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Friday, December 26, 2014

मैंने प्यार किया के 25 बरस...







29 दिसंबर 1989 को रिलीज हुई ‘मैंने प्यार किया’ के 25 साल पूरे हो रहे हैं। इसके साथ एक पूरी पीढ़ी जवाँ हुई है जिसकी यादों में यह फिल्म रची-बसी है। किशोर वय प्रेम के रोमानी अहसासों को अभिव्यक्ति देती यह फिल्म कई मायनों में ट्रेंड सेटर थी। शायद इसके पीछे युवा निर्देशक सूरज बड़जात्या की युवा सोच भी थी जिसने राजश्री बैनर की परंपरा को भी एक युवा अंदाज दिया। घिसी-पीटी ऐक्शन फिल्मों के दौर में युवा प्रेम कहानी को बिल्कुल फ़्रेश अंदाज में प्रस्तुत करने का यह प्रयास एक नए दौर के शुरू होने की कहानी कह रहा था। ‘एक लड़का और लड़की दोस्त हो सकते हैं’ के सवाल को स्पर्श करती यह फिल्म युवा पीढ़ी की बदलती सोच को भी अभिव्यक्त कर रही थी। 





स्थापित कलाकारों की भीड़ से अलग नए चेहरों को स्वीकार करने की दर्शकों की चाहत को इस फिल्म की अपार सफलता ने दृढ़ता से स्थापित किया। भाग्य श्री की सरल और घरेलू छवि घर-घर में बस गई, युवा दिलों पर छा गई, सलमान खान नई पीढ़ी के एक रोल मौड़ल के रूप में उभरे। कोई शक नहीं कि शरीर सौष्ठव पर ध्यान देने का ट्रेंड स्थापित करने में भी सलमान की छवि की प्रमुख भूमिका रही जो आज भी कायम है। 


हिन्दी सिनेमा में काफी समय से हाशिये पर पड़ी सहायक भूमिकाओं में माँ की छवि को एक नया आयाम मिला। अपने बेटे को असीम प्यार करने वाली ममतामयी माँ जो उसे संस्कार देती है और जिन संस्कारों पर खड़ा प्रेम जब अपने प्यार की पसंदगी का इज़हार करता है तो सही गलत के पक्ष को समझते हुये वह अपने पति के बजाए बेटे के पक्ष में मजबूती से खड़ी होती है। अथाह लाड़-प्यार में पला बेटा अपने प्यार को पाने के लिए शौर्टकट नहीं अपनाता बल्कि एक ऐसा कठिन रास्ता चुनता है जो उसके प्यार की राह में दीवार बने सभी लोगों को उसके समर्थन में ले ही आता है। विदेश से लौटे प्रेम के माध्यम से पश्चिम और भारतीय परंपराओं का टकराव भी इसके बाद की कई फिल्मों में बखूबी आजमाया गया। दोस्ती, अमीरी-गरीबी, सही-गलत, चालबाजियाँ और सच्चाई तथा प्यार की ताकत जैसी हिन्दी सिनेमा के कई पारंपरिक विषयों को प्रभावी तरीके से स्पर्श किया गया ‘मैंने प्यार किया’ में। तमाम आधुनिकता के बावजूद राजश्री की पारिवारिक फिल्मों की प्रचलित छवि इस फिल्म में भी कायम रखी गई जो इस फिल्म के प्रसिद्ध बिना प्रत्यक्ष संपर्क में आए फिल्माए ‘किस सीन’ से भी झलकती है जो सलमान की नजर में हिन्दी सिनेमा का बेस्ट किस सीन है। 



गौरतलब है कि ‘बीवी हो तो ऐसी’ में अपनी परफ़ौर्मेंस से निराश सलमान ने सूरज से खुद को इस फिल्म में न लेने का भी आग्रह किया था, जिसे सूरज ने नकार दिया और उनका यह सफल साथ आज भी कायम है। इसी तरह भाग्य श्री से पहले यह भूमिका दूरदर्शन के धारावाहिक ‘फिर वही तलाश’ फेम पूनम को औफ़र की गई थी। अगर उन्होने यह भूमिका स्वीकार कर ली होती तो घर-घर और हर जवाँ दिल में बसने वाली सुमन की छवि उन्ही की होती...



इसके साथ राम-लक्ष्मण के संगीत को याद न किया जाना भी अनुचित होगा जिनके माध्यम से हिन्दी सिनेमा में अर्से बाद सुरीले गीतों की पुनः वापसी हुई... 




बहरहाल अपने बेहतरीन अभिनय, संवाद, गीत-संगीत और निर्देशन आदि से सजी यह फिल्म बौलीवुड के इतिहास का एक मील का पत्थर है जो आगे भी कई फिल्म प्रेमियों को आकर्षित और प्रेरित करती रहेगी.......

Saturday, September 10, 2011

सलमान: ' बॉडीगार्ड ' वाया 'मैंने प्यार किया ' और कुछ यादें



यूँ तो सलमान ने स्वयं को 'मास' के स्टार के रूप में स्थापित व स्वीकार भी कर लिया है. मगर फिर भी 90 के दशक में कैरियर की शुरुआत करने वाले सलमान में कुछ खास बातें ऐसी भी हैं जो उन्हें आम जनता में बिना किसी प्रयोगवादिता के भी लगातार लोकप्रिय और सफल बनाये हुए है.

