Monday, November 4, 2013

पुनरप्रतिष्ठा की बाट जोहती विरासत- नारानाग मंदिर समूह, कश्मीर

नारानाग मंदिर के भग्नावशेष
 
कश्मीर की एक समृद्ध ऐतिहासिक परंपरा रही है। भौगोलिक-ऐतिहासिक कारणों से यहाँ सभ्यता की विभिन्नता  स्पष्ट दिखती है। यहाँ पाये जाने वाले प्राचीनतम आर्य परंपरा के कई अवशेष आज भी इसके भव्य अतीत की झलक उपस्थित करवाते हैं। इन्ही में से एक है कश्मीर घाटी स्थित नारानाग के प्राचीन मंदिर समूह के अवशेष। श्रीनगर-सोनमर्ग  मार्ग से गुजरते पर्यटकों को शायद ही यह एहसास होगा कि अंजाने में वो मार्ग में पड़ने वाली एक प्राचीन विरासत से अनभिज्ञ गुजरते जा रहे हैं। इसी मार्ग पर श्रीनगर से लगभग 50 किमी दूरी पर स्थित गांदरबल जिले में कंगन के क्षेत्र के अंतर्गत आता है गाँव - नारानाग। वाँगथ नदी के किनारे बसा यह गाँव अपनी प्राकृतिक सुंदरता से तो समृद्ध है ही, इसकी अपनी ही एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत भी है। यह गाँव प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा जो हरमुख (या हरिमुख !) पर्वत तक संपन्न होती है का भी प्रारंभ स्थल है। यह पीर पंजाल श्रेणी के कई ट्रेकिंग स्थलों के भी कई प्रमुख बिंदुओं जैसे गदसर झील, विशंसर झील, कृष्णसर झील आदि का प्रारंभिक पड़ाव भी है । ट्रेकरों के लिए यहाँ ग्रामीण कई जरूरी सुविधाएँ भी उपलब्ध करवाते हैं।
खंडहर बताते हैं कि ईमारत बुलंद थी कि उक्ति को चरितार्थ करता यह मंदिर समूह इसी गाँव में स्थित है। आर्कियोलौजी विभाग के अनुसार इस गाँव का प्राचीन नाम सोदरतीर्थ था, जो तत्कालीन तीर्थयात्रा स्थलों में एक प्रमुख नाम था।  यहाँ स्थित मंदिर समूह दो भागों में बंटा है। दोनों भाग भगवान शिव की प्रतिमा को समर्पित माने गए हैं। किन्तु एक में भगवान शिव और दूसरे में भगवान भैरव की प्रतिमा की बात भी कही जाती है। प्रथम भाग में तो किसी कारणवश हाल ही में द्वार लगा बंद किया गया है, मगर दूसरे भाग में मुख्य मंदिर जो प्रतिमाविहीन है के बाईं ओर पाषाण पर तराशकर ही बनाया हुआ एक शिवलिंग अभी भी विद्यमान है।
 
शिवलिंग के निकट मेरा पुत्र शिवांश
शेष मंदिर समूह ध्वस्त हैं, किन्तु आस-पास बिखरे अवशेष ही इसके भव्य और गौरवमय अतीत की कहानी बता देते हैं। मंदिर के सामने पाषाण निर्मित ही जलसंचय पात्र है जो संभवतः धार्मिक प्रयोजन में प्रयुक्त होता रहा हो। मंदिर पर चढ़ाए जल की निकासी के लिए नालियों की बनावट भी स्पष्ट दिखती है। मंदिर के उत्तर पश्चिम भाग में एक प्राचीन कुंड भी निर्मित है। पाषाणों से बनाई इसकी चारदीवारी पर कभी कई कलाकृतियों से भी सुसज्जित रही होगी, जिसकी थोड़ी झलक आज भी मिलती है। पहाड़ों के अंदर स्थित जल को इस कुंड तक लाने और अवशिष्ट जल को समीपवर्ती नदी तक ले जाने के लिए नालियों जैसी व्यवस्था उस प्राचीन इंजीनियरिंग की बस एक छोटी सी झलक मात्र है। विशाल ग्रेनाइट पत्थरों को बिना सिमेंटिंग अवयव के जोड़ ऐसी संरचनाएँ स्थापित करना पर्यटकों को आज भी अचंभित करता है। समझा जाता है कि इस मंदिर समूह का निर्माण 7-8 वीं शताब्दी में राजा ललितदित्य के राजकाल में किया गया। कलांतर में विदेशी आक्रमण और शासकों में से कई की घृणा और उपेक्षा का शिकार इस समृद्ध विरासत को भी बनना पड़ा। फिलहाल उपेक्षित  सी इस विरासत को अतिक्रमण से बचाने के लिए सरकार द्वारा इसकी घेरेबंदी के कुछ तात्कालिक प्रयास किए गए हैं और लगभग 2 दशकों से पटरी से उतरे पर्यटन को इन स्थलों के माध्यम से दुरुस्त किए जाने की योजना की भी चर्चा है।

