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Saturday, July 1, 2017

कश्मीर की एक ऐतिहासिक विरासत- मार्तंड मंदिर




धरती पर स्वर्ग के रूप में विश्वविख्यात कश्मीर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए तो प्रसिद्ध है ही, इसकी माटी सभ्यता और संस्कृति के विकास के लिए भी काफी उर्वर रही है। प्राकऐतिहासिक काल से आधुनिक काल तक इसने मानव सभ्यता की विकासयात्रा के कई पड़ावों को पल्लवित होते देखा है। इसकी धरती बौद्ध, शैव, वैष्णव, सूफी आदि कई परंपराओं की साक्षी रही; जिनके प्रमाण वक्त के बदलते दौरों के विभिन्न झंझावातों का सामना करते हुये भी आज भी अपना अस्तित्व बचाए रख पाने में सफल रहे हैं। कश्मीर की ऐसी ही कुछ प्रमुख विरासत में एक है- मार्तंड मंदिर। कश्मीर घाटी के अनंतनाग-पहलगाम मार्ग पर मार्तंड नामक स्थान पर स्थित यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। हेनरी कोल के मतानुसार इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व 35 में हुआ था। कल्हण रचित राजतरंगिनी जो कि कश्मीर के इतिहास का एक प्रामाणिक ग्रंथ मानी जाती है के अनुसार इसका निर्माण 8 वीं शताब्दी में राजा ललितादित्य ने करवाया था। यह मंदिर अपने स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर एक ऊँचे पठार पर स्थित है, जहाँ से कश्मीर घाटी का नयनाभिराम दृश्य सामने आता है। विशाल प्रांगण के मध्य में मुख्य मंदिर और चारों ओर 84 स्तंभाकार संरचनाएँ हैं। इसके साथ ही गर्भगृह और मंडप भी हैं। मुख्य मंदिर के तीन कक्ष हैं जिनपर प्रतिमाएँ उत्कीर्णित हैं। मंदिर की रचना में पत्थरों का ही प्रयोग किया गया है, जिन्हे लोहे से जोड़ा गया है। यहाँ स्थित स्तंभों तथा मुख्य मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्णित प्रतिमाएँ कश्मीर की प्राचीन मूर्तिकला की उत्कृष्टता का भी प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। प्राकृतिक और ऐतिहासिक कारणों से आज इस भव्य विरासत के भग्नावशेष ही विद्यमान हैं, मगर फिर भी ये अपने गौरवशाली अतीत का आभास कराने में सक्षम हैं। 
विशाल भारद्वाज की 'हैदर' की शूटिंग के सिलसिले में यह मंदिर कुछ विवादों और चर्चा में भी रहा। यह मंदिर एक वैश्विक विरासत का सम्मान पाने की पात्रता रखता है, जिसके संरक्षण और इसके प्राचीन महत्व को पुनर्स्थापित करने हेतु सार्थक प्रयास की आवश्यकता है।  

Wednesday, May 10, 2017

कश्मीर का दाचीगाम राष्ट्रीय अभ्यारण्य

धरती का स्वर्ग कश्मीर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यह जैव विविधता की दृष्टि से भी काफी समृद्ध है। यहाँ स्थित दाचीगाम राष्ट्रीय अभ्यारण्य यही दर्शाता है। श्रीनगर से लगभग 21 किमी दूर यह अभ्यारण्य यहाँ के प्रसिद्ध शालीमार बाग के निकट ही है। स्थानीय पर्यटन कार्यालयों या वन विभाग के कार्यालय से यहाँ भ्रमण हेतु पास प्राप्त किया जा सकता है। यूँ तो पर्यटक दिन के किसी भी वक्त अभ्यारण्य का भ्रमण कर सकते हैं, किन्तु वन में स्वच्छंद विचरते वन्य प्राणीयों के अवलोकन की संभाविता सुबह ज्यादा होने के कारण एक दिन पहले पास बनवा उसी समय भ्रमण ही ज्यादा उचित होगा।

