देश की राजधानी दिल्ली, जो कई बार बसी और कई बार उजड़ी. मगर इस बसने-उजड़ने के क्रम के बीच कुछ ऐसे चिह्न भी छोड़ गई जो आज भी इसके इतिहास के कई हिस्सों की परतें खोल कर सामने रख देते हैं, बशर्ते कोई उन्हें तस्दीक से देखना-समझना चाहे. पिछले दिनों पुरानी दिल्ली के एक भीड़-भाड़ वाले हिस्से में आयोजित एक हेरिटेज वाक का हिस्सा बनने का मौका मिला. दिल्ली की पुरानी हवेलियों से रु-ब-रु करवाते इस वाक के बारे में विस्तार से फिर कभी; मगर आज जिक्र इस वाक के अंत में समक्ष आई उस ईमारत का जिसने कभी इस देश के इतिहास को निर्धारित करने वालों की जिंदगी का काफी करीबी से साक्षात्कार किया था.
मैं बात कर रहा हूँ पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार में स्थित ' हक़सर हवेली' की. 1850 से 1900 ई. के बीच कश्मीरी ब्राह्मणों के कई परिवार अलाहाबाद, आगरा और पुरानी दिल्ली आकर बस गए; जिनमें कमला नेहरु के माता-पिता श्रीमती राजपति कॉल और श्री जवाहर मल कौल भी थे. इन्होने पुरानी दिल्ली के गली कश्मीरिया और सीता राम बाजार के पास के इस भाग में यह हवेली बनवाई जहाँ कमला नेहरु जी का जन्म हुआ और उनका बचपन बीता. इसी हवेली में 8 फरवरी, 1916 को पं. जवाहरलाल नेहरु की बारात आई थी.
सांस्कृतिक और राजनीतिक सरगोशियों का प्रमुख केंद्र रही यह हवेली 1960 में बेच दी गई. तब से विभिन्न व्यक्तिगत और व्यावसायिक गतिविधियों के सँचालन से गुजरती हुई यह हवेली अपने वास्तविक स्वरुप को पूर्णतः खो बैठी है, और अब बस इसके खंडहर ही इसके गौरवशाली इतिहास की दास्ताँ बयां कर रहे हैं.
1983 में इंदिरा जी भी अपनी माँ के जन्मस्थल पर आई थीं और काफी देर पुरानी यादों को भावुकता से टटोलती रहीं. इसे विरासत स्थल जैसे स्तर देने के भी प्रयास हुए मगर स्थानीय सहभागिता न होने के कारण योजनायें परवान न चढ़ पाईं.
अपने इतिहास और विरासत के प्रति आम भारतीयों की उपेक्षा काफी दुखद है. जब तक वो खुद अपने आस-पास बिखरे इतिहास के चिह्नों को सहेजने का प्रयास नहीं करेंगे हम अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को ध्वंश होते देखते रहेंगे.
