Thursday, February 3, 2011

हमदोनों – “ कि दिल अभी भरा नहीं “



सदाबहार अभिनेता व निर्माता – निर्देशक देव आनंद की क्लासिक ‘हमदोनों’ आगामी 4 फरवरी को अपने नए और रंगीन स्वरूप में दर्शकों के समक्ष पुनः प्रदर्शित होने जा रही है.


‘मुग़ल – ए- आजम’ के बाद से पुरानी श्वेत श्याम फिल्मों को रंगीन वर्जन में प्रस्तुत करने का एक नया ट्रेंड स्थापित हुआ है, जो उस दौर की फिल्मों को रंगीन वर्जन में देख पाने की चाहत को पूरा तो करता ही है, साथ ही नई पीढ़ी को आकर्षित भी करता है सिनेमा के उस दौर की ओर जिसने विश्व फलक में आज एक विशिष्ट स्थान बनाये ‘बॉलिवुड’ की बुनियाद रखी है.


‘हमदोनों’ देव साहब के दिल के काफी करीब रही है. इसमें पहली बार उन्होंने दोहरी भूमिका निभाई थी. युद्ध, शांति और प्रेम

जैसी मानवीय भावनाओं की कशमकश को उभारने का प्रयास है – ‘हमदोनों’.


मांगों का सिंदूर न उजड़े, माँ – बहनों की आस न टूटे ...

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ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले,

बलवानों को दे-दे ज्ञान;

अल्लाह तेरो नाम – ईश्वर तेरो नाम...”


इस फिल्म के लिए देव साहब को ‘फिल्मफेयर’ के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की कैटेगरी के लिए नामांकन मिला था, जबकि इसके निर्देशक अमरजीत को 1962 के ‘बर्लिन फिल्म फेस्टिवल’ में ‘Golden Bear’ सम्मान के लिए नामांकन मिला था. आज चाहे ये उपलब्धियां सामान्य सी लगती हों, मगर आज इन्हें सामान्य करार देने में तब के इनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.


काफी लोगों के लिए यह जानकारी नई होगी कि हिंदी फिल्मों में कैरियर आरंभ करने से पूर्व देव साहब सेना की डाक सेवा से भी जुड़े रहे थे; इस दरम्यान प्राप्त अपने अनुभवों को भी उन्होंने इस फिल्म में अपने अभिनय में ढालने की कोशिश की थी.


देव साहब की फिल्मों का सबसे सशक्त पक्ष उनका संगीत होता है. यह फिल्म भी इस कसौटी पर पूर्णतः खरी उतरती है.


“मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया” गीत हिंदी फिल्मों के इतिहास की एक कालजयी रचना है, जो अब तक और आने वाली कई पीढ़ियों के लिए भी जीवन के फलसफ़े की तरह साथ रहेगा.


और हाँ, देव साहब के सौजन्य से सायास ही प्राप्त यह मेरा सौभाग्य कि इस फिल्म के पुनर्प्रदर्शन के अवसर पर कुछ लिख पाने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ.


देव आनंद, नंदा, साधना के अभिनय, जय देव के संगीत, साहिर लुधियानवी के गीतों और विजय आनं के लेखन को एक धागे में खूबसूरती से पिरोने वाले निर्देशक अमरजीत द्वारा हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग की इस अविस्मरणीय प्रस्तुति को दोबारा महसूस करने को चलें 4 फरवरी को – ‘हमदोनों’......

Wednesday, February 2, 2011

25 वाँ 'सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला'

इंडियन आइडल श्री राम के नाम रही पहली शाम



आज से हरियाणा का प्रसिद्द 'सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला' आरंभ हो गया. 1 -15 फरवरी, 2011 तक आयोजित होने वाला यह आयोजन अपनी तरह का एक अनूठा आयोजन है.

देश की शिल्प संस्कृति और विविधता को दर्शाने वाले इस मेले में हर वर्ष किसी राज्य को थीम बनाया जाता है. इस वर्ष इस मेले का थीम राज्य है - ' आँध्रप्रदेश '. अन्य राज्यों के अलावे आंध्रप्रदेश की कला, शिल्प और संस्कृति की विशेष झलक देखी जा सकती है इस बार.
इस वर्ष इस मेले में सार्क (SAARC) देशों के प्रतिनिधी भी शामिल हो रहे हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार उज्बेकिस्तान इस वर्ष इस मेले के सहयोगी राष्ट्र की भूमिका निभा रहा है.

