Thursday, September 29, 2011

रंगमंच पर उतरे 'मुखौटे'



मुखौटों की दुनिया मे रहता है आदमी,
मुखौटों पर मुखौटे लगता है आदमी;
बार बार बदलकर देखता है मुखौटा,
फिर नया मुखौटा लगाता है आदमी..... - (डा. ए. कीर्तिवर्द्धन अग्रवाल) 

जी हाँ अपने चेहरे पर असंख्य नकली चेहरे लगाये, दुनिया के सबसे सभ्य प्रजाति होने का दावा करने वाला मनुष्य अभी भी कितना अमानुषिक और पाशविक है यह सच इन मुखौटों के पीछे ही छुपा है. मगर क्या वाकई उसके कृत्य उसे पाशविक कहे जाने के काबिल भी छोड़ते हैं ? क्या कभी पशु ने पशु के साथ छल-कपट किया है ? क्या उनमें कभी विश्व युद्ध हुआ है ? नाना प्रकारों से अपने साथी को रिझाने वाले इन जीवों को क्या कभी किसी ने कुंठा या आवेश में बलात्कार करते देखा है ??? ये सारे  कुकृत्य मनुष्य ही करता है और अपने झूठे उसूलों, आदर्शों के मुखौटे तले अपनी मूल विकृतियों को छुपाने की असफल चेष्टा करता है. 

मुखौटों का यह खेल इंसान अपने- आप के साथ तो खेलता ही है, स्त्री बनाम पुरुष (या Vice  - Versa भी), व्यक्ति बनाम समाज, राजनीति बनाम आम आदमी ही नहीं दो राष्ट्रों के मध्य भी यह क्षद्म दांव-पेंच चलते रहते हैं. मुखौटों के इस प्रपंच और इन्सान में नैतिकता की नपुंसकता और बढ़ते लालच ने इस ब्रह्माण्ड को भी टुकड़ों में बाँट दिया है. एक और शोषक हैं और दूसरी तरफ शोषित. शोषक और शोषितों के मध्य की यह खाई बढती ही जा रही है. हाँ कभी-कभी एक पक्ष अपनी तात्कालिक दावों से बाजी जीतता हुआ लगता तो है, मगर अंततः वह खुद को उन्ही मुखौटों के शिकंजे में घिरा पता है, जिससे उबरने की उसने पहल शुरू की थी. 

कुछ ऐसे ही विचारोत्तेजक मुद्दों को स्पर्श करता हुआ सक्षम थियेटर समूह के नाट्य समारोह की अंतिम प्रस्तुति ' मुखौटे '; जिसके लेखक थे हमीदुल्ला और निर्देशन किया था सुनील रावत जी ने. 
पत्नी के सामने आदर्श का मुखौटा 

एक पति जो अपनी नपुंसकता को छुपाने के लिए अपनी पत्नी पर दबाव डालता है पौराणिक नियोग प्रथा के मुखौटे के नाम पर, तो एक पत्नी जो अपने पूर्व प्रेमी से संबंधों को आधुनिकता का परिचायक मानती है इस वैचारिक मुखौटे के साथ कि हर स्त्री अपने आप में पूर्ण सक्षम है, और उसने अब नारी शरीर की नियति में मरना नहीं जीना सीख लिया है. उसके अनुभवों के अनुसार कमजोर पात्र की इस गन्दगी में कोई जगह नहीं.

पारंपरिकता से स्वतंत्रता और आधुनिकता  का मुखौटा 
और वहीँ समाज के शोषित, वंचित वर्गों के प्रतिनिधि वन्य प्राणियों का भी एक समूह है जो सत्ता से अपने लिए अधिकार और सम्मान की मांग करता है. मगर सत्ता जो शेर की तरह ताकतवर है और लोमड़ी की तरह चालाक, जो सच्चे और ताकतवर को देखने की आदि नहीं उन ' वन्य प्रतिनिधियों' को भी अपने शब्दजाल, सम्मान, बौद्धिकता के भ्रमजाल में उलझा एक ऐसे नशे में मदहोश कर देती है कि वो अपने लक्ष्य से ही भटक जाते हैं. (क्या सत्ता सदियों से समस्त विश्व में भी ऐसा ही खेल नहीं खेलती आ रही ! )