अपने अन्य साथी कलाकारों की तरह सलमान किसी नामचीन बैनर के साथ बंधे नहीं रहे. उन्होंने विभिन्न किस्म की भूमिकाओं को निभाते हुए बिना किसी विशेष छवि में टाईप्ड हुए अपनी राह बनाई. रोमांटिक से कॉमेडी तक का सफर तय करते हुए अब बह रही हवा के विरुद्ध एक्शन की कमान संभाले दिखाई दे रहे हैं. कभी चौकलेटी और रोमांटिक स्टार के रूप में प्रचारित इस स्टार ने कॉमेडी और पीरियड भूमिकाएं निभाने लग गए कलाकारों को भी वापस एक्शन की ओर लौटा दिया है. 

जैसा कि सलमान खुद ही अपनी फिल्म में कहते हैं -"मुझ पर एक एहसान करना कि मुझपर कोई एहसान न करना" की तर्ज पर अब खुले रूप से अपने निर्माता - निर्देशकों की सफलता के भी सुनिश्चित बॉडीगार्ड  बन गए हैं. सलमान ने अपना एक मैनरिज्म या 'सलामनिज्म' विकसित कर लिया है, जो उनके द्वारा निभाए जा रहे चरित्रों पर भी हावी हो जाता है. अभिनय के कद्रदान चाहे इसे अनुचित समझें मगर उनके विशिष्ट दर्शक वर्ग को उनके अपने 'भाईजान' का यही रूप ही भाता है. 

इस सफर में उन्हें कम उतार-चढाव से गुजरना पड़ा ऐसा भी नहीं है. जिस इंडस्ट्री ने उन्हें इतना कुछ दिया, उसी ने उन्हें 'बैड बॉय' की छवि भी दी. फिर भी दर्शकों और प्रशंसकों का प्यार सलमान के लिए बरक़रार है तो उनकी स्वाभाविक और निश्चल मासूमियत की भी वजह से, जो उनसे छिनी नहीं जा सकी है. 

सलमान की पिछली चंद फिल्में किसी भी दृष्टिकोण से स्तरीय नहीं कही जा सकतीं, भले व्यवसाय उन्होंने काफी किया हो. स्वयं मैं भी दबंग, रेडी के बाद अब बॉडीगार्ड को भी इसी श्रेणी में रखता हूँ.

उलजलूल कहानी, विशिष्ट साऊथ इंडियन शैली के स्टंट्स (जिसका नया सम्मिश्रण शुरू किया है सलमान ने अपनी फिल्मों में), शोर गुल भरे गाने, अपरिहार्य इंट्रो और आइटम सौंग इन सभी फिल्मों में कॉमन पक्ष हैं. इसके अलावे इस फिल्म में डार्क शेड में डार्क कपड़ों का सम्मिश्रण तो और भी हैरतंगेज और प्रयोगधर्मी है ! (गीत - 'तेरी मेरी प्रेम कहानी...'). मगर एक और चीज जो कॉमन है वो है सलमान की आँखों और चेहरे में छुपी मासूमियत जिसमें आज भी पहले सी ही ताजगी है, और जो अब भी किसी विशेष दृश्य में उभर कर दर्शकों के दिलोदिमाग में बैठ जाती है. 


याद कीजिये 'सिर्फ़ तुम' में प्रिया गिल द्वारा शादी से नकार दिये जाने पर सलमान का कहना कि " ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है ! " या "कुछ-कुछ होता है" का क्लाइमेक्स. बॉडीगार्ड में भी जिस भरोसे के साथ कहना कि "...जरूर फोन करेगी, छाया मुझसे प्यार करती है" या बिना देखे प्यार करने का जवाब " पसंद तो दिल से करते हैं मैडम, प्यार तो दिल से किया जाता है न ! " और जब छाया से मिलने से पहले पूर्वाभ्यास करते हुए जब वो कहते हैं " छाया तुम मुझसे सच्चा प्यार करती हो न, मुझसे मजाक तो नहीं कर रही ना ! "  तब वो दर्शकों को अपनी कुछ त्रासद यादों की ओर भी मोड़ लेते हैं. 

मैं सलमान की दिमाग घर में छोड़ कर आने का आह्वान करने वाली छवि से सहमत नहीं और न ही कोई अंध समर्थक. मगर मैं सलमान को हमेशा याद करूँगा 'मैंने प्यार किया' के लिए. फिल्में देखना मेरा शौक है, मगर अकेले ताकि निर्देशक या कहानी के साथ तारतम्य / संवाद स्थापित कर सकूँ. यह उस दशक में आई फिल्म थी जो आज की युवा आबादी का प्रतिनिधित्व करती है. इसने पहली बार इस पीढ़ी को 'प्रेम' को समझने का दृष्टिकोण दिया था. कई मायनों में ट्रेंड सेटर थी यह फिल्म, जिसके बारे में फिर कभी. तब इसके गाने और डायलौग कैसेट्स काफी लोकप्रिय थे; मगर मैंने इस वादे के साथ इन्हें नहीं खरीदा कि इन्हें कभी अपनी सैलरी से ही खरीदूंगा, और यह वादा भी पूरा किया.  इस फिल्म में कुछ था जिसने मुझसे यह निश्चय करवा लिया कि "  मैं कभी भी-कहीं भी रहूँ, अगर वहाँ यह फिल्म लगी; तो मैं इसे जाकर देखूंगा . "   अब तक तो यह कमिटमेंट भी निभाया है; शायद इसलिए भी कि - 
"   एकबार कमिटमेंट कर ली, तो मैं अपने-आप की भी नहीं सुनता....."

[ * एक निवेदन:  इस पोस्ट को इस फिल्म का प्रचार या प्रशंसा  के रूप में न लें. फिल्म देखने के बाद मिलने वाले आनंद या अवसाद की जिम्मेवारी इस पोस्ट के लेखक की नहीं होगी. :-)]

चलते-चलते इस फिल्म का एक प्रोमो : 


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