यहाँ के वन्य जीवों में कस्तुरी हिरण, बारहसिंगा, तेंदुआ, काला और भूरा भालू, जंगली बिल्ली, पहाड़ी लोमड़ी, लंगूर आदि प्रमुख हैं। इनके अलावे विभिन्न पक्षियों की प्रजातियाँ भी यहाँ देखी जा सकती हैं।

इस अभ्यारण्य का नाम ‘दाचीगाम’ इसके निर्माण के लिए दस गाँवों को पुनर्वासित किए जाने के कारण पड़ा। इसकी स्थापना मुख्यतः श्रीनगर शहर को स्वच्छ जल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए की गई थी।




प्रारंभ में यह क्षेत्र कश्मीर के महाराज और उनके विशिष्ट अतिथियों द्वारा शिकारगाह के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा। 1910 से संरक्षित क्षेत्र के रूप में स्थापित इस क्षेत्र को आजादी के पश्चात अभ्यारण्य का और 1981 में राष्ट्रीय अभ्यारण्य का दर्जा प्राप्त हुआ। 141 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत यह अभ्यारण्य दो भागों- निचले तथा ऊपरी भाग में विभक्त है। निचला भाग पर्यटकों द्वारा आसानी से देखा जा सकता है, जबकि ऊपरी भाग के लिए पूरे दिन की ट्रैकिंग की आवश्यकता होगी।



अभयारण्य के अंदर एक मत्स्य पालन केंद्र भी है जहाँ ट्राउट मछ्ली का पालन होता है।






















बहरहाल, इतना तय है कि यहाँ आने वाले पर्यटक कश्मीर के एक नए और सुरम्य रूप को निहार पायेंगे। यहाँ की शांति, पक्षियों का कलरव, प्राकृतिक सुंदरता आदि की अपने दिल पर अमिट छाप लिए ही वो यहाँ से लौटेंगे।

Sunday, March 5, 2017

कश्मीर के विशिष्ट फूल मज़ारमुंड या Iris Kasmiriana



कश्मीर के मज़ारमुंड: कश्मीर घाटी बर्फ का मौसम ढलने के बाद विभिन्न रंगों के फूलों से ढंक जाती है। इनमें सबसे अनूठे लगते हैं यहाँ के कब्रिस्तानों में खिलने वाले फूल। कहीं नीले, कहीं पीले, तो कहीँ लाल... मगर ताज्जुब ये कि ये फूल सामान्यतः फूलों से ही भरे पार्कों में नहीं दिखते। स्थानीय लोग इसे 'मजार मूले' या 'मज़ारमुंड' कहते हैं। थोड़ी और खोजबीन से पता चला कि इनका वैज्ञानिक नाम Iris Kasmiriana है और ये कश्मीर, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान आदि में कब्रगाहों से जुड़े हुए हैं। शायद इस क्षेत्र की ह्यूमस इसे ज्यादा मुफीद लगती है। बहरहाल अपने आप में कुछ अलग ही खूबसूरती तो रखते ही हैं ये फूल...

Friday, January 24, 2014

हिमाच्छादित कश्मीर


यूँ तो कश्मीर का सैलानी सीजन मार्च के बाद से ही माना जाता है, मगर लाखों पर्यटक यहाँ स्नोफौल देखने के लिए भी आते हैं. इस साल भी कश्मीर ने अपने इन चाहने वालों को निराश नहीं किया है. रुई के फाहों सी धीमे-धीमे होती हिमकणों की बारिश और देखते ही देखते पूरी वादी को अपने श्वेताभ आगोश में समेट लेना एक अलग सा ही अनुभव है, जिसे शब्दों में सहेज पाना सहज नहीं...

