जगजीत सिंह एक ऐसा नाम, जो पिछले कई वर्षों से संगीत की स्वरलहरियों से गुजरता हमारे दिलों में उतरता रहा, आज उसी संगीत में घुल अमर हो गया है. निःशब्द हूँ, शब्द खो गए हैं अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए. और ऐसा हो भी क्यों न शब्दों का जादूगर ही जो चला गया; जो मौसिकी के एक घने साये के समान ही तो था !!!!!
मेरे ही नहीं न जाने कितनी पीढ़ियों और धर्म-उम्र की सीमा से परे प्रशंसकों को न सिर्फ उन्होंने अपनी करिश्माई आवाज से मोहित किया है बल्कि हम सभी ने जाने-अनजाने उन्हें अपने सुख-दुःख, खुशियों और गमों में शामिल भी किया है. कितनी रातें जागते हुए गुजारी हैं हमने आपके साथ और कितने दिनों को आपके सहारे काटा है. आज अपने सभी चाहने वालों को अकेला छोड़ एक अनंत यात्रा पर न जाने कौन से देश की ओर निकल लिए. जानता हूँ की सृष्टि के इस चक्र से कोई नहीं बच सकता, मगर कुछ लोगों को यह हक़ नहीं मिलना चाहिए - कभी नहीं मिलना चाहिए कि बस मुंह मोड़ा और चल दिए...
कहते हैं जाने वाले को रोकर विदा नहीं करते, मगर कुछ रिश्ते ऐसे बन जाते हैं जो दिमाग से निर्धारित नहीं होते.....
आपने भी जिंदगी में कम गम झेले हों ऐसा नहीं था, मगर संगीत का सहारा आपके पास था अपने गम को छुपाने के लिए, जिसके साथ मुस्कुराते हुए आपने अपना गम तो छुपा लिया मगर हमारे पास तो यह विकल्प भी नहीं है. खैर अब हैं तो बस आपकी ग़ज़लों की विरासत .... और अब वही शायद साथ-साथ रहे हमारे...
आप जहाँ भी रहें, सुकून से रहे, और ईश्वर चित्रा जी को इस दुःख से उबरने की शक्ति दे यही प्रार्थना है.....
अपनी घुड़सवारी के शौक के समान ही खुबसूरत शब्दों पर सवार हो दिल में उतर जाने वाली आवाज के साथ जग को जीतने वाले जगजीत सिंह कभी भुलाये नहीं जा सकेंगे.....
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे, मेरी जवानी;
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी.....

