Monday, September 4, 2017

शताब्दी वर्ष पर देवदास...





कहते हैं कि हमें तब तक किसी का महत्व समझ नहीं आता, जब तक हम उसे खो नहीं देते। ये बात फिलहाल देव बाबू या देवदास के संदर्भ में। देवदास- 1917 में प्रकाशित शरतचंद्र की एक ऐसी कृति जिसे वो स्वयं भी काफी ज्यादा पसंद नहीं करते थे। देवदास जो शायद उनके ही किन्हीं अनुभवों का साहित्यिक प्रतिरूप था को वो एक निर्बल नायक मानते थे, जिसने पलायन स्वीकार किया था। इस कमी को वो अन्य रचनाओं में दूर करते हैं, स्त्री चरित्रों को एक अद्भुत सशक्तता तो देते ही हैं। किन्तु देश के पाठकों को क्या हो गया! देवदास उनके प्रेम संबंधी भावनाओं का सबसे उदात्त नायक कैसे बन गया! न सिर्फ साहित्यिक सफलता अपितु सिने पर्दे पर भी जब-जब यह नायक सामने आया इन्हीं पाठकों ने दर्शक के रूप में भी उसे मुक्त रूप से स्वीकार किया। अक्सर साहित्यिक कृतियाँ सिनेमा के पर्दे पर अपनी सफलता दोहरा नहीं पातीं, इसके विपरीत भी होता है; किन्तु देवदास के साथ ऐसा नहीं होता। ऐसे में इसे सिर्फ एक पुस्तक या सिनेमा से हटकर इसके मनोवैज्ञानिक पहलू को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। प्रेम को लेकर भारत संकुचित नहीं रहा है, साहित्य के प्रारम्भिक दौर से ही प्रेम इसमें भी शामिल रहा है बल्कि मूल में भी रहा है। किन्तु अभिव्यक्ति के संदर्भ में ऐसा कहना सहज नहीं। देवदास के रूप में आने से पहले शाहरुख ने- साथ ही कई और लोगों ने भी- प्रेम के हिंसक स्वरूप को महिमामंडित करने की कोशिश की। मगर यह हमारी स्वाभाविक अभिव्यक्ति नहीं बन सका। देवदास का प्रेम एक आम हिंदुस्तानी का प्रेम है। मूक, अपनी प्रेमिका के प्रेम को पाने को उत्सुक, किन्तु उसके हित-अहित के लिए सतर्क भी, जिस पुरुष मानसिकता का उसमें विकास हुआ है उसे सँजोये प्रेम में भूल करने वाला भी, अन्यमनस्कता में प्रेम को समझ न पाना, स्वीकार न कर पाना (शायद इसमें भी कहीं किसी अहम को ठेस पहुँचती हो!), मगर स्वयं को नकारा जाना भी स्वीकार न कर पाना.....
देवदास का प्रेम भी एक ऐसा ही प्रेम है। बचपन से पारो से लगाव जाने कब प्रेम में बदल जाता है, स्वीकार नहीं कर पाता, अभिव्यक्त नहीं कर पाता, पारो स्वयं कदम आगे बढ़ती है तो संस्कार आड़े आ जाते हैं या शायद कहीं खुद की कमजोरी का भाव भी। इसी भाव के आगे जो प्रेम पाने की स्थिति बननी थी, वो विछोह में बदल जाती है। देवदास कोई रसिक चरित्र नहीं है। ऐसा नहीं कि पारो की जगह उसे कोई और नारी नहीं मिल सकती, किन्तु उसे वो नहीं तो वैसी ही चाहिए; या सिर्फ वही; जैसे पारिजात, जैसे आकाशकुसुम, जैसे बस वही एक चाँद...! उसे पारो नहीं मिली, बल्कि उसका न मिलना उसकी किस्मत में आया। जानता है पा नहीं सकता तो इस अभाव, इस पीड़ा की भरपाई उससे कहीं बड़ी पीड़ा से करने का मार्ग चुनता है। खुद को मिटाने का, प्रेम में आत्मोत्सर्ग का... वो भी उसी के द्वार पर जाकर जहाँ शायद उसे उम्मीद है कि मृत्यु के बाद ही सही उसकी आत्मा अपनी पारो से एकाकार हो सकेगी...
    
