Saturday, August 27, 2022
हमारे इतिहास की एक दर्द भरी धरोहर - ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’
Tuesday, May 10, 2022
1857 की क्रांति के बलिदानियों की स्मृति की धरोहर अजनाला का कालियांवाला खू
आज 10 मई है। 10 मई 1857 ही वो तारीख थी जब वर्षों से जहां-तहां उभरती-दबती असंतोष की अग्नि को एक चिंगारी ने भड़का दिया था और इसने आज़ादी के लिए पहले ठोस कदम का रूप लिया जिसके बाद से इस देश की पूरी व्यवस्था बादल गई। कठोर दमन चक्र चला मगर यहां से स्वतन्त्रता की जो चेतना जागृत हुई उसके आगे ब्रिटिश साम्राज्यवाद अगले 100 साल तक भी इस देश में न टिक सका।
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| अजनाला स्थित कुंआ और उससे मिले शहीदों के अवशेष |
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| ब्रिटिश कमिश्नर फेडरिक हेनरी कूपर |
Sunday, May 8, 2022
गूगल_डूडल, Mothers Day और "मातृ प्रकृति" एक कानूनी इकाई के रूप में "जीवित प्राणी"
सर्च इंजन गूगल ने आज, 8 मई 2022 को अपना डूडल 'मदर्स डे' को समर्पित किया है। हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है।
गूगल ने डूडल के जरिए माँ-बच्चे के खास रिश्ते और बच्चों के विकास में मां की भूमिका को दर्शाते हुए मातृत्व का उत्सव मनाया है। गूगल ने मदर्स डे 2022 पर चार स्लाइड्स के साथ एक विशेष Gif Doodle जारी किया है।
डूडल में एक बच्चे और मां के हाथों के चार चित्र दिखाए गए हैं। पहली स्लाइड में, बच्चे को मां की उंगली पकड़े हुए दिखाया गया है, दूसरी स्लाइड में दिखाया गया है कि उन्हें ब्रेल से परिचित कराया जा रहा, तीसरी स्लाइड में उन्हें एक नल के नीचे हाथ धोते हुए दिखाया गया है, जो अच्छी आदतों को सीखाने का प्रतीक है और आखिरी में मां और बच्चे को पौधे लगाते हुए दिखाया गया है।
मदर्स डे मनाने की शुरुआत एना जार्विस नाम की एक अमेरिकी महिला ने की थी। माना जाता है कि एना अपनी मां को आदर्श मानती थीं और उनसे बहुत प्यार करती थीं। जब एना की मां की निधन हुआ तो उन्होंने उनके सम्मान में स्मारक बनवाया और मदर्स डे की शुरुआत की। उन समय इस खास दिन को मदरिंग संडे कहा जाता था।
एना के इस कदम के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने औपचारिक तौर पर 9 मई 1914 से मदर्स डे मनाने की शुरुआत की। इस खास दिन के लिए अमेरिकी संसद में कानून पास किया गया। जिसके बाद से मई महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाने लगा।
आज यह भी जिक्र करना उल्लेखनीय होगा कि प्रकृति जो भी माँ का ही रूप है के संदर्भ में मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए इसे भी एक जीवित प्राणी के रूप में घोषित किया। मीडिया में उपलब्ध टिप्पणी के अनुसार- '... "मातृ प्रकृति" को एक कानूनी इकाई / कानूनी व्यक्ति / न्यायिक व्यक्ति/ नैतिक व्यक्ति / कृत्रिम व्यक्ति के रूप में "जीवित प्राणी" के रूप में घोषित किया, जिसे सभी संबंधित अधिकारों, कर्तव्यों और देनदारियों के साथ कानूनी व्यक्ति का दर्जा प्राप्त हो, ताकि उसे संरक्षित किया जा सके।
मदुरै पीठ की न्यायमूर्ति एस. श्रीमती ने यह भी कहा कि प्रकृति के पास अपनी स्थिति बनाए रखने और अपने स्वास्थ्य और भलाई को बढ़ावा देने के लिए अपने अस्तित्व, सुरक्षा और जीविका, और पुनरुत्थान के लिए मौलिक अधिकार / कानूनी अधिकार और संवैधानिक अधिकार होंगे। कोर्ट ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार को धरती मां की रक्षा के लिए हर संभव तरीके से उचित कदम उठाने का भी निर्देश दिया।
