Friday, August 29, 2014

गणेश चतुर्थी या ढेलहिया चौथ



आज गणेश चतुर्थी है। और संजोग ऐसा कि हर पर्व-त्यौहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले चांद को आज देखना भी वर्जित है। कहते है इससे कलंक लगता है। जब इस भूल के कारन स्वयं श्रीकृष्ण पर चोरी का आरोप लग गया तो आमजनों की क्या बिसात है !
प्रचलित कथा के अनुसार एक बार गणेश जी अपने जन्मदिन के अवसर पर अपने एक प्रिय भक्त के यहाँ भोजन के आमंत्रण पर गए। वहाँ उन्होंने भरपेट भोजन किया और अपने आराधकों को सुख-प्राप्ति के भरपूर आशीर्वाद दिए। इसके बाद वे अपनी सवारी चूहे के ऊपर चढकर शिवलोक की तरफ चल दिये कि तभी एक साँप ने उनका रास्ता काट दिया। चूहे तो साँप के प्रिय भोजन होते हैं। वैसे जिसके ऊपर श्री गणेश जी का आशीर्वाद हो उसे डरने की क्या जरूरत, परन्तु गणेश जी का सवारी भी था तो एक चूहा ही। वह साँप से बहुत डर गया और भाग खड़ा हुआ। गणेश जी लड़खड़ा कर गिर पड़े। रात का समय था और आसमान में चतुर्थी का चाँद चमचमा रहा था। यह दृश्य देखकर चाँद से रहा ना गया और जोर-जोर से ठहाके मारकर हँस पड़ा। यह देखकर गणेश जी के गुस्से का ठिकाना ना रहा। साँप को सबक सिखाने के बाद गणेश जी मखौल उड़ाते चाँद की तरफ दौड़ पड़े। गुस्से से लाल गणेश जी को देखकर चाँद भाग खड़ा हुआ और डरकर अपने महल में छिप गया।

रात्री का समय था। चाँद के छिप जाने के कारण चारों तरफ अँधेरा छा गया। पृथ्वी पर लोग परेशान हो गए। सभी देवों ने गणेश जी से धरती पर शांती लाने की प्रार्थना की और यह आग्रह किया कि चँद्रमा को क्षमा कर दें। अंततः गणेश जी पिघल गए और चाँद को अपने क्रोध से मुक्त किया। पर जाते-जाते उसे एक शाप भी दे गए। चूँकि चाँद एक चोर की तरह अपने महल में छुप गया था, जैसे उसने कोई अपराध किया हो। इसीलिए अगर कोई गणेश जी के जन्मदिन पर चाँद का दर्शन करेगा, तो वह भी चोर कहलाएगा। यही कारण है कि आज भी लोग गणेश चतुर्थी के अवसर पर चाँद की तरफ नहीं झाँकते।

चंद्र दर्शन दोष से बचाव  :--

प्रत्येक शुक्ल पक्ष चतुर्थी को चन्द्रदर्शन के पश्चात्‌ व्रती को आहार लेने का निर्देश है, इसके पूर्व नहीं। किंतु भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है। यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाए तो निम्न मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए-
'सिहः प्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः।   
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः॥'
इस दिन चन्द्रमा देख लेने पर उसके दोष के शमन हेतु श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के 57वेंअध्याय को पढें। जिसमें स्यमन्तकमणि के हरण का प्रसंग हैं।
मैथिल कवि विद्यापति ने भी इस विडंबना को सुन्दर अभिव्यक्ति दी है-
"कि हम सांझ क एकसर तारा, कि भादव चौथि क ससि।
इथि दुहु माँझ कवोन मोर आनन, जे पहु हेरसि न हँसि।।"
राधा कृष्ण की उपेक्षा से दुखी हैं। कहती हैं- क्या मैं शाम का एकाकी तारा हूँ (यह तारा उदासी का प्रतीक माना जाता है) या भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का चाँद? इन दोनों में मेरा मुँह किस तरह का है? न प्रभु मुझे देख रहे हैं न मुझ पर हँस ही रहे हैं?
शास्त्रों और कवियों की बातें अपनी जगह आप चाहें तो इस अवसर से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी बाँट सकते हैं...

