Wednesday, January 30, 2013

गांधीजी की स्मृति में.....




श्री असगर वजाहत जी हिंदी के एक प्रसिद्ध रचनाकार हैं. उनके द्वारा लिखित एक बहुचर्चित नाटक ‘जित लाहौर नइं वेख्या...’ देखने का सुअवसर मुझे दिल्ली में रहते मिला था. उन्ही दिनों उनका एक और नाटक ‘गोडसे@गाँधी.कॉम’ भी एक पत्रिका में पढा. वर्तमान परिदृश्य में इस नाटक की चर्चा आवश्यक समझते हुए इसे  साझा कर रहा हूँ.

नाटक में गाँधी और गोडसे के विषय को ही नहीं, बल्कि गाँधी विचार व उनके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं को भी स्पर्श करने का प्रयास किया गया है. नाटक की पृष्ठभूमि में गोडसे द्वारा गांधीजी पर गोली चलाये जाने की घटना ही है. नाटक के अनुसार गांधीजी इस हमले में जीवित बच जाते हैं और अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद गोडसे से मिल उसे क्षमा कर देते हैं. वो विस्मित है और इसे उनका कोई नया नाटक समझ रहा है, मगर उसकी अपेक्षाओं के विपरीत उसे 5 साल की ही सजा मिलती है.

दूसरी ओर गांधीजी नेहरु आदि नेताओं को समझते हैं कि कांग्रेस जो एक खुला मंच थी जिसमें हर विचार के लोग शामिल हुए को एक पार्टी का रूप देना उचित नहीं, अतः अब इसे भंग कर गाँवों में जा देशसेवा करनी चाहिए. मगर उनका यह प्रस्ताव अस्वीकृत हो जाता है. कांग्रेस से नाता तोड़ गाँधीजी  ‘बिहार’ के एक सुदूरवर्ती आदिवासी गाँव में अपना ‘प्रयोग आश्रम’ स्थापित कर लेते हैं. उनका यह गाँव ‘ग्राम-स्वराज’ की एक जिवंत मिसाल बन जाता है जिसकी अपनी सरकार और शासन है और जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देश की संसद के निर्णयों पर आश्रित नहीं. देश के अंदर ऐसे शासन की अवधारणा दिल्ली में खतरनाक मानी गई और गांधीजी स्वतन्त्र भारत की निर्वाचित सरकार द्वारा पुनः गिरफ्तार कर लिए जाते हैं.

यहाँ गांधीजी ने स्वयं को गोडसे के साथ रखे जाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया. उनकी मांग मानी गई और गांधीजी और गोडसे के मध्य विचारों के आदान-प्रदान की एक लंबी श्रंखला आरंभ हुई. दोनों के बीच ‘हिंदुत्व’ जैसे कई विषयों को लेकर अपनी चर्चा चलती रहती है और वह दिन भी आता है जब दोनों एक ही साथ रिहा होते हैं. चलते वक्त गांधीजी गोडसे से बस इतना ही कहते हैं कि – “ नाथूराम... मैं जा रहा हूँ. वही करता रहूँगा जो कर रहा था. तुम भी शायद वही करते रहोगे जो कर रहे थे.” नाटक के अंत में तो दोनों पात्र एक साथ एक ही राह की ओर चल देते हैं, मगर शायद दोनों की विचारधाराएं आज भी अपना-अपना काम ही कर रही हैं या शायद यह एक राजनीतिक प्रहसन ही है देश सेवा के बदले देश सेवा के लिए शासन का अवसर पाने की कवायद का...

Sunday, November 4, 2012

राजनीतिक आस्था के नाम पर: ओह माई गौड !!!