स्नोफौल के कई दौर गुजर चुके हैं और कई अभी आने को हैं. वादियाँ बर्फ की धवल चादर ओढ़ अपने प्रशंसकों के लिए बाहें फैलाये इंतजार कर रही हैं. हिमपात के दृष्टिकोण से स्थानीय लोगों द्वारा इस अवधि को 3 भागों में बांटा गया है. शुरूआती चालीस दिनों की अवधि जो दिसंबर के तीसरे सप्ताह से शुरू होती है ‘चिल्लई कलां’ कहलाती है. यह यहाँ सर्वाधिक हिमपात की अवधि होती है. इसके बाद 20 दिनों की ‘चिल्लई खुर्द’ की अवधि आती है और उसके बाद के 10 दिनों तक ‘चिल्लई बच्चा’ अवधि होती है. ‘कलां’ और ‘खुर्द’ के अर्थ क्रमशः ‘बड़ा’ और ‘छोटा’ होते हैं. इस प्रकार घाटी में हिमपात का यह चक्र पूरा होता है. पारंपरिक काल विभाजन की इस परंपरा पर पर्यावरण के साथ बढ़ रही छेड़-छाड़ का भी असर पड़ रहा है, मगर फिर भी ये घाटियाँ अब भी पर्यटकों की उम्मीद पर खरी तो उतर ही रही हैं.


श्रीनगर, गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम आदि कई जाने-माने पर्यटन स्थलों पर सैलानी प्रकृति के विलक्षण रूप का आनंद उठा रहे हैं. मगर इसके साथ ही जरुरी है कि घाटी के अन्य सुन्दर मगर अनजान से स्थलों को भी पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जाये, सड़क और अन्य यात्री सुविधाएं विकसित कर इस राज्य में पर्यटन की अपार संभावनाएं सामने लाई जा सकती हैं. अकस्मात प्रकृति का मिजाज बदलने पर आने वाली परेशानियों से स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के त्वरित राहत के लिए सरकारी तंत्र को भी चुस्त-दुरुस्त रहने की जरुरत है. बहरहाल यदि आपने अब तक कश्मीर की सुंदरता को अपनी आँखों से महसूस नहीं किया है तो जल्द ही विचार कीजिये धरती पर बसे इस जन्नत की सैर का.....

Monday, November 4, 2013

पुनरप्रतिष्ठा की बाट जोहती विरासत- नारानाग मंदिर समूह, कश्मीर

नारानाग मंदिर के भग्नावशेष
 
कश्मीर की एक समृद्ध ऐतिहासिक परंपरा रही है। भौगोलिक-ऐतिहासिक कारणों से यहाँ सभ्यता की विभिन्नता  स्पष्ट दिखती है। यहाँ पाये जाने वाले प्राचीनतम आर्य परंपरा के कई अवशेष आज भी इसके भव्य अतीत की झलक उपस्थित करवाते हैं। इन्ही में से एक है कश्मीर घाटी स्थित नारानाग के प्राचीन मंदिर समूह के अवशेष। श्रीनगर-सोनमर्ग  मार्ग से गुजरते पर्यटकों को शायद ही यह एहसास होगा कि अंजाने में वो मार्ग में पड़ने वाली एक प्राचीन विरासत से अनभिज्ञ गुजरते जा रहे हैं। इसी मार्ग पर श्रीनगर से लगभग 50 किमी दूरी पर स्थित गांदरबल जिले में कंगन के क्षेत्र के अंतर्गत आता है गाँव - नारानाग। वाँगथ नदी के किनारे बसा यह गाँव अपनी प्राकृतिक सुंदरता से तो समृद्ध है ही, इसकी अपनी ही एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत भी है। यह गाँव प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा जो हरमुख (या हरिमुख !) पर्वत तक संपन्न होती है का भी प्रारंभ स्थल है। यह पीर पंजाल श्रेणी के कई ट्रेकिंग स्थलों के भी कई प्रमुख बिंदुओं जैसे गदसर झील, विशंसर झील, कृष्णसर झील आदि का प्रारंभिक पड़ाव भी है । ट्रेकरों के लिए यहाँ ग्रामीण कई जरूरी सुविधाएँ भी उपलब्ध करवाते हैं।
खंडहर बताते हैं कि ईमारत बुलंद थी कि उक्ति को चरितार्थ करता यह मंदिर समूह इसी गाँव में स्थित है। आर्कियोलौजी विभाग के अनुसार इस गाँव का प्राचीन नाम सोदरतीर्थ था, जो तत्कालीन तीर्थयात्रा स्थलों में एक प्रमुख नाम था।  यहाँ स्थित मंदिर समूह दो भागों में बंटा है। दोनों भाग भगवान शिव की प्रतिमा को समर्पित माने गए हैं। किन्तु एक में भगवान शिव और दूसरे में भगवान भैरव की प्रतिमा की बात भी कही जाती है। प्रथम भाग में तो किसी कारणवश हाल ही में द्वार लगा बंद किया गया है, मगर दूसरे भाग में मुख्य मंदिर जो प्रतिमाविहीन है के बाईं ओर पाषाण पर तराशकर ही बनाया हुआ एक शिवलिंग अभी भी विद्यमान है।
 
