Sunday, March 5, 2017

कश्मीर के विशिष्ट फूल मज़ारमुंड या Iris Kasmiriana



कश्मीर के मज़ारमुंड: कश्मीर घाटी बर्फ का मौसम ढलने के बाद विभिन्न रंगों के फूलों से ढंक जाती है। इनमें सबसे अनूठे लगते हैं यहाँ के कब्रिस्तानों में खिलने वाले फूल। कहीं नीले, कहीं पीले, तो कहीँ लाल... मगर ताज्जुब ये कि ये फूल सामान्यतः फूलों से ही भरे पार्कों में नहीं दिखते। स्थानीय लोग इसे 'मजार मूले' या 'मज़ारमुंड' कहते हैं। थोड़ी और खोजबीन से पता चला कि इनका वैज्ञानिक नाम Iris Kasmiriana है और ये कश्मीर, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान आदि में कब्रगाहों से जुड़े हुए हैं। शायद इस क्षेत्र की ह्यूमस इसे ज्यादा मुफीद लगती है। बहरहाल अपने आप में कुछ अलग ही खूबसूरती तो रखते ही हैं ये फूल...

Sunday, January 22, 2017

झाड़खंड की राजधानी रांची के कल्पवृक्ष या कल्पतरु


वृक्षों से मानव का संबंध और आस्था अति प्राचीन है। बड़े, विशाल और लंबी आयु के वृक्षों की पूजा जो ट्राइबल और शास्त्रीय सभी मान्यताओं में विद्यमान है के पीछे इनसे ऐसे ही जीवन का आशीर्वाद पाने की कामना भी एक प्रमुख कारण रही होगी। पीपल, वट आदि ऐसे ही वृक्षों में आते हैं। ऐसे ही वृक्षों में एक नाम कल्पवृक्ष या कल्पतरु भी है।  
कल्पवृक्ष- एक ऐसा पौराणिक मिथकीय वृक्ष जो समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में एक है। इसे देवराज इंद्र ने प्राप्त किया था और स्वर्ग के उपवन में स्थापित किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण इसे अफ्रीका से लाये थे। आम मान्यता के अनुसार यह तमाम कामनाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष है। इसके वास्तविक अस्तित्व का पता तो नहीं चल पाया किन्तु अपने गुणों के ही कारण कल्पवृक्ष के नाम से विख्यात कुछ वृक्ष भारत में भी मिले हैं।
झाड़खंड की राजधानी रांची के डोरंडा में इस दुर्लभ प्रजाति के 4 वृक्ष पाये गए थे, जिनमें एक नष्ट हो चुका है और तीन बचे हैं। व्यस्त सड़क के किनारे उपेक्षित से खड़े इन वृक्षों पर वन विभाग ने ‘कल्पतरु’ नाम पट्टिका तो लगा दी है, किन्तु इनके प्रति जागरूकता और संरक्षण की ओर कुछ विशेष गंभीर नहीं दिखता।

इनकी आयु 2000 से ज्यादा वर्ष की मानी जाती है, राजस्थान के मंगलियावास में स्थित कल्पवृक्ष 800 साल पुराने माने जाते हैं। कहते हैं राजस्थान के अजमेर के मंगलियावास में हरियाली अमावस्या पर कल्पवृक्ष मेले के साथ पूरे प्रदेश में मेलों का सिलसिला आरंभ होता है जो पुष्कर मेले के साथ सम्पन्न होता है। इस अवसर पर लाखों लोग पवित्र कल्पवृक्ष जोड़े की पूजा कर मन्नतें माँगते हैं। 
इंदौर के मंदसौर में भी भगवान पशुपतिनाथ मंदिर में इस वृक्ष के होने की बात कही जाती है।
इसके अलावा उत्तरप्रदेश, अल्मोड़ा, कर्नाटक आदि से भी इस वृक्ष के मिलने की सूचनाए आती रही हैं। विश्व के अन्य भागों यथा फ्रांस, इटली, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया में भी इस वृक्ष के पाये जाने की सूचना है।

Baobab प्रजाति के ये वृक्ष इस पृथ्वी पर महाद्वीपीय विस्थापन से भी पूर्व से उपस्थित माने जाते हैं। औषधीय गुणों के लिए भी यह वृक्ष काफी खास है। इसमें विटामिन सी, कैल्शियम आदि पाये जाते हैं। WHO के अनुसार हमारे शरीर के 8 अमीनो एसिड में से 6 इस वृक्ष में पाये जाते हैं। यह वृक्ष जल भंडारण के प्रयोग में भी आ सकता है, क्योंकि यह अंदर से खोखला होता है जिसमें 1 लाख लीटर से ज्यादा की जल भंडारण क्षमता होती है। इस वृष से उतसर्जित होने वाले रसायन मच्छरों आदि किटाणुओं को भी दूर रखते हैं।
हमारे देश में इस अद्भुत और बहुउपयोगी वृक्ष की उपस्थिति वास्तव में एक स्वर्गिक वरदान सा ही है। सरकार यदि इनकी पहचान, संरक्षण तथा इनकी वृद्धि की दिशा में सार्थक पहल करे तो यह काफी हितकर होगा।

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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