मेले में शिल्प, कला आदि के अलावे विभिन्न राज्यों के विशिष्ट और परंपरागत खान-पान का भी आनंद उठाया जा सकता है.
मेले के साथ संबद्ध सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रंखला में आज की शाम रही 'इन्डियन आइडल' विजेता श्री राम के नाम. नाट्यशाला में खुले आसमान के नीचे बैठे दर्शकों को इन्होने अपने सुरों और अंदाज पर झूमाते हुए मंत्रमुग्ध कर दिया. इस दौरान जहाँ वो युवा दिलों की भावनाओं को अभिव्यक्ति देते नजर आये तो वहीँ बच्चों के साथ भी झूमे और तेलुगूभाषिओं की भावनाओं को भी पूरा सम्मान दिया.
आगामी दिनों में उत्सव की इस श्रंखला में शास्त्रीय और लोक नृत्य, ग़जल, लोक गीत, जादू जैसे आकर्षक कार्यक्रम भी शामिल किये जायेंगे. मेरी व्यक्तिगत राय में ऐसे महोत्सव में किसी विशिष्ट मित्र के साथ जायें तो शायद ज्यादा एन्जॉय कर पाएं, अन्यथा मेरी तरह सिर्फ रिपोर्टिंग और विरासत दर्शन की ही अनुभूति के साथ लौट आने की स्थिति में होंगे. : - ) कार्यक्रम के संबंध में विस्तृत जानकारी, भ्रमण तथा ठहरने आदि संबंधी जानकारी के लिए हरियाणा टूरिज्म की वेबसाईट पर भी संपर्क कर सकते हैं.

सूरजकुंड के संबंध में कुछ ऐतिहासिक जानकारी अगली किसी पोस्ट में जल्द ही. तब तक लुत्फ़ उठाइए 'सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला' का.

Tuesday, February 1, 2011

25 जनवरी - 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस'

परिस्थितिवश कुछ दिनों नियमित ब्लौगिंग से दूर रहा, और एक महत्त्वपूर्ण तिथी अचर्चित रह गई. विगत 25 जनवरी को 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' के रूप में मनाया गया. 'भारतीय निर्वाचन आयोग' के हीरक जयंती वर्ष पर इसके स्थापना दिवस को सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है. इस अवसर पर देशवासियों को मतदान के प्रति जागरूक करने और चुनाव आयोग के हमारी संसदीय प्रणाली में योगदान को लेकर विभिन्न प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे. साथ ही 18 वर्ष की मतदान योग्य आयु प्राप्त कर चुके युवाओं की पहचान कर हर वर्ष इस तिथी तक उन्हें 'मतदाता पहचान पत्र' उपलब्ध कराना भी इस दिवस का लक्ष्य है.

संविधान द्वारा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में आम भागीदारी को सुनिश्चित करने की दिशा में मतदान एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है. कई बार सरकार या जनप्रतिनिधि से निराशा अथवा मतदान में धांधली मतदाताओं में इस प्रक्रिया को लेकर उपेक्षा की भावना भर देती है. मगर मैं अपने अनुभव से कहता हूँ कि मतदान न करना मतदान करने से ज्यादा नुकसानदेह है. मतदान कर भी आप अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं और कहीं ज्यादा सशक्त ढंग से. आपका एक मत किसी जितने के प्रबल मगर अवांछित उम्मीदवार के खिलाफ महत्त्वपूर्ण हो सकता है. हो सकता है आपका वोट प्राप्त उम्मीदवार जीत न पाए (जो स्वाभाविक भी है) मगर प्रबल संभावना है कि ज्यादा बुरे की अपेक्षा कम बुरे को मौका मिले और यह क्रम किसी योग्य उम्मीदवार के लिए राह भी सुगम करे. यह पंक्तियाँ काफी बौद्धिक और विचारोत्तेजक चाहे न लग रही हों मगर इसका सफल कार्यान्वयन अपने हाथों होने का गर्वीला अहसास मेरे पास है.

निर्वाचन की प्रक्रिया को परिमार्जित करने में निर्वाचन आयोग सतत्त संलग्न है, मगर उसकी सार्थकता हमारे मतदान प्रक्रिया में उत्साहपूर्वक भाग लेने में ही है. तो आइये लें एक जागरूक और सजग मतदाता बनने की शपथ.....

