Monday, February 10, 2014

नर हो न निराश करो मन को...


वर्षों पहले जब बनारस में था तो कभी-कभी मौर्निंग वाक के चुनिन्दा दिनों में एक-आध चक्कर सामने ही रहे जिम का भी लगा लेता था. एक दिन किसी लड़के को देखा अपने दोस्तों से कह रहा था- "मेरी तो जिंदगी ही बर्बाद हो गई..." ऐसा वो अपनी कम हाईट को लेकर कह रहा था क्योंकि उसके दोस्तों की नजर में उसकी मेहनत को उसकी हाईट का साथ मिला होता तो शायद उसकी पर्सनाल्टी और भी बेहतर होती. इसे सुन वहीँ खड़े एक इंस्ट्रक्टर ने हस्तक्षेप कर अपना उदाहरण देते हुए कहा कि क्या उनकी खुद की जिंदगी बर्बाद है ! नौकरी है, परिवार है, स्पोर्ट्स में भी पार्टिसिपेट करते हैं, हाईट को लेकर रोते रहते तो क्या यहाँ पहुँच पाते ! उस लड़के ने समझा या नहीं पता नहीं, मगर हाल ही एक न्यूज पढ़ ये घटना फिर याद आ गई. नई दिल्ली के एक BPO कर्मी ने हाईट और सर के बाल कम होने के कारण डिप्रेशन में आकर ख़ुदकुशी कर ली. स्कूल के दिनों में ही उसने सुसाइड का निर्णय ले लिया था और 6 महीने पहले डेट भी तय कर ली थी. सुसाइड नोट में यह भी लिखा पाया गया कि एक युवती को वो प्यार भी करता था, मगर अपनी हीनता के कारण पीछे हट गया.
वास्तविकता में हममें से कोई भी परफेक्ट नहीं होता. शारीरिक रूप से भी हममें से कई लोगों को कुछ समस्याएं होती ही हैं. मगर कहते हैं न कि ईश्वर अगर हमसे कुछ छीन लेता है तो कुछ अतिरिक्त दे भी देता है. तो जरुरत है कि अपनी उस मजबूती को पहचानें और सफलता की ओर आगे बढ़ें. सफलता से बड़ा कोई
आभूषण, कोई पहचान होती भी नहीं जो कई कमजोरियों को छुपा देती है. कई प्रसिद्ध और हमारे आस-पास भी ऐसे सफल उदाहरणों की कोई कमी नहीं. मगर ऐसे व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने में परिवार और मित्रों को भी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए. अपनी कमजोरियों से हतोत्साहित या निराश होने के बजाये अपनी क्षमताओं को पहचान सकारात्मक सोच के साथ सफलता का प्रयास करना ही जिंदगी है- आखिर "नर हो न निराश करो मन को..."

Sunday, February 2, 2014

कश्मीर की विरासत और आर्कियोएस्त्रोनौमी

 
"सुबह जाना काम पर, शाम को घर आना;
सबसे बुरा है- मुर्दा शांति से भर जाना "
 
तो अपने जिन्दा होने को कन्फर्म करने और शांत, ठहरे पानी में थोड़ी हलचल
जगाने के लिए कभी-कभी ऐसे अभियानों पर निकल ही जाता हूँ. आज जा पहुंचा
कश्मीर के सोपोर के उस स्थान पर जहाँ Palaeolithic और Neolithic काल के
कुछ अवशेष अभी भी अपने वास्तविक मूल्यांकन की राह तकते खड़े हैं. इस रौक
आर्ट में मानव और पशु आकृतियों के साथ कुछ गोल घेरे भी दिख रहे हैं.
पीर-पंजाल श्रेणी के वोल्केनिक रौक्स में अंकित किये गए इन चित्रों को
आकृति अपनी रचना शैली के कारण पुरातत्वविद Upper Palaeolithic Age के मान
रहे हैं. Concentric गोले संभवतः इस क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रमुख
झीलों का निरूपण हो सकती हैं. एक स्थानीय लोककथा के अनुसार कश्मीर का
स्थल पहले झील में डूबा हुआ था, जिसमें एक राक्षस का राज था. देवताओं ने
उसके वध के लिए एक दर्रे के माध्यम से सारा पानी निकलवा दिया और फिर उस
राक्षस का वध किया गया. कुछ लोग यहाँ की झीलों को meteorite effect से
जोड़ कर देख रहे हैं. तो क्या पुरामानवों ने यहाँ कोई उल्किय घटना देखी थी
और जिसका निरूपण इस भित्ति चित्र पर किया गया है ! कई Archaeoastronomers
इस दिशा में भी विचार कर रहे हैं, मगर इस सन्दर्भ में अभी कई भू-गर्भिक
और भू-भौतिक अध्ययन की आवश्यकता है.
 
