के प्रति प्रशासन और आम जनता से अपनी विरासत के प्रति उनकी जिम्मेदारी निभाने की कोई उम्मीद भी की जानी चाहिए ?????

Wednesday, July 25, 2012

अमरनाथ यात्रा...




“इस दर पे वही आता है, जिसे वो बुलाता है...”; ये पंक्तियाँ कुछ समय पहले तक मेरे लिए शब्द मात्र ही थीं; मगर वाकई इनपर विश्वास सा होने लगा है। घर से निकला तो था जम्मू में वैष्णो देवी के दर्शन कर श्रीनगर और इसके आस-पास की कुछ जगहें घूमने की योजना बनाकर, मगर जम्मू की जबर्दस्त गर्मी और श्रीनगर में कुछ संवेदनशील कारणों से कर्फ्यू लगे होने के कारण योजना परिवर्तित करनी पड़ी। संयोग से अमरनाथ यात्रा शुरू हो गई थी और कई यात्रियों के जत्थे जाते देख हमने भी बाबा अमरनाथ के दर्शनों का निश्चय कर लिया। इस बिल्कुल अन्प्लान्न्ड जर्नी में संयोग ही कहा जाएगा कि भगवती नगर में बने कैंप से अगले दिन का रजिस्ट्रेशन मिल गया, और तमाम शंका-आशंकाओं के मध्य ही चंद ही बची छुट्टियों में बिना किसी व्यवधान के यात्रा संपन्न हो ही गई। 

अपने पास छुट्टियाँ काफी गिनी-चुनी थीं, मगर फिर भी हमने पहलगाम मार्ग से चढ़ाई और बालटाल मार्ग से वापसी का निर्णय लिया। बालटाल मार्ग से कठिन चढ़ाई होने पर भी दूरी मात्र 14 किमी होने के कारण दो दिनों में यात्रा संपन्न होने की संभावना रहती है, मगर पहलगाम मार्ग में मिलने वाले प्राकृतिक दृश्यों के अवलोकन के आनंद से वंचित रह जाने की कसक भी रह जाएगी। वैसे भी धार्मिक मान्यताओं  के अनुसार भी पहलगाम मार्ग को ही वरीयता दी गई है. 


जम्मू से बस द्वारा सुबह रवाना होकर शाम तक पहलगाम पहुँचे जहाँ हजारों तीर्थयात्रियों के रहने और भोजन के लिए टेंट और भंडारे की अच्छी व्यवस्था की गई थी। मगर यहाँ कुछ स्टाल्स पर गुटके आदि की बिक्री ने थोडा विचलित भी किया. तंबुओं का मानो जंगल सा बसा हुआ था। ऐसी तीर्थयात्रा का पहला अनुभव और इतनी भीड़ में थोड़ी असुविधाओं के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करता हुआ रात वहाँ बिताई और और अगले दिन सुबह चंदनबाड़ी के लिए निकले। यहाँ तक के लिए वाहन उपलब्ध थे. चन्दनबाड़ी से रजिस्ट्रेशन चेकिंग की औपचारिकता पूरी होने के बाद यात्रियों के जत्थे अपनी सुविधानुसार पैदल, घोड़े या पालकी के द्वारा रवाना हुए. पहला चरण चन्दनबाड़ी से शेषनाग तक का था. इस मार्ग के प्रमुख पड़ावों में पिस्सू टॉप , जोजी बल और नागा टोपी आते हैं; जिसमें पिस्सू टॉप की चढाई वाकई यात्रिओं के धैर्य की परीक्षा लेती है. बर्फ से ढंकी पहाड़ियां और खूबसूरत झरने यात्रियों के मन को आनंद जरुर देते हैं मगर संकरे रस्ते पर सावधानीपूर्वक चलने की अपरिहार्यता  सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है. कार्यक्षेत्र की विशिष्टता मुझे इन पहाड़ों की खूबसूरती से रूबरू कराती रही है, मगर शेषनाग झील का अवलोकन वाकई एक अविष्मरणीय अनुभव था. रात्री पड़ाव हमने शेषनाग में ही किया. यहाँ भी यात्रियों के लिए रियायती दर पर टेंट्स की व्यवस्था थी और भंडारे भी चल रहे थे, इसलिए सुबह जल्द ही पंचतरणी के लिए रवाना हो गए. बर्फीले रास्ते और हलकी बारिश ने सफर को थोडा और कठिन बना दिया था, मगर दूर-दराज से आये बुजुर्ग स्त्री-पुरुषों के उत्साह और जज्बे से प्रेरणा लेते हम आगे बढते रहे. इस मार्ग के प्रमुख पड़ावों में वरबल, गणेश टॉप, पोषपत्री आदि थे. पंचतरणी हमलोग दोपहर तक पहुँच गए थे, मगर समय और साधनों को ध्यान में रखते हुए हम बीच राह में कहीं न रुक सीधे अमरनाथ ही पहुंचना चाहते थे; इसलिए हमने अपना सफर जारी रखा और उसी दिन शाम तक अमरनाथ पहुँच गए. मार्ग में संगम एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. यहाँ पर बताया गया कि ठहरने के लिए कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है और स्थानीय लोगों द्वारा उपलब्ध टेंटस् और भोजन की व्यवस्था पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. ज्यादा खोजबीन और तहकीकात की स्थिति में हम रह भी नहीं गए थे, इसीलिए इसी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया. 