एक पक्ष पारो का भी है। आर्थिक असमानता को भूल, प्रेम को उच्च मानती रूप, सौंदर्य, गुण हर चीज में उत्तम पारो अपने प्रेम की अस्वीकृति से उस दिशा में कदम बढ़ा देती है जो उसे भी स्वयं को पीड़ा देने की ओर ही ले जाता है। मगर इस पीड़ा में भी एक प्रतिशोध है जिसकी अग्नि उसकी अन्य सुकोमल भावनाओं को उभरने ही नहीं देती। उसकी यह ज्वाला भी शायद देव की चिता की ज्वाला के सामने ही फीकी पड़ने के इंतजार में है...!
इस कहानी की एक अन्य महत्वपूर्ण पात्र चंद्रमुखी भी है। एक वैश्या होते हुये, हर रोज नए-नए पुरुषों से मिलते और उनके प्रेम प्रदर्शनों/निवेदनों की वास्तविकता जानते-समझते वास्तविक प्रेम के दर्शन देवदास में ही करती है। उसके प्रेम में न कोई अभिमान है, न दर्प, न ईर्ष्या, न प्रतिशोध। उसका यह प्रेम उसके जीवन को बदल देता है किन्तु फिर भी अपने प्रेम से वो देव के जलते हृदय को शीतलता नहीं दे पाती।
इसके बीच एक और पात्र चुन्नी बाबू भी हैं। जीवन को उसके उसी रूप में स्वीकार कर जीवन का आनंद मनाने वाले। किन्तु जीवन को लेकर विचारों का यही अन्तर तो देवदास को एक अलग ही प्रजाति, एक अलग ही व्यक्तित्व बनाता है; जो सबके साथ आसानी से मेल नहीं खा सकता...

प्रेम को एक अद्भुत उत्कट, अविस्मरणीय ऊँचाई देने वाला देवदास न सिर्फ 100 वर्षों से इस देश में विविधताओं से ऊपर उठ एक नायक है बल्कि आने वाले युगों में भी मनुष्य के हृदय के किसी कोने में, किसी भावना के रूप में जीवित रहेगा ही। देवदास एक पात्र ही नहीं है, यह एक भाव है, एक विचार है जो कभी मिट नहीं सकता..... 

Saturday, July 1, 2017

कश्मीर की एक ऐतिहासिक विरासत- मार्तंड मंदिर




धरती पर स्वर्ग के रूप में विश्वविख्यात कश्मीर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए तो प्रसिद्ध है ही, इसकी माटी सभ्यता और संस्कृति के विकास के लिए भी काफी उर्वर रही है। प्राकऐतिहासिक काल से आधुनिक काल तक इसने मानव सभ्यता की विकासयात्रा के कई पड़ावों को पल्लवित होते देखा है। इसकी धरती बौद्ध, शैव, वैष्णव, सूफी आदि कई परंपराओं की साक्षी रही; जिनके प्रमाण वक्त के बदलते दौरों के विभिन्न झंझावातों का सामना करते हुये भी आज भी अपना अस्तित्व बचाए रख पाने में सफल रहे हैं। कश्मीर की ऐसी ही कुछ प्रमुख विरासत में एक है- मार्तंड मंदिर। कश्मीर घाटी के अनंतनाग-पहलगाम मार्ग पर मार्तंड नामक स्थान पर स्थित यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। हेनरी कोल के मतानुसार इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व 35 में हुआ था। कल्हण रचित राजतरंगिनी जो कि कश्मीर के इतिहास का एक प्रामाणिक ग्रंथ मानी जाती है के अनुसार इसका निर्माण 8 वीं शताब्दी में राजा ललितादित्य ने करवाया था। यह मंदिर अपने स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर एक ऊँचे पठार पर स्थित है, जहाँ से कश्मीर घाटी का नयनाभिराम दृश्य सामने आता है। विशाल प्रांगण के मध्य में मुख्य मंदिर और चारों ओर 84 स्तंभाकार संरचनाएँ हैं। इसके साथ ही गर्भगृह और मंडप भी हैं। मुख्य मंदिर के तीन कक्ष हैं जिनपर प्रतिमाएँ उत्कीर्णित हैं। मंदिर की रचना में पत्थरों का ही प्रयोग किया गया है, जिन्हे लोहे से जोड़ा गया है। यहाँ स्थित स्तंभों तथा मुख्य मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्णित प्रतिमाएँ कश्मीर की प्राचीन मूर्तिकला की उत्कृष्टता का भी प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। प्राकृतिक और ऐतिहासिक कारणों से आज इस भव्य विरासत के भग्नावशेष ही विद्यमान हैं, मगर फिर भी ये अपने गौरवशाली अतीत का आभास कराने में सक्षम हैं। 
विशाल भारद्वाज की 'हैदर' की शूटिंग के सिलसिले में यह मंदिर कुछ विवादों और चर्चा में भी रहा। यह मंदिर एक वैश्विक विरासत का सम्मान पाने की पात्रता रखता है, जिसके संरक्षण और इसके प्राचीन महत्व को पुनर्स्थापित करने हेतु सार्थक प्रयास की आवश्यकता है।  