इस स्थल के निकट से ही एक काफी ऊँचा Mound भी मिला है जिसे पुरातात्विक
दृष्टि से Neolithic माना जा रहा है और यहाँ से अब भी कई Black & Red
potteries मिल रहे हैं. इस क्षेत्र में अध्ययन करते रहे पुरातत्वशाश्त्री
डॉ. मुमताज बताते हैं कि 70 के दशक तक इस क्षेत्र में पुरातत्त्व की
दृष्टि से काफी काम हुआ, मगर 80 के बाद से इस दिशा में किये जा रहे
प्रयासों में काफी कमी आई है. निश्चित रूप से प्राकइतिहास के दृष्टिकोण
से कश्मीर में नए सिरे से और समग्र अध्ययन की जरुरत है, ताकि इतिहास के
बिखरे कई सूत्रों को जोड़ा जा सके...

Friday, January 24, 2014

हिमाच्छादित कश्मीर


यूँ तो कश्मीर का सैलानी सीजन मार्च के बाद से ही माना जाता है, मगर लाखों पर्यटक यहाँ स्नोफौल देखने के लिए भी आते हैं. इस साल भी कश्मीर ने अपने इन चाहने वालों को निराश नहीं किया है. रुई के फाहों सी धीमे-धीमे होती हिमकणों की बारिश और देखते ही देखते पूरी वादी को अपने श्वेताभ आगोश में समेट लेना एक अलग सा ही अनुभव है, जिसे शब्दों में सहेज पाना सहज नहीं...

स्नोफौल के कई दौर गुजर चुके हैं और कई अभी आने को हैं. वादियाँ बर्फ की धवल चादर ओढ़ अपने प्रशंसकों के लिए बाहें फैलाये इंतजार कर रही हैं. हिमपात के दृष्टिकोण से स्थानीय लोगों द्वारा इस अवधि को 3 भागों में बांटा गया है. शुरूआती चालीस दिनों की अवधि जो दिसंबर के तीसरे सप्ताह से शुरू होती है ‘चिल्लई कलां’ कहलाती है. यह यहाँ सर्वाधिक हिमपात की अवधि होती है. इसके बाद 20 दिनों की ‘चिल्लई खुर्द’ की अवधि आती है और उसके बाद के 10 दिनों तक ‘चिल्लई बच्चा’ अवधि होती है. ‘कलां’ और ‘खुर्द’ के अर्थ क्रमशः ‘बड़ा’ और ‘छोटा’ होते हैं. इस प्रकार घाटी में हिमपात का यह चक्र पूरा होता है. पारंपरिक काल विभाजन की इस परंपरा पर पर्यावरण के साथ बढ़ रही छेड़-छाड़ का भी असर पड़ रहा है, मगर फिर भी ये घाटियाँ अब भी पर्यटकों की उम्मीद पर खरी तो उतर ही रही हैं.


श्रीनगर, गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम आदि कई जाने-माने पर्यटन स्थलों पर सैलानी प्रकृति के विलक्षण रूप का आनंद उठा रहे हैं. मगर इसके साथ ही जरुरी है कि घाटी के अन्य सुन्दर मगर अनजान से स्थलों को भी पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जाये, सड़क और अन्य यात्री सुविधाएं विकसित कर इस राज्य में पर्यटन की अपार संभावनाएं सामने लाई जा सकती हैं. अकस्मात प्रकृति का मिजाज बदलने पर आने वाली परेशानियों से स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के त्वरित राहत के लिए सरकारी तंत्र को भी चुस्त-दुरुस्त रहने की जरुरत है. बहरहाल यदि आपने अब तक कश्मीर की सुंदरता को अपनी आँखों से महसूस नहीं किया है तो जल्द ही विचार कीजिये धरती पर बसे इस जन्नत की सैर का.....

Tuesday, January 14, 2014

मकर संक्रांति पर : लट्टू से सीख !