शोषितों की मांग उठाने से पूर्व बौद्धिकता का वैश्विक मुखौटा 
सत्ता के पास भटकाने के लिए वैचारिक और बौद्धिक क्रांति की कवायदें हैं, अन्तराष्ट्रीय संकट हैं, आर्थिक संकट हैं, घरेलु उलझनें हैं और तब तक उत्पीड़ितों के लिए सिर्फ आश्वासन और परिवर्तन का इंतज़ार. मुखौटों के इस खेल में असली मुद्दे, असली चेहरे खो ही जाते हैं, इन मुखौटों के उतरने, सच्चाई सामने आने और असली क्रांति लाने के लिए रह जाता है तो बस इंतज़ार.

इंतजार - जब तक कि समानता और सम्मान धरती पर उतरे...
जीवन और समाज की कडवी सच्चाइयों को सामने लाने में काफी सक्षम रहा है यह नाटक. और इसमें इसके कलाकारों और निर्देशक सहित पूरे टीम की उल्लेखनीय भूमिका रही है. नाटक के प्रमुख कलाकारों में अनामिका वशिष्ठ, विनीता नायक, विक्रमादित्य, आर्यन चौधरी, नवीन आदि की प्रमुख भूमिका रही. कई ज्वलंत सवालों से जुड़े नाटकों की प्रस्तुति के साथ सक्षम थियेटर समूह का यह आयोजन अभी तो समाप्त हो गया है, मगर आशा है जल्द ही लौटेगा कुछ नई प्रस्तुतियों के साथ. इस समूह और इससे जुड़े कार्यकर्ताओं को हार्दिक शुभकामनाएं. 

Tuesday, September 27, 2011

आँखों - देखी : शादी से पहले और शादी के बाद

हम उन दोस्तों में नहीं जो बौर्डर पर दोस्तों को छोड़ दूर से लुत्फ़ उठाते रहें. ऐसे में जिन दोस्तों ( eg. आशीष, शिवरंजन भारती ) को पिछले दिनों विवाह मंडप तक पहुंचा कर आया था, जीवन संग्राम में उनके अनुभवों को बांटने या पाने का भी अवसर तो प्राप्त करना ही था. इस क्रम में पहला साक्षात्कार लिया गया मि. & मिसेज सिंह यानि आशीष और उनकी  पत्नी श्रीमती कविता सिंह का. 

आशीष और कविता 
जैसा कि मैंने अपनी एक पोस्ट में बताया था कि आशीष मेरे बी. एच. यू. के मित्रों में रहे हैं और उनका कविता जी से प्रेम विवाह हुआ है. किसी शादीशुदा मित्र दंपत्ति के प्रत्यक्ष साक्षात्कार और मेहमाननवाजी को पाने का यह मेरा प्रथम अनुभव था. काफी रोचक रहा यह अनुभव मेरे लिए. दो पंक्षियों को अपना घोंसला धीरे-धीरे सजाते हुए देखकर काफी अच्छा लगा. अबतक अकेले अपने हिसाब से जिंदगी को अपनी तरह जीते रहे दो व्यक्तित्व अब एक-दुसरे के हिसाब से खुद को समायोजित करने का प्रयास करते भी दिख रहे हैं. निश्चित रूप से इस इवौल्युशन में पुरुष की गति थोड़ी धीमी है, मगर शायद यह मानव सभ्यता की जेनेटिक समस्या भी हो ! मगर कितनी भी पुरुषीय संरचना हो घर और घर के कायदे-कानून पर नयी गृह मंत्री की छाप तो दिख ही जाती है. 

भाभी जी जो कि ओ. एन. जी. सी. में जियोफिजिसिस्ट भी हैं, अपनी दोहरी जिम्मेवारी को बखूबी निभा रही हैं और इसका सकारात्मक असर मित्र की सेहत और मनोमस्तिष्क पर भी पड़ता दिख रहा है.

विवाह के दौरान ताम-झाम में किसी को अच्छी तरह से जानने का अवसर नहीं मिल पाता. अब फुर्सत से बैठने पर पता चला कि भाभी जी गृहसज्जा के साथ-साथ पाक कला में भी अतिशय निपुण हैं. द. भारतीय होते हुए भी उत्तरभारतीय व्यंजनों पर भी उन्हें पूर्ण अधिकार प्राप्त है.