Wednesday, July 23, 2014

ऑल इंडिया रेडियो की वर्षगांठ पर कुछ यादें...




आज  ‘औल इंडिया रेडियो’ की 87 वीं सालगिरह है। 23 जुलाई 1927 को ही मुंबई में रेडियो प्रसारण की शुरुआत हुई थी। टीवी की धमक से रेडियो आज चाहे घर के एक कोने में सिमट गया हो, मगर एक समय में स्टेटस सिंबल से आगे बढ़ता हुआ आम आदमी के लिए सूचना और मनोरंजन का यह सबसे प्रभावशाली माध्यम था। सुबह की शुरुआत इस पर आने वाले भजनों के साथ तो रात में उद्घोषक की विदा के साथ सोने की भी तैयारी। निशाचर विद्यार्थियों के अलावे भी  जो अन्य शामिल हों उनका साथ रात भर भी बखूबी देता था रेडियो। और इसकी सबसे बड़ी बात ये कि इसमें हमेशा आँखें गड़ाए रखने की जरूरत भी नहीं, कमरे के एक कोने या सामने रखी मेज पर अनवरत चलने वाला यह रेडियो अकेलेपन का एहसास भी नहीं होने देता था। इसका होना मानो साथ में हरदम एक मित्र की उपस्थिति से कम नहीं था, जिसके साथ जानकारी और मनोरंजन दोनों के ही लम्हे बिताए जा सकते थे। बचपन में कइयों की स्मृति में बसा होगा माँ का रेडियो से किसी खास व्यंजन की विधि नोट करना तो कभी लोकगीत को जल्दी-जल्दी अपनी डायरी में उकेरना। सुबह समाचारों के वक्त आस-पास के एक-दो और चाचाओं-मामाओं का आ जुटना। और ताज्जुब ये कि रेडियो के 15 मिनट के संक्षिप्त और संश्लिष्ट ख़बरों का मुक़ाबला आज के 24X7 खबरिया चैनल भी नहीं कर पाते। कई इतिहास रचती ख़बरों, ऐतिहासिक कमेंट्रीयों और भूले-बिसरे गानों की स्मृतियाँ आज भी कइयों के जेहन में यूँ ही जीवंत हैं।

रेडियो की प्रासंगिकता आज भी ख़त्म नहीं हुई है। समय के साथ स्वरूप में थोड़े परिवर्तन जरूर आए हों, मगर विविध भारती जैसी मनोरंजन सेवा की लोकप्रियता, कई नए एफ़एम स्टेशनों की होड़ इसकी उपयोगिता की स्वीकृति को ही दर्शाते हैं। आधुनिक गाड़ियों आदि में भी एफ़एम इंस्टाल करवा लोग सफर के साथ न सिर्फ जानकारी और मनोरंजन  के इस माध्यम से जुड़े हुये हैं, बल्कि इसने तो यातायात, मौसम सहित आवश्यकतानुसार लाइफ़लाइन आदि की सुविधाएँ उपलब्ध करवा कई परेशानियों और आपदाओं आदि का सामना करने में भी कारगर मदद पहुँचाई है।

इस प्रभावशाली माध्यम से जुड़े लोगों को शुभकामना के साथ आशा है सूचना के इस दौर में विभिन्न प्रसार माध्यमों के साथ रेडियो भी कदम-से-कदम मिलकर आगे बढ़ता रहे हम सभी की जिंदगी को छूते हुये और इस व्यस्ततम जिंदगी को सुकून देने वाली कुछ पुरानी यादों को ताजा करते हुये... 

