Wednesday, January 12, 2011

विवेकानंद के विचारों की कालजयिता


किसी ने कहा था " भारत को समझना हो तो विवेकानंद को पढ़ो. "

देश में भ्रष्टाचार को चरम पर पहुंचते, एक आदर्श के रूप में स्थापित छवियों को खंड - खंड टूटते देख अपनी व्यवस्था के प्रति वितृष्णा देश के बहुसंख्यक युवाओं के साथ मुझे भी कहीं- न कहीं छु सी जा रही है. ऐसे में युवा सन्यासी स्वामी विवेकानंद जैसे व्यक्तित्व का होना आश्चर्यजनक ही लगता है जिसने भारत के इतिहास के सर्वाधिक अंधकारपूर्ण दौर में से एक में भी अपनी हुंकार से पुरे विश्व को उद्वेलित कर दिया. उनका तो सारा जीवन ही एक सन्देश है जिसके बारे में चर्चा करना बिना किसी नयेपन के एक रस्मअदायगी ही होगी. मगर उनके कालजयी विचार पुष्प से कुछ के स्मरण इस घनघोर निराशाजनक माहौल में प्रेरणा का कार्य करेंगे.

स्वामी जी ने देशवासियों विशेषकर युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था - " राष्ट्ररूपी यह जहाज लाखों लोगों को जीवनरूपी समुद्र के पार करता आ रहा है. कई शताब्दियों से इसका यह कार्य चल रहा है, और इसकी सदाशयता से लाखों आत्माएं इस सागर के उस पार अमृतधाम में पहुंची हैं. पर आज शायद तुम्हारे ही दोषों से इसमें कुछ खराबी आ गई है. इसमें एक - दो छेद हो गए हैं; तो क्या तुम इसे कोसोगे ! संसार में जिसने तुम्हारा सबसे अधिक उपकार किया है, उसपर खड़े होकर गाली बरसाना क्या तुम्हे उचित है ? ..... यदि हमारे इस समाज में, राष्ट्रीय जीवनरूपी जहाज में छेद है, तो हम तो इसकी संतान हैं ; आओ चलें इस छेद को भर दें. ..... मैं तुम्हारे पास आया हूँ अपनी सारी योजनाएं तुम्हारे सामने रखने के लिए. मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए तैयार हूँ. और यदि तुम मुझे ठुकराकर अपने देश के बाहर भी निकाल दो तो भी मैं तुम्हारे पास वापस आकर यही कहूँगा कि - भाई हम सब डूब रहे हैं. मैं आज तुम्हारे पास बैठने आया हूँ. और यदि हमें डूबना है तो आओ हम सब साथ ही डूबें, पर सावधान एक भी कटु शब्द अपने होठों पर न आये. ..... "

शायद ऐसे ही विचार होते हैं जो किसी व्यक्ति को युगपुरुष की कोटि में ला खड़ा करते हैं. हम युवा, जिनके पास उत्तराधिकार में स्वामी विवेकानद के विचारों की ऐसी अप्रतिम विरासत है को निराश होने का तो कोई कारण होना ही नहीं चाहिए. आइये, वर्तमान कृत्रिम आदर्शों और छवियों के ध्वंस होने का शोक मनाने में समय नष्ट करने के बजाये देश निर्माण के परम लक्ष्य में अपने योगदान देने में दृढतापूर्वक तबतक लगे रहे - जबतक कि अपने लक्ष्य तक पहुँच न जायें.

Tuesday, January 11, 2011

गत शुक्रवार को एक छोटे से एक्सीडेंट से गुजरने के बाद अगले दिन शनिवार की छुट्टी होते हुए भी कमरे में ही पुरे आराम की दुह्साध्य परिस्थिति के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर ही रहा था कि फेसबुक से गुजरते हुए चंडीदत्त शुक्ल जी के स्टेटस पर नजर पड़ गई जो अपनी एक दिवसीय यात्रा पर दिल्ली पधारने वाले थे. चंडीदत्त शुक्ल जी से ऑनलाइन तो मेरा संपर्क कई सालों से रहा जब वो नोएडा में 'दैनिक जागरण' से जुड़े हुए थे. अरुणाचल जाने के बाद मेरा संपर्क इंटरनेट से टूट गया और इन जैसे कई अन्य व्यक्तियों से भी. नेटवर्क जोन में वापसी के बाद इनसे पुनः संपर्क हुआ तो पता चला अब ये जयपुर में हैं और मेरी कुछ पसंदीदा पत्रिकाओं में से एक 'अहा ! ज़िन्दगी' से जुड़ गए हैं. 