जिनलोगों ने परेश रावल अभिनीत ‘ओह माई गौड’ देखी होगी वो जाने-अनजाने कहीं-न-कहीं आज के अरविन्द केजरीवाल को इससे रिलेट कर रहे होंगे. वेदांत, सनातन... किसी भी नाम से धर्म के वास्तविक रूप से कितनी भी बार लोगों को जागरूक बनाने की कोशिश की गई, मगर धर्म जैसे ब्रांड के हाथों अपनी सत्ता मजबूत करने वाले ठेकेदारों ने हर नई परिभाषा को अपने ही सांचों में ढाल लिया और सदियों से धर्म के नाम पर भय को अपने अंदर तक स्थापित कर चुकी आम जनता ने बार-बार नई स्थिति बिना किसी विशेष प्रतिरोध के स्वीकार कर ली. बुद्ध, मोहम्मद साहब, साईं बाबा जैसी विभूतियों ने आम जनता को जागरूक करने के अथक प्रयास किये, मगर धर्मसुधार के प्रयासों की जरुरत आज भी कम नहीं हुई है...

धार्मिक व्यवस्था की ही तरह राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के भी समस्त विश्व में कई प्रयास हुए. कई विचारधाराएं अस्तीत्व में आईं. मगर सत्ता को अपने हित साधन का एक जरिया समझने वाले वर्ग ने लगभग हर देश में हर नई व्यवस्था को अपने अनुकूल तोड़-मडोड़ ही लिया, और जनता बस नई उम्मीद के साथ नए कलेवर में लिपटी उसी व्यवस्था की अनुगामिनी बनती रही. मार्क्स, माओ और गांधी जैसे विचारकों के आदर्शों पर आधारित व्यवस्था आज हकीकत में कहाँ हैं !!!

अरविन्द केजरीवाल इन विचारकों की श्रंखला में नहीं आते. मगर व्यवस्था में कमियों की ओर उन्होंने ‘व्हिसल ब्लोअर’ की अपनी भूमिका निभा दी है. उन्हें अब गंभीरता से लिया जाये अथवा नहीं, वो सत्ता का अंग बनते हैं और अपनी क्या भूमिका निभाते हैं वो अलग विषय है. मगर सत्ता के ठेकेदारों को फिल्म के कांजी भाई की तरह उन्होंने कटघरे में तो ला खड़ा किया ही है. हर प्रयास की विवेचना सिर्फ उसकी सफलता-असफलता के आधार पर ही नहीं की जा सकती, छला जाता रहा आम आदमी अबतक जिन बातों को मात्र महसूस ही करता आ रहा था, उसे किसी भी बहाने अभिव्यक्ती देने की पहल कर एक हिम्मत तो दी ही है केजरीवाल ने. एक शक्तिशाली और एकजुट गुट के आगे आम आदमी द्वारा अपनी आवाज उठाना कोई छोटी बात नहीं, चाहे वो आज शक्तिशाली अट्टहासों में दबती सी प्रतीत हो रही हो.

केजरीवाल पर आरोप लगाया जा रहा है कि वो हर राजनीतिक दल को भ्रष्ट बता विकल्प की उम्मीदों को धुंधला कर रहे हैं, जनता को असमंजस में डाल अस्थिरता बढ़ा रहे हैं. केजरीवाल कोई राजनीतिक मसीहा नहीं, वो विकल्प न बन सकते हों, मगर यह असमंजस मात्र उन्ही के आगे आएगा जिसने उस व्यक्ति की आवाज अनसुनी की हो जिसके विचार इस देश की मिट्टी और परिस्थितियों को आत्मसात करते हुए उभरे थे. लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए गाँधी जी ने कहा था – “ सच्चे लोकतंत्र में, प्रत्येक स्त्री-पुरुष को स्वयं विचार करने की शिक्षा दी जाती है....”

“भारत के सच्चे लोकतंत्र में गाँव को इकाई माना जायेगा... सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे बीस लोगों द्वारा  नहीं चलाया जा सकता. इसका संचालन तो नीचे से, हर गाँव के लोग करेंगे.”