Friday, June 20, 2014

धर्म का मूल स्वरूप

विश्व में घटित हो रही कई घटनाओं को देख जो सोच उभरी उसे बाँटने का प्रयास है ये। थोड़ा लंबा तो हो गया है मगर यह आत्मसंतुष्टि के लिए जरूरी था। जो पढ़ सकें अपनी राय भी दे सकते हैं।

अक्सर सभ्यताओं के संघर्ष की बात कही जाती है- आजकल तो कुछ ज्यादा ही ज़ोर-शोर से। मगर क्या यह कोई नई बात है ? अलग-अलग विचारधाराओं के लोग जब साथ रहते हैं तो उसकी सर्वस्वीकार्यता के लिए संघर्ष होता ही है। इसे समझने के लिए बाहर कहीं देखने की खास जरूरत नहीं। और उनके जिक्र की भी उतनी जरूरत नहीं जहाँ संवाद की संभावना कम ही है। मगर समाधान है तो संवाद में ही और गनीमत है कि इस देश में तर्क और शास्त्रार्थ जैसे माध्यमों से संवाद की समृद्ध परंपरा रही है। कब तक रहेगी वो अलग विषय है। भारत तो विश्व गुरु रहा ही है और सभ्यता के प्रारंभिक दौर से ही कई मायनों में विश्व को दिशा दिखाता रहा है। ऐसे में यदि भारत को ही समझ लें तो काफी कुछ समझ सकते हैं। इसलिए अभी सिर्फ अपनी ही बात।
आज अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं (यदि अलग हैं) के एक-दूसरे पर हावी होने की बात होती रहती है। क्या ये नई बात है, क्या ये स्थायी है ? नहीं। भारत में सदा से ही कई धाराएं बहती रही हैं। कभी एक धारा ज्यादा प्रभावी होकर दूसरों पर हावी होने की कोशिश करती है मगर सभी का अपना अस्तित्व बना ही रहता है, अपने वक्त की प्रतीक्षा में। जैन धर्मावलंबी मानते हैं कि सनातन धर्म के प्रतिनिधि राम के काल में भी राजा जनक जो विदेह भी कहलाते थे जैन मान्यता के प्रतिनिधि थे। वो श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम को भी अपनी प्राचीन परंपरा से जोड़ते हैं। कहने का आशय यह कि अपनी जमीन तलाशने की यह प्रक्रिया काफी दूर तक जाती है, और जब समय आता है हिंदु धर्म पर न सिर्फ हावी होती है बल्कि आवश्यकतानुसार बौद्ध धर्म से टकराती भी है। इसी प्रकार बौद्ध धर्म भी अपनी जातक कथाओं से हिंदु मान्यताओं में अपनी जगह तलाशने का प्रयास करता हुआ इस देश का राजधर्म भी बन जाता है। इसी के साथ शैव, वैष्णव और न जाने अन्य कितनी धाराएं समय के साथ ऊपर-नीचे होती रहीं। इनके मध्य भी कई तरह के संबंध बने, कई बार काफी हिंसक भी। मगर वह दौर भी आया जब इनमें एकात्मकता की जरूरत समझी गई। शिव ने राम को अपना पूज्य बताया तो राम ने भी समुद्र पार करने से पूर्व शिव की पुजा की। और इन रूपकों से इनके भक्तों में भी एकता बढ़ी। आज यह अलग कर पाना कठिन है कि कौन किस संप्रदाय का उपासक है। एक ही घर में पिता विष्णु की पुजा कर रहे हैं तो माँ शिव की। मातृ शक्ति की पुजा भी अब सर्वस्वीकार्य है। निःसंदेह इस एकात्मकता के पीछे हिंदु धर्म को आंतरिक रूप से ही बौद्ध-जैन धर्मों आदि से मिल रही चुनौतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। विदेशी आक्रमणों के दौर में इन धाराओं को भी जोड़ने की जरूरत महसूस की गई और शंकराचार्य आदि विचारकों के नेतृत्व में इनके धार्मिक एकीकरण के जो प्रमुख प्रयास हुये उनके नतीजों में एक यह भी था कि बौद्ध धर्म के प्रवर्तक बुद्ध, भगवान विष्णु के दसवें अवतार के रूप में स्वीकार लिए गए। यह सारी प्रक्रिया काफी शांति और सौहाद्र के साथ संपन्न हुई होगी ऐसा भी नहीं है। बोधि वृक्ष कट गया, शास्त्रार्थों में हारने वाले को आत्मदाह करना पड़ा तो समर्थकों के बीच हिंसा भी हुई ही होगी। मगर शांति की जरूरत को समझते हुये यह प्रक्रिया उसे पाने में सफल तो रही ही।
 