पिछले दिनों अपनी अचानक हुई जयपुर यात्रा में मुझे याद भी न रहा कि ये भी यहीं हैं, वर्ना अपनी साईट विजीट में इनके दर्शन को भी ऐड जरुर कर लेता. अब इनके दिल्ली आने के अवसर को मैं छोड़ना नहीं चाहता था, और यह शनिवार को मेरे बाहर निकलने की एकमात्र प्रेरणा थी. 

कला-विज्ञान-संस्कृति से जुड़े लोगों से मिलने या संपर्क का अवसर मैं छोड़ना नहीं चाहता, यह मेरी कुछ कमजोरियों में से एक है. मेरी इस 'प्रवृत्ति' का शिकार कई लोग हो चुके हैं जिनमें ब्लॉग जगत के ही श्री अरविन्द मिश्र, यूनुस खान आदि भी शामिल हैं. इससे पहले केंद्रीय सचिवालय मेट्रो पर ही एक अन्य ब्लौगर नीरज जाट से भी मुलाकात हो चुकी थी, जिसके सन्दर्भ में यहाँ  भी देखा जा सकता है. यही मेट्रो स्टेशन इस दिन फिर हमारी मुलाकात का गवाह बनाने जा रहा था, जहाँ हमारा मिलना नियत हुआ था. 


चंडीदत्त जी एक कमाल के लेखक, कवि और साथ ही ब्लौगर भी हैं. उनका लिखना पाठकों पर जादू सा असर करता है और उन्हें मंत्रमुग्ध कर देता है. इसका एक उदाहरण मैं उनके फेसबुक पेज से ही दे रहा हूँ, जिसमें उन्होंने इस सामान्य सी मुलाकात को अपने खुबसूरत शब्दों में पिरोकर एक यादगार शक्ल दे दी है - 

कुछ अलसाई सुबहें इस कदर हावी होती हैं कि गुजिश्ता दिन भागते हुए बीतता है और कसम से, ऐसी दोपहरियों के बाद की शामें अक्सर तनहाई की आग से लबरेज़ करते हुए जिस्म को सिहरन से भर देती हैं। 
कुछ ऐसा ही तो मंज़र था उस रात, जब चांद ने सरसराती हवा का आंचल थामकर सांझ को ढलने का इशारा किया और नीले आसमान के दिल के ऐन बीच जा बैठा। ठिठुरती रात ने ओस से कहा-- तुम इतनी सर्द क्यों हो आज...और वो जैसे लजाकर घास के सीने में और गहरे तक दुबक गई। क़दमों के नीचे पत्ते चरमरा रहे थे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राष्ट्रपति के घर के ठीक बगल सड़क पर खंबों के माथे के ऊपर जगमगाती स्ट्रीटलाइट के नीचे कोई था, जो मेरे इंतज़ार में था और इसी फ़िक्र में मैं भी तो था...ऐन उसी वक्त, इंसानी कारीगरी का बेमिसाल नमूना- दिल्ली मेट्रो के एक शुरुआती डिब्बे में सवार मैं भी बार-बार अपनी घड़ी देखता हुआ वक्त को जैसे रोक लेने की कोशिश में जुटा था...
हर दो-तीन मिनट बाद पीछे छूट जाते प्लेटफॉर्म को अपनी रफ्तार से मुंह चिढ़ाते और जैसे साथ ही फिर मिलने का दिलासा देती मेट्रो जैसे ही मंज़िल तक पहुंची, एस्केलेटर पर मेरे क़दम जम गए और जैसे ही खुद चलती सीढ़ियां रुकीं, बेताब निगाहों ने बाहर झांककर यकीन करना चाहा-- है तो सही, वो शख्स, जिससे मिलना आज मुमकिन हुआ है। नज़रें चेहरा नहीं तलाश पाईं पर फोन के पार एक आवाज़ मौजूद थी--हां जी...आता हूं। रात के सवा नौ बजे, राह को लांघ, वो मेरे सामने था। ये ज़िक्र है--झारखंड के रहने वाले, बनारस में पढ़े, अरुणाचल में नौकरी कर चुके और फिलहाल, फरीदाबाद में सेवारत अभिषेक मिश्र का। ब्लॉगर, पत्रकार, लेखक, संगीतप्रेमी... ये तमगे दरअसल छोटे और नाकाफ़ी हैं अभिषेक का बयान करने के लिए। यकीनन...वो सबसे पहले और सबसे ज्यादा एक स्वीट इंसान हैं। एक दिन पहले ही एक एक्सीडेंट से जूझने और रा-वन देखने की हिम्मत रखने वाले अभिषेक उस रात भी महज मुझसे मिलने फरीदाबाद से चले आए थे। ये बस मोहब्बत थी। बिना किसी काम, बगैर किसी प्रोफेशनल रुचि की। रात ढलती रही, वक्त अब खुद पुरज़ोर सिफारिश कर रहा था कि मुझे गुजरना है पर कुछ तो था, जो गुज़र नहीं पाया। हम दोनों एक कृत्रिम झील के किनारे बैठे, बिना किसी कृत्रिमता के दुनिया-जहान की बातें करते रहे। बहुत देर तक भी नहीं...बमुश्किल, 45-50 मिनट। फिर विदा हुए, फिर मिलने की कोशिश के वादे के साथ..."