और ग्राम शासन की रुपरेखा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा था “... गाँव में पूर्ण लोकतंत्र चलेगा जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित होगा. व्यक्ति ही अपनी सरकार का निर्माता होगा....”

स्पष्ट है कि यूँ ही नहीं भारत का संविधान ‘हम भारत के लोग...” पर ही आधारित है.  भारत की समस्याओं का हल भारत के ही मनीषियों के विचारों में छुपा हुआ है और इसे उजागर और आत्मसात भी हम ही कर सकते हैं. समय के कई थपेडों का हमारी धार्मिक व्यवस्था ने सामना किया है और खुद को परिमार्जित करते हुए हर बार और बेहतर स्वरुप में उभर कर सामने आई है, यह प्रक्रिया आज भी जारी है. यह प्रयोग हम अपनी राजनीतिक व्यवस्था में भी अपना सकते हैं. राजनीतिक व्यवस्था में आस्था दूसरों पर दोषारोपण करके नहीं बल्कि खुद में बदलाव करके सुदृढ़ की जा सकती है. इस संस्था पर विश्वास और आस्था का टूटना ही अराजकता का मूल कारण होगा और हम जानते हैं कि “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना...”

Tuesday, October 2, 2012

गांधीजी की वसीयत.....



वर्तमान में भारत सहित पूरे विश्व में जारी राजनीतिक, आर्थिक, वैचारिक उथल-पुथल के इस दौर में इस बात को दोहराने की आवश्यकता नहीं कि गांधीजी के विचारों की प्रासंगिकता कितनी शिद्दत से उभरती है.  गांधीजी के विचार जिनकी प्राथमिक झलक उनकी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ से मिलती है से न सिर्फ भारत बल्कि समस्त विश्व को सर्वांगीण स्वराज की दिशा मिलती है. मगर गांधीजी के विचारों की एक मुख्य खासियत यह है कि वो मात्र सैद्धांतिक ही न होते हुए व्यावहारिक रूप से अमल करने का मार्ग भी दर्शाता है. शायद तभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिससे वो राजनीतिक रूप से जुड़े थे की उन्होंने ‘लोक सेवक संघ’ के रूप में परिकल्पना की थी; जो हरिजन’ में ‘हिज लास्ट विल एंड टेस्टामेंट’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ था.....

राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर चुकने के बाद वो एक संसदीय तंत्र के रूप में कॉंग्रेस की कोई भूमिका नहीं देखते थे. उनका अगला लक्ष्य अपने गांवों को सामाजिक, नैतिक और आर्थिक स्वाधीनता हासिल कराना था. स्वदेशी समर्थक, छुआछूत - सांप्रदायिक वैमनस्य से रहित कार्यकर्ताओं द्वारा पंचायत को इकाई मानते हुए गाँवों के सर्वांगीण विकास द्वारा प्राथमिक स्तर से उच्चतम स्तर तक विकास के क्रम को सुनिश्चित करवाना उनका लक्ष्य था.

निःसंदेह गांधीजी की हत्या के बाद सुनियोजित ढंग से उनके विचारों की हत्या के भी निरंतर प्रयास होते रहे, फिर भी विभिन्न कारणों से विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं द्वारा अपने कई विचारों के साथ ‘गाँधीवादी’ सदृश्य उपमा भी जोड़नी ही पड़ी...

आज देश में कोई और संगठन तो गांधीजी की इस अंतिम इच्छा को एक बड़े पैमाने पर उतारने को इच्छुक और समर्थ तो दिखता नहीं. फिर भी मन में कहीं एक विचार है जिसके मूर्त रूप में उतर पाने की संभावना नगण्य देखता हुआ भी कहना तो चाहूँगा ही. कहते हैं गांधीजी ने 1934 में वर्धा प्रवास के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा का अवलोकन किया था, जहाँ वे उसके स्वयंसेवकों की अनुशासन और गैरजातिवादी भावनाओं से काफी प्रभावित भी हुए थे. मगर उनके जैसे दूरदर्शी व्यक्ति ने कुछ सोचकर ही इसी तर्ज पर एक पृथक ‘लोक सेवक संघ’ की स्थापना की परिकल्पना पर विचार किया होगा. अगर राष्ट्रसेवा को समर्पित, गांधीजी के विचारों पर आधारित एक अति शक्तिशाली संगठन अस्तित्व में होता तो आज इस देश का वर्तमान कुछ और ही होता..........

