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Tuesday, May 10, 2022

1857 की क्रांति के बलिदानियों की स्मृति की धरोहर अजनाला का कालियांवाला खू

आज 10 मई है। 10 मई 1857 ही वो तारीख थी जब वर्षों से जहां-तहां उभरती-दबती असंतोष की अग्नि को एक चिंगारी ने भड़का दिया था और इसने आज़ादी के लिए पहले ठोस कदम का रूप लिया जिसके बाद से इस देश की पूरी व्यवस्था बादल गई। कठोर दमन चक्र चला मगर यहां से स्वतन्त्रता की जो चेतना जागृत हुई उसके आगे ब्रिटिश साम्राज्यवाद अगले 100 साल तक भी इस देश में न टिक सका।

इतिहास के किसी भी अंश को किसी भी तरह से कितना भी क्यों न दबाया जाये, अपने हिस्से की जगह लिए वो कभी-न-कभी उभर ही आता है। ऐसी ही एक दास्तान पंजाब के अजनाला कस्बे के कुएं में मिले नरकंकालों की है जो इतिहास के एक गुम पन्ने से वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ उभर आये हैं।
अजनाला स्थित कुंआ और उससे मिले शहीदों के अवशेष



डॉक्यूमेंटेशन में अंग्रेजों ने कई महत्वपूर्ण काम किये हैं। इन्हीं से उस दौर के विवरण के साथ ऐसे तथ्य भी सामने आ जाते हैं जिनका उल्लेख सामान्य परिस्थितियों में शायद न किया जाता या किसी और रूप में किया जाता। मगर वास्तविक इतिहास और गल्पों में यही अंतर है। 1857 में पंजाब के अमृतसर में तैनात रहे ब्रिटिश कमिश्नर फेडरिक हेनरी कूपर की किताब 'द क्राइसिस ऑफ पंजाब' में कई चौंकाने वाली बातों के साथ यह भी उल्लेख था कि अमृतसर के अजनाला गांव के एक गुरुद्वारे के नीचे कुआं है, जिसमें 282 सैनिकों को 1857 में मारकर फेंका गया था। साथ ही लिखा था कि इन सैनिकों ने अंग्रेजों से गद्दारी की थी लेकिन वस्तुतः वो असली देशभक्त थे जो अंग्रेजों के छक्के छुड़ा रहे थे।
भारत और पाकिस्तान के पंजाब राज्यों में 'उपेक्षित पड़े स्मारकों’ की खोज में समर्पित भाव से जुटे अमृतसर निवासी 42 वर्षीय सुरिंदर कोचर इतिहास में खासी दिलचस्पी रखते हैं।

यह उनका जुनून ही था कि अजनाला के 30,000 निवासियों ने उनकी बात सुनी और अमृतसर के बाहरी किनारे पर स्थित कालियांवाला खू में खुदाई करने के लिए स्वेच्छा से अपनी सेवाएं दीं। यह वही जगह थी, जहां शहीदों का इतिहास सदियों पुराने ईंट से अटे कुएं में गुमनाम दफन था।

खुदाई में जो सामने आया, वह कल्पना से परे था। यहां नरकंकाल, 90 साबुत खोपडिय़ां, करीब 200 जबड़ों के हिस्से और हड्डियों के हजारों टुकड़े मिले हैं, जिन्हें कूपर ने यहां दफन करवाया था। ये ईस्ट इंडिया कंपनी की 26वीं एनआइ (नेटिव इन्फेंट्री) के सैनिक थे, जो 31 जुलाई, 1857 को लाहौर के बाहर स्थित मियां मीर छावनी की जेल से भाग निकले थे। कोचर के पास इस सिलसिले में 'पर्याप्त सबूत थे’।

ये सबूत कूपर की 1958 में लिखी में हत्याकांड के बारे में दिए गए विस्तृत, सर्द और आत्मप्रशंसा से भरे ब्यौरे की ओर इशारा करते हैं। इसमें दफनाने की जगह चुने जाने का जिक्र है। कूपर की क्रूरता का सबूत ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के आर्काइव में भी मौजूद है। 1883 और 1947 के बीच प्रकाशित अमृतसर जिला गजट के सभी चार संस्करणों में कालियांवाला खू का जिक्र किया गया है।

28 फरवरी 2014 को, सुरिंदर कोचर के नेतृत्व में एक शौकिया पुरातत्व दल ने पंजाब में स्थित अजनाला शहर में एक पुराने कुएं से 22 शवों के अवशेषों का पता लगाया। अगले दो दिनों में, कोचर और उनकी टीम ने 90 खोपड़ियों, 170 जबड़े की हड्डियों, और 5,000 से अधिक दांतों सहित हजारों हड्डियों के साथ ही गहने और पुराने सिक्कों के टुकड़े भी प्राप्त किये।