इन पंक्तियों से चंडीदत्त जी के शब्द कौशल की संपूर्ण तो नहीं मगर एक छोटी सी झलक जरुर मिल गई होगी. उनके जैसे व्यक्तित्व के साथ बिताये वो चंद लम्हे मेरे भी स्मृति पटल पर संगृहीत रहेंगे और आशा करता हूँ कि वो पत्रकारिता में और भी ऊँचाइयाँ हासिल करते हुए हमें भी गौरवान्वित करते रहेंगे. 
चलते-चलते उन्ही की लिखी कुछ पंक्तियाँ -   

तुम रहना स्त्री, बचा रहे जीवन

हे सुनो न स्त्री
तुम, हां बस तुम ही तो हो
जीने का ज़रिया,
गुनगुनाने की वज़ह.
बहती हो कैसे?
साझा करो हमसे सजनी…
होंठ पर गीत बनकर,
ढलकर आंख में आंसू,
छलकती हो दंतपंक्तियों पर उजास भरी हंसी-सी!
उफ़…
तुम इतनी अगाध, असीम, अछोर
बस…एक गुलाबी भोर!
चांद को छलनी से जब झांकती हो तुम,
देखा है कभी ठीक उसी दौरान उसे?
कितना शरमाया रहता है, मुग्ध, बस आंखें मींचे
हां, कभी-कभी पलक उठाकर…
इश्श! वो देखो, मुए ने झांक लिया तुम्हारा गुलाबी चेहरा…
वसंतलता, जलता है वो मुझसे,
तुमसे,
हम दोनों की गुदगुदाती दोस्ती से…
स्त्री…
तुम न होतीं,
तो सच कहो…
होते क्या ये सब पर्व, त्योहार, हंसी-खुशी के मौके?
उत्सव के ज्वार…
मौसम सब के सब, और ये बहारें?
कहां से लाते हम यूं किसी पर, इस कदर मर-मिटने का जज़्बा?
बेढंगे जीवन के बीच, कभी हम यूं दीवाने हो पाते क्या?
कहो न सखी…
जब कभी औचक तुम्हें कमर से थामकर ढुलक गया हूं संपूर्ण,
तुमने कभी-कहीं नहीं धिक्कारा…
सीने से लगाकर माथा मेरा झुककर चूम ही तो लिया…
स्त्री, सच कहता हूं.
तुम हो, तो जीवन के होने का मतलब है…
है एक भरोसा…
कोई सन्नाटा छीन नहीं सकेगा हमारे प्रेम की तुमुल ध्वनि का मधुर कोलाहल
हमारे चुंबनों की मिठास संसार की सारी कड़वाहटों को यूं ही अमृत-रस में तब्दील करती रहेगी.
तुम रहना स्त्री,
हममें बची रहेगी जीवन की अभिलाषा…
उफ़… तुम्हारे न होने पर हो जाते हैं कैसे शब्दकोश बेमानी
आ जाओ, तुम ठीक अभी…
आज खुलकर, पागलों की तरह, लोटपोट होकर हंसने का मन है



Monday, January 10, 2011

चर्चा एक नाटक की ( दिल्ली के 13 वें 'भारत रंग महोत्सव से' )




वाकई एक कालजयी रचना देश, काल और भाषा की सीमाओं से परे होती है, और इसे एक बार फिर साबित किया दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ( NSD ) द्वारा आयोजित 13 वें 'भारत रंग महोत्सव' में मंचित नाटक 'एन अन सोल अमारिलो' (In a Yellow Sun : Memories of an Earthquake) ने. बोलिविया की नाट्य संस्था टीटरो डी लांस एनडस द्वारा स्पेनिश भाषा में एक घंटे, दस मिनट का यह नाटक 9 जनवरी की शाम 5:30 पर एल. टी. जी. ऑडिटोरियम; नई दिल्ली में मंचित किया गया. दर्शकों की सुविधा के लिए टेलीविजन स्क्रीन पर इसके अंग्रेजी शब्दानुवाद भी उपलब्ध थे.

