Thursday, November 26, 2020

तेरी तस्वीर मिल गई: उल्कापिंड के पहले फोटोग्राफ की वर्षगांठ


खगोलीय पिंडों में उल्का का एक अलग ही स्थान है जिससे गंभीर शोधकर्ता ही नहीं आम जन भी परिचित हैं। 

आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का (meteor) और साधारण बोलचाल में 'टूटते हुए तारे' अथवा 'लूका' कहते हैं। उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड (meteorite) कहते हैं। प्रायः प्रत्येक रात्रि को उल्काएँ अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं, किंतु इनमें से पृथ्वी पर गिरनेवाले पिंडों की संख्या अत्यंत अल्प होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से इनका महत्व बहुत अधिक है क्योंकि एक तो ये अति दुर्लभ होते हैं, दूसरे आकाश में विचरते हुए विभिन्न ग्रहों इत्यादि के संगठन और संरचना (स्ट्रक्चर) के ज्ञान के प्रत्यक्ष स्रोत केवल ये ही पिंड हैं।

यद्यपि मनुष्य इन टूटते हुए तारों से अत्यंत प्राचीन समय से परिचित था, प्राकएतिहासिक काल से ही इनके देखे जाने के संकेत उनकी रॉक आर्ट जैसी रचनाओं से मिलती रही हैं, तथापि आधुनिक विज्ञान के विकासयुग में मनुष्य को यह विश्वास करने में बहुत समय लगा कि भूतल पर पाए गए ये पिंड पृथ्वी पर आकाश से आए हैं। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में डी. ट्रौयली नामक दार्शनिक ने इटली में अल्बारेतो स्थान पर गिरे हुए उल्कापिंड का वर्णन करते हुए यह विचार प्रकट किया कि वह अंतरिक्ष से टूटते हुए तारे के रूप में आया होगा, किंतु किसी ने भी इसपर ध्यान नहीं दिया। सन् 1768 ई. में फादर बासिले ने फ्रांस में लूस नामक स्थान पर एक उल्कापिंड को पृथ्वी पर आते हुए स्वत: देखा। अगले वर्ष उसने पेरिस की विज्ञान की रायल अकैडमी के अधिवेशन में इस वृत्तांत पर एक लेख पढ़ा। अकैडमी ने वृत्तांत पर विश्वास न करते हुए घटना की जाँच करने के लिए एक आयोग नियुक्त किया जिसके प्रतिवेदन में फादर बासिले के वृत्तांत को भ्रमात्मक बताते हुए यह मंतव्य प्रकट किया गया कि बिजली गिर जाने से पिंड का पृष्ठ कुछ इस प्रकार काँच सदृश हो गया था जिससे बासिले को यह भ्रम हुआ कि यह पिंड पृथ्वी का अंश नहीं हैं। तदनंतर जर्मन दार्शनिक क्लाडनी ने सन् 1794 ई. में साइबीरिया से प्राप्त एक उल्कापिंड का अध्ययन करते हुए यह सिद्धांत प्रस्तावित किया कि ये पिंड खमंडल के प्रतिनिधि होते हैं। यद्यपि इस बार भी यह विचार तुरंत स्वीकार नहीं किया गया, फिर भी क्लाडनी को इस प्रसंग पर ध्यान आकर्षित करने का श्रेय मिला और तब से वैज्ञानिक इस विषय पर अधिक मनोयोग देने लगे। सन् 1803 ई. में फ्रांस में ला ऐगिल स्थान पर उल्कापिंडों की एक बहुत बड़ी वृष्टि हुई जिसमें अनगिनत छोटे-बड़े पत्थर गिरे और उनमें से प्राय: दो-तीन हजार इकट्ठे भी किए जा सके। विज्ञान की फ्रांसीसी अकैडमी ने उस वृष्टि की पूरी छानबीन की और अंत में किसी को भी यह संदेह नहीं रहा कि उल्कापिंड वस्तुत: अंतरिक्ष से ही पृथ्वी पर आते हैं।

अभी भी इनसे जुड़ी एक घटना इतिहास में जुड़नी शेष थी। 27 नवंबर, 1885 की तारीख को उल्कापिंड की पहली तस्वीर लिए जाने की तारीख के रूप में याद किया जाता है। यह तस्वीर Austro-Hungarian astronomer, Ladislaus Weinek द्वारा ली गई थी। 


यह उल्कापिंड Andromedids meteor shower से जुड़ा माना जाता है जो Biela's Comet से संबद्ध था; जिसके 6 दिसंबर, 1741 से ही देखे जाने का उल्लेख मिलता रहा है।

Lick Observatory और Meudon Observatory, की सहायता से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर Weinek ने चन्द्रमा का पहला एटलस भी तैयार किया। 

चंद्रमा का Crater Weinek और Asteroid 7114 Weinek का नामकरण उनके नाम के आधार पर ही किया गया।

Monday, October 19, 2020

बचपन के दिन भी क्या दिन थे...!