गांधी जी ने भी कहा सत्य ही ईश्वर है, और ईश्वर एक ही हैं; तो उसके नाम पर लड़ना कैसा ! जब हमारे यहाँ इतनी धाराओं और प्रतिनिधि चेहरों को एक सूत्र में सफलतापूर्वक जोड़ा जा सकता है तो क्या औरों के लिए यह इतना कठिन है ! मगर जरूरत तो पहले एकजुटता की जरूरत स्वीकार करने की है। अलग-अलग धर्म पहले खुद में यह प्रक्रिया संपन्न कर लें तो उसके बाद उनके बीच भी एकात्मकता लाने की कोशिश हो सकती है। आखिर ‘सत्यमेव जयते’ और सत्य तो एक ही है...

Thursday, February 27, 2014

शिव बारात: शिव जी के विराट व्यक्तित्व की झलक

त्रिमूर्ति, करोड़ों देवी-देवताओं और अवतारों की इस धरती पर राम, कृष्ण और
शिव का एक अलग ही स्थान रहा है. अपने ऐतिहासिक महापुरुषों, राजाओं के
बारे में हमारी स्मृतियाँ चाहे कितनी भी क्षीण हों इन प्रतीक पुरुषों को
इस देश की करोड़ों जनता पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी स्मृतियों में सहेजती आई है तो
इसके पीछे इनका व्यक्तित्व और वो आदर्श भी हैं जो इस देश की संस्कृति के
आधार हैं. आज अपने प्रतीकों के छिद्रान्वेषण का आधुनकितामय प्रचलन जरुर
बढ़ा है, इस बारे में फिर कभी; मगर आज इतना तो जरुर कि शिव इन अन्य
प्रतीकों से इस मामले में जरुर थोड़े ज्यादा सौभाग्यशाली माने जायेंगे कि
हम इंसानों ने अपनी तमाम बौद्धिकता के साथ भी इनके चरित्र में कोई ऐसी
विसंगति ढूँढने में सफलता नहीं पाई जितनी हम राम-कृष्ण आदि में ढूंढ अपने
प्रगतिशील होने का आत्मसुख तलाशते हैं ! अपने परिवार के साथ वैभव से अलग,
पर्वतों की चोटी पर विराजमान, संसार से अलग मगर जब सृष्टि को जरुरत पड़े
तो गंगा को बाँधने से लेकर गरल पीने को भी तत्पर और इस मंथन के परिणामों
से पूर्णतः अनासक्त भी ! शायद तभी जब हमारे प्राचीन ऋषियों को भारत को एक
सूत्र में पिरोने का विचार आया तो प्रतीक शिव को ही बनाया. कश्मीर से
कन्याकुमारी..., 12 ज्योतिर्लिंग और इसके बाद भी और स्पष्टता के लिए सती
से जुड़े 52 शक्तिपीठ भी. और अपने विवाह की बारात भी निकाली तो ऐसी जिसमें
कृत्रिमता, और रस्म अदायगी करने वाले भद्र बाराती ही नहीं बल्कि तमाम
भूत-प्रेत, पिशाच मानी जाने वाली नंग-धड़ंगों की टोली- जो जताती है कि
समाज के तमाम वंचित, पिछड़े तबकों को भी मस्ती के साथ लेकर चलने वाले हैं
शिव. यह काम और कोई अवतार करता नहीं दिख पाता. शिव ऐसा कर पाते हैं तो
शायद इसलिए कि वो भारत की मौलिक आत्मा हैं, मूल जीवनशैली -
जनजातीय/ट्राईबल शैली जो जीवन को आडंबर में नहीं बल्कि संपूर्णता में
जीना सिखाती है. इस नजरिये से शिव को देखें तो उनके विराट व्यक्तित्व के
कई राज समझ पाएंगे जो अन्य प्रतीक पुरुषों में नहीं दिखते... सभी को
सृष्टि के इस सबसे उल्लासमय उत्सव की बधाई.....

Monday, February 10, 2014

नर हो न निराश करो मन को...