निर्देशक कैशर ब्री का यह नाटक 22 मई 1998 को बोलीविया में आये एक विनाशकारी भूकंप की पृष्ठभूमि में निर्मित है. यह नाटक जहाँ एक ओर भूकंप के महाविनाश और भीषणता, उससे प्रभावित हुई आम जनता के सरोकारों को दर्शाता है; वहीँ दूसरी ओर पुनर्वास और राहत के लिए मुहैया राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय सहायता की सरकारी और प्रशासनिक लुट - खसोट, भ्रष्टाचार और पीडितों से दुर्व्यवहार जैसी कड़वी सच्चाई को भी सामने लाता है. यह पटकथा और ये दृश्य कहीं से भी विदेशी पृष्ठभूमि से होने का आभास नहीं देते, बल्कि देखने वाला प्रत्येक आम दर्शक चाहे वो किसी भी देश का हो अपने परिवेश को इस प्रस्तुति से जोड़ कर देखने लगता है.


शायद तभी नाटक के क्लाईमेक्स के करीब मंच पर उतरे नेताओं के उलजलूल बयानबाजियों पर हूटिंग के रूप में कागज के गोले फेंकता आम दर्शक कहीं - न - कहीं अपने राजनीतिक विद्रूप पर भी प्रहार कर अपना आक्रोश निकाल रहा होता है. पीड़ित जनता को आंसू पोंछने के लिए रुमाल देने, मैक्डोवेल खुलवाने के वादे जैसे प्रसंग हास्य की जगह गहरा कटाक्षपूर्ण व्यंग्य करते हैं. ब्रेकिंग न्यूज़ का भूखा और मानवीय संवेदनाओं से बेपरवाह मीडिया का रूप इस नाटक में भी सामने आ ही जाता है.

नाटक के कारुणिक दृश्यों में एक अहम दृश्य है जब एक व्यक्ति अपनी बेटी के मलबे में दब जाने का वर्णन कर रहा होता है और बगल में एक मेज पर पावडर से एक बच्ची कि छवि बना, मेज को उलट उसके मिटटी में मिल जाने को निरुपित किया जाता है.


संजोग से इस समय प्राप्त दिल्ली प्रवास के ये संस्मरण, ये अनुभव मेरे लिए काफी अहम रहेंगे. इस नाटक ने इस तथ्य को भी स्पष्ट किया कि आम और संवेदनशील जनमानस किसी सीमित सीमा में ही नहीं बल्कि सारे विश्व में ही लगभग एक सी ही व्यवस्थाजनक परिस्थितियों का सामना कर रहा है. व्यवस्था में परिवर्तन का एक सफल प्रयास निश्चित रूप से पुरे विश्व में ही एक नई लहर उत्पन्न कर देगा जैसा कि कभी हमने 'गांधीयुग' में करके दिखाया था. लेखक, कवि, नाटककार और बुद्धिजीवी वर्ग शायद ऐसी किसी वैश्विक पहल के बारे में भी विचार करें.

(तसवीरें- नेट तथा अपने मोबाइल कैमरे की सीमित क्षमता के साथ)

Friday, January 7, 2011

दिल्ली का आमंत्रण : भारत रंग महोत्सव

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (National School of Drama) द्वारा आयोजित नाट्य महोत्सव का 13 वाँ आयोजन 7 – 22 जनवरी 2011 तक नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है. रंगमंचीय कला के प्रोत्साहन और विकास के उद्देश्य से आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय रंगमंच समूह भी साझीदारी निभाते है, जिस वजह से इस आयोजन ने आज एशिया के सबसे बड़े नाट्य उत्सव का रूप ले लिया है.