अगले दिन पवित्र अमरनाथ गुफा की ओर अपने निर्णायक सफर पर निकले और अपने पीछे बढती लाइन से प्रेरित होते शनैः-शनैः आगे खिसकते हुए अंततः बाबा के सामने पहुँच ही गए. 

जो वाकया, जो शब्द बस यहाँ-वहाँ पढ़े थे वो खुद पर चरितार्थ होता पाया. बाबा बर्फानी के दर्शन ने वाकई अभिभूत और भावुक ही कर दिया. अपलक प्रकृति की इस अनूठी लीला को निहारता रहा. दर्शनों की प्यास बुझ नहीं रही थी, मगर इस दृश्य का दर्शनाकांक्षी मैं अकेला ही तो नहीं था.....



भोलेनाथ के इस स्वरुप को मन में बसा बालताल मार्ग से वापस उतरा.  

यात्रा तो वाकई सफल और यादगार रही मगर कुछ बातें वाकई ध्यान देने वाली हैं. इधर आस-पास कोई गाँव न होने के कारण स्थानीय व्यवस्था जो मुस्लिम समुदाय द्वारा ही की जाती है, हर छोटी -से- छोटी चीज के लिए नीचे के स्थानों पर ही निर्भर है. इसलिए ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ हर चीज महँगी होती जाती है. घोड़े और पालकी वाले मनचाहे रेट मांगते हैं, जिनमें मोलभाव की भी थोड़ी गुंजाईश रहती है. वैसे कहीं बेहतर होता यदि सरकारी दर तय कर दी जाती. मगर शायद अल्पावधि में इनके जीविकोपार्जन की संभावनाओं के दबाव को देखते हुए वो कुछ ठोस पहल न कर पा रही हो. बेहतर है कि ये घोड़ेवाले जो सामान्यतः रजिस्टर्ड होते हैं के पहचानपत्र सफर तक अपने ही पास रखे जायें, इससे इनकी मनमानी पर किंचित नियंत्रण की संभावना तो रहती ही है. 

रजिस्ट्रेशन के पूर्व मेडिकल चेकअप की सामान्यतः औपचारिकता ही होती है, इसलिए अपने स्वास्थ्य को परखने के बाद ही यात्रा पर रवाना हों. क्योंकि ऊँचे स्थानों पर ऑक्सीजन की कमी सहित कुछ अन्य परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है. कोई भी असुविधा होने पर राह में बने आर्मी कैम्पस की सहायता लें. सेना की सक्रिय और सराहनीय भूमिका इस यात्रा को थोड़ा सहज तो बना ही देती है. 

लौटते वक्त आश्चर्यजनक रूप से जम्मू का बारिश से भीगा मौसम मानो मुसकुराता हुआ सवाल कर रहा था – “क्यों ! हो गया न !!!”