कोचर के इकट्ठा किए गए तमाम कागजी सबूतों के बावजूद कोई भी अधिकारी उन्हें सहयोग देने के लिए तैयार नहीं था। उनके मुताबिक काबिल विशेषज्ञों ने भी 1 चुप्पी साध रखी थी। कोचर कहते हैं, "सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि कूपर की किताब या फिर अन्य दस्तावेजों में जिस जगह का जिक्र था, वहां ऐसे किसी कुएं के निशान नहीं दिख रहे थे। "

कोचर का मानना था कि सैनिकों को जिस जगह दफनाया गया था, वह गुरुद्वारा शहीदगंज के नीचे रहा होगा। यह गुरुद्वारा 1947 के आसपास बना था। लेकिन एक आशंका से उनकी जान निकल रही थी कि गुरुद्वारा शहीदों की कब्र पर न खड़ा हो। दिसंबर, में अमरजीत सिंह सरकारिया के नेतृत्व वाले गुरुद्वारा प्रबंधन ने किसी इतिहासकार की निगरानी में खुदाई की मंजूरी दे दी।

कोचर ने याद करते हुए बताया, "अभी 10 फुट भी खुदाई नहीं हुई थी कि हमें प्राचीन नानकशाही ईंटों से बनी कुएं की घुमावदार दीवार दिखी। "कोचर कहते हैं कि लोगों के इकट्ठा किए गए पैसे, 80 लाख रु. के कर्ज और अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह के सहयोग से गुरुद्वारे को इस साल जनवरी में नई जगह पर ले जाया गया। इस तरह यहां पर बड़े पैमाने पर खुदाई की जमीन तैयार हो सकी।

28 फरवरी की सुबह जमीन से 8 फुट नीचे एक हाथ उठाकर खड़े एक सैनिक का लगभग पूरा कंकाल दिखाई दिया तो वहां मौजूद भीड़ की दर्द में डूबी आवाज फूट पड़ी। उस कंकाल के आसपास पड़े सात और कंकालों को देखते हुए उस समय के हालात का अंदाजा लगाते हुए कोचर कहते हैं, "यह खड़ा व्यक्ति जरूर उस वक्त जिंदा रहा होगा और लाशों के ढेर से होता हुआ बाहर निकलने की कोशिश कर रहा होगा। "

दो दिनों तक खुदाई में निकले कंकालों के ढेर बता रहे थे कि वह कितनी नृशंस घटना थी। उन्हें देखकर अजनाला के लोगों के आंसू थम नहीं रहे थे। उनको इस बात का सुकून तो है कि उन्होंने उस नरसंहार की हकीकत सबके सामने ला दी, लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस भी है कि इस क्रम में घटना से जुड़े फॉरेंसिक महत्व के साक्ष्य शायद हमेशा के लिए बर्बाद भी हो गए क्योंकि उन्हें अप्रशिक्षित गांववालों से खुदाई करानी पड़ी थी।

इतिहासकारों के एक वर्ग की मान्यता रही कि ये कंकाल भारत, पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान दंगों में मारे गए लोगों के थे।
इन कंकालों की वास्त विकता का पता लगाने के लिए पंजाब विश्वभविद्यालय के डॉ. जेएस सेहरावत ने सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) हैदराबाद, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट, लखनऊ और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर अवशेषों का डीएनए और आइसोटोप अध्यययन किया। इस अध्यवयन में हड्डियों, खोपड़ी और दांत के डीएनए टेस्टा से इस बात की पुष्टि हुई है कि मरने वाले सभी उत्तर भारतीय मूल के हैं।

शोध में 50 सैंपल डीएनए और 85 सैंपल आइसोटोप एनालिसिस के लिए इस्तेईमाल किए गए। डीएनए विश्लेिषण से लोगों के अनुवांशिक संबंध को समझने में मदद मिलती है और आइसोटोप एनालिसिस भोजन की आदतों पर प्रकाश डालता है। शोध विधियों ने इस बात का समर्थन किया कि कुएं में मिले मानव कंकाल पंजाब या पाकिस्तान में रहने वाले लोगों के नहीं बल्कि, डीएनए सीक्वेंस यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मेल खाते हैं। ये सभी पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, अवध (वर्तमान में पूर्वी उत्तर प्रदेश) राज्यों से आए थे।

इस शोध को 26 अप्रैल को ‘फ्रंटियर्स इन जेनेटिक्स’ नाम के जर्नल में प्रकाशित किया गया है। शोध के मुताबिक, कुएं में जिन सैनिकों के नरकंकाल मिले हैं, वो ब्रिटिश इंडियन आर्मी की 26वीं बंगाल इनफैंट्री का हिस्सा थे। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुरातत्वविदों ने अजनाला के कुएं को ऐसी जगह बताया है, जहां 1857 के विद्रोह से जुड़े सबसे अधिक नरकंकाल पाए गए हैं।