वर्षों पहले जब बनारस में था तो कभी-कभी मौर्निंग वाक के चुनिन्दा दिनों में एक-आध चक्कर सामने ही रहे जिम का भी लगा लेता था. एक दिन किसी लड़के को देखा अपने दोस्तों से कह रहा था- "मेरी तो जिंदगी ही बर्बाद हो गई..." ऐसा वो अपनी कम हाईट को लेकर कह रहा था क्योंकि उसके दोस्तों की नजर में उसकी मेहनत को उसकी हाईट का साथ मिला होता तो शायद उसकी पर्सनाल्टी और भी बेहतर होती. इसे सुन वहीँ खड़े एक इंस्ट्रक्टर ने हस्तक्षेप कर अपना उदाहरण देते हुए कहा कि क्या उनकी खुद की जिंदगी बर्बाद है ! नौकरी है, परिवार है, स्पोर्ट्स में भी पार्टिसिपेट करते हैं, हाईट को लेकर रोते रहते तो क्या यहाँ पहुँच पाते ! उस लड़के ने समझा या नहीं पता नहीं, मगर हाल ही एक न्यूज पढ़ ये घटना फिर याद आ गई. नई दिल्ली के एक BPO कर्मी ने हाईट और सर के बाल कम होने के कारण डिप्रेशन में आकर ख़ुदकुशी कर ली. स्कूल के दिनों में ही उसने सुसाइड का निर्णय ले लिया था और 6 महीने पहले डेट भी तय कर ली थी. सुसाइड नोट में यह भी लिखा पाया गया कि एक युवती को वो प्यार भी करता था, मगर अपनी हीनता के कारण पीछे हट गया.
वास्तविकता में हममें से कोई भी परफेक्ट नहीं होता. शारीरिक रूप से भी हममें से कई लोगों को कुछ समस्याएं होती ही हैं. मगर कहते हैं न कि ईश्वर अगर हमसे कुछ छीन लेता है तो कुछ अतिरिक्त दे भी देता है. तो जरुरत है कि अपनी उस मजबूती को पहचानें और सफलता की ओर आगे बढ़ें. सफलता से बड़ा कोई
आभूषण, कोई पहचान होती भी नहीं जो कई कमजोरियों को छुपा देती है. कई प्रसिद्ध और हमारे आस-पास भी ऐसे सफल उदाहरणों की कोई कमी नहीं. मगर ऐसे व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने में परिवार और मित्रों को भी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए. अपनी कमजोरियों से हतोत्साहित या निराश होने के बजाये अपनी क्षमताओं को पहचान सकारात्मक सोच के साथ सफलता का प्रयास करना ही जिंदगी है- आखिर "नर हो न निराश करो मन को..."

Sunday, February 2, 2014

कश्मीर की विरासत और आर्कियोएस्त्रोनौमी

 
"सुबह जाना काम पर, शाम को घर आना;
सबसे बुरा है- मुर्दा शांति से भर जाना "
 
तो अपने जिन्दा होने को कन्फर्म करने और शांत, ठहरे पानी में थोड़ी हलचल
जगाने के लिए कभी-कभी ऐसे अभियानों पर निकल ही जाता हूँ. आज जा पहुंचा
कश्मीर के सोपोर के उस स्थान पर जहाँ Palaeolithic और Neolithic काल के
कुछ अवशेष अभी भी अपने वास्तविक मूल्यांकन की राह तकते खड़े हैं. इस रौक
आर्ट में मानव और पशु आकृतियों के साथ कुछ गोल घेरे भी दिख रहे हैं.
पीर-पंजाल श्रेणी के वोल्केनिक रौक्स में अंकित किये गए इन चित्रों को
आकृति अपनी रचना शैली के कारण पुरातत्वविद Upper Palaeolithic Age के मान
रहे हैं. Concentric गोले संभवतः इस क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रमुख
झीलों का निरूपण हो सकती हैं. एक स्थानीय लोककथा के अनुसार कश्मीर का
स्थल पहले झील में डूबा हुआ था, जिसमें एक राक्षस का राज था. देवताओं ने
उसके वध के लिए एक दर्रे के माध्यम से सारा पानी निकलवा दिया और फिर उस
राक्षस का वध किया गया. कुछ लोग यहाँ की झीलों को meteorite effect से
जोड़ कर देख रहे हैं. तो क्या पुरामानवों ने यहाँ कोई उल्किय घटना देखी थी
और जिसका निरूपण इस भित्ति चित्र पर किया गया है ! कई Archaeoastronomers
इस दिशा में भी विचार कर रहे हैं, मगर इस सन्दर्भ में अभी कई भू-गर्भिक
और भू-भौतिक अध्ययन की आवश्यकता है.
 