Sunday, June 25, 2017

विभिन्न परिप्रेक्ष्य में ययाति


ययाति के विषय में कई प्रारूप की कहानियां मिलती हैं। सबमें उनके मुख्यतः इच्छाओं और भोग से निवृत न हो पाने की प्रवृत्ति का उल्लेख है और सारांश रूप में यही है कि अंततः वो कह उठते हैं कि "अब मैं चलने को तैयार हूं। यह नहीं कि मेरी इच्‍छाएं पूरी हो गईं, इच्‍छाएं वैसी की वैसी अधूरी हैं। मगर एक बात साफ हो गई कि कोई इच्‍छा कभी पूरी हो नहीं सकती। मुझे ले चलो। मैं ऊब गया।..." उन्हें मात्र असीमित इच्छाओं के उदाहरण के रूप में देखा गया।
मगर व्यक्तिगत उनकी प्रवृत्ति के साथ-साथ उनके जीवन में और क्या चल रहा था? क्या वो मात्र एक विषय व्यसनी, स्त्री लोलुप ही थे? किन परिस्थितियों/कारणों ने उन्हें ऐसा बनाया! संक्षिप्त कहानियों में उनका उल्लेख नहीं है, मगर प्रसिद्ध लेखक विष्णु सखाराम खांडेकर द्वारा ज्ञानपीठ व साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत उपन्यास 'ययाति' में इसका कुछ वर्णन है। उपन्यास के अनुसार एक क्षत्रिय राजा की परिस्थितिवश बनी ब्राह्मण पत्नी, जिसपर शुक्राचार्य की पुत्री होने का भी दंभ था के साथ विषम वैवाहिक जीवन और उत्पन्न परिस्थितियां या तो उन्हें उसकी मुट्ठी में मन मार जीवन व्यतीत करने पर विवश करतीं या प्रतिक्रिया में एक विपरीत ही छोर पर चले जाने की। और लगभग ये दोनों ही चीजें हुईं। साथ ही ऋषियों द्वारा नहुष के पुत्रों के कभी सुखी न होने का शाप भी। सबकुछ पास होता दिखते हुए भी ययाति कभी सुखी न हो पाए। ययाति ने न सिर्फ स्वयं को देवयानी से काट लिया बल्कि राजकाज से भी खुद को अलग कर लिया। सारा नियंत्रण देवयानी के ही पास था बस महाराज पर नहीं। किन्तु यहीं यदि उनका विवाह प्रारंभ में ही शर्मिष्ठा से हो जाता तो क्या परिस्थितियां अलग हो सकती थीं? प्रथम पड़ाव में ही इच्छा पूर्ण हो जाने पर अनंत (या अंत भी) काल तक इच्छाओं के पीछे मनुष्य क्यों भागता! आम चर्चाओं में जिस प्रकार रहस्यमयी या विद्रूप हंसी के साथ ययाति या किसी का भी उदाहरण दिया जाता है, उसके पहले समग्र परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना उचित न हो! मानव के व्यक्तित्व को प्रभावित करने में भाग्य और परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है, ययाति की कथा इसका एक अप्रतिम उदाहरण है...