भोजन के लिए सहज आमंत्रण 


भाभी जी के कर कमलों से से भोजन का अनिवर्चनीय सुख 














यह उनके बनाये विशेष 'गोभी मुसल्लम' से ही परिलक्षित हो गया. उनके कुछ और विशिष्टताप्राप्त व्यंजन भी ज्ञात हुए हैं, जिनके अगले किसी अवसर पर प्रकटीकरण की संभावना शेष है.
लज़ीज़ ' गोभी मुसल्लम '
संजोग से वहीँ बी. एच. यू. के ही एक अन्य मित्र दीपक के भी आ जाने से वहां एक और महफ़िल जम गई. 

अपने इस प्रथम अनुभव के स्मृति चिह्न केरूप में सिंह दंपत्ति को एक हस्तशिल्प का सुन्दर नमूना 'स्वास्तिक' के रूप में देकर, और कुछ संतुष्टि भरी सुखद यादें लेकर मैं उनके आशियाने से निकल आया; इस कामना के साथ कि इनका आशियाना यूँ ही खुशियों आपसी समझ, सामंजन और विश्वास से भरा-पूरा रहे.

खुश रहे तूँ सदा ये दुआ है मेरी...


अब अगर अंत में भाभीजी की शान में यह गीत न समर्पित करूँ तो भावभिव्यक्ति थोड़ी अधूरी है रह जायेगी - 


Saturday, September 24, 2011

भीड़ से हटकर कुछ बदला हुआ सा 'मौसम' (एक फिल्म समीक्षा)


वर्षों पहले दूरदर्शन के दौर में एक बेहतरीन सीरियल आता था - 'फटीचर'; जिसके मुख्य कलाकार पंकज कपूर का एक प्रसिद्द डायलौग था- ' फटीचर, तूँ इतना इमोशनल क्यों है यार ! " बहुचर्चित फिल्म 'मौसम' को देखकर अच्छा लगा कि वो पंकज कपूर आज भी उतने ही इमोशनल हैं. मौसम जो कि उनकी ड्रीम प्रोजेक्ट थी, वाकई एक सपने के जैसी ही खूबसूरत फिल्म है. या यूँ कहें कि यह एक दिल को छु लेने वाली कविता है, जिसे किसी संवेदनशीलता के साथ ही महसूस किया जा सकता है. हाँ कहीं - कहीं यह फिल्म स्क्रिप्ट में थोड़ी और कसावट की मांग भी करती है, और क्लाइमेक्स में शाहीद कपूर में जबरन हिरोइज्म के तत्व प्रकट कर हिंदी फिल्मों के हीरो के भाव विकसित करने का मोह भी छोड़ा जा सकता था. खैर पहली फिल्म और बौलीवुडीय ट्रेंड का दबाव भी तो कुछ अर्थ रखता ही है. 



फिल्म न सिर्फ़ एक भावनापूर्ण प्रेम कहानी है, बल्कि पिछले बीस वर्षों का एक दस्तावेज भी है. 1992 के  'बाबरी मस्जिद कांड' से लेकर 'गोधरा कांड' तक की घटनाओं जिनमें कारगिल युद्ध और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हादसे भी शामिल है के एक मासूम प्रेमी युगल पर प्रभाव को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करती है यह फिल्म. कश्मीर में आतंकवाद के दौर में वहाँ से पंजाब आ गई मुस्लिम युवती आयत और पंजाब के हरिन्दर उर्फ हैरी का मासूम प्रेम इस फिल्म की बुनियाद है जो अपनी परिणति को पहुँचने के लिए कई विषमताओं से गुजरता है. निर्देशक की सक्षमता के कारण दोनों की ही मासूम प्रेम कहानी शुरू से ही दर्शकों को अपने साथ जोड़ लेती है, जो इनके सम्मोहन में कहीं खो से ही जाते हैं. मगर आज  20-20 के दौर में दर्शकों के भी धैर्य की एक सीमा है. निर्देशक ने हरेक शौट काफी खूबसूरती से लिया है, और हर सीन में पंकज कपूर का टच महसूस होता है, मगर यही शायद उनकी कमजोरी भी बन गई जो एडिटिंग के आड़े आकर फिल्म को अनावश्यक थोड़ी लंबी बना गई. 