हम बड़े नहीं होंगे- कॉमिक्स जिंदाबाद

कॉमिक्स प्रेमियों का यह प्रिय नारा है। वो भी दिन थे जब रविवार को बेताबी से अखबार वाले का इंतजार रहता था जिसकी थैली में ढ़ेरों रोचक कहानियों का घर बाल पत्रिकाएं होती थीं। होली-दिवाली आदि विशेषांकों की तो बात ही और थी। छुट्टियों का मज़ा कई गुना बढ़ जाता था। भूख-पाया भूल पहले सारी कहानियां ख़त्म करनी होती थीं। पत्र मित्रता में कभी कुछ भेजा तो नहीं लेकिन उन बच्चों का परिचय देख लगता था जाने कहाँ होंगें कैसे होंगे! अभी ऐसी ही एक पुरानी तस्वीर पर नजर पड़ी तो लगा अब कितने बड़े हो गए होंगे ये चेहरे, क्या अपने बच्चों को बताते होंगे उन दिनों की बातें!



ऐसी ही एक पुरानी याद है जिसे याद करते आज भी चेहरे पर मधुर मुस्कान उभर आती है- मधु मुस्कान। ऐसी ही एक बाल पत्रिका थी मधु मुस्कान। उसके पात्रों की कुछ छवियां आज भी मन में कहीं छुपी बैठी हैं, जैसे 'डैडी जी'।

कल कपिल के शो में शत्रुघ्न सिन्हा आये थे। उसी दौरान सर्च करते इस कॉमिक्स में उनसे जुड़ा एक कार्टून भी मिला, जिसमें आज से दशकों पहले हीरो के कारण एक्सट्रा के शोषण पर करारा व्यंग्य किया गया था। 

उन दिनों एक अंक या भाग छूट जाने पर फिर मिल पाना अत्यंत कठिन होता था। कई लोगों से पूछना होता था। कॉमिक्स और फिल्मों का लंबा इंतजार, बेचैनी यूँ ही नहीं होती थी। आज तो सब उंगलियों की नोंक पर है। कुछ भी ढूंढ़ना कितना सरल! वो लोग भी कम बड़ा योगदान नहीं कर रहे जो इंटरनेट के विशाल संग्रह को इनसे समृद्ध करते जा रहे हैं। यह अलग बात है कि हम अब कुछ नॉस्टेल्जिया सी याद की तलाश में कुछ पन्ने पलट लें, आज के बच्चों की प्राथमिकता भी अलग है, पसंद भी। फिर भी उस दौर में यह एक ख़्वाब भी नहीं था कि कभी यह भी संभव हो पायेगा। मगर यही साइंस है और यही साइंस फिक्शन।

सुकून की तलाश में दिल कभी-कभी बच्चा हो जाना चाहता है, पर यह भी एक पल से ज्यादा अब मुमकिन नहीं...



Wednesday, September 30, 2020

'पथरीली पगडंडियों पर' के भूवैज्ञानिक यात्री प्रो.के.एस. वल्दिया

 

 


भूविज्ञान और विज्ञान से जुड़े कई अन्य वैज्ञानिकों की यह खासियत होती है कि वो अपने बारे में ज्यादा बात नहीं करते, औरों से ज्यादा बात नहीं करते, औरों की भी ज्यादा बात नहीं करते. और अधिकांश अपनी एकल उपलब्धियाँ बटोरे खामोशी से एक दिन खामोशी से गुजर जाते हैं। भारत में यह विशेषता कुछ ज्यादा ही प्रतीत होती है। विश्वविद्यालयों में जहाँ शिक्षक और छात्रों के रूप में इस दूरी को कम करने की थोड़ी गुंजाइश है भी वहाँ भी ऐसी कोई खास कोशिश दिखती नहीं। खैर...

