Sunday, January 22, 2017

झाड़खंड की राजधानी रांची के कल्पवृक्ष या कल्पतरु


वृक्षों से मानव का संबंध और आस्था अति प्राचीन है। बड़े, विशाल और लंबी आयु के वृक्षों की पूजा जो ट्राइबल और शास्त्रीय सभी मान्यताओं में विद्यमान है के पीछे इनसे ऐसे ही जीवन का आशीर्वाद पाने की कामना भी एक प्रमुख कारण रही होगी। पीपल, वट आदि ऐसे ही वृक्षों में आते हैं। ऐसे ही वृक्षों में एक नाम कल्पवृक्ष या कल्पतरु भी है।  
कल्पवृक्ष- एक ऐसा पौराणिक मिथकीय वृक्ष जो समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में एक है। इसे देवराज इंद्र ने प्राप्त किया था और स्वर्ग के उपवन में स्थापित किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण इसे अफ्रीका से लाये थे। आम मान्यता के अनुसार यह तमाम कामनाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष है। इसके वास्तविक अस्तित्व का पता तो नहीं चल पाया किन्तु अपने गुणों के ही कारण कल्पवृक्ष के नाम से विख्यात कुछ वृक्ष भारत में भी मिले हैं।
झाड़खंड की राजधानी रांची के डोरंडा में इस दुर्लभ प्रजाति के 4 वृक्ष पाये गए थे, जिनमें एक नष्ट हो चुका है और तीन बचे हैं। व्यस्त सड़क के किनारे उपेक्षित से खड़े इन वृक्षों पर वन विभाग ने ‘कल्पतरु’ नाम पट्टिका तो लगा दी है, किन्तु इनके प्रति जागरूकता और संरक्षण की ओर कुछ विशेष गंभीर नहीं दिखता।

इनकी आयु 2000 से ज्यादा वर्ष की मानी जाती है, राजस्थान के मंगलियावास में स्थित कल्पवृक्ष 800 साल पुराने माने जाते हैं। कहते हैं राजस्थान के अजमेर के मंगलियावास में हरियाली अमावस्या पर कल्पवृक्ष मेले के साथ पूरे प्रदेश में मेलों का सिलसिला आरंभ होता है जो पुष्कर मेले के साथ सम्पन्न होता है। इस अवसर पर लाखों लोग पवित्र कल्पवृक्ष जोड़े की पूजा कर मन्नतें माँगते हैं। 
इंदौर के मंदसौर में भी भगवान पशुपतिनाथ मंदिर में इस वृक्ष के होने की बात कही जाती है।
इसके अलावा उत्तरप्रदेश, अल्मोड़ा, कर्नाटक आदि से भी इस वृक्ष के मिलने की सूचनाए आती रही हैं। विश्व के अन्य भागों यथा फ्रांस, इटली, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया में भी इस वृक्ष के पाये जाने की सूचना है।

Baobab प्रजाति के ये वृक्ष इस पृथ्वी पर महाद्वीपीय विस्थापन से भी पूर्व से उपस्थित माने जाते हैं। औषधीय गुणों के लिए भी यह वृक्ष काफी खास है। इसमें विटामिन सी, कैल्शियम आदि पाये जाते हैं। WHO के अनुसार हमारे शरीर के 8 अमीनो एसिड में से 6 इस वृक्ष में पाये जाते हैं। यह वृक्ष जल भंडारण के प्रयोग में भी आ सकता है, क्योंकि यह अंदर से खोखला होता है जिसमें 1 लाख लीटर से ज्यादा की जल भंडारण क्षमता होती है। इस वृष से उतसर्जित होने वाले रसायन मच्छरों आदि किटाणुओं को भी दूर रखते हैं।
हमारे देश में इस अद्भुत और बहुउपयोगी वृक्ष की उपस्थिति वास्तव में एक स्वर्गिक वरदान सा ही है। सरकार यदि इनकी पहचान, संरक्षण तथा इनकी वृद्धि की दिशा में सार्थक पहल करे तो यह काफी हितकर होगा।

Thursday, June 18, 2015

‘उसने कहा था’ के सौ साल...