Wednesday, May 10, 2017

कश्मीर का दाचीगाम राष्ट्रीय अभ्यारण्य

धरती का स्वर्ग कश्मीर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यह जैव विविधता की दृष्टि से भी काफी समृद्ध है। यहाँ स्थित दाचीगाम राष्ट्रीय अभ्यारण्य यही दर्शाता है। श्रीनगर से लगभग 21 किमी दूर यह अभ्यारण्य यहाँ के प्रसिद्ध शालीमार बाग के निकट ही है। स्थानीय पर्यटन कार्यालयों या वन विभाग के कार्यालय से यहाँ भ्रमण हेतु पास प्राप्त किया जा सकता है। यूँ तो पर्यटक दिन के किसी भी वक्त अभ्यारण्य का भ्रमण कर सकते हैं, किन्तु वन में स्वच्छंद विचरते वन्य प्राणीयों के अवलोकन की संभाविता सुबह ज्यादा होने के कारण एक दिन पहले पास बनवा उसी समय भ्रमण ही ज्यादा उचित होगा।

यहाँ के वन्य जीवों में कस्तुरी हिरण, बारहसिंगा, तेंदुआ, काला और भूरा भालू, जंगली बिल्ली, पहाड़ी लोमड़ी, लंगूर आदि प्रमुख हैं। इनके अलावे विभिन्न पक्षियों की प्रजातियाँ भी यहाँ देखी जा सकती हैं।

इस अभ्यारण्य का नाम दाचीगाम इसके निर्माण के लिए दस गाँवों को पुनर्वासित किए जाने के कारण पड़ा। इसकी स्थापना मुख्यतः श्रीनगर शहर को स्वच्छ जल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए की गई थी।




प्रारंभ में यह क्षेत्र कश्मीर के महाराज और उनके विशिष्ट अतिथियों द्वारा शिकारगाह के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा। 1910 से संरक्षित क्षेत्र के रूप में स्थापित इस क्षेत्र को आजादी के पश्चात अभ्यारण्य का और 1981 में राष्ट्रीय अभ्यारण्य का दर्जा प्राप्त हुआ। 141 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत यह अभ्यारण्य दो भागों- निचले तथा ऊपरी भाग में विभक्त है। निचला भाग पर्यटकों द्वारा आसानी से देखा जा सकता है, जबकि ऊपरी भाग के लिए पूरे दिन की ट्रैकिंग की आवश्यकता होगी।



अभयारण्य के अंदर एक मत्स्य पालन केंद्र भी है जहाँ ट्राउट मछ्ली का पालन होता है।






















बहरहाल, इतना तय है कि यहाँ आने वाले पर्यटक कश्मीर के एक नए और सुरम्य रूप को निहार पायेंगे। यहाँ की शांति, पक्षियों का कलरव, प्राकृतिक सुंदरता आदि की अपने दिल पर अमिट छाप लिए ही वो यहाँ से लौटेंगे।

Sunday, March 5, 2017

कश्मीर के विशिष्ट फूल मज़ारमुंड या Iris Kasmiriana



कश्मीर के मज़ारमुंड: कश्मीर घाटी बर्फ का मौसम ढलने के बाद विभिन्न रंगों के फूलों से ढंक जाती है। इनमें सबसे अनूठे लगते हैं यहाँ के कब्रिस्तानों में खिलने वाले फूल। कहीं नीले, कहीं पीले, तो कहीँ लाल... मगर ताज्जुब ये कि ये फूल सामान्यतः फूलों से ही भरे पार्कों में नहीं दिखते। स्थानीय लोग इसे 'मजार मूले' या 'मज़ारमुंड' कहते हैं। थोड़ी और खोजबीन से पता चला कि इनका वैज्ञानिक नाम Iris Kasmiriana है और ये कश्मीर, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान आदि में कब्रगाहों से जुड़े हुए हैं। शायद इस क्षेत्र की ह्यूमस इसे ज्यादा मुफीद लगती है। बहरहाल अपने आप में कुछ अलग ही खूबसूरती तो रखते ही हैं ये फूल...