"पिछली पीढ़ियों ने 'पृथ्वी माता' को इसकी प्राचीन महिमा में हमें सौंप दिया है और हम नैतिक रूप से उसी धरती माता को अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए बाध्य हैं। यह सही समय है कि "माँ प्रकृति" को न्यायिक दर्जा घोषित / प्रदान किया जाए।" इसलिए यह कोर्ट "माता-पिता के अधिकार क्षेत्र" को लागू करके एतद्द्वारा "मातृ प्रकृति" को "जीवित प्राणी" के रूप में घोषित कर रहा है, जिसे कानूनी इकाई /कानूनी व्यक्ति / न्यायिक व्यक्ति / न्यायिक व्यक्ति / नैतिक व्यक्ति / कृत्रिम व्यक्ति के रूप में एक कानूनी व्यक्ति का दर्जा प्राप्त है, जिसे सभी संबंधित अधिकारों, कर्तव्यों और देनदारियों के साथ कानूनी व्यक्ति का दर्जा प्राप्त होगा, ताकि उसे संरक्षित किया जा सके।"
Friday, April 8, 2022
गाईड: अब तक 56...
इस अप्रैल माह 1966 में प्रदर्शित हिंदुस्तानी सिनेमा की कालजयी फ़िल्म 'गाईड' अपने 56 साल पूरे कर रही है। देव आनंद की फिल्में समय से आगे तो कही ही जाती हैं, यह फ़िल्म और इसकी कहानी और मूल उपन्यास आज भी अपने इस गुण के कारण प्रासंगिक है।
शायद ऑस्कर को ध्यान में रखते फ़िल्म का अंग्रेजी संस्करण एक साल पहले यानी 6 फरवरी 1965 को अमेरिका में प्रदर्शित कर दिया गया। हिंदुस्तानी दर्शकों की संवेदना को ध्यान में रखते मूल कहानी में कुछ संशोधनों के साथ हिंदी संस्करण तैयार किया गया, जिससे उपन्यासकार आर के नारायण सहमत नहीं थे, फिर भी फिल्फेयर के लिए सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार उन्हें ही मिला।
अंग्रेजी साहित्य में गहरी दिलचस्पी रखने वाले देव साहब को जब किसी ने आर के नारायण की इस किताब के बारे में बताया वो बर्लिन फिल्म फेस्टिवल आए थे 'हमदोनों' को लेकर। वहां से लंदन आ उन्होंने ‘द गाइड’ की तलाश शुरू की। बुकस्टोर के मालिक ने कहा कि किताब अभी उपलब्ध नहीं है लेकिन उनके लिए वह इसे भारत से 24 घंटे के अंदर मंगवा देगा। जैसे ही उन्हें यह किताब मिली, उन्होंने एक बार में ही इसे पूरा पढ़ डाला। और इसके बाद प्रोड्यूसर, निर्देशक से लेकर मूल उपन्यासकार से मिलने का सिलसिला शुरू हुआ।
India's entry for the OSCAR 'The Guide', written by Pearl S Buck and directed by Tad Danielewski
हिंदी संस्करण में भी फ़िल्म के बनते कई कहानियां जुड़ीं। चेतन आनंद से राज खोसला होते विजय आनंद निर्देशक बने और अपनी मास्टर पीस रची। हसरत जयपुरी के फ़िल्म छोड़ने पर शैलेंद्र ने गीत लिखे, परंतु उन्हें सम्मान देते 'दिन ढ़ल जाये...' का मुखड़ा बरकरार रखते हुए पूरा गीत लिखा।
विवाहेत्तर प्रेम संबंध जिसमें नायिका पीड़िता नहीं बल्कि अपनी मर्जी से प्रेम का चयन करती है की कहानी उस दौर में ही नहीं आज भी सहज ग्राह्य नहीं है। मगर यह फ़िल्म आम हिंदी फिल्मों की तरह किसी को देवी या देवता या खलनायक न बनाते हुए एक इंसान के तौर पर परिस्थितियों के अनुरूप उनके व्यवहार को दर्शाती है, जो कहानी के तौर पर एक अलग हट कर किया गया प्रयोग है।
टूरिस्ट गाईड से अपने खुद के गाईड बनने का सफ़र तय करती एक युवा पर आधारित यह फ़िल्म आज भी देखे जाने की योग्यता रखती है और हर अगली पीढ़ी को देखनी ही चाहिए...