महोत्सव के आयोजन को और भी सारगर्भिता देने के लिए इस महोत्सव के समानांतर एक और आयोजन की भी रुपरेखा तैयार की जाती है, ताकि रंगमंच के इस अनूठे उत्सव से दिल्ली से बाहर के लोगों को भी जुडने का अवसर उपलब्ध हो सके और रंगमंच के अनुकूल बेहतर समझ और संस्कृति विकसित हो सके. इस बार इस समानांतर आयोजन के लिए चेन्नई को चुना गया है, 11 – से 18 जनवरी 2011 तक नाट्य आयोजन की यह श्रृंखला चेन्नई में भी जारी रहेगी.

हबीब तनवीर के ‘चरणदास चोर’ से दिल्ली में शुभारंभ होने वाले नाट्योत्सव में विविध मंचन स्थलों पर करीब 80 से ज्यादा राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय रंगमंचीय समूहों की प्रस्तुतियों के साक्षात्कार का अवसर उपलब्ध होने वाला है जिसके बारे में विस्तृत जानकारी NSD के केंद्रीय कार्यालय या वेबसाइट - www.nsd.gov.in से प्राप्त की जा सकती है.

तो चलें - नाट्योत्सव के इस महाआयोजन का लुत्फ़ उठाने ! .....

Friday, December 31, 2010

दशक के दस सबक



(जिंदगी से जो रोज एक नया सबक सिखाती है)

1. दिल की आवाज को पहचानो जो अक्सर दिमाग और बाहर के शोर में दब जाती है.

2. कोई भी निर्णय पूरे सोच – विचार के बाद लो और उसपर अडिग रहो ताकि बाद में कभी पछतावा न हो.

3. आज के दौर में कैरियर इस देश का सबसे विचारणीय मुद्दा है. अपने शौक और क्षमताओं की पहचान कर उसे कैरीयर का रूप दे सको तो महज duty की formality पूरी नहीं करोगे बल्कि उसका लुत्फ़ भी उठाओगे.

4. Problems को opportunities के रूप में लेना. याद रखना कि – “ जिस काम में जितनी ज्यादा समस्याएं आयें, समझ लेना वो काम उतना ही बेहतर होने वाला है.”

5. NCC की ट्रेनिंग कभी अनिवार्य हो या नहीं, कम – से - कम 1 वर्ष के रिसर्च का अनुभव किसी उपयुक्त गाईड के अंतर्गत जरुर ले लेना. भावार्थ समझने का मौका जीवनपर्यंत मिलता रहेगा; 1 उम्र तो थोड़ी कम ही पड़ेगी. J

6. परिवर्तन एक शाश्वत प्रक्रिया है, इससे कभी घबडाना मत. Evolution के लिए परिवर्तन भी आवश्यक है.

तो – “ सैर कर दुनिया की गाफिल, ये जिंदगानी फिर कहाँ;

जिंदगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ ! “

7. असफलता सिर्फ यही नहीं सिखाती कि सफलता का प्रयास पुरे मन से नहीं हुआ बल्कि यह भी कि – “ सितारों के आगे जहाँ और भी हैं;

अभी मंजिलों के इम्तिहाँ और भी हैं “

8. दोस्ती सबसे बड़ी नेमत है. यह ऐसी शै है, जिसे इश्वर आपको खुद चुनने का मौका देता है. तो इस मौके को व्यर्थ मत जाने देना ताकि कल बता सको कि रिश्ते जोडने में अपनी काबिलियत उससे कम भी नहीं.

9. शादी ??? (अहूँ – अहूँ) – “ उसी से करो जिससे दोस्ती कर सकते हो, घंटों बातें कर सकते हो ”

10. और यह भी कि – “ जो तुम्हारे मन का हो अच्छा, जो न हो वो और भी अच्छा; क्योंकि उसमें भगवान की मर्जी छुपी होती है “

Wednesday, December 29, 2010

अरुणाचल से दिल्ली - शुक्रिया '2010'




पिछले वर्ष जब लगभग इसी समय, गुजर रहे वर्ष का लेखा - जोखा संकलित कर रहा था, तब जहाँ एक ओर एक अधूरे सपने के साथ बनारस को छोडने की कसक थी, तो वहीँ दूसरी ओर देश के एक सुदूरतम प्रदेश से जीवन के एक नए सफर की शुरुआत की एक उम्मीद भी.

गुजरा वर्ष कई नए अनुभवों और उपलब्धियों का वर्ष रहा. कैरियर की दृष्टि से जहाँ काफी कुछ सीखने को मिला; वहीँ विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच और काम के प्रति समर्पण ने नई जिम्मेदारियां और उन्हें संभालने का आत्मविश्वास भी दिया.