इस स्थल के निकट से ही एक काफी ऊँचा Mound भी मिला है जिसे पुरातात्विक
दृष्टि से Neolithic माना जा रहा है और यहाँ से अब भी कई Black & Red
potteries मिल रहे हैं. इस क्षेत्र में अध्ययन करते रहे पुरातत्वशाश्त्री
डॉ. मुमताज बताते हैं कि 70 के दशक तक इस क्षेत्र में पुरातत्त्व की
दृष्टि से काफी काम हुआ, मगर 80 के बाद से इस दिशा में किये जा रहे
प्रयासों में काफी कमी आई है. निश्चित रूप से प्राकइतिहास के दृष्टिकोण
से कश्मीर में नए सिरे से और समग्र अध्ययन की जरुरत है, ताकि इतिहास के
बिखरे कई सूत्रों को जोड़ा जा सके...

Friday, January 24, 2014

हिमाच्छादित कश्मीर


यूँ तो कश्मीर का सैलानी सीजन मार्च के बाद से ही माना जाता है, मगर लाखों पर्यटक यहाँ स्नोफौल देखने के लिए भी आते हैं. इस साल भी कश्मीर ने अपने इन चाहने वालों को निराश नहीं किया है. रुई के फाहों सी धीमे-धीमे होती हिमकणों की बारिश और देखते ही देखते पूरी वादी को अपने श्वेताभ आगोश में समेट लेना एक अलग सा ही अनुभव है, जिसे शब्दों में सहेज पाना सहज नहीं...

स्नोफौल के कई दौर गुजर चुके हैं और कई अभी आने को हैं. वादियाँ बर्फ की धवल चादर ओढ़ अपने प्रशंसकों के लिए बाहें फैलाये इंतजार कर रही हैं. हिमपात के दृष्टिकोण से स्थानीय लोगों द्वारा इस अवधि को 3 भागों में बांटा गया है. शुरूआती चालीस दिनों की अवधि जो दिसंबर के तीसरे सप्ताह से शुरू होती है ‘चिल्लई कलां’ कहलाती है. यह यहाँ सर्वाधिक हिमपात की अवधि होती है. इसके बाद 20 दिनों की ‘चिल्लई खुर्द’ की अवधि आती है और उसके बाद के 10 दिनों तक ‘चिल्लई बच्चा’ अवधि होती है. ‘कलां’ और ‘खुर्द’ के अर्थ क्रमशः ‘बड़ा’ और ‘छोटा’ होते हैं. इस प्रकार घाटी में हिमपात का यह चक्र पूरा होता है. पारंपरिक काल विभाजन की इस परंपरा पर पर्यावरण के साथ बढ़ रही छेड़-छाड़ का भी असर पड़ रहा है, मगर फिर भी ये घाटियाँ अब भी पर्यटकों की उम्मीद पर खरी तो उतर ही रही हैं.


श्रीनगर, गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम आदि कई जाने-माने पर्यटन स्थलों पर सैलानी प्रकृति के विलक्षण रूप का आनंद उठा रहे हैं. मगर इसके साथ ही जरुरी है कि घाटी के अन्य सुन्दर मगर अनजान से स्थलों को भी पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जाये, सड़क और अन्य यात्री सुविधाएं विकसित कर इस राज्य में पर्यटन की अपार संभावनाएं सामने लाई जा सकती हैं. अकस्मात प्रकृति का मिजाज बदलने पर आने वाली परेशानियों से स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के त्वरित राहत के लिए सरकारी तंत्र को भी चुस्त-दुरुस्त रहने की जरुरत है. बहरहाल यदि आपने अब तक कश्मीर की सुंदरता को अपनी आँखों से महसूस नहीं किया है तो जल्द ही विचार कीजिये धरती पर बसे इस जन्नत की सैर का.....
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