Wednesday, June 13, 2012

कश्मीर का एक अछूता सौंदर्य – राजधन पास




धरती पर अगर कहीं जन्नत है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है; कश्मीर के संदर्भ में यदि यह उक्ति कही गई थी तो यह सर्वथा सटीक है। यूँ तो कश्मीर का नाम लेने पर सामान्यतः श्रीनगर, सोनमर्ग, गुलमर्ग जैसे प्रचलित नाम ही ज़हन में उभरते हैं, मगर वाकई देश के इस मुकूट का हर अंश कहीं से भी एक-दूसरे से कमतर नहीं है। चाहे आप इस प्रदेश के सुदूरतम स्थल तक चले जाएँ यहाँ की सुंदरता से आप मंत्रमुग्ध हुये बिना रह नहीं सकेंगे। और वाकई भीड़-भाड़, शोर-शराबे, गंदगी आदि ( जो कि मशहूर पर्यटन स्थलों की पहचान बन गई है) से दूर प्रकृति का संपूर्ण आनंद लेना हो तो कुछ कदम और आगे तो बढ्ना ही पड़ेगा।
प्रकृति के अलौकिक दृश्यों को उनकी पूरी भव्यता के साथ प्रकृति प्रेमियों के समक्ष रखने वाले स्थलों में एक प्रमुख नाम है ‘ राजधन पास । श्रीनगर से लगभग 100 किमी और बांदीपूर – गुरेज मार्ग पर लगभग 3000 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह पास प्रसिद्ध सिल्क रूट से भी जुड़ता है। हिमालय की ऊँची चोटियों में से एक पर खड़े होकर समकक्ष स्थित चोटियों को निहारना एक अलग ही अनुभूति देता है। सर्दियों में यह मार्ग बर्फ से ढँका होने के कारण आवागमन बाधित रहता है, मगर गर्मियों की शुरुआत में इसपर सहेजी हुई बर्फ की चादर इसकी सुंदरता और भव्यता को और भी आकर्षक बना देती है।
राजधन पास पर ही एक पीर बाबा की दरगाह भी है, जो स्थानीय जनता की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। कहते हैं 30 के दशक में लाहौर से यहाँ आ बसे थे बाबा, जो अपनी साधना से बाहर निकल कभी-कभी ही स्थानीय वाशिंदों से मिल पाते थे। उनकी मृत्यु के बाद श्रद्धालुओं ने उनके शव को दफनाने के लिए बाँदीपुर ले जाना चाहा, मगर आस-पास की मधुमक्खियों ने उनपर हल्ला बोल दिया। अंततः इसी स्थल पर ही उनकी क़ब्र स्थापित की गई। आज यह स्थल एक प्रसिद्ध दरगाह का रूप ले चुका है, जिसका प्रबंधन भारतीय सेना करती है।

मई-सितंबर तक यह स्थल भ्रमण के उपयुक्त माना जाता है। अप्रैल में मेरे इस ओर से गुजरने के दौरान अचानक हुई हल्की बर्फबारी ने इस स्थल के अपने एक अत्यंत ही मनमोहक रूप को हमारे सामने पेश कर दिया था।
अगर आप वाकई एक प्रकृति प्रेमी हैं तो इसे अकेले ही एंजॉय करें या फिर आपही की तरह कुछ और चाहने वालों का साथ हो.....

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Thursday, April 12, 2012

दिल्ली की यादों में शामिल सीमा तोमर

लगभग एक साल दिल्ली में रहता हुआ अब जब इसे छोड़ने के दिन करीब आ रहे हैं तब एक बार पलट कर देखता हूँ तो निश्चित रूप से इस अरसे में दिल्ली के कई रूपों को देखने का अवसर मिला. यहाँ की कला-संस्कृति और साहित्यिक हलचलों से तो रूबरू हुआ ही देश की कुछ प्रमुख राजनीतिक घटनाक्रमों के भी साक्षी बनने का अवसर पाया. इनके अलावे कुछ मानवीय पहलुओं को भी जानने के अवसर मिला. महानगरीय संस्कृति में अक्सर समयाभाव और दबाव में रिश्तों के टूटने और कायम न रह पाने के किस्से सुनने को मिलते रहे हैं मगर कुछ उदाहरण इसके विपरीत भी होते हैं. अपने अकेलेपन के साथ जब दिल्ली की सांस्कृतिक सरगोशियों में खुद को डुबो सा चूका था, तभी एक ऐसी शख्शियत से मुलाकात हुई शायद जिस तरह के लोगों के लिए ही कभी दिल्ली को दिल वालों की नगरी कहा गया होगा ! और यह संपर्क भी हुआ तो आभासी दुनिया के प्रमुख माध्यम फेसबुक के जरिये. 

