Thursday, June 18, 2015

‘उसने कहा था’ के सौ साल...




मेरी पसंदीदा कहानियों में संभवतः सर्वोपरि और मेरी पढ़ी हुई कहानियों में सबसे प्रारम्भिक भी... तब भी जाने क्या देखा था इसमें कि इसके आकर्षण से कभी निकल न पाया... बाद में पता चला इसके मुरीदों में एक मैं ही नहीं था, 1915 में छपने के सौ साल के बाद से कितनी पीढ़ियों को इसने आज भी अपने आकर्षण में बांधे रखा है और आगे भी बांधे रहेगी। पंजाब की गलियों की प्यार भरी गालियों के बीच पलती कच्ची उमर के प्यार की यादें, पहली बार दिल को लगी ठेस, और इस प्यार की यादों को दिल में सहेजे आत्मोत्सर्ग भी... क्योंकि उसनेकहा था... क्या नहीं था इस कहानी में पाठकों को खुद से आत्मीयता कायम कर लेने के लिए... इसी कहानी का ही वो जादुई असर था कि ये टिप्पणी एक शाश्वत आलोचना ही बन गई जो पीढ़ियों से वरिष्ठों द्वारा नए लेखकों को प्रेरणा देती आ रही है कि गुलेरी बन गए हो क्या, जो एक ही कहानी से प्रसिद्ध बनना चाहते हो...?” 

इस कहानी के जादू से बौलीवुड भी अछूता न रह सका और 1960 में बिमल रॉय के प्रोडक्शन में मोनी भट्टाचार्य के निर्देशन में सुनील दत्त-नंदा को लेकर इसी नाम से फिल्म भी बनाई गई। शैलेन्द्र के लिखे और सलिल चौधरी के संगीत से सँजोये गाने सुमधुर तो थे ही...
इस कहानी पर बाद में कई नाटकों का भी मंचन किया गया। 


किसी भी संवेदनशील हृदय को छूने में सक्षम इस कहानी हिन्दी साहित्य में एक मील का पत्थर है...


यूँ तो गुलेरी जी ने कुछ अन्य कहानियाँ भी लिखीं मगर उनकी लेखकीय और जीवन यात्रा ज्यादा लंबी न रही... काश कि उनका लेखन हिन्दी साहित्य को और समृद्ध कर पाता, और मेरा सारा लेखन मिल कर भी इस एक कहानी के सदृश्य यश प्राप्त कर पाता... उसने कहा था.....



Thursday, May 14, 2015

भारत-चीन संबंध और डॉ कोटनीस की अमर कहानी


प्रधानमंत्री मोदी आज से अपनी चीन यात्रा पर हैं। चीन के साथ हमारे संबंध ऐतिहासिक होने के साथ काफी उतार-चढ़ाव लेते हुए भी रहे हैं। दोनों देशों के साथ जुड़ी चंद खुशनुमा यादों में डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस की स्मृतियाँ भी शामिल हैं। तो कल 'डॉ कोटनीस की अमर कहानी' की भी याद आएगी ! डॉ द्वारकानाथ कोटनीस वो भारतीय डॉक्टर थे जो 1938 में चीन-जापान युद्ध के दौरान जापानी आक्रमण के समय चीन एक राहत अभियान में गए थे। वहां वो जापानियों के बंदी भी रहे। चीनी युवती चिंग लान ( Guo Qinglan) से उन्होंने विवाह किया, जिससे उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई- जिसका नाम Yinhua  (Yin-India और Hua-China) रखा गया। प्लेग के रोगियों का इलाज करते हुए इसी बीमारी से उनकी मृत्यु भी हुई... 

ख्वाजा अहमद अब्बास लिखित कहानी 'And one didn't didn't come back' के आधार पर सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक व्ही. शांताराम ने अपनी क्लासिक फ़िल्म 'डॉ कोटनीस की अमर कहानी' बनाई थी। फ़िल्म में मुख्य भूमिका स्वयं व्ही. शांताराम और जयश्री ने निभाई थी। भारत-चीन के द्विपक्षीय संबंधों के मध्य डॉ. कोटनीस को बड़े आदर के साथ याद किया जाता है। इन दो देशों के मध्य सिर्फ ऐतिहासिक-व्यापारिक ही नहीं बल्कि ऐसे ही ठोस और सुदृढ़ नागरिक संबंधों की भी आवश्यकता है.....

Sunday, May 10, 2015

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, सिनेमा और नटिर पूजा

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने साहित्य के अलावा न सिर्फ संगीत, चित्रकला, दर्शन आदि में अपना योगदान दिया बल्कि तब के अभिव्यक्ति के उभरते माध्यम सिनेमा के लिए भी एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई। नटिर पूजा एकमात्र ऐसी फ़िल्म है जिसमे गुरुदेव ने निर्देशक तथा एक महत्वपूर्ण पात्र की भूमिका भी निभाई। एक बौद्ध मिथक पर आधारित उनकी कविता 'पुजारिनी' का नाट्य रूपांतरण थी 'नटिर पूजा'। 1932 में टैगोर की 70 वीं वर्षगांठ पर न्यू थियेटर के बैनर तले इसे फ़िल्म के रूप में फिल्माने का प्रयास किया गया। गुरुदेव के ही मार्गदर्शन में स्क्रीनप्ले तैयार किया उनके भतीजे दिनेंद्रनाथ टैगोर ने तो कलाकार शांतिनिकेतन से ही लिए गए। 22 मार्च 1932 को कोलकाता के चित्रा सिनेमा में यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई। निर्माताओं को सफलता की उम्मीद तो थी ही इसलिए फ़िल्म से प्राप्त होने वाली आधी राशि शांतिनिकेतन को समर्पित करने की भी बात थी, मगर आर्थिक सफलता के पैमाने पर फ़िल्म खरी न उतर सकी। संभवतः इसका कारण इसका नृत्य नाटिका स्वरुप था। फिर भी कई समीक्षक इसे बंगला संस्कृति और टैगोर की छाप लिए एक अमूल्य धरोहर मानते हैं। 
इस महामानव को उनके जन्मदिवस पर नमन.....