शिवलिंग के निकट मेरा पुत्र शिवांश
शेष मंदिर समूह ध्वस्त हैं, किन्तु आस-पास बिखरे अवशेष ही इसके भव्य और गौरवमय अतीत की कहानी बता देते हैं। मंदिर के सामने पाषाण निर्मित ही जलसंचय पात्र है जो संभवतः धार्मिक प्रयोजन में प्रयुक्त होता रहा हो। मंदिर पर चढ़ाए जल की निकासी के लिए नालियों की बनावट भी स्पष्ट दिखती है। मंदिर के उत्तर पश्चिम भाग में एक प्राचीन कुंड भी निर्मित है। पाषाणों से बनाई इसकी चारदीवारी पर कभी कई कलाकृतियों से भी सुसज्जित रही होगी, जिसकी थोड़ी झलक आज भी मिलती है। पहाड़ों के अंदर स्थित जल को इस कुंड तक लाने और अवशिष्ट जल को समीपवर्ती नदी तक ले जाने के लिए नालियों जैसी व्यवस्था उस प्राचीन इंजीनियरिंग की बस एक छोटी सी झलक मात्र है। विशाल ग्रेनाइट पत्थरों को बिना सिमेंटिंग अवयव के जोड़ ऐसी संरचनाएँ स्थापित करना पर्यटकों को आज भी अचंभित करता है। समझा जाता है कि इस मंदिर समूह का निर्माण 7-8 वीं शताब्दी में राजा ललितदित्य के राजकाल में किया गया। कलांतर में विदेशी आक्रमण और शासकों में से कई की घृणा और उपेक्षा का शिकार इस समृद्ध विरासत को भी बनना पड़ा। फिलहाल उपेक्षित  सी इस विरासत को अतिक्रमण से बचाने के लिए सरकार द्वारा इसकी घेरेबंदी के कुछ तात्कालिक प्रयास किए गए हैं और लगभग 2 दशकों से पटरी से उतरे पर्यटन को इन स्थलों के माध्यम से दुरुस्त किए जाने की योजना की भी चर्चा है।

प्राचीन कुंड जिसमें पानी के आगमन और निकास की तकनीक अप्रतीम है
हाल में भी कई जगह सांस्कृतिक विरासतों को घृणा का शिकार बनते देखा गया है। यह समझा जाना चाहिए कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत किसी एक मज़हब के नहीं होते। वो हमारा वैश्विक साझा इतिहास हैं और हमारे भविष्य के एक आधार भी। उनका संरक्षण और सम्मान हमारे लिए अपरिहार्य होना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि इन स्थलों को विरासत सूची में शामिल करवा इन्हे इनका वाजिब सम्मान सुनिश्चित करवाने की ओर गंभीर प्रयास करे।
 
 

Saturday, October 12, 2013

पहचान की बाट जोहती कश्मीर की एक प्राचीन विरासत...