 "जरा सी मेंहदी लगा दो,
जो रंग न चढ़ा तो --- तो एक नजर देख लेना ..."

इंटरवल से पहले फिल्म बस एक जादुई सम्मोहन सा ही अहसास देती है. इंटरवल के बाद भी किसी खूबसूरत कविता सा एहसास होता है, जब फिल्म स्कौटलैंड से गुजर रही होती है. मगर कारगिल युद्ध, गोधरा जैसी चीजें कहानी को कहीं भटकती सी लगती हैं और दर्शकों को उकताती भी. मगर साथ ही दर्शकों को सचेत भी करती है ये फिल्म उन " भयानक सायों के प्रति, जिनके न चेहरे होते हैं न नाम....."

"कि दिल अभी भरा नहीं..."

मगर फिर भी पंकज कपूर के कुशल निर्देशन में शाहीद और सोनम ने सराहनीय अभिनय किया है, और दोनों ने ही अपनी सादगी से प्रभावित किया है.  कुछ अच्छे गानों के साथ हमदोनो' की - " कि दिल अभी भरा नहीं..." गुनगुनाना आकर्षित करता है. 


फूहड़ कॉमेडी और अतिनाटकीय एक्शन से भरी फिल्मों के इस दौर में एक रिमझिम सी फुहार है मौसम.....



Tuesday, September 20, 2011

आधुनिक कला की युवा अभिव्यक्ति : स्वाति गुप्ता


कला अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जो शब्दों की मोहताज हुए बिना मात्र सृजनात्मकता के द्वारा ही परस्पर संवाद कायम कर लेती है. कला के क्षेत्र में भारत का गौरवशाली इतिहास रहा है और वर्तमान पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभा रही है. स्वाति गुप्ता भारतीय कला में उभरता ऐसा ही एक सशक्त हस्ताक्षर हैं.


यूँ तो स्वाति कला की विभिन्न विधाओं यथा पेंटिंग, वीडियो, फोटोग्राफी आदि के द्वारा अभिव्यक्ति की समान रूप से दक्षता रखती हैं, मगर उनकी प्रस्तुतियों में मुख्यतः परंपरागत और समकालीन कला के फ्यूजन की खूबसूरत झलक मिलती है. 


दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट से BFA करने के बाद इन्होने विजुअल आर्ट्स में डिप्लोमा फ़्रांस के Ecole d'arts de Paris - Cergy से प्राप्त किया. दिल्ली में रहते हुए जहाँ उन्हें श्रीमती अंजलि इला मेनन जैसी हस्ती से कला की बारीकियां जानने का अवसर मिला वही फ़्रांस में रहते हुए उन्हें अपनी मूल प्रेरणा स्व. एम्. एफ. हुसैन साहब से मिलने का भी अविस्मरणीय और अमूल्य अवसर प्राप्त हुआ. कला के क्षेत्र में अपनी विरासत संभालने को उत्सुक युवा पीढ़ी के इस प्रतिनिधि को देख हुसैन साहब के मनोभावों की सहज कल्पना की जा सकती है. कला  के  प्रति  अतिशय  जुनूनी  इन  दोनों शख्शियतों के बीच परस्पर संवाद और हुसैन साहब के अनुभवों ने इन्हें कला के प्रति और भी समर्पण के लिए प्रेरित किया. 

फ़्रांस में लगभग 6 वर्षों के प्रवास के दौरान इन्हें भारत-फ़्रांस के मध्य राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साझेदारी को करीब से महसूस करने का अवसर मिला. भूमंडलीकरण और आधुनिकता ने विभिन्न समाजों और संस्कृतियों को एक-दूसरे से जोड़ा है उसने कला जगत को भी प्रभावित किया है. स्वाति की कृतियों में इन बदलते पहलुओं की भी झलक मिलती है. 



पिछले दिनों दिल्ली के त्रिवेणी आर्ट गैलरी में इनकी कलाकृतियों की प्रथम एकल प्रदर्शनी आयोजित की गई. इसमें इनकी हालिया पेंटिंग्स और इंस्टालेशंस शामिल किये गए थे. प्रदर्शनी में शामिल कृतियाँ उनके रोजमर्रा की  साधारण सी चीजों को  असाधारण स्वरुप में देखने और अभिव्यक्त करने की क्षमता को दर्शाती है. भारत से जड़ों के जुड़े होने के कारण रंगों के प्रति स्वाभाविक लगाव उनकी कलाकृतियों में भी दिखता है, जहाँ वे चमकीले रंगों के साथ कंट्रास्ट का भी सुन्दर संयोजन स्थापित करती हैं.  