डॉ. खड़क सिंह वल्दिया (प्रो.के.एस. वल्दिया) इस मामले में थोड़े अलग थे जिन्होंने न सिर्फ अपने बल्कि भूविज्ञान और आम लोगों के बीच की इस दूरी को कम करने में भी मुखर भूमिका निभाई। उनका मुखर होना काफी खास भी था। उनका जन्म 20 मार्च 1937 को कलौं, म्यांमार (बर्मा) में हुआ था। प्रो.वल्दिया उत्तराखंड के पिथौरागढ़ सीमांत जिले आठगांव शिलिंग के देवदार (खैनालगांव) के मूल निवासी थे। डा.मोहन चंद तिवारी जी के संस्मरण के अनुसार डॉ. वल्दिया का बचपन जो कि मुख्यतः म्यांमार, तत्कालीन बर्मा में बीता था; वहीं विश्व युद्ध के दौरान एक बम के धमाके से इनकी श्रवण शक्ति लगभग समाप्त हो गई। इनके दादा जी पोस्ट ऑफिस में चतुर्थ श्रेणी कर्मी थे और पिताजी मामूली ठेकेदारी करते थे। परिवार में घोर गरीबी थी। इसके बावजूद वहाँ रहते उन्होंने जो सपने देखे, कल्पनाएँ सँजोईं उसे हक़ीक़त में भी तलाश करते रहे। बर्मा में नेताजी सुभाष बोस के भाषणों को सुन कर खड्ग सिंह को एक ही शिक्षा मिली कि हम सब हिंदुस्तानी हैं। वहां सबकी एक ही जाति थी- हिंदुस्तानी’, एक ही मजहब था- आजादी’, एक ही भाषा थी हिंदीऔर एक ही अभिवादन था- जय हिंद। इसका बचपन ऐसे समाज में बीता जो उस बगीचे के समान था जिसमें हर किस्म के, हर रंग के फूल खिलते थे।

उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है- “मुहल्ले में साथी थे रफीक नाई का बेटा छोटू, मथुरा पाण्डेय पान वाले का सुपुत्र तुलसी, फतह मोहम्मद मोची की बिटिया मुन्नी, बशीर बेकर की बेटी जेना, सिख दर्जी का मुंडा लोचन। जब हिंदी स्कूल गया तो दोस्ती का दायरा कुछ बढ़ा। मुलुक के अपने इलाके के किदारी, दीवानी, प्रेमवल्लभ, मधु, भागु, परु आदि मित्र बन गए। तब कोई किसी का उपनाम (सरनेम) नहीं जानता था, न किसी की जाति के बारे में कुछ ज्ञान था। मुझे तो भारत आकर पता लगा कि हम वल्दिया कुनबे के हैं। कांर्वेट स्कूल में मेरे दोस्त थे बर्मी बाविन, शान ईसाई बार्बरा वाछित, चीनी विंचैट और ईरानी शिराजी।

माध्यमिक शिक्षा से पहले ही कान खराब होने पर लोग इनका मजाक बनाने से भी नहीं चूकते थे और ताने मारते थे कि यह बच्चा जीवन में कुछ नहीं कर पाएगा। पर अपने मनोबल, संकल्प और कठोर परिश्रम के बल पर इस बालक ने ऐसा कुछ कर दिखाया कि समूचे विश्व ने उसकी बातें गंभीरता से सुनी। उस दौर में हियरिंग ऐड मशीन की आज जैसी सुविधा नहीं थी। तब बालक रहे वल्दिया सदैव हाथ में एक बड़ी बैटरी लिए चलते थे जिससे जुड़े यंत्र से वे थोड़ा बहुत सुन पाते थे। इसी हालात में उन्होंने न केवल अपनी शिक्षा पूरी की बल्कि टॉपर भी रहे। जीवन को राह दिखाने में गुरु की भूमिका और भी स्पष्ट होती है जब हम पाते हैं कि उनके एक शिक्षक बहुगुणा जी ने उनसे कहा कि तुम भूगर्भ विज्ञानी बनो जिसमें न सुनना है, न बोलना, बस पत्थरों को ताकना है, और यह बालक जीवन की वही राह चुन लेता है। 

पिथौरागढ़ से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वल्दिया ने लखनऊ विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और वहीं भू-विज्ञान विभाग में प्रवक्ता पद पर उनकी नियुक्ति हो गई।