प्राचीन कुंड जिसमें पानी के आगमन और निकास की तकनीक अप्रतीम है
हाल में भी कई जगह सांस्कृतिक विरासतों को घृणा का शिकार बनते देखा गया है। यह समझा जाना चाहिए कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत किसी एक मज़हब के नहीं होते। वो हमारा वैश्विक साझा इतिहास हैं और हमारे भविष्य के एक आधार भी। उनका संरक्षण और सम्मान हमारे लिए अपरिहार्य होना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि इन स्थलों को विरासत सूची में शामिल करवा इन्हे इनका वाजिब सम्मान सुनिश्चित करवाने की ओर गंभीर प्रयास करे।
 
 

Saturday, October 12, 2013

पहचान की बाट जोहती कश्मीर की एक प्राचीन विरासत...


धरती का स्वर्ग कश्मीर जो अक्सर नकारात्मक कारणों से ही चर्चा में रहता रहा है, कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी भारत के प्राचीन इतिहास के कई पन्नों को अब भी सहेजे हुए है. भले ये पन्ने अब पीले से पड़ चुके होंय उनमें से कुछ बुरी तरह फटे-चीते भी हों – पारखियों की नजर उनमें अपने अतीत के कुछ संस्मरण ढूंढ ही लेंगीं. ऐसी ही पारखी नजरों की बाट जोह रहे हैं कश्मीर घाटी के गांदरबल जिला स्थित मानसबल (कुछ मान्यताओं के अनुसार मानसरोवर का अपभ्रंश) झील के निकट स्थित एक प्राचीन मंदिर के अवशेष. मानसबल विकास प्राधिकरण के द्वारा इस क्षेत्र के पुनरूद्धार कार्यक्रम के दौरान जमीन में धंसे इस मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए. 


प्राचीन कश्मीर की पारंपरिक आर्य शैली में बने इस मंदिर की कालावधि 8-9 वीं शताब्दी मानी जा रही है. इसके पिरामिडाकार शिखर इसे एक अलग ही स्वरुप देते हैं (जो फिलहाल तो स्थानीय बच्चों के इनपर चढ नीचे पानी में कूदने के लिए ही प्रयोग आ रहे हैं...). जलकुंड के मध्य स्थित यह मंदिर कभी अपने वास्तुशिल्प में भी विशिष्ट स्थान रखता होगा. आतंरिक जलश्रोतों की ससंभावित उपस्थिति के कारण बढते जलस्तर के कारण भी इसके पुनरुद्धार में प्राधिकरण को कठिनाइयाँ आती रही हैं. क्षेत्रीय अख़बारों के अनुसार कुछ स्थानीय लोगों ने यहाँ हर शुक्रवार को एक सांप के दिखने की बात भी कही है, जिसकी तस्वीर नहीं ली जा सकी.
मान्यताओं से परे यह एक ऐसा स्थल तो है ही जो इतिहास से वर्तमान में अपने वाजिब स्थान और पहचान का अधिकारी है और इसे इसकी वास्तविक पहचान मिलनी ही चाहिए.....

Monday, June 3, 2013

किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी .....

(बढते महिला अपराधों पर)


