Sunday, May 15, 2011

"उसने कहा था" - मैने नहीं ...



"..... लड़के ने मुस्कुराकर पूछा, "तेरी कुड़माई हो गई?" 
इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ा कर 'धत्' कह कर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।

दूसरे-तीसरे दिन सब्ज़ीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, 'तेरी कुड़माई हो गई?' और उत्तर में वही 'धत्' मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली, "हाँ हो गई।"
"कब?"    
"
कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।"

लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ीवाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।...."

प्रबुद्ध ब्लौगर समझ ही गए होंगे कि उपरोक्त पंक्तियाँ प्रसिद्द लेखक श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की लोकप्रिय कहानी 'उसने कहा था' से उद्धृत हैं. यह मेरी सर्वाधिक पसंदीदा कहानियों में से एक है. इस पोस्ट के माध्यम से मैं आज इस कहानी पर कोई विशेष चर्चा नहीं कर रहा, बल्कि मेरा प्रयास है विभिन्न माध्यमों द्वारा अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति का. 

अक्सर हम आक्रोश को यदि अपने अंदर जज्ब नहीं कर पाते तब किसी-न-किसी माध्यम से उसे अभिव्यक्त कर देते हैं, कभी मौखिक अपशब्दों के प्रयोग द्वारा तो कभी ज्यादा आक्रामक ढंग से भी. 

ऐसा आक्रोश यदाकदा तब उभरता है जब किसी रिलेशन में दोनों पक्षों को अभिव्यक्ति का समान अवसर नहीं मिलता. क्या किसी रिलेशनशिप - चाहे मित्रता ही सही - में एक पक्ष पर ही सामंजन का सारा दारोमदार निर्भर होना चाहिए ? अपनी भावनाओं को एकपक्षीय रूप से दबा कर निभाए जा रहे संबंध क्या स्थायित्व की गारंटी हो सकते हैं !

कई बार ऐसे संबंध जो कोई स्थायी स्वरुप ग्रहण नहीं कर पाए होते हैं उनमें भी ऐसी मनःस्थिति के बीज छुपे रहते हैं, जैसा कुछ उपरोक्त कहानी में भी है. 

कई बार ऐसा भी होता है जब मूड भी किसी ग्राफ सदृश्य व्यवहार करता हुआ फ्लक्चुएशन दिखलाता रहता है. 

पिछले कुछ दिनों से मैं भी ऐसी ही किसी कशमकश से गुजर रहा हूँ जिसका नतीजा अनावश्यक और गैरजरुरी स्थानों तथा व्यक्तियों से वाद-विवाद के रूप में सामने आ रहा है. स्पष्ट कर दूँ कि इसके पीछे - "तेरी कुड़माई हो गई ?"- जैसा कोई विषय नहीं है. :-) मुझे खुद भी इसके मूल के बारे में कोई स्पष्ट कारण समझ में नहीं आ रहा मगर यह एक प्रकार का विचलन तो है ही.




Tuesday, May 10, 2011

दिल्ली में मंचित – ‘ Sons of Babur ’


सलमान खुर्शीद, टॉम आल्टर और ‘बहादुर शाह जफ़र’

गत 8 मई को दिल्ली के श्रीराम कला केन्द्र में सलमान खुर्शीद लिखित और टॉम ऑल्टर अभिनीत व निर्देशित नाटक ‘ सन्स ऑफ बाबर ’ का मंचन हुआ. बहादुरशाह जफ़र के रूप में केंद्रीय भूमिका टॉम ऑल्टर ने निभाई थी तो सूत्रधार सदृश्य पात्र रूद्रांशु सेनगुप्ता की भूमिका निभाई थी – राम नरेश दिवाकर ने. अन्य प्रमुख कलाकारों में – हरीश छाबड़ा, मनोहर पांडे, अंजू छाबड़ा, यशराज मलिक, एकांत कॉल, पंकज मत्ता आदि थे.