उन्होंने 1963 में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की। भू विज्ञान में उल्लेखनीय कार्य करने पर 1965 में वह अमेरिका के जॉन हापकिंस विश्वविद्यालय के फुटब्राइट फैलो चुने गए थे। 1979 में राजस्थान यूनिवर्सिटी उदयपुर में भू विज्ञान विभाग के रीडर बने। इसके बाद 1970 से 76 तक वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी में वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर कार्यरत रहे। 1976 में उन्हें उल्लेखनीय कार्य के लिए शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।1983 में वह प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे।


प्रो.वल्दिया भू वैज्ञानिक होने के साथ साथ कवि और लेखक भी थे। प्रो.वल्दिया ने कुल चौदह पुस्तकें लिखी, जिनमें मुख्य पुस्तकें हैं -जियोलाजी ऑफ कुमाऊं, लैसर हिमालय, डायनामिक हिमालय, नैनीताल एंड ईस्ट एनवायरमेंटल जियोलाजी, एनवायरमेंट एंड सोसाइटी, एक थी नदी सरस्वती, आत्मकथा पथरीली पगडंडियों पर आदि।







एक संघर्षमय किन्तु प्रेरक जीवन जीकर हिमालय पर्यावरणविद् के रूप में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भूवैज्ञानिक पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित प्रोफेसर खड़क सिंह वल्दिया का 83 साल की उम्र में कल 29 सितंबर को निधन हो गया।वे इन दिनों बेंगलुरु में थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी में भी कई वैज्ञानिक लेख लिखे, काश कि ये एक जगह संकलित हो पायें. विज्ञान, वैज्ञानिकों और आम लोगों के मध्य की दूरी को कुछ कम कर पाने में सार्थक भूमिका निभा पाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी...

  

Wednesday, August 12, 2020

भारतीय एकता के सूत्रधार: राम और कृष्ण के चरित्र


डॉ. राम मनोहर लोहिया ने लिखा था- "...कृष्‍ण बहुत अधिक हिंदुस्‍तान के साथ जुड़ा हुआ है। हिंदुस्‍तान के ज्‍यादातर देव और अवतार अपनी मिट्टी के साथ सने हुए हैं। मिट्टी से अलग करने पर वे बहुत कुछ निष्‍प्राण हो जाते हैं। त्रेता का राम हिंदुस्‍तान की उत्‍तर-दक्षिण एकता का देव है। द्वापर का कृष्‍ण देश की पूर्व-पश्चिम एकता का देव है। राम उत्‍तर-दक्षिण और कृष्‍ण पूर्व-पश्चिम धुरी पर घूमे। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि देश को उत्‍तर-दक्षिण और पूर्व-‍पश्चिम एक करना ही राम और कृष्‍ण का धर्म था। यों सभी धर्मों की उत्‍पत्ति राजनीति से है, बिखरे हुए स्‍वजनों को इकठ्ठा करना, कलह मिटाना, सुलह कराना और हो सके तो अपनी और सबकी सीमा को ढहाना। साथ-साथ जीवन को कुछ ऊंचा उठाना, सदाचार की दृष्टि से और आत्‍म-चिंतन की भी।

देश की एकता और समाज के शुद्धि संबंधी कारणों और आवश्‍यकताओं से संसार के सभी महान धर्मों की उत्‍पत्ति हुई है। अलबत्‍ता, धर्म इन आवश्‍यकताओं से ऊपर उठकर, मनुष्‍य को पूर्ण करने की भी चेष्‍टा करता है। किंतु भारतीय धर्म इन आवश्यकताओं से जितना ओत-प्रोत है, उतना और कोई धर्म नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि राम और कृष्‍ण के किस्‍से तो मनगढ़ंत गाथाएं हैं, जिनमें एक अद्वितीय उद्देश्‍य हासिल करना था, इतने बड़े देश के उत्‍तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम को एक रूप में बांधना था। इस विलक्षण उद्देश्‍य के अनुरूप ही ये विलक्षण किस्‍से बने।..."

धर्म के सही स्वरूप को समझने की कोशिश करते हुए अपने-अपने निर्धारित कर्मों को करते अपने परिवेश को बेहतर बनाने का प्रयास करें, यही श्री कृष्ण के प्रति सच्ची आस्था होगी...