रांची जैसे छोटे शहरों से लेकर मुंबई जैसे महानगरों तक महिला अपराधों के बढते सिलसिले चिंताजनक रूप लेते जा रहे हैं. निश्चित रूप से इनमें से अधिकांश के पीछे एकतरफा प्यार जैसे ही मामले हैं. मगर ये कैसा प्यार है जो प्रतिक्रिया में इंसान को इतना हिंसक बना देता है कि उसे अपने प्यार ही नहीं बल्कि अपने भविष्य की भी फ़िक्र नहीं रह जाती. वर्तमान भारतीय मानस को प्रभावित करने में साहित्य और सिनेमा दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है. हमारे साहित्य में भी असफल प्रेमियों ने स्त्री को ही हर दोष की खान माना. बेवफा, स्वार्थी जाने कितने तमगे उन्हें थमाने में पुरुषों की निराशा की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. ‘प्यासा’ के चोट खाए विजय से देवदास द्वारा मानिनी पारो की सुंदरता पर दाग लगा जाने की मानसिकता के पीछे पुरुषत्व को ठेस लगने की मानसिकता भी रही. बाद में डर, अंजाम जैसी फिल्मों ने प्यार पर जबरन अधिकार ज़माने की सोच को वैधता सी ही दे दी. विश्व सिनेमा में भी ऐसे ही बदलाव आ रहे थे. और बेशक इन चीजों के महिमामंडन ने कुंठित युवाओं में खुद को नकारे जाने पर इन्तक़ाम को लेकर उनमें एक शहीदाना एहसास भी भर दिया.

मगर क्या प्रेम मात्र ऐसी सतही भावना है, जो अस्वीकृति की दशा में अपने प्रेम के लिए इतना हिंसक स्वरुप अख्तियार कर ले ! अगर पुरुष को अपने प्रेम की अभिव्यक्ती का अधिकार है तो स्त्रियों को भी उसे स्वीकृत या अस्वीकृत करने का उतना ही अधिकार है. सही या गलत निर्णय की पहचान तो वक्त ही कराएगा. प्रेम में वर्चस्व ज़माने की भावना के पीछे Anthropological और जैविकीय करण भी हैं. जानवरों में तो इन प्रवृत्तियों के कारण समझे जा सकते हैं, मगर सभ्यता की राह पर लगातार आगे बढते जा रहे मनुष्यों में इस प्रवृत्ति का उग्र होना निराशाजनक है, जिसका शमन होना ही चाहिए.

मैं तो प्रेम में निराश पुरुषों से यही कहना कहूँगा कि वो अपने जीवन को ‘प्यासा’ के विजय की तरह निराशा में डुबोने या ‘डर’ के राहुल की तरह प्रतिशोध में बर्बाद कर हीरो जैसी फीलिंग महसूस करने के बजाये खुद को इतना सफल बनाएँ कि अगले को महसूस हो कि उसने क्या खो दिया है, जो कल उसका भी हो सकता था.....

यूँ तो बात पुरुषों के प्रतिशोध की हो रही है, वैसे ध्यान रखें कि कहा तो यह भी जाता है कि बदला लेने और प्रेम करने में नारी पुरुष से अधिक निर्दयी होती है (नीत्शे).

वैसे हमारी सरकार जो बात-बात पर कानून बना देने में ही विश्वास करती है, एसिड की बिक्री और उसके प्रयोग पर भी नियंत्रण के लिए कारगर कदम उठाये. पडोसी बंगलादेश ने जब ऐसा कर पाने में उल्लेखनीय सफलता पा ली है तो हम भी ऐसा कर ही सकते हैं..... 

Tuesday, May 21, 2013

कश्मीर : रुसी पोपलर वृक्ष का कहर...



हिमपात खत्म होने के बाद बदलते मौसम में कश्मीर की वादियाँ जहाँ अपनी खूबसूरती की नई परतें उतार रही थीं, वहीँ एक नई प्राकृतिक समस्या भी उभर रही है. मगर ये समस्या आयातीत ही ज्यादा प्रतीत हो रही है. रुसी पोपलर के नाम से जाने वाले एक वृक्ष से रुई की तरह उड़ते पराग से स्थानीय निवासियों में एलर्जी की समस्या खतरनाक रूप से बढ़ रही है.


 जल्दी बढ़ने की खासियत को देखते हुए 80 के दशक में सामाजिक वानिकी योजना के तहत यहाँ ‘रुसी चिनार’ भी कहलाये जाने वाले इन वृक्षों का रोपण करवाया गया था, मगर आज इस मौसम में ये सांस तथा स्वास्थ्य संबंधी कई बिमारियों की वजह बनते जा रहे हैं. वैसे ही जैसे आज देश के दूसरे हिस्सों से यूकेलिप्टस, गाजर घास जैसी प्रजातियों के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं. फिलहाल तो श्रीनगर जिला प्रशासन द्वारा इन पेड़ों के लगाये जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. पहले से मौजूद पेड़ों को हटाने के लिए विशेषज्ञों से रिपोर्ट भी मांगी गई है.