एक तरह से खुद को नए परिवेश के प्रति समर्पित ही कर दिया था,, मगर बुझते दीपक की तरह एक अंतिम कोशिश की लपट कहीं बाकि थी. और अंततः इस देश के बहुसंख्यक युवाओं की सबसे बड़ी आकांक्षा - 'सरकारी सेवा में आना ' - यह स्वप्न भी पूरा हुआ; और वर्षों से बंद इस दरवाजे को आखिर अंतिम धक्के में खोल पाने (या यूँ कहें कि तोड़ पाने) * में सफल रहा. और अब लगभग एक वर्ष अधिक के नेटवर्क जोन से वनवास के बाद देश और नेटवर्क जोन की राजधानी दिल्ली आखिरकार दूर नहीं रह गई.

रचनात्मक जगत से अवान्क्षनीय दूरी के बावजूद आंशिक रूप से ब्लौगिंग भी जारी रही, जिसे मेरी विवशताओं को समझते हुए ब्लॉग परिवार का प्रोत्साहन भी मिलता रहा.

पत्रिका 'विज्ञान प्रगति ' और विज्ञान वेबसाईट 'कल्किओं' पर विज्ञान कथाएँ भी प्रकाशित हुईं.

इनके अलावे प्रत्यक्ष संपर्क में न रह पाने पर भी कुछ आभासी तो कुछ साभासी मित्रों से इस वनवास ने घनिष्ठता को और प्रगाढ़ ही किया. दोस्तों की पहचान रोज चाय या फ़ोन पर लंबी और अनर्थक बातों से ही नहीं होती, बल्कि ख़ामोशी भी दोस्तों के बीच भाषा सी ही काम कराती है.

"एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों,
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों."

बीता वर्ष यह सिखाता हुआ गया कि वाकई जीवन चलने का नाम है, पीछे मुड़-मुड़ कर देखते रहने का नहीं; और यह भी कि "सच्चे दिल से किसी को चाहो तो सारी कायनात उसे तुमसे मिलाने कि कोशिश में लग जाती है....."

नए शहर में नई जिम्मेदारियों को निभाता हुआ, ब्लॉग जगत से भी पुनः सक्रिय रूप से जुड़ने का नए वर्ष में प्रयास रहेगा, जिसमें आशा है सभी ब्लौगर्स का अपेक्षित सहयोग मिलेगा.

नववर्ष और नवदशक भी आप सभी के लिए खुशियाँ लाये; शुभकामनाएं.....

Sunday, December 26, 2010

नववर्ष का उपहार : दिल्ली पुस्तक मेला

दिल्ली का प्रगति मैदान एक बार फिर तैयार है पुस्तक प्रेमियों के स्वागत के लिए, 25 दिसंबर से २ जनवरी तक आयोजित दिल्ली पुस्तक मेले के साथ. कॉमनवेल्थ गेम्स की वजह से प्रस्तावित तिथी में बदलाव के साथ अनजाने में ही यह नववर्ष के लिए एक विशेष destination बन गया है. मेले का मुख्य थीम है – ‘ग्रामीण भारत हेतु पुस्तकें’. यूँ तो इस थीम की रस्मअदायगी कुछ सरकारी प्रकाशन केंद्र ही करते दीखते हैं, मगर रस्मों से ऊपर पुस्तकों के विशाल महासागर में एक बार फिर गोते लगाने का अवसर तो है ही यह पुस्तक मेला.
कई देशी-विदेशी प्रकाशन समूहों के साथ पुस्तक प्रेमियों के लिए पलक – पांवड़े बिछाये प्रस्तुत है यह आयोजन. तो चलें इस बार पुस्तक मेला इस निश्चय के साथ कि नववर्ष की शरुआत अपनी पसंदीदा पुस्तकों से करेंगे और उपहार में पुस्तकें देने की परंपरा को और भी सुदृढ़ कर पुस्तक पठन - पाठन की संस्कृति विकसित करने में अपना भी योगदान देंगे.

लगभग एक वर्ष से अधिक लंबे वनवास से वापसी के बाद मुख्यधारा से जुड़ने के अवसर को enjoy करने के लिए मेरे लिए तो यह आयोजन काफी महत्वपूर्ण था, मगर अपने बारे में बात अपनी अगली किसी पोस्ट में. अभी तो बस पुस्तक मेले का ही लुत्फ़ उठाएं.

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