कला के क्षेत्र में उनके विभिन्न अनुभवों, संवादों, प्रवास और यात्राओं ने उनके आर्ट में वैश्विक घटकों का सम्मिश्रण भी सुनिश्चित किया है, जो उनकी कला को एक विशिष्टता देता है. वो स्वयं भी अपनी कला को American abstract and minimal art, BPMT (French artist Group), Colour Field Artist और Pop - Art की ओर झुकाव लिए हुए भी मानती हैं. 

अब जब स्वाति जी अपनी कला के साथ भारत लौट आई हैं तो आशा है कि यहाँ भी उनकी अभिव्यक्ति को और भी नए आयाम मिलें. अपनी विशिष्ट कला शैली के साथ वो अपना एक अहम मुकाम बनाने में सफल हों - हार्दिक शुभकामनाएं. 

Saturday, September 17, 2011

अरुणाचल में मनाई विश्वकर्मा पूजा की यादें ...



आज विश्वकर्मा पूजा के शुभ दिवस पर अपने अरुणाचल में बिताए एक वर्ष की याद हो आई है. एक ईंजीनियरिंग जियोलौजिस्ट के रूप में मैं अपनी मूल साईट पर अरुणाचल के पासीघाट से विश्वकर्मा पूजा मना कर ही निकला था, और अगली पूजा वेस्ट सियांग के सुदूरवर्ती गाँव हिरोंग में मनाई थी. तब तक काम के साथ - साथ स्थानीय परिस्थितियों का भी अनुभव काफी हो चुका था. 

पूजन में NE के युवाओं की भी भागीदारी 


अरुणाचल नोर्थ - ईस्ट का ऐसा प्रमुख भाग है जहाँ हिंदी बोली और समझी जाती है. यहाँ के सुदूरवर्ती गाँवों में भी आप इसे व्यवहार में ला सकते हैं. यहाँ की विभिन्न जनजातियों जिनकी परंपरा, मान्यता, भाषा आदि एक - दूसरे से पृथक हैं; आपस में संवाद के लिए टूटी-फूटी हिंदी का ही प्रयोग करते हैं. 

दर्शन के लिए स्थानीय निवासी 

बंगाल, बिहार और अन्य प्रान्तों से आ बसे हिंदी भाषियों के कारण वहाँ के पर्व-त्यौहार, रीति-रिवाजों की झलक भी यहाँ मिल जाती है. विश्वकर्मा पूजा, दशहरा, दिवाली के अलावे छठ  का होना भी मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य से कम नहीं था.  


ऐसे में यह अलग से कहने का कोई कारण नहीं बचता कि अरुणाचल और इसके लोग हमारे देश के एक अभिन्न अंग हैं. 

अरुणाचल में माने गई विश्वकर्मा पूजा की की कुछ झलकियाँ - 

Tuesday, September 13, 2011

ना आना इस देश लाडो (अंजलि गुप्ता को समर्पित)


अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था को नकारते हुए (झकझोड़ने की तो कोई गुंजाईश है ही नहीं) पूर्व वायु सेना अधिकारी अंजलि गुप्ता ने अपनी जिंदगी को भी टर्मिनेशन दे दिया. जाते-जाते वह पहली भारतीय महिला वायुसेना अधिकारी जिस पर ' कोर्ट मार्शल' की कारर्वाई की गई के अलावे इतिहास में संभवतः एक और  कारण से अपना नाम लिखवाती गई हैं - आत्महत्या करने वाली भारतीय वायु सेना की पहली महिला अधिकारी. 


अंजलि गुप्ता (35 वर्ष) करीब 6 वर्ष पूर्व अपने वरिष्ठ अधिकारीयों पर यौन शोषण का आरोप लगा कर चर्चा में आई थीं. मगर जांच में उनके खिलाफ आरोप सही नहीं पाए गए, बल्कि अंजलि को ही वित्तीय अनियमितता और ड्यूटी पर न आने का दोषी पाया गया. भारत के सैन्य इतिहास का यह भी पहला मौका था जब किसी सैन्य अदालत की कारर्वाई की मीडिया को रिपोर्टिंग करने की अनुमति दी गई. नौकरी से बर्खास्त किये जाने के बाद वो काफी मानसिक दबाव से भी गुजर रही थीं. बर्खास्तगी के बाद अंजलि बंगलुरु के एक कॉल सेंटर से जुड गईं. 