Tuesday, March 1, 2022
महाशिवरात्रि, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य
आज महाशिवरात्रि है और साथ ही है Self-Injury Awareness Day (आत्म-चोट जागरूकता दिवस, SIAD ) तथा Zero Discrimination Day (शून्य भेदभाव दिवस) भी।
शिव बड़े अद्भुत और प्रेरक व्यक्तित्व हैं। तमाम दुरूह और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद स्वंय को शांत रख विश्व कल्याण की उनकी भावना अतुलनीय है। विश्व के कल्याण के लिए वह विषपान कर लेते हैं तो व्यक्तिगत पीड़ा से विश्व पर संभावित आपदा को ध्यान में रखते उसे अपने अंदर जज्ब भी कर लेते हैं। हर परिस्थिति में मानसिक शांति की उनकी क्षमता अप्रतिम है।
किसी भी प्रकार का भेदभाव हो या जीवन में मिले ऐसे अनुभव जो खुद को शारीरिक-मानसिक दर्द पंहुचना भी स्वीकार करने की स्थिति में ले जाते हैं से उबरने में आत्मकेंद्रित हो खुद को समझने, सहेजने के प्रयास महत्वपूर्ण हैं। इस प्रक्रिया में ध्यान भी काफी सहायक हो सकता है। डिप्रेशन आदि के लिए जब आप दवा का उपयोग ले रहे होते हैं तो साथ-साथ योग, प्राणायाम, ध्यान आदि जैसी परम्परा का प्रयोग भी किया जाता रह सकता है। तमाम सुख-सुविधा रहते भी मानसिक अशांति आज एक बड़ी वैश्विक समस्या है और विभिन्न परिस्थितियां इसे और बढ़ाती ही जा रही हैं।
इन प्रक्रियाओं के यूँ तो कई माध्यम हैं, आप अपनी पसंद, सुविधा के अनुसार किसी को भी चुन सकते हैं। एक बार राह मिल गई तो आगे आप ख़ुद भी बढ़ते जा सकते हैं।
मुझे जब ऐसी किसी राह की तलाश थी मुझे 'आर्ट ऑफ लिविंग' की 'सुदर्शन क्रिया' की जानकारी मिली और मैंने इसे अपनाया। हिमाचल में रहते कोरोना के प्रारंभिक दौर की बिल्कुल नई परिस्थितियों में पहले से ही विचलित मेरी मनःस्थिति से उबरने में इस प्रक्रिया का काफी सहारा मिला। आस पास की परिस्थितियों और अपनी कमियों-कमजोरियों ने साल भर जितने विष धीमे-धीमे मन-मस्तिष्क में भरे उससे उबरने की राह तलाशते फिर एक राह इसी के अगले चरण के कैंप में ऋषिकेश लेती गई।
अपने अनुभव के आधार पर मैं तो कहूंगा कि आप जो अपनी मनःस्थिति से ख़ुद बेहतर वाकिफ़ हैं यदि जरूरी समझें तो अपनी सुविधानुसार ऐसे किसी विकल्प को अवश्य आजमाएं।
आजकल ऑनलाइन होने के कारण कहीं से किसी भी कोर्स को करने की भी सुविधा है।
ऐसा ही एक ऑनलाइन कोर्स 3-6 मार्च, 2022 से आरंभ हो रहा है। ज्यादा जानकारी के लिए इसका विवरण भी दे रहा हूँ। इच्छुक व्यक्ति स्वंय संपर्क कर सकते हैं।
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Sunday, February 6, 2022
स्वर कोकिला का मौन हो जाना...