(प्रेम माह 'वसंत' - (आयातित नहीं - पूर्णतः स्वदेशी) आने को है, इस माह में कुछ ऐसी प्रेम स्मृतियों की चर्चा भी की जाएगी जो वाकई एक धरोहर हैं - भौतिक ही नहीं वैचारिक भी. इस प्रेममय सफ़र में आपके साथ की भी प्रत्याशा रहेगी.)

Sunday, January 16, 2011

स्त्री मनोविज्ञान का चित्रण करता एक चीनी नाटक ‘The Amorous Lotus Pan’


नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के 13 वें ‘भारत रंग महोत्सव’ में कल ‘कमानी’ रंगालय में एक चीनी नाटक ‘अमोरौस लोटस पैन’ ( The Amorous Lotus Pan ) का मंचन हुआ. ‘सेंट्रल अकादमी ऑफ ड्रामा’, चीन द्वारा प्रस्तुत प्रो. चेन गेंग द्वारा निर्देशित यह नाटक चीन के एक प्रमुख शास्त्रीय उपन्यास ‘ आउटलाज ऑफ दि मार्श ‘ की एक पात्र पैन जिनलियन पर आधारित है.

स्त्री मनोविज्ञान की पड़ताल करते इस नाटक में नियति और व्यक्तित्व के बीच होने वाले अंतर्द्वंद और मनुष्य पर इसके प्रभाव को सामने लाने का प्रयास किया गया है.

नायिका पैन जिनलियन अल्पायु में ही अनाथ हो जाती है. उसे एक अमीर व्यक्ति झेंग दाऊ को बेच दिया जाता है, जो उसे अपनी उप पत्नी बनाना चाहता है. पैन द्वारा प्रस्ताव ठुकरा दिए जाने पर, झेंग उसके साथ बलात्कार कर सजा के रूप में वुडा नाम के बौने को सौंप देता है. वुडा एक कायर, दब्बू और यथास्थितिवादी इंसान है, जिसके साथ पैन की जिंदगी में कोई आकर्षण रह ही नहीं जाता है. वो, वुडा के छोटे भाई वु सौंग जो काफी बहादुर और आकर्षक है; से प्रेम करने लगती है. मगर वो उसकी भावनाओं को स्वीकार नहीं करता. अंततः वह एक अमीर व्यक्ति ‘ झिमैन किंग ‘ से जुड जाती है. पति के तलाक देने पर राजी न होने पर किंग के उकसावे पर पैन वुडा को जहर दे देती है. वु सौंग अपने भाई की हत्या के प्रतिशोध में पैन द्वारा आत्मस्वीकृति और उसे इस स्थिति में पहुँचाने में अपनी भूमिका को देखता हुआ भी पैन की हत्या कर देता है. अंत में पैन का अभिनय कर रही प्रतिभाशाली अभिनेत्री – ‘ली येकिंग’ दर्शकों के समक्ष एक प्रश्न रखती है कि –

“ यदि वह पैन जिनलियन होती और ठीक इसी तरह के दुर्भाग्य से संघर्ष कर रही होती, तब वह अपने लिए क्या चुनाव करती ? “

यह सवाल वर्त्तमान वैश्विक एकरूपता के इस युग में प्रत्येक स्त्री सहित संपूर्ण समाज से किया गया एक सवाल भी है. है इसका कोई जवाब आपके पास ???

ये नाटक इस मायने में भी खास है कि यह पुनः रेखांकित करता है कि स्त्री मनोविज्ञान को समझने में अपनी असमर्थता को स्वीकार करने में सभी धर्मों के प्राचीन आख्यानों; भारतीय, रोमन, ब्रिटिश आदि सभी नाटकों में भी एक अद्भुत साम्य है. इस नाटक का स्रोत और यह नाटक भी इसी श्रृंखला में एक कड़ी लगते हैं.

नाटक का प्रस्तुतीकरण, पात्रों का अभिनय काफी प्रभावशाली है; विशेषकर मानवीय अंतर्द्वंद की अभिव्यक्ति का नाट्य चित्रण सराहनीय है.