आत्महत्या के बाद की जा रही छानबीन में एक नई कड़ी जुडी है जिसके अनुसार अंजलि की वायुसेना के ग्रुप कैप्टन अमित गुप्ता (54 वर्ष) से मित्रता थी. वो उनके भोपाल के शाहपुरा स्थित मकान में आई थीं, जहाँ अमित की पत्नी और बड़ी बहन रहती हैं. अमित और उसके परिवार वाले जब अपने बेटे की सगाई में दिल्ली गए हुए थे, इसी घर में अंजलि ने फांसी लगाकर तथाकथित आत्महत्या कर ली. समाचारों में घर से कई पेट्रोल की बोतलें मिलने की भी सूचनाएं हैं, जिससे अंजलि द्वारा आत्महत्या के दृढ निश्चय के कयास भी लगाये जा रहे हैं (!) अंजलि के कुछ रिश्तेदारों का दावा है कि अमित द्वारा अपनी पत्नी से तलाक ले उससे विवाह के वादे को ठुकराए जाने के कारण ही उसने ऐसा कदम उठाया. पुलिस हत्या और आत्महत्या दोनों संभावनाओं पर विचार कर रही है. 

संभावनाएं चाहे जो हों, एक बार फिर एक स्त्री को ही हार माननी पड़ी है. आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां हैं जिनके कारण ये इतनी नाउम्मीद, इतनी हतोत्साहित हो जाती हैं !!!  प्राणोत्सर्ग कर जाना अपने सिस्टम पर भरोसा करने की तुलना में सहज लगता है. सेना हो या समाज, हर जगह Compromise स्त्री को ही करना पड़ता है, जान दे देने की हद तक !!! क्या वायु सेना को कैरियर बनाने वाली अंजलि इतनी कमजोर थी !!! समाज और व्यवस्था शायद ही इस बारे में विशेष सोचे क्योंकि चिंता करने के लिए तो भारतीय क्रिकेट टीम की Performance जैसी कई महत्वपूर्ण चीजें पड़ी हैं. हमलोग भी थोड़े बेचैन होंगे, एक रात की नींद खराब करेंगे, पोस्ट लिखेंगे, टिप्पणियां करेंगे और दैनिक व्यस्तताओं में खो जायेंगे. मगर अंदर कहीं छुपी अंतरात्मा तो कराहती हुई दुआ कर रही होगी कि न आना इस देश लाडो, यह धरती स्त्री की सिर्फ़ शाब्दिक आराधना करना जानती है; व्यवहारिक नहीं. यहाँ न तो तेरी अस्मिता सुरक्षित है न तेरा गौरव. यह धरती अब स्त्री विहीन होने के ही लायक है. 'No Land Without Woman' की अवधारणा इसी देश में ही अस्तित्व में आनी चाहिए. मरते समय यही बददुआ, यही श्राप अंजलि के ह्रदय से भी निकला होगा.

आज 'क्षमा दिवस' पर मुझे नहीं लगता कि अंजलि की आत्मा हमें क्षमा कर पायेगी. 

Sunday, September 11, 2011

पाकिस्तान से पहुंचे हिंदुस्तान तक ' बोल '


"  दिन परेशां है, रात भारी है ;
जिंदगी है कि, फिर भी प्यारी है " (बोल) 

पिछले दिनों पाकिस्तान से आई नसीरुद्दीन शाह अभिनीत फिल्म 'खुदा के लिए' काफी चर्चित रही थी, जिसमें 9/11 के बाद बदले हालत में इस्लाम की मनमाफिक व्याख्या पर अंकुश लगाने की झलक थी. उसके निर्देशक शोएब मंसूर की अगली पेशकश 'बोल' एक उद्देश्यपरक सिनेमा की अगली कड़ी है. सन्देश देने की अपनी जिम्मेवारियों से बौलीवुड अब खुल कर हाथ झाड चुका है, ऐसे में क्षेत्रीय सिनेमा और पडोसी देशों से आने वाली ये फिल्में सार्थक सिनेमा की एक उम्मीद तो जगाये ही रखती हैं.