अक्सर पाया जाता है कि इस तरह के आयातीत समाधान हमारी समस्याओं को बढ़ाने वाले ही साबित हुए हैं. ऐसे में क्या उचित नहीं कि ऐसे किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले उचित शोध और कृषि वैज्ञानिकों से पर्याप्त चर्चा व सहमति कायम करने के प्रयास कर लिए जायें ! ताकि हमारे देश का पर्यावरण सुरक्षित रह सके.....


Wednesday, January 30, 2013

गांधीजी की स्मृति में.....




श्री असगर वजाहत जी हिंदी के एक प्रसिद्ध रचनाकार हैं. उनके द्वारा लिखित एक बहुचर्चित नाटक ‘जित लाहौर नइं वेख्या...’ देखने का सुअवसर मुझे दिल्ली में रहते मिला था. उन्ही दिनों उनका एक और नाटक ‘गोडसे@गाँधी.कॉम’ भी एक पत्रिका में पढा. वर्तमान परिदृश्य में इस नाटक की चर्चा आवश्यक समझते हुए इसे  साझा कर रहा हूँ.

नाटक में गाँधी और गोडसे के विषय को ही नहीं, बल्कि गाँधी विचार व उनके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं को भी स्पर्श करने का प्रयास किया गया है. नाटक की पृष्ठभूमि में गोडसे द्वारा गांधीजी पर गोली चलाये जाने की घटना ही है. नाटक के अनुसार गांधीजी इस हमले में जीवित बच जाते हैं और अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद गोडसे से मिल उसे क्षमा कर देते हैं. वो विस्मित है और इसे उनका कोई नया नाटक समझ रहा है, मगर उसकी अपेक्षाओं के विपरीत उसे 5 साल की ही सजा मिलती है.

दूसरी ओर गांधीजी नेहरु आदि नेताओं को समझते हैं कि कांग्रेस जो एक खुला मंच थी जिसमें हर विचार के लोग शामिल हुए को एक पार्टी का रूप देना उचित नहीं, अतः अब इसे भंग कर गाँवों में जा देशसेवा करनी चाहिए. मगर उनका यह प्रस्ताव अस्वीकृत हो जाता है. कांग्रेस से नाता तोड़ गाँधीजी  ‘बिहार’ के एक सुदूरवर्ती आदिवासी गाँव में अपना ‘प्रयोग आश्रम’ स्थापित कर लेते हैं. उनका यह गाँव ‘ग्राम-स्वराज’ की एक जिवंत मिसाल बन जाता है जिसकी अपनी सरकार और शासन है और जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देश की संसद के निर्णयों पर आश्रित नहीं. देश के अंदर ऐसे शासन की अवधारणा दिल्ली में खतरनाक मानी गई और गांधीजी स्वतन्त्र भारत की निर्वाचित सरकार द्वारा पुनः गिरफ्तार कर लिए जाते हैं.

यहाँ गांधीजी ने स्वयं को गोडसे के साथ रखे जाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया. उनकी मांग मानी गई और गांधीजी और गोडसे के मध्य विचारों के आदान-प्रदान की एक लंबी श्रंखला आरंभ हुई. दोनों के बीच ‘हिंदुत्व’ जैसे कई विषयों को लेकर अपनी चर्चा चलती रहती है और वह दिन भी आता है जब दोनों एक ही साथ रिहा होते हैं. चलते वक्त गांधीजी गोडसे से बस इतना ही कहते हैं कि – “ नाथूराम... मैं जा रहा हूँ. वही करता रहूँगा जो कर रहा था. तुम भी शायद वही करते रहोगे जो कर रहे थे.” नाटक के अंत में तो दोनों पात्र एक साथ एक ही राह की ओर चल देते हैं, मगर शायद दोनों की विचारधाराएं आज भी अपना-अपना काम ही कर रही हैं या शायद यह एक राजनीतिक प्रहसन ही है देश सेवा के बदले देश सेवा के लिए शासन का अवसर पाने की कवायद का...

Sunday, November 4, 2012

राजनीतिक आस्था के नाम पर: ओह माई गौड !!!