यह नाटक हमें चीनी समाज को जरा पास से देखने का एक अवसर भी देता है, और कहीं न कहीं यह सोच भी जगाता है कि अपनी संस्कृति और समाज को वैश्विक प्रभाव से संरक्षित रखने की इसकी अपनी भावना और शैली है; जिसका हमें सम्मान करना चाहिए. बेवजह उसे सभ्यता और मानवाधिकार जैसे पाठ पढाने का नैतिक अधिकार शेष विश्व के पास भी नहीं ही है. चीन जैसा है, उसे वैसे ही स्वीकार करते हुए उसके साथ परस्पर सामंजस्य के नए स्रोत भी ढूंढने चाहिए. और निश्चय ही कला व संस्कृति की इसमें एक महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.


Saturday, January 15, 2011

विकिपीडिया के दस वर्ष ; जन्मदिन मुबारक


यह एक अद्भुत संजोग है कि जब मैंने ब्लौगिंग शुरू की थी तब उसके प्रारंभिक दौर में ही 'गूगल' का 10 वाँ जन्मदिन आन पड़ा था, और अब जबकि एक ब्रेक के बाद पुनः ब्लौगिंग शुरू की है तो एक और मशहूर सर्च इंजन 'विकीपीडिया' का 10 वाँ जन्मदिन आन पड़ा है. जी हाँ, आज 15 जनवरी को विकिपीडिया अपनी स्थापना के दस वर्ष पूरे करने जा रहा है. इसके प्रंशसक इस दिन को 'विकिपीडिया डे' के रूप में भी सेलिब्रेट करते हैं.

15 जनवरी 2001 को जिमी वेल्स और लैरी सैगर द्वारा ऑनलाइन विश्वकोश WikiPedia की स्थापना की गई.

विकिपीडिया शब्द 'विकी' (यानी एक ऐसा जाल पृष्ठ जो सभी को इसका संपादन करने की छूट देता है) और 'इनसाइक्लोपीडिया '(ज्ञानकोष) शब्दों को मिला के बना है।

स्थापना के पूर्व ही इसे जिस आलोचना का सर्वाधिक सामना करना पड़ा वो थी - " विश्वकोष का निर्माण शोधकर्ताओं और विद्वानों की जिम्मेवारी है; आम लोगों की नहीं." निःशुल्क, व्यापक, गैरलाभकारी और मुक्त ज्ञानकोष की स्थापना और वो भी बिना किसी प्रायोजक की मदद के; वाकई संस्थापकों के लिए एक बड़ी चुनौती थी.

मगर संचालकों ने इन चुनौतियों के आगे हिम्मत नहीं हारी. लेखों की Crowd sourcing (आम लोगों से जुटाई सामग्री) पर निर्भर इस साईट द्वारा धन के लिए भी विज्ञापनों के सब्सक्रिप्शन की जगह Crowd sourcing का ही सहारा लिया गया. और नतीजा ? 250 से भी अधिक भाषाओँ में 2.6 करोड लेखों के साथ आज यह इन्टरनेट पर 5 वें नंबर की सबसे सफल वेबसाइट है. एक लाख से अधिक स्वयंसेवक संपादकों और अनगिनत लेखकों से लैस इस साईट के उपभोक्ताओं की संख्या 42 करोड से अधिक ही है.

आज यह 200 से भी ज्यादा भाषाओँ में अपनी सेवाएं दे रहा है. हिंदी में यह साईट जुलाई, 2003 से उपलब्ध है और आज इसपर हिंदी में भी लगभग 68000 लेख उपलब्ध हैं.

सूचनाओं के संकलन में आम आदमी की साझेदारी के प्रयोग ने इसे कई विवादों में भी डाला मगर इसने अपनी कार्यप्रणाली को दुरुस्त करते हुए अपनी विश्वनियता बनाये रखी है.

एक बड़ी सोच और बुलंद इरादों के साथ प्रारंभ कोई विचार कैसे अपनी मजबूत नींव स्थापित करता है, इसका अप्रतीम उदाहरण है 'विकिपीडिया'.

दसवीं सालगिरह पर उज्जवल और प्रगतिशील भविष्य की हार्दिक शुभकामनाएं.

Friday, January 14, 2011

दिल्ली की लोहड़ी




देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली और यहाँ के लोगों के लिए सभी त्यौहार भी अपने ही से हो जाते हैं. यहाँ ‘लोहड़ी’ की धूम रही तो ‘मकर संक्रांति’ का उत्साह भी जोरों पर है. सूर्य देव भी दो दिनों से अपनी रंगत में लौट दिल्लीवासियों को राहत और खुशी के पूरे मौके दे रहे हैं.

