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Monday, January 10, 2011

चर्चा एक नाटक की ( दिल्ली के 13 वें 'भारत रंग महोत्सव से' )




वाकई एक कालजयी रचना देश, काल और भाषा की सीमाओं से परे होती है, और इसे एक बार फिर साबित किया दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ( NSD ) द्वारा आयोजित 13 वें 'भारत रंग महोत्सव' में मंचित नाटक 'एन अन सोल अमारिलो' (In a Yellow Sun : Memories of an Earthquake) ने. बोलिविया की नाट्य संस्था टीटरो डी लांस एनडस द्वारा स्पेनिश भाषा में एक घंटे, दस मिनट का यह नाटक 9 जनवरी की शाम 5:30 पर एल. टी. जी. ऑडिटोरियम; नई दिल्ली में मंचित किया गया. दर्शकों की सुविधा के लिए टेलीविजन स्क्रीन पर इसके अंग्रेजी शब्दानुवाद भी उपलब्ध थे.

निर्देशक कैशर ब्री का यह नाटक 22 मई 1998 को बोलीविया में आये एक विनाशकारी भूकंप की पृष्ठभूमि में निर्मित है. यह नाटक जहाँ एक ओर भूकंप के महाविनाश और भीषणता, उससे प्रभावित हुई आम जनता के सरोकारों को दर्शाता है; वहीँ दूसरी ओर पुनर्वास और राहत के लिए मुहैया राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय सहायता की सरकारी और प्रशासनिक लुट - खसोट, भ्रष्टाचार और पीडितों से दुर्व्यवहार जैसी कड़वी सच्चाई को भी सामने लाता है. यह पटकथा और ये दृश्य कहीं से भी विदेशी पृष्ठभूमि से होने का आभास नहीं देते, बल्कि देखने वाला प्रत्येक आम दर्शक चाहे वो किसी भी देश का हो अपने परिवेश को इस प्रस्तुति से जोड़ कर देखने लगता है.


शायद तभी नाटक के क्लाईमेक्स के करीब मंच पर उतरे नेताओं के उलजलूल बयानबाजियों पर हूटिंग के रूप में कागज के गोले फेंकता आम दर्शक कहीं - न - कहीं अपने राजनीतिक विद्रूप पर भी प्रहार कर अपना आक्रोश निकाल रहा होता है. पीड़ित जनता को आंसू पोंछने के लिए रुमाल देने, मैक्डोवेल खुलवाने के वादे जैसे प्रसंग हास्य की जगह गहरा कटाक्षपूर्ण व्यंग्य करते हैं. ब्रेकिंग न्यूज़ का भूखा और मानवीय संवेदनाओं से बेपरवाह मीडिया का रूप इस नाटक में भी सामने आ ही जाता है.

नाटक के कारुणिक दृश्यों में एक अहम दृश्य है जब एक व्यक्ति अपनी बेटी के मलबे में दब जाने का वर्णन कर रहा होता है और बगल में एक मेज पर पावडर से एक बच्ची कि छवि बना, मेज को उलट उसके मिटटी में मिल जाने को निरुपित किया जाता है.


संजोग से इस समय प्राप्त दिल्ली प्रवास के ये संस्मरण, ये अनुभव मेरे लिए काफी अहम रहेंगे. इस नाटक ने इस तथ्य को भी स्पष्ट किया कि आम और संवेदनशील जनमानस किसी सीमित सीमा में ही नहीं बल्कि सारे विश्व में ही लगभग एक सी ही व्यवस्थाजनक परिस्थितियों का सामना कर रहा है. व्यवस्था में परिवर्तन का एक सफल प्रयास निश्चित रूप से पुरे विश्व में ही एक नई लहर उत्पन्न कर देगा जैसा कि कभी हमने 'गांधीयुग' में करके दिखाया था. लेखक, कवि, नाटककार और बुद्धिजीवी वर्ग शायद ऐसी किसी वैश्विक पहल के बारे में भी विचार करें.

(तसवीरें- नेट तथा अपने मोबाइल कैमरे की सीमित क्षमता के साथ)

Friday, January 7, 2011

दिल्ली का आमंत्रण : भारत रंग महोत्सव

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (National School of Drama) द्वारा आयोजित नाट्य महोत्सव का 13 वाँ आयोजन 7 – 22 जनवरी 2011 तक नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है. रंगमंचीय कला के प्रोत्साहन और विकास के उद्देश्य से आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय रंगमंच समूह भी साझीदारी निभाते है, जिस वजह से इस आयोजन ने आज एशिया के सबसे बड़े नाट्य उत्सव का रूप ले लिया है.

महोत्सव के आयोजन को और भी सारगर्भिता देने के लिए इस महोत्सव के समानांतर एक और आयोजन की भी रुपरेखा तैयार की जाती है, ताकि रंगमंच के इस अनूठे उत्सव से दिल्ली से बाहर के लोगों को भी जुडने का अवसर उपलब्ध हो सके और रंगमंच के अनुकूल बेहतर समझ और संस्कृति विकसित हो सके. इस बार इस समानांतर आयोजन के लिए चेन्नई को चुना गया है, 11 – से 18 जनवरी 2011 तक नाट्य आयोजन की यह श्रृंखला चेन्नई में भी जारी रहेगी.

हबीब तनवीर के ‘चरणदास चोर’ से दिल्ली में शुभारंभ होने वाले नाट्योत्सव में विविध मंचन स्थलों पर करीब 80 से ज्यादा राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय रंगमंचीय समूहों की प्रस्तुतियों के साक्षात्कार का अवसर उपलब्ध होने वाला है जिसके बारे में विस्तृत जानकारी NSD के केंद्रीय कार्यालय या वेबसाइट - www.nsd.gov.in से प्राप्त की जा सकती है.

तो चलें - नाट्योत्सव के इस महाआयोजन का लुत्फ़ उठाने ! .....

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