मेरी पसंदीदा कहानियों में संभवतः सर्वोपरि और मेरी पढ़ी हुई कहानियों में सबसे प्रारम्भिक भी... तब भी जाने क्या देखा था इसमें कि इसके आकर्षण से कभी निकल न पाया... बाद में पता चला इसके मुरीदों में एक मैं ही नहीं था, 1915 में छपने के सौ साल के बाद से कितनी पीढ़ियों को इसने आज भी अपने आकर्षण में बांधे रखा है और आगे भी बांधे रहेगी। पंजाब की गलियों की प्यार भरी गालियों के बीच पलती कच्ची उमर के प्यार की यादें, पहली बार दिल को लगी ठेस, और इस प्यार की यादों को दिल में सहेजे आत्मोत्सर्ग भी... क्योंकि उसनेकहा था... क्या नहीं था इस कहानी में पाठकों को खुद से आत्मीयता कायम कर लेने के लिए... इसी कहानी का ही वो जादुई असर था कि ये टिप्पणी एक शाश्वत आलोचना ही बन गई जो पीढ़ियों से वरिष्ठों द्वारा नए लेखकों को प्रेरणा देती आ रही है कि गुलेरी बन गए हो क्या, जो एक ही कहानी से प्रसिद्ध बनना चाहते हो...?” 

इस कहानी के जादू से बौलीवुड भी अछूता न रह सका और 1960 में बिमल रॉय के प्रोडक्शन में मोनी भट्टाचार्य के निर्देशन में सुनील दत्त-नंदा को लेकर इसी नाम से फिल्म भी बनाई गई। शैलेन्द्र के लिखे और सलिल चौधरी के संगीत से सँजोये गाने सुमधुर तो थे ही...
इस कहानी पर बाद में कई नाटकों का भी मंचन किया गया। 


किसी भी संवेदनशील हृदय को छूने में सक्षम इस कहानी हिन्दी साहित्य में एक मील का पत्थर है...


यूँ तो गुलेरी जी ने कुछ अन्य कहानियाँ भी लिखीं मगर उनकी लेखकीय और जीवन यात्रा ज्यादा लंबी न रही... काश कि उनका लेखन हिन्दी साहित्य को और समृद्ध कर पाता, और मेरा सारा लेखन मिल कर भी इस एक कहानी के सदृश्य यश प्राप्त कर पाता... उसने कहा था.....



Thursday, May 14, 2015

भारत-चीन संबंध और डॉ कोटनीस की अमर कहानी


प्रधानमंत्री मोदी आज से अपनी चीन यात्रा पर हैं। चीन के साथ हमारे संबंध ऐतिहासिक होने के साथ काफी उतार-चढ़ाव लेते हुए भी रहे हैं। दोनों देशों के साथ जुड़ी चंद खुशनुमा यादों में डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस की स्मृतियाँ भी शामिल हैं। तो कल 'डॉ कोटनीस की अमर कहानी' की भी याद आएगी ! डॉ द्वारकानाथ कोटनीस वो भारतीय डॉक्टर थे जो 1938 में चीन-जापान युद्ध के दौरान जापानी आक्रमण के समय चीन एक राहत अभियान में गए थे। वहां वो जापानियों के बंदी भी रहे। चीनी युवती चिंग लान ( Guo Qinglan) से उन्होंने विवाह किया, जिससे उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई- जिसका नाम Yinhua  (Yin-India और Hua-China) रखा गया। प्लेग के रोगियों का इलाज करते हुए इसी बीमारी से उनकी मृत्यु भी हुई... 

ख्वाजा अहमद अब्बास लिखित कहानी 'And one didn't didn't come back' के आधार पर सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक व्ही. शांताराम ने अपनी क्लासिक फ़िल्म 'डॉ कोटनीस की अमर कहानी' बनाई थी। फ़िल्म में मुख्य भूमिका स्वयं व्ही. शांताराम और जयश्री ने निभाई थी। भारत-चीन के द्विपक्षीय संबंधों के मध्य डॉ. कोटनीस को बड़े आदर के साथ याद किया जाता है। इन दो देशों के मध्य सिर्फ ऐतिहासिक-व्यापारिक ही नहीं बल्कि ऐसे ही ठोस और सुदृढ़ नागरिक संबंधों की भी आवश्यकता है.....