खैर इतने बड़े स्तर पर न सही मगर गाँधीवादी विचारों को व्यवहार में लाने के यथासंभव प्रयास पूरे देश में किसी - न - किसी स्तर पर तो चल ही रहे हैं, जो अक्सर हमारी आँखों के सामने से गुजरते रहते हैं. हम चाहे इस दिशा में इतनी बड़ी भूमिका न निभा सकें मगर व्यक्तिगत रूप से ही गाँधीवादी सिद्धांतों को यथासंभव अपने अंदर ही उतारने की सच्ची कोशिश करें तो गांधीजी के बलिदान के प्रति यह हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.....

Tuesday, August 21, 2012

अविश्वास के ड्रैगन के पंजों में भारतीय समरसता...



कुछ माह पूर्व हमारे एक सशक्त पड़ोसी देश से जुड़ी एक खबर चर्चा में थी, जिसमें एक रिसर्च ग्रुप ने अपने शोध अध्ययन से निष्कर्ष निकाला था कि भारत सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विविधतापूर्ण देश है, अतः आने वाले समय में इसके इसी आधार पर कई भागों में विभक्त होने की संभावना काफी प्रबल है...।  अब यह संभावना ही मात्र इंगित की गई थी अथवा इस दिशा में प्रयास करने की भी नीति झलक रही थी – यह कहना सहज तो नहीं; मगर हाल ही में देश के पूर्वोत्तर सहित कई भागों में घटी हिंसक घटनाओं को इस परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है।

महज सोशल नेटवर्किंग साइट्स, या एसएमएस या एमएमएस के प्रभाव में अनगिनत लोगों का पलायन या हिंसा सिर्फ बाहरी षड्यंत्र ही नहीं मनोवैज्ञानिक रूप से आंतरिक अविश्वास भी दर्शाता है – अपने देशवासियों के प्रति भी। और निःसंदेह यह अविश्वास अपने ही लोकतंत्र पर आस्था और विश्वास से कहीं मजबूत हो गया है।

आजादी के पहले से ही हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने देश को एकसूत्र में पिरोने के जो प्रयास किए थे वो अब मात्र प्राथमिक कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों के अध्यायों और सतही शब्दों तक ही सीमित रह गए हैं।

आज जरूरत जातीय अथवा प्रांतीय विविधता के नाम पर कुछ राज्यों को शेष भारत से पृथक महत्व देने भर की नहीं, बल्कि सभी को समानता का बोध कराने की है। हिन्दी जैसी सर्वसुगम भाषा का प्रसार, आबादी का समानुपातिक सम्मिश्रण आदि प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति के आधार पर सुनीश्चित किए जाने चाहिए।

अफवाहों के सूत्र भले पाकिस्तान से मिलने के संकेत मिले हों, मगर उसके प्यादों की चाल कौन तय कर रहा है इसे भी समझना होगा। बार-बार हर जाँच का घुमफिरकर पाकिस्तान पर ही केंद्रित रह जाना इसके मूल नीतिकारों को आवरण प्रदान कर सकता है।  समस्या के मूल पर अभी और समय रहते ठोस प्रहार करने की जरूरत है, वरना भारत की ऐतिहासिक – सांस्कृतिक समरसता की विरासत हमारी आँखों के सामने ही ध्वस्त हो जाएगी..... 