शुभ जन्माष्टमी

Tuesday, August 11, 2020

वीडियो पायरेसी के बाद बुक पायरेसी



वर्षों पहले बॉलीवुड के सभी दिग्गज कलाकार वीडियो पायरेसी के खिलाफ एकजुट हो सड़कों पर उतरे थे। कुछ बदलाव आए थे, कोई गाना या सीन काटकर आता था वीडियो में ताकि शौकीन दर्शक सिनेमाघरों में ही जाकर देखें। लेकिन यह समस्या तकनीक में बदलाव के साथ मात्र अपना स्वरूप ही बदलती जा रही है। फिर भी बॉलीवुड के पास इसके आर्थिक प्रभावों से उबरने के कुछ विकल्प हैं भी, लेकिन हिंदी लेखकों के विषय में क्या कहा जा सकता है!


यूँ तो नई वाली हिंदी और इसके लेखकों से व्यक्तिगत खुन्नस के कारण उनकी किताबें पढ़ना छोड़ रखा है। सभी नामवर और राजेंद्र यादव हैं तो वाकई उनके वहां पहुंचने के बाद उनकी किसी रचना की याद रही या जरूरत पड़ी तो देखूंगा। हिंदुस्तान की सड़कों पर लगभग सभी बड़े लेखकों की रचनाएं कम मूल्य पर मिल जाती हैं। अंग्रेजी के लेखक तो अपनी आय से  इस नुकसान को बर्दाश्त कर सकते हैं पावलो कोएल्हो ने तो इसे अपने लिए सम्मान बताया था। पर ये नए हिंदी लेखक न तो इतने महान हैं, न समृद्ध, न उदार ही। ऐसे में बुक पायरेसी जो छपे रूप से होते, ऑनलाइन और पीडीएफ में आसानी से उपलब्ध होती जा रही है, इसके विषय में उन्हें गंभीरता से सोचना चाहिए। 

पुरानी दुर्लभ किताबों को जमा करने का शौक मुझे भी है। ऑनलाइन और पीडीएफ विकल्प मुझे इसमें सहायता भी करते हैं। लेकिन शुक्रवार को रिलीज हुई फ़िल्म की तरह कल प्रकाशित हुई कोई किताब आज पीडीएफ में आ जाये तो यह ठीक नहीं लगता। या फिर इन माध्यमों से भी लेखक को लाभांश मिलने की स्थिति बननी चाहिए। 

मुफ़्त में कोई किताब मिल जाये तो कई गुना पैसे दे उसकी किताब कोई क्यों खरीदेगा! ऐसे में किताब प्रकाशित देखने का शौक भले पूरा हो जाये, बिक्री के आंकड़ों की संतुष्टि कैसे मिलेगी! 

अपने लिए मुझे तो लगता है लेख वगैरह लिखना-छपवाना ही ठीक है। जो कुछ पाठक पढ़ लें वही संतुष्टि रहेगी। वैसे भी साहित्यिक गैंगवार के युग में निर्गुट वालों को तो कोई अवार्ड-सवार्ड भी नहीं मिलना कि कोई लेखक उसी से मुग्ध हो ले... 


Monday, August 10, 2020

एक भूला दिया गया शहज़ादा- दारा शिकोह

दारा शिकोह मुग़ल सल्तनत का एक शहज़ादा जिसे शाहज़हां ने अपना उत्तराधिकारी माना था, जो हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धाराओं के दार्शनिक पहलुओं को जोड़ने  को प्रयासरत था। इसी कड़ी में उसने उपनिषदों का अनुवाद किया, वेदांत और सूफ़ीवाद का तुलनात्मक अध्ययन किया और कई पुस्तकें लिखीं। कहते हैं वह अपने एक हाथ में उपनिषद और दूसरे हाथ में पवित्र कुरान रखते थे। वे भगवान श्रीराम के नाम की अंगुठी पहनते थे तो नमाज़ भी पढ़ते थे।शायद यही प्रतिभा, विद्वता और उदारता उसकी सबसे बड़ी दुश्मन हो गई और शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर औरंगजेब और मुराद ने दारा के काफ़ि़र होने का प्रचार शुरू कर दिया। राजगद्दी के लिए युद्ध हुए और अंत में  को दिल्ली में औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी। 

इससे पहले उसका सार्वजनिक अपमान किया गया जिसका काफी लोमहर्षक वर्णन फ़्रेंच इतिहासकार फ़्राँसुआ बर्नियर ने अपनी किताब 'ट्रेवल्स इन द मुग़ल इंडिया' में किया है।