“ बाबर के बेटों – वापस जाओ “ सरीखे राष्ट्रवाद (!) के प्रकटीकरण के जुबानी नारों की पृष्ठभूमि में आरम्भ हुआ यह नाटक एक प्रयास है ‘ बाबर के बेटों ’- मुग़लों का अपनी जड़ों को तलाशने का.

नाटक की शुरुआत एक शोध क्षात्र (भारत का सबसे निरीह प्राणी) रूद्रांशु सेनगुप्ता से होती है, जो इतिहास पर अपने शोध के सन्दर्भ में रंगून जाना चाहता है. और जाये भी क्यों नहीं जब ‘ भारत में पंचायती राज ‘ पर शोध करने के लिए उसका एक मित्र अमेरिका जा सकता है तो मुग़लों पर शोध करने के लिए उसके आखरी बादशाह जफ़र के अंतिम समय का साक्षी रहा रंगून क्यों नहीं !

खैर रंगून तो वो जा नहीं ही पाता, मगर लाइब्रेरी में ढूंढते हुए इतिहास के रंगमंच के एक कोने में उसे स्वयं जफ़र ही मिल जाते हैं. दोनों के मध्य रोचक संवाद होते हैं जिसमें बादशाह – ए – आजम द्वारा रूद्र के बंगाली उच्चारण में ‘ जोहापोनाह ‘ के उच्चारण से स्वाभाविकतः तिलमिलाना भी शामिल है, जो अंत तक उनकी आदत में भी शामिल हो जाती है, J, साथ ही यह पीड़ा भी उभरती है कि दिल्ली आजाद हो गई है तो उन्हें अब तक वापस क्यों नहीं बुलाया गया ?
                
                    
एक कटाक्षपूर्ण संवाद में रूद्र द्वारा ‘ डेमोक्रेसी ‘ की परिभाषा – “Democracy of the people, for the people, by the people”  पर जफ़र चौंकते हुए फ़ौज के बारे में पूछते हैं. जवाब में रूद्र के मुंह से भी निकल ही जाता है – “ Army also follow the people, but that is only Pakistan where people follow the Army “.

 बाबर के बेटों के बारे में हालिया इतिहास में जुडी नई जानकारियों से ओतप्रोत रूद्र की टिप्पणियां जफ़र को विचलित करती हैं और वो बाबर से लेकर औरंगजेब तक के मुगलकाल के सफर को उसके मानसपटल के रंगमंच पर उकेर देते हैं.

इस क्रम में एक उल्लेखनीय टिप्पणी मुग़लों के रक्त सम्मिश्रण पर भी है, जब जफ़र कह उठते हैं – “इन मुग़ल बादशाहों की रगों में खून तो हिन्दुस्तानी माँओं का ही बह रहा था. Paternity may be doubted, but not the Maternity.

जफ़र के माध्यम से लेखक ने इतिहासकारों से एक और महत्त्वपूर्ण आग्रह भी किया है कि – “ वो इतिहास तो लिखें मगर इतिहास का पुनर्लेखन न करें. “

अंत में नाटक जफ़र के एक हृदयस्पर्शी प्रश्न पर आकर समाप्त होता है जब वो पूछते हैं कि – “ मुझे किस रूप में याद करोगे रूद्र ? ”
रूद्र – “ आखरी मुग़ल बादशाह. ”
जफ़र – “ नहीं, First Emperor of the Free India “ – 
     “ First Emperor of the Democratic India. ”

Sunday, May 8, 2011

"वाईफ नहीं; जीवन संगिनी"