Sunday, August 19, 2012

अन्ना आंदोलन या जनांदोलन : कोई दिशा निकलनी चाहिए...




जब मैं BHU में था, बनारस के मेहंदीगंज में कोका-कोला संयंत्र के सालाना विरोधी आयोजन में मेधा पाटेकर से मुलाकात हुई. उन दिनों मैं उनसे बड़ा प्रभावित था. मैंने उनसे पुछा कि जब मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से इतनी शिकायतें हैं तो आप जैसे लोग खुद चुनावों में उतर हमें उनको चुनने का विकल्प क्यों नहीं देते ? - उनका जवाब यही था कि उनका प्रयास सिर्फ जनजागरूकता का है और परिवर्तन का निर्णय जनता को ही करना है.

इस देश के अधिसंख्य मतदाता विभिन्न कारणवश विकल्पहीनता की सी ही स्थिति में पृथक राजनीतिक दलों को समर्थन देने पर विवश हैं. धार्मिक, सामाजिक, जातीय, आर्थिक किसी भी  वजह से किसी भी दल को समर्थन देते हुए भी बदलाव की एक उम्मीद कहीं-न-कहीं तो सभी के मन में थी.

अन्ना आंदोलन के प्रथम चरण को समर्थन के रूप में इन्ही भावनाओं का उभार दिखा. विभिन्न कारणों से दूसरे चरण को उसी स्तर का समर्थन न मिलता देख इस आकलन पर पहुंचना सही नहीं होगा कि जनता में विकल्प की चाहत खत्म हो गई है. यदि धर्म, संप्रदाय, जाति  आदि संकुचित भावनाओं के ‘ प्रकटीकरण ‘ के लिए तत्पर किसी समूह को राजनीतिक स्वीकार्यता मिल जा सकती है तब टीम अन्ना के पास तो ऐसी संकीर्ण मानसिकता से हटकर ही मुद्दे हैं. वैसे भी यह भारत है जहाँ हर मान्यता और विचारधारा के लिए समुचित स्थान की कभी कोई कमी नहीं रही है...

हमारा संविधान तो सदा से ही अलगाववादी और नक्सली विचारधारा को भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने को आमंत्रित करता रहा है, ऐसे में टीम अन्ना के राजनीति में आने पर इतनी हायतौबा भला कैसी !!!

           



हाँ, बेहतर होगा कि वो किसी ठोस रणनीति के साथ एक सार्थक विकल्प के रूप में चुनाव में उतरें. जनता उनका हर कदम एक अलग नजरिये से देख रही है, जो बाकि राजनीतिक दलों के प्रति दृष्टिकोण से अलग है. इस दबाव का इन्हें एहसास होना चाहिए. बदलाव की दिशा में एक छोटे कदम का भी अपना महत्व है, मगर इतिहास सफल लोगों को ही स्थान देता है. तो टीम अन्ना से भी बस एक हंगामा खड़ा करने वाली ही नहीं बल्कि तस्वीर बदलने वाली कोशिश पर खरे उतरने की भी अपेक्षा यह देश रखेगा.

और गांधीजी की यह उक्ति शायद उन्हें प्रेरित कर सके (यदि वो वाकई प्रेरणा पाना चाहें) कि – “ पहले वो आपको नजरअंदाज करेंगे, फिर वो आप पर हँसेंगे, इसके बाद वो आप से लड़ेंगे और फिर आपकी जीत होगी.....”

देश को कभी परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखलाने वाले आज उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, और उन्ही की ओर से इस नई कवायद का ज्यादा मुखर विरोध भी हो रहा है. भारतीय जनता के विश्वास को एक बार फिर से न छले जाने के उम्मीद व आग्रह के साथ एक सार्थक विकल्प दे पाने की शुभकामनाएं.....

Monday, August 13, 2012

एक महापाषाणीय स्थल की अभूतपूर्व पुनर्स्थापना.....





