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Sunday, May 15, 2011

"उसने कहा था" - मैने नहीं ...



"..... लड़के ने मुस्कुराकर पूछा, "तेरी कुड़माई हो गई?" 
इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ा कर 'धत्' कह कर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।

दूसरे-तीसरे दिन सब्ज़ीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, 'तेरी कुड़माई हो गई?' और उत्तर में वही 'धत्' मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली, "हाँ हो गई।"
"कब?"    
"
कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।"

लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ीवाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।...."

प्रबुद्ध ब्लौगर समझ ही गए होंगे कि उपरोक्त पंक्तियाँ प्रसिद्द लेखक श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की लोकप्रिय कहानी 'उसने कहा था' से उद्धृत हैं. यह मेरी सर्वाधिक पसंदीदा कहानियों में से एक है. इस पोस्ट के माध्यम से मैं आज इस कहानी पर कोई विशेष चर्चा नहीं कर रहा, बल्कि मेरा प्रयास है विभिन्न माध्यमों द्वारा अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति का. 

अक्सर हम आक्रोश को यदि अपने अंदर जज्ब नहीं कर पाते तब किसी-न-किसी माध्यम से उसे अभिव्यक्त कर देते हैं, कभी मौखिक अपशब्दों के प्रयोग द्वारा तो कभी ज्यादा आक्रामक ढंग से भी. 

ऐसा आक्रोश यदाकदा तब उभरता है जब किसी रिलेशन में दोनों पक्षों को अभिव्यक्ति का समान अवसर नहीं मिलता. क्या किसी रिलेशनशिप - चाहे मित्रता ही सही - में एक पक्ष पर ही सामंजन का सारा दारोमदार निर्भर होना चाहिए ? अपनी भावनाओं को एकपक्षीय रूप से दबा कर निभाए जा रहे संबंध क्या स्थायित्व की गारंटी हो सकते हैं !

कई बार ऐसे संबंध जो कोई स्थायी स्वरुप ग्रहण नहीं कर पाए होते हैं उनमें भी ऐसी मनःस्थिति के बीज छुपे रहते हैं, जैसा कुछ उपरोक्त कहानी में भी है. 

कई बार ऐसा भी होता है जब मूड भी किसी ग्राफ सदृश्य व्यवहार करता हुआ फ्लक्चुएशन दिखलाता रहता है. 

पिछले कुछ दिनों से मैं भी ऐसी ही किसी कशमकश से गुजर रहा हूँ जिसका नतीजा अनावश्यक और गैरजरुरी स्थानों तथा व्यक्तियों से वाद-विवाद के रूप में सामने आ रहा है. स्पष्ट कर दूँ कि इसके पीछे - "तेरी कुड़माई हो गई ?"- जैसा कोई विषय नहीं है. :-) मुझे खुद भी इसके मूल के बारे में कोई स्पष्ट कारण समझ में नहीं आ रहा मगर यह एक प्रकार का विचलन तो है ही.




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