बर्नियर के अनुसार, "दारा को एक छोटी हथिनी की पीठ पर बिना ढ़के हुए हौदे पर बैठाया गया। उनके पीछे एक दूसरे हाथी पर उनका 14 साल का बेटा सिफ़िर शिकोह सवार था। उनके ठीक पीछे नंगी तलवार लिए औरंगज़ेब का गुलाम नज़रबेग चल रहा था। उसको आदेश थे कि अगर दारा भागने की कोशिश करें या उन्हें बचाने की कोशिश हो तो तुरंत उनका सिर धड़ से अलग कर दिया जाए। दुनिया के सबसे अमीर राज परिवार का वारिस फटे- हाल कपड़ों में अपनी ही जनता के सामने बेइज़्ज़त हो रहा था। उसके सिर पर एक बदरंग साफ़ा बंधा हुआ था और उसकी गर्दन में न तो कोई आभूषण थे और न ही कोई जवाहरात... 

...दारा के पैर ज़ंजीरों में बंधे हुए थे, लेकिन उनके हाथ आज़ाद थे। अगस्त की चिलचिलाती धूप में उसे इस वेष में दिल्ली की उन सड़कों पर घुमाया गया जहाँ कभी उसकी तूती बोला करती थी। इस दौरान उसने एक क्षण के लिए भी अपनी आँखें ऊपर नहीं उठाईं और कुचली हुई पेड़ की टहनी की तरह बैठा रहा। उसकी इस हालत को देख कर दोनों तरफ़ खड़े लोगों की आँखें भर आईं।"

इन्हीं राहों ने ऐसा ही मंजर फिर से देखा जब 30 अगस्त 1659 को उसकी हत्या करवाने के बाद औरंगजेब ने आदेश दिया कि दारा के सिर से अलग हुए धड़ को हाथी पर रख कर एक बार फिर दिल्ली के उन्हीं रास्तों पर घुमाया जाए जहाँ उनकी पहली बार परेड कराई गई थी। दिल्ली के लोग खौफ़ भरी आंखों से इस दृश्य को देखते हैं। दारा के इस कटे हुए धड़ को हुमायूँ के मकबरे के प्रांगण में दफ़ना दिया जाता है।"

मुग़ल सल्तनत के इस विलक्षण शहज़ादे की दुःखद दास्तान यहीं ख़त्म नहीं होती। इटालियन इतिहासकार निकोलाओ मनूची ने अपनी किताब स्टोरिया दो मोगोर में लिखा, "आलमगीर ने अपने लिए काम करने वाले एतबार ख़ाँ को शाहजहाँ को पत्र भेजने की ज़िम्मेदारी दी। उस पत्र के लिफ़ाफ़े पर लिखा हुआ था कि औरंगज़ेब, आपका बेटा, आपकी ख़िदमत में इस तश्तरी को भेज रहा है, जिसे देख कर उसे आप कभी नहीं भूल पाएंगे। उस पत्र को पा कर तब तक बूढ़े हो चले शाहजहाँ बोले, भला हो ख़ुदा का कि मेरा बेटा अब तक मुझे याद करता है। उसी वक्त उनके सामने एक ढ़की हुई तश्तरी पेश की गई। जब शाहजहाँ ने उसका ढक्कन हटाया तो उनकी चीख़ निकल गई, क्योंकि तश्तरी में उनके सबसे बड़े बेटे दारा का कटा हुआ सर रखा हुआ था।"

शाहजहाँ को इससे ज़बर्दस्त आघात पहुंचा। 

दारा शिकोह के दुर्भाग्य की कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई। 

दारा का बाकी का धड़ तो हुमायूँ के मकबरे में दफ़नाया गया लेकिन औरंगज़ेब के हुक्म पर दारा के सिर को ताज महल के प्राँगड़ में गाड़ा गया। उसका मानना था कि जब भी शाहजहाँ की नज़र अपनी बेगम के मक़बरे पर जाएंगी, उन्हें ख़्याल आएगा कि उनके सबसे बड़े बेटे का सर भी वहींं पड़ा है।"

जनता में आक्रोश और बग़ावत की संभावना को खत्म करने के लिए उसकी क़ब्र पर कोई ऐसा चिह्न भी नहीं छोड़ा गया कि उसे पहचाना जा सके। 

लेकिन क्या भारत के भविष्य को एक अलग रुख दे सकने की संभावना वाले व्यक्तित्व का अस्तित्व सदा यूँ ही गुमनामी में खो जाने वाला था! इसके बाद कभी उसे भी देखते हैं...