हमारे ग्राम्य खेल अपनी मिट्टी से ही नहीं प्रकृति से भी जुड़े हुये हैं। पतंग उड़ाना, लट्टू नचाना या ऐसे ही कई और भी। ये खेल-खेल में शिक्षा का एक माध्यम भी है। आज मकर संक्रांति है। इन दिनों पतंग उड़ाने और लट्टू नचाने की परंपरा रही है। आधुनिक शहरी जीवन के प्रभाव में ये विधाएँ लुप्त हो रही हों या मात्र प्रतीकात्मक ही हों, इनका ग्राम्य जीवन में सदा से ही अपना महत्त्व रहा है। सूरदास अपनी एक रचना में बाल गोविंद के चन्द्र खिलौना लेने की हठ करने पर यशोदा की उस उलझन का जिक्र भी करते हैं जिसमें वह उनके लिए रेशम की डोर वाला लट्टू तो देने को सहर्ष तैयार हैं, मगर चाँद कहाँ से लाकर दें !

मेरी माई, हठी बालगोबिन्दा।
अपने कर गहि गगन बतावत
, खेलन कों मांगै चंदा॥
बासन के जल धर्‌यौ
, जसोदा हरि कों आनि दिखावै।
रुदन करत ढ़ूढ़ै नहिं पावत
,धरनि चंद क्यों आवै॥
दूध दही पकवान मिठाई
, जो कछु मांगु मेरे छौना।
भौंरा चकरी लाल पाट कौ
, लेडुवा मांगु खिलौना॥
जोइ जोइ मांगु सोइ-सोइ दूंगी
, बिरुझै क्यों नंद नंदा।
सूरदास
, बलि जाइ जसोमति मति मांगे यह चंदा॥“

लट्टू मात्र एक खेल ही नहीं उसका अपना एक विज्ञान भी है। इसे गौर से देखें तो यह धरती के घूर्णन के सदृश्य ही है। अपने अक्ष पर झुक घूमते हुये सूर्य की परिक्रमा सी यह गति धरती के घूर्णन को भी दर्शाती है। पृथ्वी के इस तरह के दोलन की वजह से उसका अक्ष जो हमेशा एक तारे की ओर दिखता है (आज ध्रुव तारा), वह समय के साथ बदलता भी रहता है। लगभग 13000 वर्ष पूर्व लायरा (वीणा) तारामंडल का अभिजीत तारा ध्रुवतारा था जिसका स्थान आज लघु सप्तऋषि के अल्फा तारे ने ले लिया है।

मकर संक्रांति का यह दौर जो खगोलीय दृष्टिकोण से सूर्य और धरती की परस्पर गतियों का एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु है के ही दरम्यान लट्टू का खेल हमारे पूर्वजों की रचनात्मक कल्पनाशीलता का अप्रतिम उदाहरण है।

यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि सामान्यतः हम मकर संक्रांति को सूर्य के उत्तरायण से जोड़ लेते हैं। मगर सूर्य और पृथ्वी की परस्पर गतियों में समय के साथ बदलाव के कारण ये तिथियाँ स्थिर नहीं हैं। उत्तरी गोलार्ध में वास्तविक उत्तरायण तो विंटर सोलस्टाइस (21/22 दिसंबर) के आस-पास से ही आरंभ हो जाता है। यानी कि अतीत में कभी वह समय रहा होगा जब सूर्य सोलस्टाइस को मकर राशि में प्रवेश करता रहा होगा, मगर अब उस तिथि पर यह धनु राशि में रहता है। पंचांगों में तालमेल के अभाव में हम इस तिथि को अभी भी अपनी परंपरा में जीवित रखे हुये हैं, जबकि यह अपने वास्तविक खगोलीय महत्त्व पृथक हो चुका है, अब यह मकर रेखा पर नहीं है। मकर रेखा और मकर राशि में अन्तर समझने की जरूरत है।

तो इस अवसर पर आइये क्यों न सिर्फ उल्लास और गर्मजोशी के त्योहार का उत्सव मनाएँ बल्कि इसके खगोलीय महत्त्व को भी स्वीकार करते हुये अपने प्रखर बुद्धिमान पूर्वजों की मेधा का भी सम्मान करें...

प्रख्यात कवि जैक एग्युरो की कविता की श्री मनोज पटेल जी द्वारा अनुवादित पंक्तियाँ हैं-

“शायद मैं भी एक लट्टू ही हूँ, वे भी सोते हैं

खड़े-खड़े, तेजी से नाचते हुये अपनी जगह पर...

