देश के सीमान्त प्रदेश अपनी प्राकृतिक समृद्धि से ओत-प्रोत हैं, मगर विकास के मानकों से काफी पीछे भी. यही कारण है कि अशिक्षा, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से ग्रसित इन प्रान्तों में उपनने वाले आक्रोश को उग्र अभिव्यक्ति दिए जाने के प्रयास भी किये जाते रहे हैं. स्वावलंबी बनने के लिए सिर्फ पर्यटन और पर्यटकों की कृपा दृष्टि पर आश्रित व्यवस्था से मैं सहमत नहीं. उन्हें अपने उपलब्ध संसाधनों का समुचित विकास कर देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान सुनिश्चित करना होगा, तभी वे सही मायने में इस देश के महत्वपूर्ण अंग कहे जा सकेंगे.
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| 'राजभाषा ज्योति' में प्रकाशित लेख |
नौर्थ - ईस्ट हों या जम्मू कश्मीर ये प्रदेश जल संसाधनों से समृद्ध हैं, और यही इनकी ताकत भी हैं. ये सभी प्रदेश खनन आदि की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने नहीं जा सकते. साथ ही जल उर्जा अन्य विकल्पों की तुलना में अपेक्षया प्रदुषण रहित भी है. ऐसे में निश्चित रूप से इस विकल्प का उपयुक्त विकास किया जाना चाहिए.
जिस प्रकार कोई ईमारत अपने मजबूत पायों पर ही सुदृढ़ हो सकती है, उसी प्रकार किसी देश की समृद्धि, सुरक्षा, आदि अपने चारों कोनों की सुदृढ़ता पर ही निर्भर कर सकती है.
इन्ही विचारों को मैंने उक्त लेख में रखने का प्रयास किया है जो एन. एच. पी. सी. की हिंदी पत्रिका 'राजभाषा ज्योति' में प्रकाशित हुई है.
आशा है आपकी भी प्रतिक्रिया तथा सुझाव प्राप्त होंगे.