Saturday, November 2, 2019

‘केरवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय…’: छठ पर्व पर विंध्यवासिनी देवी जी की याद


सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर और फिर आशा भोंसले की तरह ही भोजपुरी लोकगीतों में कोई नाम याद करें तो वो विंध्यवासिनी देवी जी और शारदा सिन्हा जी का होगा। आज की भीड़ में शारदा सिन्हा जी भले अपनी अलग पहचान लिए खड़ी दिखती हों, विंध्यवासिनी देवी की याद कम ही की जाती है। मगर छठ जैसे अवसर जो मिट्टी से जुड़े हैं और पहली बारिश में मिट्टी की खुशबू से सांसों में बसे रहते हैं पर उनके स्वर उसी खुशबू का एहसास दिलाते हैं। 

पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी का जन्म 5 मार्च, 1920 को नाना चतुर्भुज सहाय के घर मुजफ्फरपुर में हुआ था। उनके पिता जगत बहादुर प्रसाद थे, जो रोहतर, नेपाल के रहनेवाले थे। परिवार के सभी लोग धार्मिक प्रवृत्ति के थे, जिसका प्रभाव विंध्यवासिनी देवी पर भी पड़ा।  उनका विवाह मात्र 14 वर्ष की उम्र में हो गया था। एक घटना ने उनके जीवन ही नहीं भोजपुरी लोकगीतों के क्षेत्र में भी बड़ा परिवर्तन ला दिया। कभी किसी आयोजन में एक अन्य राज्य के व्यक्ति ने यह कह दिया कि बिहार के लोग सिर्फ खाना जानते है गाना नहीं। इस घटना ने विंध्यवासिनी देवी को अंदर तक झकझोर दिया जिसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वो गाना गाएंगीं। उनके पति सहवेश्वर चंद्र वर्मा उनके प्रथम संगीत के गुरु बने। श्री क्षितेश चंद्र वर्मा से भी उन्होंने संगीत की विद्या ग्रहण की। 
विंध्यवासिनी देवी ने मैथिली, भोजपुरी, मगही सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी गायन कला प्रदर्शित की और विश्व स्तर पर बिहार की हर भाषा को उन्होंने एक नई पहचान दिलायी। उन्होंने शादी-विवाह ,छठ गीतों के अलावा कई तरह के गीतों को गाया जो काफी प्रसिद्ध हुए। विंध्यवासिनी देवी ने ऑल इंडिया रेडियो, पटना में लोक संगीत के निर्माता के रूप में भी कार्य किया और इस क्षेत्र के उत्थान के लिए उन्होंने विंध्य कला मंदिर नामक संगीत संस्था की स्थापना की, जो भातखण्डे यूनिवर्सिटी लखनऊ से अंगीकृत है।

लोकगीतों के प्रति उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री की उपाधि भी प्रदान की। संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा अहिल्याबाई सम्मान आदि से भी उन्हें सम्मानित किया गई।

उन्होंने लोक संगीत रूपक और लोक नाट्य की रचना ही नहीं की, उनका निर्देशन भी किया। 1962-63 में पहली मगही फिल्म 'भइया' में संगीत निर्देशक चित्रगुप्त के निर्देशन में उन्होंने स्वर दिया। मैथिली फिल्म कन्यादान, छठ मइया, विमाता में डोमकच झिंझिया की लोक प्रस्तुति से काफी ख्याति पाई।


'गरजे-बरसे रे बदरवा', 'हरि मधुबनवा छाया रे...', 'हमसे राजा बिदेसी जन बोल...', 'हम साड़ी ना पहिनब बिदेसी हो पिया देसी मंगा द...' जैसे कई गीत उनकी पहचान के रूप में आज भी कई लोकगीत प्रेमियों की स्मृति में ताजा हैं।  उन्होंने लोकसंगीत को जिंदगी की आखिरी बेला तक रचाये-बसाये रखा।

18 अप्रैल 2006 को पटना के कंकड़बाग में स्थित उनके आवास पर विंध्यवासिनी देवी का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 

आज जब भोजपुरी लोकसंगीत अपसंस्कृति और अश्लीलता के विभिन्न आरोपों से लगातार घिरता जा रहा है, ऐसे ध्रुवतारों की रोशनी अभी भी राह दिखा सकती है...

(स्रोत इंटरनेट पर उपलब्धविभिन्न सामग्री)
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