Sunday, May 10, 2015

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, सिनेमा और नटिर पूजा

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने साहित्य के अलावा न सिर्फ संगीत, चित्रकला, दर्शन आदि में अपना योगदान दिया बल्कि तब के अभिव्यक्ति के उभरते माध्यम सिनेमा के लिए भी एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई। नटिर पूजा एकमात्र ऐसी फ़िल्म है जिसमे गुरुदेव ने निर्देशक तथा एक महत्वपूर्ण पात्र की भूमिका भी निभाई। एक बौद्ध मिथक पर आधारित उनकी कविता 'पुजारिनी' का नाट्य रूपांतरण थी 'नटिर पूजा'। 1932 में टैगोर की 70 वीं वर्षगांठ पर न्यू थियेटर के बैनर तले इसे फ़िल्म के रूप में फिल्माने का प्रयास किया गया। गुरुदेव के ही मार्गदर्शन में स्क्रीनप्ले तैयार किया उनके भतीजे दिनेंद्रनाथ टैगोर ने तो कलाकार शांतिनिकेतन से ही लिए गए। 22 मार्च 1932 को कोलकाता के चित्रा सिनेमा में यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई। निर्माताओं को सफलता की उम्मीद तो थी ही इसलिए फ़िल्म से प्राप्त होने वाली आधी राशि शांतिनिकेतन को समर्पित करने की भी बात थी, मगर आर्थिक सफलता के पैमाने पर फ़िल्म खरी न उतर सकी। संभवतः इसका कारण इसका नृत्य नाटिका स्वरुप था। फिर भी कई समीक्षक इसे बंगला संस्कृति और टैगोर की छाप लिए एक अमूल्य धरोहर मानते हैं। 
इस महामानव को उनके जन्मदिवस पर नमन.....

Tuesday, April 21, 2015

राज अच्छे हैं: Time Capsule


कुछ राज कभी सामने आते नहीं, कुछ राज सामने आने दिये जाते नहीं... कुछ राज आधे सामने आते हैं-आधे पर्दे के पीछे ही रखे जाते हैं... सबके पीछे अपने-अपने स्वार्थ होते हैं... तात्कालिक लाभ के साथ लंबी अवधि तक भ्रम फैलाए रखना भी इसके कारणों में से हैं। और ये देश जिसकी परी और रहस्य कथाओं में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी है वहाँ ऐसे किस्सों का होना तो आम होना ही है...
ऐसे ही किस्सों में एक है टाईम कैपसूल का... यूँ तो ये कहानी एक बार हवा में उठ कर शांत हो चुकी है, मगर कोई कारण नहीं कि  अफवाहों से प्राणवायु लेने वाली लौबी के तत्वावधान में इसे समुचित समय पर फिर हवा न दी जाए...
कहा जाता है कि आजादी की 25 वीं या 26 वीं वर्षगांठ पर तत्कालीन प्र.मं. स्व. इन्दिरा गांधी ने एक टाईम कैप्सूल 1000 वर्षों के लिए लाल क़िला के प्रांगण में कहीं दबवाया था जिसमें इस देश का इतिहास दर्ज था। टाइम कैप्सूल- धातु का एक पात्र होता है जिसके भीतर दस्तावेज और अमूल्य प्रतीक चिह्न रखकर इसे जमीन में दबा दिया जाता है। यह भी कहा गया कि यह कैप्सूल 27 मई को जमींदोज़ किया गया जो कि नेहरू जी
की पुण्यतिथि भी थी और इसमें मात्र नेहरू जी के देश के प्रति योगदानों का ही जिक्र है। खैर एक सनसनीखेज, रहस्यमयी चर्चा का बीजारोपन तो हो ही गया था। परिदृश्य बदला – जनता पार्टी सत्ता में आई। और इसे उनका समर्थन तो मिला ही हुआ था जिनके कंधों पर देश का यथार्थ इतिहास प्रस्तुत करने की स्वआरोपित महती जिम्मेदारी है। कहा गया कि उसने गड़े मुर्दे उखाड़ने की तर्ज यह कैप्सूल भी निकलवाया और इसमें ऐसा कुछ नहीं पाया गया जिसकी और चर्चा की जानी जरूरी लगे... (तहलका पत्रिका, नवम्बर, 2012 में इसके बारे
में कुछ और भी जान सकते हैं) इसके बाद से सभी इसपर चुप हैं, मगर कभी-कहीं सुगबुगाहट होती ही रहती है...
हमें समझना चाहिए कि इतिहास के कई रूप होते हैं। उनकी परतों को उघाड़ना कहीं उल्टा ही न पड़ जाए। हर तरफ-हर चीज की खुदाई हमें खंडहरों, कूड़ों और बदबुओं के बीच ही उलझा देगी... वर्तमान को बेहतर बनाते हुये भविष्य की ओर बढ़ें यही उचित होगा.....