Sunday, January 22, 2017

झाड़खंड की राजधानी रांची के कल्पवृक्ष या कल्पतरु


वृक्षों से मानव का संबंध और आस्था अति प्राचीन है। बड़े, विशाल और लंबी आयु के वृक्षों की पूजा जो ट्राइबल और शास्त्रीय सभी मान्यताओं में विद्यमान है के पीछे इनसे ऐसे ही जीवन का आशीर्वाद पाने की कामना भी एक प्रमुख कारण रही होगी। पीपल, वट आदि ऐसे ही वृक्षों में आते हैं। ऐसे ही वृक्षों में एक नाम कल्पवृक्ष या कल्पतरु भी है।  
कल्पवृक्ष- एक ऐसा पौराणिक मिथकीय वृक्ष जो समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में एक है। इसे देवराज इंद्र ने प्राप्त किया था और स्वर्ग के उपवन में स्थापित किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण इसे अफ्रीका से लाये थे। आम मान्यता के अनुसार यह तमाम कामनाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष है। इसके वास्तविक अस्तित्व का पता तो नहीं चल पाया किन्तु अपने गुणों के ही कारण कल्पवृक्ष के नाम से विख्यात कुछ वृक्ष भारत में भी मिले हैं।
झाड़खंड की राजधानी रांची के डोरंडा में इस दुर्लभ प्रजाति के 4 वृक्ष पाये गए थे, जिनमें एक नष्ट हो चुका है और तीन बचे हैं। व्यस्त सड़क के किनारे उपेक्षित से खड़े इन वृक्षों पर वन विभाग ने ‘कल्पतरु’ नाम पट्टिका तो लगा दी है, किन्तु इनके प्रति जागरूकता और संरक्षण की ओर कुछ विशेष गंभीर नहीं दिखता।

इनकी आयु 2000 से ज्यादा वर्ष की मानी जाती है, राजस्थान के मंगलियावास में स्थित कल्पवृक्ष 800 साल पुराने माने जाते हैं। कहते हैं राजस्थान के अजमेर के मंगलियावास में हरियाली अमावस्या पर कल्पवृक्ष मेले के साथ पूरे प्रदेश में मेलों का सिलसिला आरंभ होता है जो पुष्कर मेले के साथ सम्पन्न होता है। इस अवसर पर लाखों लोग पवित्र कल्पवृक्ष जोड़े की पूजा कर मन्नतें माँगते हैं। 
इंदौर के मंदसौर में भी भगवान पशुपतिनाथ मंदिर में इस वृक्ष के होने की बात कही जाती है।
इसके अलावा उत्तरप्रदेश, अल्मोड़ा, कर्नाटक आदि से भी इस वृक्ष के मिलने की सूचनाए आती रही हैं। विश्व के अन्य भागों यथा फ्रांस, इटली, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया में भी इस वृक्ष के पाये जाने की सूचना है।

Baobab प्रजाति के ये वृक्ष इस पृथ्वी पर महाद्वीपीय विस्थापन से भी पूर्व से उपस्थित माने जाते हैं। औषधीय गुणों के लिए भी यह वृक्ष काफी खास है। इसमें विटामिन सी, कैल्शियम आदि पाये जाते हैं। WHO के अनुसार हमारे शरीर के 8 अमीनो एसिड में से 6 इस वृक्ष में पाये जाते हैं। यह वृक्ष जल भंडारण के प्रयोग में भी आ सकता है, क्योंकि यह अंदर से खोखला होता है जिसमें 1 लाख लीटर से ज्यादा की जल भंडारण क्षमता होती है। इस वृष से उतसर्जित होने वाले रसायन मच्छरों आदि किटाणुओं को भी दूर रखते हैं।
हमारे देश में इस अद्भुत और बहुउपयोगी वृक्ष की उपस्थिति वास्तव में एक स्वर्गिक वरदान सा ही है। सरकार यदि इनकी पहचान, संरक्षण तथा इनकी वृद्धि की दिशा में सार्थक पहल करे तो यह काफी हितकर होगा।

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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