जितना तेज नाचते हो, उतना ही स्थिर दिखते हो तुम

इसमें कुछ सीखने की बात है, मगर क्या ?

Monday, November 11, 2013

मिथिलांचल का भाई-बहन के प्रेम से जुड़ा लोकपर्व सामा-चकेवा

मिथिलांचल की मिट्टी अपनी कला और संस्कृति की सोंधी खुशबू के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के कई पारंपरिक पर्वों में एक नाम सामा-चकेवा भी है। भाई-बहन के प्रेम के प्रकटीकरण से जुड़े पर्वों की शृंखला में एक यह भी है। कार्तिक माह की सप्तमी तिथि से पूर्णिमा तक आयोजित होने वाला 9 दिवसीय यह पर्व प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक भी है। व्रत के अंतिम दिन बहनें अपने भाई को चावल, दही और गुड खिलाती हैं और बदले में भाई उन्हे उपहार देते हैं। कहते हैं हिमालय से आने वाले प्रवासी पक्षियों के आगमन के उत्सव के रूप में भी इस पर्व की मान्यता है। इसीलिए महिलाएँ इस पर्व पर मिट्टी से पक्षियों  की आकृति बनाती हैं और उन्हे सजाती हैं। पर्व के अंतिम दिन इन प्रतिमाओं को जलाशयों में प्रवाहित कर दिया जाता है, इस कामना के साथ के ये पक्षी अगले जाड़ों में प्रसन्नता और सौभाग्य लिए फिर लौटें। समाज को प्रकृति से जोड़ने का अनोखा अंदाज है ये ! एक और मायने में यह इस क्षेत्र की पारंपरिक कला के संरक्षण का माध्यम भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार एक कथा कृष्ण के पुत्र साम्ब और पुत्री सामा से भी जुड़ी है। किसी की चुगली की वजह से कृष्ण अपनी पुत्री और उसके पति से नाराज हो गए और उन्हे चकवी और चकवा पक्षी बनने का शाप दे दिया, जिनकी नियति दिन में तो साथ रहना है मगर रात में अलग हो जाना है। बाद में साम्ब के प्रयास से उनकी नाराज़गी दूर होती है। इसीलिए इस पर्व में महिलाओं द्वारा ‘चुगला’ का प्रतीकात्मक दहन भी किया जाता है। इस प्रकार यह पर्व एक आम सामाजिक बुराई जो कई गलतफहमियों - खासकर नजदीकी संबंधों में - के विरुद्ध एक संदेश भी देती है। बाजार के प्रभाव में अब खुद मूर्तियाँ बनाने की जगह रेडीमेड मूर्तिया खरीदने का चलन भी बढ़ता जा रहा है। यह ये भी स्पष्ट दिखाता है कि प्रतीकात्मक मान्यताएँ किस प्रकार व्यक्तिवादी स्वरूप लेने लगती हैं। पक्षियों की मूर्ति की जगह अभी सामा की मूर्ति और कल किसी देवी-देवता का चेहरा सामने रख कर्मकांड का आरंभ !!! जागरूकता और चेतना से ही ऐसे पर्वों के पारंपरिक स्वरूप बचाए जा सकते हैं, और इसके लिए सार्थक कोशिश की जानी भी चाहिए। प्रकृति, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को समर्पित इस सुंदर पर्व की शुभकामनाएँ...

Tuesday, November 5, 2013

लाल क़िले से लाल ग्रह तक:


पिछले वर्ष जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मिशन मार्स की घोषणा की थी तो यह उम्मीद  काफी कम लोगों को ही महसूस हुई होगी कि इतने कम समय में ही हमारे यान द्वारा इस यात्रा के लिए काउंटडाउन शुरू हो जाएगा। लालफ़ीताशाही और कार्यों की धीमी रफ्तार की जैसी छवि हमारी बन गई है, उसमें ऐसा स्वाभाविक भी था। कई लोग इसे चुनावी शोशा कह सकते हैं, कई लोगों की नजर में यह संसाधनों का अपव्यय है। ऐसी आलोचनाओं के स्वर अन्य विकसित देशों में भी उठते रहे हैं। मगर सौभाग्य से सारे विश्व के ही अंतरिक्षविज्ञानी इस ऊहापोह और विचार मंथन से परे रहे हैं। इसरो देश के उन चंद संस्थानों में से है जो तमाम आलोचना और सराहनाओं से परे अपने लक्ष्य पर एक कर्मयोगी की तरह केंद्रित है। इसके कई अभियान अतिशय सफल हुये हैं तो कुछ सीधे शब्दों में पानी में समा गए हैं। मगर इसके प्रयासों पर से हमारा भरोसा डिगा नहीं कभी। और शायद इसी ने इसे आगे और बेहतर करने की प्रेरणा भी दी।
औद्द्योगिक क्रांति में हम पहले ही पिछड़ चुके थे। सूचना क्रांति में तमाम अनुभवी और दूरदर्शी लोगों की मान्यताओं को नकार हमारे तत्कालीन अपरिपक्व नेतृत्व ने समय रहते सार्थक पहल की जिसके नतीजे आईटी के क्षेत्र में थोड़ी साख के रूप में हमारे सामने है। भविष्य के अंतरिक्ष युग में भी समय रहते हमारी भागीदारी जरूरी है। चंद्रमा से जुड़े अभियानों में भी हम पीछे रहे, इस कारण मिशन चंद्रयान से हमारी जिम्मेवारी बड़ी थी। क्योंकि अबतक हुई खोजों और मिली जानकारी से आगे कुछ ढूँढ पाने की चुनौती थी। पानी की संभावना से जुड़ी खोज ने हमारे अभियान को नए मायने दिये। ऐसे अभियानों की यही जिम्मेवारी होती है। मिशन मार्स से भी यही जिम्मेवारी जुड़ी है। 60 के दशक से ही मंगल को लेकर अभियान चलते रहे हैं। कुछ असफलताओं के बाद अमेरिका, रूस और कुछ यूरोपीय अभियानों को खासी सफलता मिली है। हमारे सामने चुनौती इस मायने में भी बड़ी है कि एशिया से जापान और चीन के मंगल अभियानों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। यह मात्र एशिया से कोई अंतरिक्ष होड़ नहीं है। अंतरिक्ष की विपुल संभावनाओं के मद्देनजर यह भागीदारी समय की आवश्यकता है। हमारे अंटार्कटिका अभियानों की तरह ही। यदि यहाँ मीथेन की उपस्थिति से जुड़े कुछ पुख्ता प्रमाण मिले तो यह वहाँ जीवन की संभावना को लेकर बड़ी उपलब्धि होगी। धरती की बढ़ती माँग के मद्देनजर अंतरिक्ष में खनन, कृषि और आगे के अभियानों के लिए स्टेशन बनाए जाने की संभावनाओं के मद्देनजर भी ये अभियान आवश्यक हैं। 
यहाँ मेरी यह बात शायद किसी को ठेस पहुँचा सकती है, मगर मैंने पाया है कि कई उत्तर भारतीय वैज्ञानिकों को यह मलाल है कि अरबों रुपये पानी में डुबो देने पर भी इसरो पर सरकार इतनी मेहरबान क्यों है ! मेरे ख्याल से इसके लिए उन्हे अपनी मानसिकता, सोच और कार्यशैली पर भी विचार करने की जरूरत है।

बहरहाल, इस मंगल अभियान के लिए अपने वैज्ञानिकों और इस अभियान से जुड़े हर व्यक्ति को इसकी सफलता के लिए मंगलकामना.....  