Friday, March 20, 2015

Equinox (समदिवारात्री): एक प्राक्ऐतिहासिक परंपरा की पुनर्स्थापना


हम सामान्यतः सिलेक्टिव और सुविधाजनक इतिहास पसन्द करते हैं और असहज प्रश्नों से परहेज ही बरतने की कोशिश करते हैं। इसी लिये अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने और इतिहास में अपनी जगह तलाशने की प्रवृत्ति पाई जाती है। जिन ट्राइबल्स को असभ्य/अनार्य घोषित किया उनकी वैज्ञानिक सोच को स्वीकार कैसे करते ! रावण को प्रकांड ज्योतिष मानने से इंकार तो नहीँ कियाDismiss मगर उन लोगों की कालगणना किसपर आधारित थी इसपर सुविधाजनक और सुनियोजित चुप्पी साध ली ! आज भी पुस्तकालयों और संग्रहालयों को जमींदोज करना उसी मानसिकता का ही अंग है...
प्रकृति और व्यक्तिगत प्रभावों के बावजूद विश्व में कई ऐसी प्राचीन संरचनाएं अभी भी विद्यमान है जो प्राक्इतिहास में कालगणना के प्रयासों का दस्तावेज हैं। इंग्लैंड का स्टोन हेंज जो सॉल्स्टाइस देखने का प्रमुख स्थान है के बाद संभवतः झाड़खण्ड के हजारीबाग का पंखड़ी बरवाडीह एक मात्र ऐसी जगह है जहाँ Equinox (समदिवारात्री; 20-21 मार्च/ 22-23 सितंबर) के अवलोकन की महापाषाणकालीन परंपरा अन्वेषक श्री शुभाशीष दास द्वारा पुनर्जीवित की गई है। 
ऐसे स्थलों का अध्ययन व संरक्षण वैश्विक आवश्यकता है, यदि हम मानवता के इतिहास को समग्र रूप से समझने के प्रति वाकई गम्भीर हैं। ऐसी एक कड़ी का टूटना हमें अपनी विकास यात्रा की श्रृंखला से अलग कर देगा। यह स्थल भी आज अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है। माईनिंग के माध्यम से विकास और विरासत की जंग में विकास का पलड़ा ही भारी पड़ता दिख रहा है। देखें कब तक महफूज़ रह पाती है ये हमारी साझी विरासत !!!

Saturday, March 7, 2015

होली के रंग: गीतों के संग...





गीत-संगीत का हमारे जीवन में अहम् स्थान है। यही कारण है कि हिंदुस्तानी सिनेमा से भी गानों को अलग नहीं किया जा सकता। होली गीतों के साथ भी यही बात है। कई बेहतरीन गाने जुड़े हैं इस पर्व से। कुछ गाने कहानी को आगे बढ़ाते हैं (जैसे शोले), तो कुछ इसी लिए डाल दिए गए कि होली के बहाने थोड़ी 'लिबर्टी' ले ली जाये। मगर यादों में वही गाने रह जाते हैं जो कहीं न कहीं आपको भी कहीं छु जाते हों। वैसे भी होली के इतने रंगों में कोई भी आपको छु न जाये ये हो भी नहीं सकता। इन गानों की सफलता भी इसी में है कि आज नहीं तो कल कभी न कभी आपको खुद से जोड़ते ही हैं। अपने मनपसंद कुछ फ़िल्मी होली गानों का जिक्र कर रहा हूँ, आप भी अपने पसंदीदा गानों को जोड़ना चाहें तो अच्छा लगेगा... 
मोहे पनघट पे:- क्लासिकल 
होली आई रे कन्हाई:- हिंदुस्तानी मिट्टी की सुगंध लिए 
जा रे हट नटखट:- राधा-कृष्ण की होली एक ही पात्र के द्वारा अभिव्यक्त 
रंग बरसे:- होली के राष्ट्रीय गीत सदृश्य मान्यता प्राप्त यह गीत मुझे चारों मुख्य कलाकारों के बेहतरीन अभिनय के लिए ही पसंद है 
सात रंग में खेल रही है:- 'आखिर क्यों' प्रश्न की शुरुआत ही इस गाने से है 
होली आई होली आई:- अनिल कपूर का टपोरी अंदाज 
आज न छोड़ेंगे:- राजेश खन्ना का आमंत्रण और आशा पारेख की बेबसी... 
इनके अलावे 'सौदागर' में राज कुमार-दिलीप कुमार का होली दृश्य भी यादगार था... 
ये तो थे मेरे मनपसंद सात रंग। आप चाहें तो अपने रंग भी जोड़ इसे आगे बढ़ा सकते हैं.....

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...