यूँ तो आधुनिकता में हमारे कई पारंपरिक खेल भी लुप्त ही होते जा रहे हैं, मगर अपने अतीत में झांकें तो दिसंबर - जनवरी के दौरान बच्चे एक कील पर आधारित लकड़ी से बने 'लट्टू' काफी घुमाया करते थे. कभी सोचा है आपने कि कहीं ये इसी अवधि के दौरान धरती के घूर्णन और इससे होने वाले मौसम चक्र के प्रतीक तो नहीं थे ! पतंग बाजी और लट्टू जैसे खेलों को भी खगोलीय और वैज्ञानिक स्पर्श दे देना - ओह ! It Happens Only in India !!! Incredible India !!!!!!

आप सभी को भी ‘लोहड़ी’, ‘मकर संक्रांति’, ‘उत्तरायण’ की हार्दिक शुभकामनाएं.

Wednesday, January 12, 2011

विवेकानंद के विचारों की कालजयिता


किसी ने कहा था " भारत को समझना हो तो विवेकानंद को पढ़ो. "

देश में भ्रष्टाचार को चरम पर पहुंचते, एक आदर्श के रूप में स्थापित छवियों को खंड - खंड टूटते देख अपनी व्यवस्था के प्रति वितृष्णा देश के बहुसंख्यक युवाओं के साथ मुझे भी कहीं- न कहीं छु सी जा रही है. ऐसे में युवा सन्यासी स्वामी विवेकानंद जैसे व्यक्तित्व का होना आश्चर्यजनक ही लगता है जिसने भारत के इतिहास के सर्वाधिक अंधकारपूर्ण दौर में से एक में भी अपनी हुंकार से पुरे विश्व को उद्वेलित कर दिया. उनका तो सारा जीवन ही एक सन्देश है जिसके बारे में चर्चा करना बिना किसी नयेपन के एक रस्मअदायगी ही होगी. मगर उनके कालजयी विचार पुष्प से कुछ के स्मरण इस घनघोर निराशाजनक माहौल में प्रेरणा का कार्य करेंगे.

स्वामी जी ने देशवासियों विशेषकर युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था - " राष्ट्ररूपी यह जहाज लाखों लोगों को जीवनरूपी समुद्र के पार करता आ रहा है. कई शताब्दियों से इसका यह कार्य चल रहा है, और इसकी सदाशयता से लाखों आत्माएं इस सागर के उस पार अमृतधाम में पहुंची हैं. पर आज शायद तुम्हारे ही दोषों से इसमें कुछ खराबी आ गई है. इसमें एक - दो छेद हो गए हैं; तो क्या तुम इसे कोसोगे ! संसार में जिसने तुम्हारा सबसे अधिक उपकार किया है, उसपर खड़े होकर गाली बरसाना क्या तुम्हे उचित है ? ..... यदि हमारे इस समाज में, राष्ट्रीय जीवनरूपी जहाज में छेद है, तो हम तो इसकी संतान हैं ; आओ चलें इस छेद को भर दें. ..... मैं तुम्हारे पास आया हूँ अपनी सारी योजनाएं तुम्हारे सामने रखने के लिए. मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए तैयार हूँ. और यदि तुम मुझे ठुकराकर अपने देश के बाहर भी निकाल दो तो भी मैं तुम्हारे पास वापस आकर यही कहूँगा कि - भाई हम सब डूब रहे हैं. मैं आज तुम्हारे पास बैठने आया हूँ. और यदि हमें डूबना है तो आओ हम सब साथ ही डूबें, पर सावधान एक भी कटु शब्द अपने होठों पर न आये. ..... "

शायद ऐसे ही विचार होते हैं जो किसी व्यक्ति को युगपुरुष की कोटि में ला खड़ा करते हैं. हम युवा, जिनके पास उत्तराधिकार में स्वामी विवेकानद के विचारों की ऐसी अप्रतिम विरासत है को निराश होने का तो कोई कारण होना ही नहीं चाहिए. आइये, वर्तमान कृत्रिम आदर्शों और छवियों के ध्वंस होने का शोक मनाने में समय नष्ट करने के बजाये देश निर्माण के परम लक्ष्य में अपने योगदान देने में दृढतापूर्वक तबतक लगे रहे - जबतक कि अपने लक्ष्य तक पहुँच न जायें.
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