इस ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास मुख्यतः अपनी विरासत के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करना रहा है. ऐसी ही एक विरासत पंखुड़ी बरवाडीह, हजारीबाग; झाड़खंड के ‘स्टोन सर्कल’ भी हैं जिनका जिक्र मैंने अपनी ब्लौगिंग की प्रारंभिक पोस्ट में भी किया था. पुनः जब स्थानीय लोगों ने इसपर अपने प्रेम प्रदर्शन की निशानियाँ छोडीं तब भी ‘ विश्व विरासत दिवस ‘ के बहाने इस घृणित प्रवृत्ति पर भी मैंने चर्चा की.  कोल माइनिंग से संभावित खतरे और स्थानीय जनता तथा प्रशासन की उपेक्षा के बीच फिर भी इसके बरकरार होने की फिर भी कहीं एक मनबह्लाऊ तसल्ली थी, जो भी हाल में टूट सी गई जब इनमें से एक स्टोन (मेन्हीर) के गिर जाने की सुचना मिली. इन दोनों महापाषाणों के मध्य से बनी ‘V’ आकृति से समदिवारात्री  ( Equinox ) के कई दृश्यों को निहारने के संस्मरण मानसपटल पर उभर आये. दूर से ही इस स्थल को देख उभर आने वाला रोमांच अद्भुत था, मगर इस रोमांच का केन्द्र ‘V’ आकृति बनाने वाले मेनहीर में से एक के प्रकृति, प्रशासन और स्थानीय लोगों की अपेक्षाओं के बोझ तले ध्वस्त हो चुका था.  


ऐसे में राहत यह जानकर मिली कि हजारीबाग निवासी मेगालिथ अन्वेषक श्री शुभाशीष दास ने जिन्होंने इस स्थल के खगोलिय पक्षों को उभारने के महत्वपूर्ण प्रयास करते हुए राष्ट्रिय-अन्तराष्ट्रीय कई विशेषज्ञों का ध्यान इस ओर खिंचा था, के द्वारा इसे मूल स्वरुप वापस देने के त्वरित प्रयास शुरू किये गए. इन् महापाषाणों (Megaliths) को अपनी संतान सादृश्य मानने वाले श्री दास के लिए इनका ये स्वरुप देख पाना कितना कठिन रहा होगा इसकी कल्पना भी नाहीं की जा सकती. अपने कई कई वर्षों के सतत अध्ययन के दौरान इन्होने इन् मेगालिथ्स की दिशा, कोनों पर झुकाव जैसे कई तकनिकी देता संकलित कर रखे थे, वो अभी काम आये और संभवतः भारत में पहली बार किसी ध्वस्त महापाषाण को उसका मूल स्वरुप पुनः दे पाने का प्रयास किया गया. एक अमेचर मेगालिथ अन्वेषक के लिए यह कार्य कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा इसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है...


श्री दास के अनुसार इस संरचना को संपूर्ण वास्तविक स्वरुप दे पाना तो असंभव सा ही है, किन्तु इन्हें पूर्व सदृश्य स्वरुप तो दिया ही जा चूका है; और अब इसकी ‘ V ‘ आकृति में से ‘Equinox’ का अवलोकन पुनः संभव है.....


एक मेगालिथ अन्वेषक और एक जागरूक नागरिक के रूप में श्री दास ने अपनी जिम्मेवारी तो निभा दी, मगर क्या अब इन अपाहिज मेगालिथ्स के प्रति प्रशासन और आम जनता से अपनी विरासत के प्रति उनकी जिम्मेदारी निभाने की कोई उम्मीद भी की जानी चाहिए ?????

Wednesday, July 25, 2012

अमरनाथ यात्रा...