इस कुंए को पहले "कलियां वाला खू" (अश्वेतों का कुआं) कहा जाता था। इसे अब "शहीदान वाला खू" (शहीदों का कुआं) कहा जाता है।

रिपोर्ट के विस्तृत विवरण के अनुसार भारतीय विद्रोह 10 मई 1857 को शुरू हुआ, जब उत्तर भारत के मेरठ के छावनी शहर में तैनात भारतीय सिपाहियों ने अपने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ तब बगावत कर दी, जब अफवाहें फैलीं कि उनकी नई एनफील्ड राइफलों के लिए इस्तेमाल किए गए कारतूस गाय और सुअर की चर्बी से बने हुए थे। हिंदुओं और मुसलमानों दोनों ने इसे अपने धार्मिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं के खिलाफ एक सुविचारित हमले के रूप में देखा। आक्रोश ने हिंसक प्रतिरोध के लिए प्रेरित किया और इसका शिकार ब्रिटिश अधिकारियों के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों सहित किसी भी अन्य यूरोपीय या ईसाई नागरिकों को बनना पड़ा।

इसी क्रम में विद्रोही दिल्ली के लिए रवाना हुए, और ग़दर भड़क उठा क्योंकि पीड़ित किसान और अभिजात वर्ग समान रूप से अपने ब्रिटिश आकाओं को बाहर करने के प्रयास में एकजुट हो खड़े हो गए।

अजनाला में मारे गए सिपाही 26वीं नेटिव इन्फैंट्री (एनआई) रेजिमेंट के थे, जो मियां मीर (मीन मीर) छावनी में तैनात थे। लाहौर शहर के ठीक बाहर। 13 मई 1857 को, पूरी सेना में असंतोष फैलने के डर से, ब्रिटिश अधिकारियों ने मियां मीर में तैनात कई अन्य रेजिमेंटों के साथ 26वीं को निरस्त्र कर दिया। 30 जुलाई को, लगभग 635-सदस्यीय मजबूत 26वें एनआई उठे और रेजिमेंट के सार्जेंट-मेजर और दो भारतीय अधिकारियों के साथ उनके कमांडिंग ऑफिसर को मार डाला। इसके बाद सिपाहियों ने छावनी के समर्थक दल के साथ, उत्तर की ओर प्रस्थान किया। एक बड़ी धूल भरी आंधी ने उनकी गतिविधियों को छिपाने में उन्हें मदद की।

इस प्रकरण के तुरंत बाद, अंग्रेजों ने विद्रोहियों का पीछा करने के लिए लाहौर और अमृतसर दोनों से सैनिकों को भेजा, और सिपाहियों का पीछा करने में सिख ग्रामीणों की मदद ली। अगले दिन, दादियान (डूडियन) की बस्ती के ग्रामीणों ने रावी नदी के पास सिपाहियों को देखा और तुरंत ही पड़ोसी जिलों में से एक के तहसीलदार (राजस्व कलेक्टर) को सूचना भेजी। स्थानीय पुलिसकर्मियों और स्वयंसेवकों को इकट्ठा करने के बाद, सेना ने सिपाहियों पर हमला किया, जिनमें से लगभग 150 खूनी झड़प में मारे गए या भागने की कोशिश में डूब गए। शेष सिपाही भाग गए, और लगभग 200 नदी के एक छोटे से द्वीप तक तैरने में कामयाब रहे। खून से लथपथ, थके हुए, और परिस्थितियों से निराश, अधिकांश सिपाहियों ने घटनास्थल पर पहुंचने के बाद कूपर और उसके आदमियों के सामने स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर दिया। सिपाहियों ने सोचा कि उन पर कोर्ट-मार्शल द्वारा मुकदमा चलाया जाएगा। ग्रामीणों की सहायता से, कूपर और उसके आदमियों ने सिपाहियों को अजनाला तक लगभग 10 किलोमीटर की दूरी तक मार्च किया, जहाँ उन्हें थाने और कई अन्य पुरानी इमारतों में रात भर के लिए बंद कर दिया गया।

अगली सुबह, 1 अगस्त 1857 को, कूपर ने अपने मुस्लिम घुड़सवारों को ईद अल-अधा मनाने की अनुमति देने की उदारता का ढोंग रचते हुए वापस अमृतसर भेज दिया। इन अधिक अनुभवी मुस्लिम सैनिकों को भेजने के लिए कूपर की वास्तविक मंशा यह थी कि उन्हें उनकी वफादारी पर संदेह था, और उन्हें डर था कि पकड़े गए सिपाहियों के ख़िलाफ़ इनकी योजना को जान वे उसके खिलाफ उठ खड़े हो सकते हैं।