जिनलोगों ने परेश रावल अभिनीत ‘ओह माई गौड’ देखी होगी वो जाने-अनजाने कहीं-न-कहीं आज के अरविन्द केजरीवाल को इससे रिलेट कर रहे होंगे. वेदांत, सनातन... किसी भी नाम से धर्म के वास्तविक रूप से कितनी भी बार लोगों को जागरूक बनाने की कोशिश की गई, मगर धर्म जैसे ब्रांड के हाथों अपनी सत्ता मजबूत करने वाले ठेकेदारों ने हर नई परिभाषा को अपने ही सांचों में ढाल लिया और सदियों से धर्म के नाम पर भय को अपने अंदर तक स्थापित कर चुकी आम जनता ने बार-बार नई स्थिति बिना किसी विशेष प्रतिरोध के स्वीकार कर ली. बुद्ध, मोहम्मद साहब, साईं बाबा जैसी विभूतियों ने आम जनता को जागरूक करने के अथक प्रयास किये, मगर धर्मसुधार के प्रयासों की जरुरत आज भी कम नहीं हुई है...

धार्मिक व्यवस्था की ही तरह राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के भी समस्त विश्व में कई प्रयास हुए. कई विचारधाराएं अस्तीत्व में आईं. मगर सत्ता को अपने हित साधन का एक जरिया समझने वाले वर्ग ने लगभग हर देश में हर नई व्यवस्था को अपने अनुकूल तोड़-मडोड़ ही लिया, और जनता बस नई उम्मीद के साथ नए कलेवर में लिपटी उसी व्यवस्था की अनुगामिनी बनती रही. मार्क्स, माओ और गांधी जैसे विचारकों के आदर्शों पर आधारित व्यवस्था आज हकीकत में कहाँ हैं !!!

अरविन्द केजरीवाल इन विचारकों की श्रंखला में नहीं आते. मगर व्यवस्था में कमियों की ओर उन्होंने ‘व्हिसल ब्लोअर’ की अपनी भूमिका निभा दी है. उन्हें अब गंभीरता से लिया जाये अथवा नहीं, वो सत्ता का अंग बनते हैं और अपनी क्या भूमिका निभाते हैं वो अलग विषय है. मगर सत्ता के ठेकेदारों को फिल्म के कांजी भाई की तरह उन्होंने कटघरे में तो ला खड़ा किया ही है. हर प्रयास की विवेचना सिर्फ उसकी सफलता-असफलता के आधार पर ही नहीं की जा सकती, छला जाता रहा आम आदमी अबतक जिन बातों को मात्र महसूस ही करता आ रहा था, उसे किसी भी बहाने अभिव्यक्ती देने की पहल कर एक हिम्मत तो दी ही है केजरीवाल ने. एक शक्तिशाली और एकजुट गुट के आगे आम आदमी द्वारा अपनी आवाज उठाना कोई छोटी बात नहीं, चाहे वो आज शक्तिशाली अट्टहासों में दबती सी प्रतीत हो रही हो.

केजरीवाल पर आरोप लगाया जा रहा है कि वो हर राजनीतिक दल को भ्रष्ट बता विकल्प की उम्मीदों को धुंधला कर रहे हैं, जनता को असमंजस में डाल अस्थिरता बढ़ा रहे हैं. केजरीवाल कोई राजनीतिक मसीहा नहीं, वो विकल्प न बन सकते हों, मगर यह असमंजस मात्र उन्ही के आगे आएगा जिसने उस व्यक्ति की आवाज अनसुनी की हो जिसके विचार इस देश की मिट्टी और परिस्थितियों को आत्मसात करते हुए उभरे थे. लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए गाँधी जी ने कहा था – “ सच्चे लोकतंत्र में, प्रत्येक स्त्री-पुरुष को स्वयं विचार करने की शिक्षा दी जाती है....”

“भारत के सच्चे लोकतंत्र में गाँव को इकाई माना जायेगा... सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे बीस लोगों द्वारा  नहीं चलाया जा सकता. इसका संचालन तो नीचे से, हर गाँव के लोग करेंगे.”

और ग्राम शासन की रुपरेखा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा था “... गाँव में पूर्ण लोकतंत्र चलेगा जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित होगा. व्यक्ति ही अपनी सरकार का निर्माता होगा....”