Monday, November 4, 2013

पुनरप्रतिष्ठा की बाट जोहती विरासत- नारानाग मंदिर समूह, कश्मीर

नारानाग मंदिर के भग्नावशेष
 
कश्मीर की एक समृद्ध ऐतिहासिक परंपरा रही है। भौगोलिक-ऐतिहासिक कारणों से यहाँ सभ्यता की विभिन्नता  स्पष्ट दिखती है। यहाँ पाये जाने वाले प्राचीनतम आर्य परंपरा के कई अवशेष आज भी इसके भव्य अतीत की झलक उपस्थित करवाते हैं। इन्ही में से एक है कश्मीर घाटी स्थित नारानाग के प्राचीन मंदिर समूह के अवशेष। श्रीनगर-सोनमर्ग  मार्ग से गुजरते पर्यटकों को शायद ही यह एहसास होगा कि अंजाने में वो मार्ग में पड़ने वाली एक प्राचीन विरासत से अनभिज्ञ गुजरते जा रहे हैं। इसी मार्ग पर श्रीनगर से लगभग 50 किमी दूरी पर स्थित गांदरबल जिले में कंगन के क्षेत्र के अंतर्गत आता है गाँव - नारानाग। वाँगथ नदी के किनारे बसा यह गाँव अपनी प्राकृतिक सुंदरता से तो समृद्ध है ही, इसकी अपनी ही एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत भी है। यह गाँव प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा जो हरमुख (या हरिमुख !) पर्वत तक संपन्न होती है का भी प्रारंभ स्थल है। यह पीर पंजाल श्रेणी के कई ट्रेकिंग स्थलों के भी कई प्रमुख बिंदुओं जैसे गदसर झील, विशंसर झील, कृष्णसर झील आदि का प्रारंभिक पड़ाव भी है । ट्रेकरों के लिए यहाँ ग्रामीण कई जरूरी सुविधाएँ भी उपलब्ध करवाते हैं।
खंडहर बताते हैं कि ईमारत बुलंद थी कि उक्ति को चरितार्थ करता यह मंदिर समूह इसी गाँव में स्थित है। आर्कियोलौजी विभाग के अनुसार इस गाँव का प्राचीन नाम सोदरतीर्थ था, जो तत्कालीन तीर्थयात्रा स्थलों में एक प्रमुख नाम था।  यहाँ स्थित मंदिर समूह दो भागों में बंटा है। दोनों भाग भगवान शिव की प्रतिमा को समर्पित माने गए हैं। किन्तु एक में भगवान शिव और दूसरे में भगवान भैरव की प्रतिमा की बात भी कही जाती है। प्रथम भाग में तो किसी कारणवश हाल ही में द्वार लगा बंद किया गया है, मगर दूसरे भाग में मुख्य मंदिर जो प्रतिमाविहीन है के बाईं ओर पाषाण पर तराशकर ही बनाया हुआ एक शिवलिंग अभी भी विद्यमान है।
 
शिवलिंग के निकट मेरा पुत्र शिवांश
शेष मंदिर समूह ध्वस्त हैं, किन्तु आस-पास बिखरे अवशेष ही इसके भव्य और गौरवमय अतीत की कहानी बता देते हैं। मंदिर के सामने पाषाण निर्मित ही जलसंचय पात्र है जो संभवतः धार्मिक प्रयोजन में प्रयुक्त होता रहा हो। मंदिर पर चढ़ाए जल की निकासी के लिए नालियों की बनावट भी स्पष्ट दिखती है। मंदिर के उत्तर पश्चिम भाग में एक प्राचीन कुंड भी निर्मित है। पाषाणों से बनाई इसकी चारदीवारी पर कभी कई कलाकृतियों से भी सुसज्जित रही होगी, जिसकी थोड़ी झलक आज भी मिलती है। पहाड़ों के अंदर स्थित जल को इस कुंड तक लाने और अवशिष्ट जल को समीपवर्ती नदी तक ले जाने के लिए नालियों जैसी व्यवस्था उस प्राचीन इंजीनियरिंग की बस एक छोटी सी झलक मात्र है। विशाल ग्रेनाइट पत्थरों को बिना सिमेंटिंग अवयव के जोड़ ऐसी संरचनाएँ स्थापित करना पर्यटकों को आज भी अचंभित करता है। समझा जाता है कि इस मंदिर समूह का निर्माण 7-8 वीं शताब्दी में राजा ललितदित्य के राजकाल में किया गया। कलांतर में विदेशी आक्रमण और शासकों में से कई की घृणा और उपेक्षा का शिकार इस समृद्ध विरासत को भी बनना पड़ा। फिलहाल उपेक्षित  सी इस विरासत को अतिक्रमण से बचाने के लिए सरकार द्वारा इसकी घेरेबंदी के कुछ तात्कालिक प्रयास किए गए हैं और लगभग 2 दशकों से पटरी से उतरे पर्यटन को इन स्थलों के माध्यम से दुरुस्त किए जाने की योजना की भी चर्चा है।

प्राचीन कुंड जिसमें पानी के आगमन और निकास की तकनीक अप्रतीम है
हाल में भी कई जगह सांस्कृतिक विरासतों को घृणा का शिकार बनते देखा गया है। यह समझा जाना चाहिए कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत किसी एक मज़हब के नहीं होते। वो हमारा वैश्विक साझा इतिहास हैं और हमारे भविष्य के एक आधार भी। उनका संरक्षण और सम्मान हमारे लिए अपरिहार्य होना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि इन स्थलों को विरासत सूची में शामिल करवा इन्हे इनका वाजिब सम्मान सुनिश्चित करवाने की ओर गंभीर प्रयास करे।
 
 
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