लोकयात्री देवेन्द्र सत्यार्थी जी को समर्पित 

यूँ तो यह पोस्ट अपनी ही धुन में अलमस्त यायावर एक ऐसी महानात्मा को ही समर्पित करना चाहता था, जिसने लोक गीतों के संग्रह के अपने अभिनव सफर में पूरे भारत को एक सूत्र में पिरो दिया. मगर इनके सफर की यह कहानी अधूरी ही कही जायेगी यदि इसमें इनकी जीवनसंगिनी की सहभागिता का उल्लेख न किया जाये; के जिनत्याग, सामंजन और सहभागिता के बिना सत्यार्थी जी का जीवन सफर संपूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता. जी हां, बात हो रही लोक साहित्य को अपने अप्रतिम योगदान से अपूर्व ऊंचाई पर पहुँचाने वाले देवेन्द्र सत्यार्थी जी की. 1927 से आरंभ हुआ लोकगीतों के संग्रह का इनका सफर जीवनपर्यंत जारी रहा.
पुत्र की घुमक्कड प्रवृत्ति से चिंतित माता-पिता ने इनका विवाह कर दिया, मगर इस बंधन की दुर्बलता भी तब सामने आ गई जब चार आने की सब्जी लेने निकले सत्यार्थी जी  चार महीने बाद लौटकर आए. श्रीमती जी (जिन्हें बाद में वो ‘लोकमाता’ कहकर पुकारने लगे थे), ने पूछा तो जवाब मिला – “देखो मेरा झोला, इसमें चार हज़ार लोकगीत हैं”.
थोड़े दिनों बाद पुनः इनके बदलते रंग-ढंग को भांप साहस कर लोकमाता ने टोक ही दिया कि – “इस बार आप घर से गए तो मैं भी साथ जाउंगी”. यह घुमक्कड प्राणी पहली बार इस परिस्थिति में पड़ा था, काफी समझाया उन्होंने, मार्ग की कठिनाइयाँ बतलाईं; मगर लोकमाता फैसला कर चुकी थीं कि –" तुम राजा तो मैं रानी, तुम भिखारी तो मैं भिखारिन, मगर चलूंगी तुम्हारे साथ. “
सत्यार्थी जी को सहमति देनी पड़ी, कहा – “ठीक है... राजा रानी छोडो, भिखारी-भिखारिन वाला रिश्ता ठीक है. चलो मेरे साथ.”
और इस प्रकार लोकयात्री और लोकमाता की यह जोड़ी एक अनंत सफर में साथ-साथ बढ़ चली; जिसमें समय के साथ उनकी बेटियां भी शामिल होती रहीं.


सत्यार्थी जी का यात्रा के विभिन्न चरणों में महात्मा गाँधी और गुरुदेव टैगोर के अलावे प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल जैसे व्यक्तित्वों से संपर्क हुआ जिन्होंने इनकी जिजीविषा को सराहा ही. साहिर लुधियानवी और बलराज साहनी जैसी हस्तियाँ इनकी कई यात्राओं में सहभागी भी रहीं.
1948 में ये प्रतिष्ठित पत्रिका ‘आजकल’ के संपादक बने, 1956 में इससे मुक्त हो इनकी खानाबदोशी पुनः आरंभ हो गई, ऐसे में घर को चलाने की पूरी जिम्मेवारी लोकमाता पर आ गई और सत्यार्थी जी के लेखन और लोकमाता की सिलाई मशीन में ज्यादा चलने की होड लग गई. लेखन को व्यवसाय तो सत्यार्थी जे ने कभी बनाया ही नहीं था, ऐसे में बेटियों कविता, अलका और पारुल की शिक्षा तथा शादियां लोकमाता की सिलाई मशीन से ही संभव हो सकी. सत्यार्थी जी ने स्वयं भी स्वीकार किया है कि – “लोकमाता के कारण ही यह घर चला. वर्ना ...मेरे बस का तो कुछ भी न था. “
अपनी अभिरुचि के प्रति ही जीवन समर्पित कर देने का यह अप्रतिम उदाहरण कभी अस्तित्व में आ नहीं सकता था यदि सत्यार्थी जी को ‘लोकमाता’ जैसी सच्चे अर्थों में जीवन संगिनी, सहधर्मिणी न मिली होती. ऐसे ही उदाहरण इस धारना को पुष्ट करते हैं की - “हर सफल आदमी के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है. “
यह देश आज तक अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है तो ऐसी ही महानात्माओं के योगदानों की वजह से. 