मुस्लिम सैनिकों के जाते ही, कूपर ने अपने शेष सिख सैनिकों को दस के समूह में कैदियों को बाहर लाने का आदेश दिया। कैदियों को एक साथ बांधा गया, फायरिंग दस्ते के सामने मार्च किया गया, और बिना किसी मुकदमे या सुनवाई के सीधे मार डाला गया। सुबह 10 बजे तक, 237 सिपाहियों की हत्या कर दी गई थी, और उनके शवों को गांव के सफाईकर्मियों ने एक बड़े कुएं में फेंक दिया था। अभी भी 45 को सजा दिया जाना बाकी था, लेकिन जब कूपर और उसके लोगों ने अपनी जेल की कोठरी खोली, तो उन्होंने पाया कि अंदर लगभग सभी लोग पहले ही मर चुके थे। किसी भी प्रकार की ताजी हवा की गुंजाइश को खत्म करते हुए कसकर बंद खिड़कियों और बैरिकेडिंग ने अत्यधिक गर्मी और घुटन के कारण कम जगह में ज्यादा लोगों के घुटकर मर जाने की संभावना जताई गई।

कूपर ने 237 सैनिकों के ब्यौरे इस तरह दर्ज किए हैं सभी पूर्वियों ( पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के युवक) को 10-10 के समूह में गोली मारी गई। अन्य 45 सैनिकों को ऐसे हालात में रखा गया कि उनकी मौत घुटन से हो जाए। उनमें से ज्यादातर अजनाला पुलिस स्टेशन के पास एक दुर्ग में गर्मी और उमस में घुटकर मर गए। अन्य 41 जवानों को लाहौर में 'तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया गया। ये वे जवान थे जो अंग्रेजों की गिरफ्तारी से बचने में कामयाब हो गए।

ब्रिटिश कमिश्नर फेडरिक हेनरी कूपर 


कूपर के कार्यों को पंजाब के मुख्य आयुक्त जॉन लॉरेंस और यहां तक कि गवर्नर-जनरल चार्ल्स कैनिंग दोनों से मजबूत समर्थन मिला। पंजाब के न्यायिक आयुक्त रॉबर्ट मोंटगोमरी ने व्यक्तिगत रूप से कूपर को इस "सफलता" के लिए हार्दिक बधाई दी।

इस स्टडी के बारे में इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए जे एस सेहरावत ने कई जरूरी बातें बताईं। उन्होंने बताया कि ट्रेस एलिमेंट्स और डीएनए एनालिसिस के आधार पर पता चला है कि जिन सैनिकों को मारा गया, उनकी उम्र 21 साल से 49 साल के बीच थी। उन्होंने आगे बताया, “डेंटल पैथालॉजी एनालिसिस के आधार पर पता चला कि मारे गए सैनिक हेल्दी थे और शायद इसलिए ही सेना में थे। आर्मी में होने की वजह से उनके पास अच्छी डेंटल हेल्थ बनाए रखने की सुविधाएं उपलब्ध थीं। ”

स्टडी में ये भी सामने आया कि इन सैनिकों को बहुत ही क्रूरता से मारा गया। स्टडी करने वालों को 86 खोपड़ियों में दोनों भौंहों के बीच चोट के निशान मिले हैं। जिससे पता चलता है कि उन्हें प्वाइंट ब्लैंक रेंज से गोली मारी गई। साथ ही साथ नरकंकालों के साथ पत्थर की गोलियां भी मिली हैं, जिनका इस्तेमाल 19वीं शताब्दी में कैद किए गए लोगों की हत्या में होता था। कूल्हे की हड्डियां भी टूटी पाई गई हैं। जिससे पता चलता है कि गोली मारने से पहले सैनिकों को प्रताड़ित किया गया। साथ ही साथ मृत सैनिकों को दफनाने की जगह सीधे ऊपर से कुएं में फेंक दिया गया।

इतिहास के इन शहीदों के साथ वर्तमान जो आज इंका नाम तक नहीं जानता पूरा न्याय नहीं कर सकता, किन्तु इस खोज से जुड़े लोगों की मनोभावना है कि ब्रिटिश सरकार उन शहीदों के नाम बताए ताकि उनके परिजनों के माध्यम से पृथक मान्यताओं के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार अपने जघन्यतम अपराध के लिए भारत से खेद भी प्रकट करे। भविष्य में देखते हैं इतिहास से वर्तमान तक का यह सफर आगे क्या मोड लेता है।

तबतक तो उन गुमनाम शहीदों के प्रति नमन और कृतज्ञता ही प्रकट कर सकते हैं.....
🙏🙏🙏
(स्रोत: इन्टरनेट पर उपलब्ध विविध स्रोतों से संलग्न)
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