धरती का स्वर्ग कश्मीर जो अक्सर नकारात्मक कारणों से ही चर्चा में रहता रहा है, कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी भारत के प्राचीन इतिहास के कई पन्नों को अब भी सहेजे हुए है. भले ये पन्ने अब पीले से पड़ चुके होंय उनमें से कुछ बुरी तरह फटे-चीते भी हों – पारखियों की नजर उनमें अपने अतीत के कुछ संस्मरण ढूंढ ही लेंगीं. ऐसी ही पारखी नजरों की बाट जोह रहे हैं कश्मीर घाटी के गांदरबल जिला स्थित मानसबल (कुछ मान्यताओं के अनुसार मानसरोवर का अपभ्रंश) झील के निकट स्थित एक प्राचीन मंदिर के अवशेष. मानसबल विकास प्राधिकरण के द्वारा इस क्षेत्र के पुनरूद्धार कार्यक्रम के दौरान जमीन में धंसे इस मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए. 


प्राचीन कश्मीर की पारंपरिक आर्य शैली में बने इस मंदिर की कालावधि 8-9 वीं शताब्दी मानी जा रही है. इसके पिरामिडाकार शिखर इसे एक अलग ही स्वरुप देते हैं (जो फिलहाल तो स्थानीय बच्चों के इनपर चढ नीचे पानी में कूदने के लिए ही प्रयोग आ रहे हैं...). जलकुंड के मध्य स्थित यह मंदिर कभी अपने वास्तुशिल्प में भी विशिष्ट स्थान रखता होगा. आतंरिक जलश्रोतों की ससंभावित उपस्थिति के कारण बढते जलस्तर के कारण भी इसके पुनरुद्धार में प्राधिकरण को कठिनाइयाँ आती रही हैं. क्षेत्रीय अख़बारों के अनुसार कुछ स्थानीय लोगों ने यहाँ हर शुक्रवार को एक सांप के दिखने की बात भी कही है, जिसकी तस्वीर नहीं ली जा सकी.
मान्यताओं से परे यह एक ऐसा स्थल तो है ही जो इतिहास से वर्तमान में अपने वाजिब स्थान और पहचान का अधिकारी है और इसे इसकी वास्तविक पहचान मिलनी ही चाहिए.....

Tuesday, October 18, 2011

सीमान्त प्रान्तों के विकास में जल संसाधनों की भूमिका

देश के सीमान्त प्रदेश अपनी प्राकृतिक समृद्धि से ओत-प्रोत हैं, मगर विकास के मानकों से काफी पीछे भी. यही कारण है कि अशिक्षा, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से ग्रसित इन प्रान्तों में उपनने वाले आक्रोश को उग्र अभिव्यक्ति दिए जाने के प्रयास भी किये जाते रहे हैं. स्वावलंबी बनने के लिए सिर्फ पर्यटन और पर्यटकों की कृपा दृष्टि पर आश्रित व्यवस्था से मैं सहमत नहीं. उन्हें अपने उपलब्ध संसाधनों का समुचित विकास कर देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान सुनिश्चित करना होगा, तभी वे सही मायने में इस देश के महत्वपूर्ण अंग कहे जा सकेंगे.
'राजभाषा ज्योति' में प्रकाशित लेख 

नौर्थ - ईस्ट हों या जम्मू कश्मीर ये प्रदेश जल संसाधनों से समृद्ध हैं, और यही इनकी ताकत भी हैं. ये सभी प्रदेश खनन आदि की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने नहीं जा सकते. साथ  ही जल उर्जा अन्य विकल्पों की तुलना में अपेक्षया प्रदुषण रहित भी है. ऐसे में निश्चित रूप से इस विकल्प का उपयुक्त विकास किया जाना चाहिए.  

जिस प्रकार कोई ईमारत अपने मजबूत पायों पर ही सुदृढ़ हो सकती है, उसी प्रकार किसी देश की समृद्धि, सुरक्षा, आदि अपने चारों कोनों की सुदृढ़ता पर ही निर्भर कर सकती है. 

इन्ही विचारों को मैंने उक्त लेख में रखने का प्रयास किया है जो एन. एच. पी. सी. की हिंदी पत्रिका 'राजभाषा ज्योति' में प्रकाशित हुई है. 

आशा है आपकी भी प्रतिक्रिया तथा सुझाव प्राप्त होंगे.
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