Tuesday, April 12, 2011

लोकमानस के राम



संकीर्ण राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के परे राम भारतीय जनमानस के रोम-रोम में अंतरतम तक बसे हुए हैं. विभिन्न भाषाओँ में हर प्रमुख कवि / लेखक ने अपने दृष्टिकोण से राम के स्वरुप को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है. मगर मुख्यतः रामचरित्र सीता हरण और रावण वध के इर्द – गिर्द ही घुमता नजर आता है. रामचरित्र के श्रवण को अतर्मन की प्यास अनबुझी ही रह जाती है. वनवास से सीता हरण तक के दरम्यान राम परिवार के दिन कैसे कटे यह प्रश्न करोड़ों लोगों के साथ मेरे मन में भी सदा से ही कहीं उभरता रहा था, मगर इसका समाधान हुआ प्रेरक व्यक्तित्व और महानतम लोकयात्री स्व. श्री देवेन्द्र सत्यार्थी जी को पढते हुए. देश की मिट्टी में बिखरे लोक-गीतों को सहेजने में समग्र जीवन होम कर चुके सत्यार्थी जी के लिए गांधीजी ने कहा था कि – “ देश को एकसूत्र में पिरोने में आप भी हमारे ही काम को आगे बढ़ा रहे हैं, मगर एक अलग ढंग से.
 ”
लोकमानस ने वनवासी राम को अपनी आँखों के सामने, दिल के पास रखा और काफी गहरे और आत्मीयता से अवलोकन किया, जो उसके लोकगीतों में भी झलकता है.

ओडिसा के कृषकों द्वारा गए जाने वाले ‘हालिया गीतों’ में राम की गाथा गाई जाती है, जिसमें राम के कृषक रूप को देखा गया है.
“ राम बांधे हल, लेखन देवे माई;
 आउरी कि करिवे जे ...
सीताया देवे रोई जे ...”

अर्थात – “ राम हल चला रहे हैं, लक्ष्मण जी जुताई करेंगे, सीताजी के लिए और क्या काम है, वो बीज बो देंगीं. “

धान कुटने वाले उपकरण ढेंकी से जुड़े एक ‘ढेंकी गीत’  में राम – लक्ष्मण का विवाद  कि धान कौन डाले और कौन कूटे ?
राम ने कहा –
 “ लक्ष्मण तुम धान डालो मैं कुटूंगा. यह कह कर राम ढेंकी पर बैठ गए और पान खाने लगे. धान कूटने का कम आनंद से चलता गया. चारों ओर महक फ़ैल गई. “

राम – सीता के प्रेम की एक लोक झांकी –

“ जहाँ सीता सुपारी हैं, वहीं राम पान हैं; जहाँ सीता टोकरी हैं, वहीं राम धान हैं “

लगभग हरेक भाषा में लोक जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में, भावनात्मक रंगों को राम – सीता और लक्ष्मण के चरित्र में पिरोकर पति – पत्नी के प्रेम, तनाव, नोंक – झोंक,  भाई –भाई, देवर – भाभी आदि की विभिन्न काल्पनिक परिदृश्यों के माध्यम से व्यक्त किया गया है. स्पष्ट है कि लोक मानस ने रामायण सहित किसी भी महाकाव्य या पौराणिक ईश्वरतुल्य पात्रों के साथ तथाकथित शास्त्रीय मानकों के विपरीत अपना एक अलग आत्मीय संबंध बना रखा है जो होली आदि त्योहरिक, वैवाहिक उत्सवों के क्रम में झलक ही जाता है. और स्पष्ट है कि लोक मानस में बसे यही राम हैं, जिन्हें आम आदमी के ह्रदय से निकाल दोबारा किसी ‘ स्वर्णिम वनवास ‘ में भेजना कभी संभव नहीं हो पायेगा. 