स्पष्ट है कि यूँ ही नहीं भारत का संविधान ‘हम भारत के लोग...” पर ही आधारित है.  भारत की समस्याओं का हल भारत के ही मनीषियों के विचारों में छुपा हुआ है और इसे उजागर और आत्मसात भी हम ही कर सकते हैं. समय के कई थपेडों का हमारी धार्मिक व्यवस्था ने सामना किया है और खुद को परिमार्जित करते हुए हर बार और बेहतर स्वरुप में उभर कर सामने आई है, यह प्रक्रिया आज भी जारी है. यह प्रयोग हम अपनी राजनीतिक व्यवस्था में भी अपना सकते हैं. राजनीतिक व्यवस्था में आस्था दूसरों पर दोषारोपण करके नहीं बल्कि खुद में बदलाव करके सुदृढ़ की जा सकती है. इस संस्था पर विश्वास और आस्था का टूटना ही अराजकता का मूल कारण होगा और हम जानते हैं कि “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना...”

Tuesday, October 2, 2012

गांधीजी की वसीयत.....



वर्तमान में भारत सहित पूरे विश्व में जारी राजनीतिक, आर्थिक, वैचारिक उथल-पुथल के इस दौर में इस बात को दोहराने की आवश्यकता नहीं कि गांधीजी के विचारों की प्रासंगिकता कितनी शिद्दत से उभरती है.  गांधीजी के विचार जिनकी प्राथमिक झलक उनकी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ से मिलती है से न सिर्फ भारत बल्कि समस्त विश्व को सर्वांगीण स्वराज की दिशा मिलती है. मगर गांधीजी के विचारों की एक मुख्य खासियत यह है कि वो मात्र सैद्धांतिक ही न होते हुए व्यावहारिक रूप से अमल करने का मार्ग भी दर्शाता है. शायद तभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिससे वो राजनीतिक रूप से जुड़े थे की उन्होंने ‘लोक सेवक संघ’ के रूप में परिकल्पना की थी; जो ‘हरिजन’ में ‘हिज लास्ट विल एंड टेस्टामेंट’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ था.....

राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर चुकने के बाद वो एक संसदीय तंत्र के रूप में कॉंग्रेस की कोई भूमिका नहीं देखते थे. उनका अगला लक्ष्य अपने गांवों को सामाजिक, नैतिक और आर्थिक स्वाधीनता हासिल कराना था. स्वदेशी समर्थक, छुआछूत - सांप्रदायिक वैमनस्य से रहित कार्यकर्ताओं द्वारा पंचायत को इकाई मानते हुए गाँवों के सर्वांगीण विकास द्वारा प्राथमिक स्तर से उच्चतम स्तर तक विकास के क्रम को सुनिश्चित करवाना उनका लक्ष्य था.

निःसंदेह गांधीजी की हत्या के बाद सुनियोजित ढंग से उनके विचारों की हत्या के भी निरंतर प्रयास होते रहे, फिर भी विभिन्न कारणों से विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं द्वारा अपने कई विचारों के साथ ‘गाँधीवादी’ सदृश्य उपमा भी जोड़नी ही पड़ी...

आज देश में कोई और संगठन तो गांधीजी की इस अंतिम इच्छा को एक बड़े पैमाने पर उतारने को इच्छुक और समर्थ तो दिखता नहीं. फिर भी मन में कहीं एक विचार है जिसके मूर्त रूप में उतर पाने की संभावना नगण्य देखता हुआ भी कहना तो चाहूँगा ही. कहते हैं गांधीजी ने 1934 में वर्धा प्रवास के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा का अवलोकन किया था, जहाँ वे उसके स्वयंसेवकों की अनुशासन और गैरजातिवादी भावनाओं से काफी प्रभावित भी हुए थे. मगर उनके जैसे दूरदर्शी व्यक्ति ने कुछ सोचकर ही इसी तर्ज पर एक पृथक ‘लोक सेवक संघ’ की स्थापना की परिकल्पना पर विचार किया होगा. अगर राष्ट्रसेवा को समर्पित, गांधीजी के विचारों पर आधारित एक अति शक्तिशाली संगठन अस्तित्व में होता तो आज इस देश का वर्तमान कुछ और ही होता..........

खैर इतने बड़े स्तर पर न सही मगर गाँधीवादी विचारों को व्यवहार में लाने के यथासंभव प्रयास पूरे देश में किसी - न - किसी स्तर पर तो चल ही रहे हैं, जो अक्सर हमारी आँखों के सामने से गुजरते रहते हैं. हम चाहे इस दिशा में इतनी बड़ी भूमिका न निभा सकें मगर व्यक्तिगत रूप से ही गाँधीवादी सिद्धांतों को यथासंभव अपने अंदर ही उतारने की सच्ची कोशिश करें तो गांधीजी के बलिदान के प्रति यह हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.....
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