“इस दर पे वही आता है, जिसे वो बुलाता है...”; ये पंक्तियाँ कुछ समय पहले तक मेरे लिए शब्द मात्र ही थीं; मगर वाकई इनपर विश्वास सा होने लगा है। घर से निकला तो था जम्मू में वैष्णो देवी के दर्शन कर श्रीनगर और इसके आस-पास की कुछ जगहें घूमने की योजना बनाकर, मगर जम्मू की जबर्दस्त गर्मी और श्रीनगर में कुछ संवेदनशील कारणों से कर्फ्यू लगे होने के कारण योजना परिवर्तित करनी पड़ी। संयोग से अमरनाथ यात्रा शुरू हो गई थी और कई यात्रियों के जत्थे जाते देख हमने भी बाबा अमरनाथ के दर्शनों का निश्चय कर लिया। इस बिल्कुल अन्प्लान्न्ड जर्नी में संयोग ही कहा जाएगा कि भगवती नगर में बने कैंप से अगले दिन का रजिस्ट्रेशन मिल गया, और तमाम शंका-आशंकाओं के मध्य ही चंद ही बची छुट्टियों में बिना किसी व्यवधान के यात्रा संपन्न हो ही गई। 

अपने पास छुट्टियाँ काफी गिनी-चुनी थीं, मगर फिर भी हमने पहलगाम मार्ग से चढ़ाई और बालटाल मार्ग से वापसी का निर्णय लिया। बालटाल मार्ग से कठिन चढ़ाई होने पर भी दूरी मात्र 14 किमी होने के कारण दो दिनों में यात्रा संपन्न होने की संभावना रहती है, मगर पहलगाम मार्ग में मिलने वाले प्राकृतिक दृश्यों के अवलोकन के आनंद से वंचित रह जाने की कसक भी रह जाएगी। वैसे भी धार्मिक मान्यताओं  के अनुसार भी पहलगाम मार्ग को ही वरीयता दी गई है. 


जम्मू से बस द्वारा सुबह रवाना होकर शाम तक पहलगाम पहुँचे जहाँ हजारों तीर्थयात्रियों के रहने और भोजन के लिए टेंट और भंडारे की अच्छी व्यवस्था की गई थी। मगर यहाँ कुछ स्टाल्स पर गुटके आदि की बिक्री ने थोडा विचलित भी किया. तंबुओं का मानो जंगल सा बसा हुआ था। ऐसी तीर्थयात्रा का पहला अनुभव और इतनी भीड़ में थोड़ी असुविधाओं के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करता हुआ रात वहाँ बिताई और और अगले दिन सुबह चंदनबाड़ी के लिए निकले। यहाँ तक के लिए वाहन उपलब्ध थे. चन्दनबाड़ी से रजिस्ट्रेशन चेकिंग की औपचारिकता पूरी होने के बाद यात्रियों के जत्थे अपनी सुविधानुसार पैदल, घोड़े या पालकी के द्वारा रवाना हुए. पहला चरण चन्दनबाड़ी से शेषनाग तक का था. इस मार्ग के प्रमुख पड़ावों में पिस्सू टॉप , जोजी बल और नागा टोपी आते हैं; जिसमें पिस्सू टॉप की चढाई वाकई यात्रिओं के धैर्य की परीक्षा लेती है. बर्फ से ढंकी पहाड़ियां और खूबसूरत झरने यात्रियों के मन को आनंद जरुर देते हैं मगर संकरे रस्ते पर सावधानीपूर्वक चलने की अपरिहार्यता  सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है. कार्यक्षेत्र की विशिष्टता मुझे इन पहाड़ों की खूबसूरती से रूबरू कराती रही है, मगर शेषनाग झील का अवलोकन वाकई एक अविष्मरणीय अनुभव था. रात्री पड़ाव हमने शेषनाग में ही किया. यहाँ भी यात्रियों के लिए रियायती दर पर टेंट्स की व्यवस्था थी और भंडारे भी चल रहे थे, इसलिए सुबह जल्द ही पंचतरणी के लिए रवाना हो गए. बर्फीले रास्ते और हलकी बारिश ने सफर को थोडा और कठिन बना दिया था, मगर दूर-दराज से आये बुजुर्ग स्त्री-पुरुषों के उत्साह और जज्बे से प्रेरणा लेते हम आगे बढते रहे. इस मार्ग के प्रमुख पड़ावों में वरबल, गणेश टॉप, पोषपत्री आदि थे. पंचतरणी हमलोग दोपहर तक पहुँच गए थे, मगर समय और साधनों को ध्यान में रखते हुए हम बीच राह में कहीं न रुक सीधे अमरनाथ ही पहुंचना चाहते थे; इसलिए हमने अपना सफर जारी रखा और उसी दिन शाम तक अमरनाथ पहुँच गए. मार्ग में संगम एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. यहाँ पर बताया गया कि ठहरने के लिए कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है और स्थानीय लोगों द्वारा उपलब्ध टेंटस् और भोजन की व्यवस्था पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. ज्यादा खोजबीन और तहकीकात की स्थिति में हम रह भी नहीं गए थे, इसीलिए इसी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया. 