बोल में पाकिस्तान के एक परिवार के माध्यम से आम आदमी के जीवनसंघर्ष और परिस्थितियों की जटिलताओं का ही निदर्शन है, मगर अपने अर्थों में यह किसी एक देश या समुदाय की नहीं बल्कि पूरे विश्व की सामाजिक असमानताओं का चित्रण करती है. स्क्रिप्ट के लिहाज से कहीं यह फिल्म कमजोर सी लगती है, मगर जिन सवालों को इसने छुने का साहस किया है, वो तथाकथित प्रगतिशील समाज में भी अश्पृश्य ही हैं. 

कहानी लाहौर के एक हकीम साहब की है, जो बेटे की चाहत में 14 बच्चे पैदा करते गए, जिनमें सिर्फ़ सात ही जीवित हैं. 6 बेटियां और एक संतान जो बेटी भी नहीं हो पाया. इस आश्वस्ति  के साथ कि "जब अल्लाह ने पैदा किया है तो चुग्गा भी देगा". उनकी अब भी अधूरी हसरत को देखते हुए बड़ी बेटी जेनब आवाज उठती है. वह न सिर्फ़ अपनी माँ के आगे संतान होने की संभावनाओं को समाप्त करवाती है, बल्कि अपने भाई जैसे सैफी को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी प्रयास करती है. मगर सैफी के साथ हुए एक हादसे से परिवार में तूफान आ जाता है, और हकीम साहब 'ऑनर कीलिंग' के नाम पर उसकी हत्या कर देते हैं. इसके बाद भी धर्म और सामाजिक मान्यताओं के नाम पर स्त्रियों की आवाज को दबाने की उनकी कोशिश जारी रहती है, और जेनब के तर्कों का उनका एकमात्र प्रतिकार हिंसा ही बचती है. परिस्थितियां उन्हें एक ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहाँ जेनब के हाथों उसके पिता की हत्या हो जाती है, और उसे फांसी की सजा. 

फिल्म में पाकिस्तानी समाज के जिन चंद पहलूओं की भी झलक मिलती है, ईमानदारी से देखें तो वो हमारे यहाँ भी विद्यमान हैं. 

यहाँ मीडिया का भी एक पहलू है, जब फांसी से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करती हुई जेनब के लिए एक महिला पत्रकार बार-बार उच्चाधिकारियों से राष्ट्रपति महोदय को जगाने की गुहार करती है, ताकि वो उसकी फांसी की सजा माफ कर दें. राष्ट्रपति महोदय की नींद टूटती है मगर फांसी की सजा के बाद और उन गूंजते सवालों के बीच जो जेनब ने उठाये हैं - "अगर मारना गुनाह है तो पैदा करना गुनाह क्यों नहीं ? हराम का बच्चा पैदा करना जुर्म क्यों है, जायज बच्चा पैदा कर उसकी जिंदगी हराम करना जुर्म क्यों नहीं?? जब खिला नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हो ??? "

जरा गौर से सोचिये क्या ये सवाल सिर्फ़ पाकिस्तान के लिए ही मौजूं हैं ? क्या इनके जवाब तलाशने की जरुरत हमारे आस-पास भी नहीं ? मगर गंभीर सवालों से मुंह मोड़कर तमाशों में ही समय काटने की आदत बनाकर हम इस पूरी मानवता के भविष्य के साथ विश्वासघात ही कर रहे हैं.

मैं बार-बार कहता आ रहा हूँ कि भारत-पाकिस्तान और तमाम दुनिया के नौजवानों की सोच, जरूरतें, शिकायतें  काफी एक सी हैं और इनका समाधान भी ये एक साथ मिलकर निकाल सकते हैं, बस ये सरहदों और प्रशासन की बंदिशें कम हों. यह नई पीढ़ी आजाद परिंदों की तरह है, इन्हें अपनी लकीरों में मत बांधो - घुटन होती है.....

एक वीडियो इसी मूवी से - 

एक बार जरुर देख सकते हैं इस फिल्म को यदि कड़वी सच्चाई से रूबरू होने का हौसला हो तो .....

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