हमारे देश की पहचान जिन चंद नामों से है उनमें से एक को आज हमने खो दिया। इसी साल जनवरी महीने की शुरुआत में कोविड संक्रमित होने के बाद मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने आज रविवार सुबह 8 बजकर 12 मिनट पर 92 साल की उम्र में अंतिम साँस ली। इस देश के आम आदमी के जीवन का शायद ही कोई दिन होगा जिस दिन उसके कानों में लता जी के किसी गीत की आवाज न जाती हो। मेरे जैसे रात को सोते सुबह उठते ही विविध भारतीऔर पुराने गाने सुनने वाले व्यक्तियों को अगली सुबह यह याद दिलायेगी कि यह आवाज अब सशरीर हमारे बीच मौजूद नहीं है। भारत के रत्नों में आज एक और रत्न कम हो गया।
इस देश में बहुत कम ऐसे अवसर आते हैं जब हर इंसान के मन में एक ही भाव हों। आज भी फेसबुक टाइमलाइन या व्हाट्सएप स्टेटस यही दर्शा रहे हैं।
सोशल मीडिया की हालिया परंपरा में धारा के अलग बोल कर अपनी अलग पहचान दिखाने के इच्छुक कुछ लोग भी दिखेंगे, मगर लता जी अब इन सब से बहुत दूर निकल चुकी हैं।
उनके साथ हिंदी फिल्म संगीत के सुमधुर इतिहास का एक बड़ा हिस्सा भी चला गया है। पीछे छोड़ गई हैं असंख्य गीत जो संगीत प्रिय आम आदमी के विभिन्न मनोभावों में उसके दिल में उमड़ते रहेंगे।
| माता सरस्वती की विदाई के दिन ही स्वर साम्राज्ञी की भी विदाई |
उन्होंने ख़ुद भी कभी शास्त्रीय संगीत में संभावित भूमिका में कमी पर अफसोस ज़ाहिर किया था। काश हिंदी फ़िल्म संगीत के अलावा भी अन्य विधायें अपने बीच उनकी उपस्थिति का और लाभ उठा पातीं...
उन्हें याद करते गीतकार आनंद बख्शी जी की एक कविता जो उन्होंने 1973 में लिखी थी लेकिन उन्होंने लता जी को ये कविता 2001 में भेंट की, जब उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा गया था।
ये गुलशन में बाद-ए-सबा गा रही है
के पर्वत पे काली घटा गा रही है
ये झरनों ने पैदा किया है तरन्नुम
कि नदियां कोई गीत सा गा रही हैं
ये माहिवाल को याद करती है सोहनी
कि मीरा भजन श्याम का गा रही हैं
मुझे जानें क्या क्या गुमां हो रहे हैं
नहीं और कोई लता गा रही हैं
यूं ही काश गाती रहें ये हमेशा
दुआ आज खुद ये दुआ गा रही है
लता को पसंद करने वाले देश, धर्म, भाषा आदि की सीमाओं से भी परे थे। शायर हबीब जालिब ने भी एक नज़्म लता जी के लिए लिखी थी। उन्हें श्रद्धांजलि देते इस नज़्म के माध्यम से भी याद करते हैं...
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रेन हमारे
तेरी अगर आवाज़ न होती
बुझ जाती जीवन की जोती
तेरे सच्चे सुर हैं ऐसे
जैसे सूरज चांद सितारे
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रेन हमारे
क्या क्या तू ने गीत हैं गाये
सुर जब लागे मन झुक जाए
तुझ को सुन कर जी उठते हैं
हम जैसे दुख-दर्द के मारे
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रेन हमारे
'मीरा' तुझ में आन बसी है
अंग वही है रंग वही है
जग में तेरे दास हैं इतने
जितने हैं आकाश पे तारे
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रेन हमारे

