अगले दिन पवित्र अमरनाथ गुफा की ओर अपने निर्णायक सफर पर निकले और अपने पीछे बढती लाइन से प्रेरित होते शनैः-शनैः आगे खिसकते हुए अंततः बाबा के सामने पहुँच ही गए. 

जो वाकया, जो शब्द बस यहाँ-वहाँ पढ़े थे वो खुद पर चरितार्थ होता पाया. बाबा बर्फानी के दर्शन ने वाकई अभिभूत और भावुक ही कर दिया. अपलक प्रकृति की इस अनूठी लीला को निहारता रहा. दर्शनों की प्यास बुझ नहीं रही थी, मगर इस दृश्य का दर्शनाकांक्षी मैं अकेला ही तो नहीं था.....



भोलेनाथ के इस स्वरुप को मन में बसा बालताल मार्ग से वापस उतरा.  

यात्रा तो वाकई सफल और यादगार रही मगर कुछ बातें वाकई ध्यान देने वाली हैं. इधर आस-पास कोई गाँव न होने के कारण स्थानीय व्यवस्था जो मुस्लिम समुदाय द्वारा ही की जाती है, हर छोटी -से- छोटी चीज के लिए नीचे के स्थानों पर ही निर्भर है. इसलिए ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ हर चीज महँगी होती जाती है. घोड़े और पालकी वाले मनचाहे रेट मांगते हैं, जिनमें मोलभाव की भी थोड़ी गुंजाईश रहती है. वैसे कहीं बेहतर होता यदि सरकारी दर तय कर दी जाती. मगर शायद अल्पावधि में इनके जीविकोपार्जन की संभावनाओं के दबाव को देखते हुए वो कुछ ठोस पहल न कर पा रही हो. बेहतर है कि ये घोड़ेवाले जो सामान्यतः रजिस्टर्ड होते हैं के पहचानपत्र सफर तक अपने ही पास रखे जायें, इससे इनकी मनमानी पर किंचित नियंत्रण की संभावना तो रहती ही है. 

रजिस्ट्रेशन के पूर्व मेडिकल चेकअप की सामान्यतः औपचारिकता ही होती है, इसलिए अपने स्वास्थ्य को परखने के बाद ही यात्रा पर रवाना हों. क्योंकि ऊँचे स्थानों पर ऑक्सीजन की कमी सहित कुछ अन्य परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है. कोई भी असुविधा होने पर राह में बने आर्मी कैम्पस की सहायता लें. सेना की सक्रिय और सराहनीय भूमिका इस यात्रा को थोड़ा सहज तो बना ही देती है. 

लौटते वक्त आश्चर्यजनक रूप से जम्मू का बारिश से भीगा मौसम मानो मुसकुराता हुआ सवाल कर रहा था – “क्यों ! हो गया न !!!”

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