फेसबुक पर मित्रों की वालपोस्ट्स और कमेन्ट देखता ही कभी सीमा तोमर जी की कुछ पंक्तियों के अपडेट्स पर नजर पड़ी, जिसने सहसा ही अपनी ओर आकर्षित किया. रचनात्मक लोगों से मित्रता की आकांक्षा ने मुझे उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने को प्रेरित किया और सामान्यतः अन्य महिलाओं की अपेक्षया इन्होने काफी जल्दी मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली. इसी के बाद पता चला कि ये एक उदीयमान चित्रकार और उभरती कवयित्री भी हैं. इनसे और इनकी कला से रूबरू होने का अवसर भी जल्द ही मिला जब ललित कला अकादमी में आयोजित मास्क प्रदर्शनी में इनकी कृति को देखने का मौका मिला. इसी अवसर पर इनके पति श्री राम चित्रांशी जी से मिलने का भी अवसर प्राप्त हुआ. पहली ही मुलाकात में लगा ही नहीं कि जैसे हम पहली बार मिले हों. ऐसा अपनापन, ऐसी आत्मीयता इस अजनबी और अनजाने शहर में अकल्पनीय ही थी. इसके बाद तो एक-दूसरे से मिलने के और भी कई मौके मिले. हमारी साझी अभिरुचियों ने हमें कई मौकों पर मिलवाया; जैसे कला प्रदर्शनी, दिल्ली हाट, सूरजकुंड मेला और गुलज़ार साहब के साथ एक महफ़िल जैसे और भी कई अवसर...
एक साहित्यिक सम्मलेन में कविता पाठ करतीं सीमा जी...

जामिया मीलिया से कला में स्नातक और अपने चित्रों में महिलाओं की भूमिका और अस्तित्व को मजबूती से उभारने वाली सीमा जी एक संवेदनशील कवि भी हैं. गुलज़ार साहब के लेखन से अतिशय प्रभावित सीमा जी अपनी रचनाओं को भी भाषाई क्लिष्टता से दूर रखते हुए बहुत सरल और सहज शब्दों में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं. कुछ उदाहरण - 

1. आज कुछ कमी रहने दो 
आँखो में बरकरार नमी रहने दो
चाँद ख्वाबो के आसमान पर है
पावं के नीचे ज़मीं रहने दो ...........

2. डोर का एक सिरा 
मेरे पास रहा
और एक तुम्हारे
और बीच में बँधी
गाँठ के दो सिरो
में से भी
एक मेरे पास था
और एक तुम्हारे ....
हिसाब के पक्के हो
तो बताओ ज़रा

... कितने बंधनो को 

तुम थामे रहे 
और कितने रिश्तो को
मैने संभाला .....
राम जी, सीमा जी और मैं...

सीमा जी को उनके बेह्तरीन भविष्य और रचनात्मक ऊँचाइयों को छूने की हार्दिक शुभकामनाएं. वाकई आप जैसे लोग काफी कम हैं.....


Sunday, April 1, 2012

ब्लौगिंग से चलते - चलते : साँची से होते हुए..

दिल्ली आये हुए एक साल से थोडा ज्यादा अरसा हो गया, और अब फिर यहाँ से विदाई की बेला है - धरती के स्वर्ग की ओर (कृपया इस सूचना को आज के दिन विशेष से जोड़ कर न देखा जाये...)

जानता था एक इंजीनियरिंग जियोलौजिस्ट  होने के नाते मुख्य भूमि पर ज्यादा दिन नहीं लिखे हैं मेरे लिए, इसलिए इस अवधि को भरपूर जिया. आर्ट और कल्चर से जुडी कई गतिविधियों में शामिल हुआ, कई महत्वपूर्ण लोगों से मिलने का मौका मिला, काफी घुमा, वापस ब्लौगिंग से जुड़ा और अपने अनुभवों को शेयर किया. इस सफ़र में आप लोगों ने भी पूरा साथ दिया और उत्साहवर्धन किया धन्यवाद. इस सफ़र का सारांश फिर कभी. पहले इस सफ़र के संभवतः अंतिम महत्वपूर्ण पड़ाव प्राकैतिहसिक महत्व के ' भीमबेटका' और ऐतिहासिक स्थल 'साँची' की एक झलक चित्रों के माध्यम से...

प्राकऐतिहासिक भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्द भीमबेटका

वो पहली रचना !!!

समय के साथ अपनी पहचान खोते भित्तिचित्र

भोपाल का एक प्राचीन मंदिर

साँची की शांति वाकई महसूस हुई यहाँ.

स्तूप को स्पर्श करने पर महसूस हुए भावों को अभिव्यक्त नहीं कर सकता 

प्रवेश तोरणों पर बुद्ध तथा तत्कालीन जनजीवन को झलकाती झांकियां

प्राचीन बौद्ध मठ

उदयगिरी की गुफाएं जहाँ जैन धर्म का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है

विदिशा का करीब 2000 वर्ष प्राचीन 'गरुड़ स्तंभ' जिसे हेलियोदौरस ने 'वासुदेव' (विष्णु) के सम्मान में स्थापित करवाया था...

 चैत्र नवरात्री और रामनवमी के पावन पर्व की भी हार्दिक शुभकामनाएं...
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