Saturday, April 2, 2011

'सचिन वर्ल्ड कप - 2011'



वर्ल्ड कप का उन्माद अब अपने चरम पर है. सचिन की भावनाओं के इर्द-गिर्द ही परिभ्रमण कर रही टीम के साथ आई. सी. सी. के सितारे भी सहायक भूमिका में आ जुटे हैं. इडेन गार्डन को दरकिनार कर वानखेडे में जमाई गई इस आयोजन की आखरी महफ़िल में सचिन को अपने घरेलु दर्शकों को शतकों के शतक का तोहफा देना तो तय ही है. रही बात वर्ल्ड कप की तो टीम के महामहिम अंतिम क्षणों में प्यादे  खिलाडियों को किनारे कर अपना वजीर न चल दें तो एक वर्ल्ड कप भी सचिन के खाते में जुट ही जाना चाहिए. मगर कहीं वर्ल्ड कप भी प्याज की नियति न प्राप्त कर जाये, कहीं यह आशंका भी है. क्या करूँ अब मैदान से ज्यादा बाहर का खेल ही ज्यादा अहम हो गया है.
वैसे वर्ल्ड कप का माहौल बनाने के लिए एक फिल्म भी देखी है – ‘हैट्रिक’. नाना पाटेकर, डैनी, परेश रावल, कुणाल कपूर, रीमा अभिनीत यह फिल्म शायद पिछले वर्ल्ड कप के दौरान रिलीज हुई थी. वर्ल्ड कप की पृष्ठभूमि में इससे प्रभावित व्यक्तियों के जीवन को दर्शाती एक बार देखने के लिए अच्छी फिल्म है ये.
चलते – चलते टीम ऑफ इंडिया को समर्पित करता हूँ ‘मैं आजाद हूँ’ फिल्म का वह गीत जिसे हिंदी सिनेमा के चंद प्रेरक गीतों में एक माना जाता है.
“इतने बाजू - इतने सर, गिन लें दुश्मन ध्यान से;
हारेगा वो हर बाजी जब खेलें हम जी - जान से.” 

Saturday, March 19, 2011

शब्दों और चित्रों के साथ – देख बहारें होली की

हर ओर होली का उल्लास है, मगर ब्रज की होली की बात ही कुछ और है; साथ में अगर कान्हा भी शामिल हों तब तो होली के आनंद अलहदा ही है.
रंगों भरी होली से तो अपनी दूरी ही है, मगर साहित्यिक और आत्मिक होली (अपने-आप के साथ J) का आनंद जरुर उठा लेता हूँ. इस बार वृन्दावन की होली देखने का कार्यक्रम तो अनिश्चित ही है, मगर आपसे साझा कर रहा हूँ नजीर अकबराबादी साहब की देश की गंगा-जमुनी होली की शाब्दिक प्रस्तुति और ब्रज की होली के एक मंचीय प्रस्तुति से एक झलक.

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।

हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की

गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।

ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों,
तब देख बहारें होली की।।

फूलों भरी होली में खुद ही कूद पड़े कृष्ण 
आज न छोडेंगे राधे को...
अलौकिक होली 
यदा - यदा हि धर्मस्य

होली मुबारक. 

Thursday, March 3, 2011

"जागो ग्राहक" – टाटा इंटरप्राइजेज ‘क्रोमा’ के प्रति





इलेक्ट्रिकल वस्तुओं के स्टोर के रूप में तेजी से उभर रहे टाटा क्रोमा रिटेल स्टोर के उस विज्ञापन पर आपकी नजर जरुर गई होगी जिसमें एक व्यक्ति खुद को ही मुक्के मार रहा है कि “उसने इतनी अच्छी दुकान छोड़ कहीं और से सामान क्यों लिया ?” मगर मैं अपने अनुभव से आपको आगाह कर रहा हूँ कि यदि इस एड पर ही भरोसा करके गए तो शायद उक्त इंसान की जगह आप खुद को ही पाएंगे.
अपने उत्पाद की बिक्री के सिवा ग्राहकों की सुविधा से इन्हें कोई वास्ता नहीं. शिकायत या सामान 
रिटर्न करने की भी इनकी प्रक्रिया पेचीदा ही है.  

 मैंने इंटरनेट के नियमित उपभोग के लिए यहाँ से 31 जनवरी को ‘टाटा फोटोन +’ खरीदा, जिसका कनेक्शन 9/10 तारीख तक कट गया. कस्टमर सेंटर ने इसका कारण पेपर्स का समय पर न पहुँचना बताया. 11 को इसके स्टाफ मि. चेतन जो इसके सेल को देखते हैं से बात करने पर उन्होंने कहा कि आज ही आपको कोई और तस्वीर देने को कहा गया है. मैंने 12 को तस्वीर उन्हें दीं. 15 तक  फिर कोई प्रगति नहीं हुई. पुनः संपर्क कर मैंने उनसे कहा कि आपको कष्ट हो तो पेपर्स मुझे दे दें, मैं खुद ही उन्हें डीलर को पहुँचा दूँगा. फिर मैंने उनसे उस व्यक्ति का नंबर लिया जो इनके अनुसार पेपर्स डीलर को सौंपते हैं. पहली बार फोन करने पर उस सज्जन ने बताया कि उसे पेपर्स मिले ही 15 को हैं और उसने उन्हें सबमिट कर भी दिया है. इसके बाद भी कोई प्रगति न होने पर मेरी छोडिये ‘टाटा इंडीकोम’ के कर्मचारियों द्वारा फोन करने पर भी इसने कहना शुरू कर दिया कि वो ‘विजेन्द्र’ नहीं ‘विवेक’ है.
अंततः मैं एक बार फिर २० फरवरी को श्रीमान चेतन से मिला और उन्हें समझाया कि वो मुझे पुलिस या उपभोक्ता अदालत की ओर जाने को विवश कर रहे हैं. इसके बाद उनमें शायद अपने दायित्वबोध की भावना जगी और 22 को मुझे SMS द्वारा अपने पेपर्स वेरिफिकेशन की सुचना मिल गई.
इस पूरे उपक्रम में सिर्फ टाटा इंडिकॉम के कस्टमर केयर अधिकारियों न ही अपनी ओर से पूरा सहयोग दिया. मगर पेपर्स सबमिट होने तक वो भी कुछ विशेष कर पाने की स्थिति में नहीं थे.
मैंने इस संबंध में कई दिनों से कोशिश करते हुए क्रोमा की साईट पर कम्पलेन करने में आज सफलता पाई है, (यह भी कोई सहज प्रक्रिया नहीं थी) देखें क्या नतीजा निकालता है ! टाटा के ही ग्रुप का एक भाग होते हुए क्रोमा की यह स्थिति निराश करती है और आगे कभी उससे खरीददारी को हतोत्साहित ही करती है. कस्टमर केयर संबंधी क्रोमा की और भी कई शिकायतें इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं. हो सकता है कि यह सिस्टम की न होकर कुछ स्टाफ्स की व्यक्तिगत लापरवाही का ही नतिजा हों, मगर एक प्रतिष्ठित ब्रांड के नाम को कलंकित करने के लिए काफी हैं ये उदहारण. आशा करूँ कि प्रबंधन स्वयं को सरकारी बाबु समझ रहे इन कर्मचारियों की नकेल खिंच ग्राहकों को ऐसी असुविधाओं से बचाने की दिशा में गंभीर होगा.
बहरहाल इस पोस्ट के माध्यम से अपने ब्लौगर साथियों को आगाह करने का अपनी ओर से प्रयास तो मैंने कर ही दिया है.

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