Tuesday, April 21, 2015

राज अच्छे हैं: Time Capsule


कुछ राज कभी सामने आते नहीं, कुछ राज सामने आने दिये जाते नहीं... कुछ राज आधे सामने आते हैं-आधे पर्दे के पीछे ही रखे जाते हैं... सबके पीछे अपने-अपने स्वार्थ होते हैं... तात्कालिक लाभ के साथ लंबी अवधि तक भ्रम फैलाए रखना भी इसके कारणों में से हैं। और ये देश जिसकी परी और रहस्य कथाओं में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी है वहाँ ऐसे किस्सों का होना तो आम होना ही है...
ऐसे ही किस्सों में एक है टाईम कैपसूल का... यूँ तो ये कहानी एक बार हवा में उठ कर शांत हो चुकी है, मगर कोई कारण नहीं कि  अफवाहों से प्राणवायु लेने वाली लौबी के तत्वावधान में इसे समुचित समय पर फिर हवा न दी जाए...
कहा जाता है कि आजादी की 25 वीं या 26 वीं वर्षगांठ पर तत्कालीन प्र.मं. स्व. इन्दिरा गांधी ने एक टाईम कैप्सूल 1000 वर्षों के लिए लाल क़िला के प्रांगण में कहीं दबवाया था जिसमें इस देश का इतिहास दर्ज था। टाइम कैप्सूल- धातु का एक पात्र होता है जिसके भीतर दस्तावेज और अमूल्य प्रतीक चिह्न रखकर इसे जमीन में दबा दिया जाता है। यह भी कहा गया कि यह कैप्सूल 27 मई को जमींदोज़ किया गया जो कि नेहरू जी
की पुण्यतिथि भी थी और इसमें मात्र नेहरू जी के देश के प्रति योगदानों का ही जिक्र है। खैर एक सनसनीखेज, रहस्यमयी चर्चा का बीजारोपन तो हो ही गया था। परिदृश्य बदला – जनता पार्टी सत्ता में आई। और इसे उनका समर्थन तो मिला ही हुआ था जिनके कंधों पर देश का यथार्थ इतिहास प्रस्तुत करने की स्वआरोपित महती जिम्मेदारी है। कहा गया कि उसने गड़े मुर्दे उखाड़ने की तर्ज यह कैप्सूल भी निकलवाया और इसमें ऐसा कुछ नहीं पाया गया जिसकी और चर्चा की जानी जरूरी लगे... (तहलका पत्रिका, नवम्बर, 2012 में इसके बारे
में कुछ और भी जान सकते हैं) इसके बाद से सभी इसपर चुप हैं, मगर कभी-कहीं सुगबुगाहट होती ही रहती है...
हमें समझना चाहिए कि इतिहास के कई रूप होते हैं। उनकी परतों को उघाड़ना कहीं उल्टा ही न पड़ जाए। हर तरफ-हर चीज की खुदाई हमें खंडहरों, कूड़ों और बदबुओं के बीच ही उलझा देगी... वर्तमान को बेहतर बनाते हुये भविष्य की ओर बढ़ें यही उचित होगा.....

Friday, March 20, 2015

Equinox (समदिवारात्री): एक प्राक्ऐतिहासिक परंपरा की पुनर्स्थापना


हम सामान्यतः सिलेक्टिव और सुविधाजनक इतिहास पसन्द करते हैं और असहज प्रश्नों से परहेज ही बरतने की कोशिश करते हैं। इसी लिये अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने और इतिहास में अपनी जगह तलाशने की प्रवृत्ति पाई जाती है। जिन ट्राइबल्स को असभ्य/अनार्य घोषित किया उनकी वैज्ञानिक सोच को स्वीकार कैसे करते ! रावण को प्रकांड ज्योतिष मानने से इंकार तो नहीँ कियाDismiss मगर उन लोगों की कालगणना किसपर आधारित थी इसपर सुविधाजनक और सुनियोजित चुप्पी साध ली ! आज भी पुस्तकालयों और संग्रहालयों को जमींदोज करना उसी मानसिकता का ही अंग है...
प्रकृति और व्यक्तिगत प्रभावों के बावजूद विश्व में कई ऐसी प्राचीन संरचनाएं अभी भी विद्यमान है जो प्राक्इतिहास में कालगणना के प्रयासों का दस्तावेज हैं। इंग्लैंड का स्टोन हेंज जो सॉल्स्टाइस देखने का प्रमुख स्थान है के बाद संभवतः झाड़खण्ड के हजारीबाग का पंखड़ी बरवाडीह एक मात्र ऐसी जगह है जहाँ Equinox (समदिवारात्री; 20-21 मार्च/ 22-23 सितंबर) के अवलोकन की महापाषाणकालीन परंपरा अन्वेषक श्री शुभाशीष दास द्वारा पुनर्जीवित की गई है। 
ऐसे स्थलों का अध्ययन व संरक्षण वैश्विक आवश्यकता है, यदि हम मानवता के इतिहास को समग्र रूप से समझने के प्रति वाकई गम्भीर हैं। ऐसी एक कड़ी का टूटना हमें अपनी विकास यात्रा की श्रृंखला से अलग कर देगा। यह स्थल भी आज अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है। माईनिंग के माध्यम से विकास और विरासत की जंग में विकास का पलड़ा ही भारी पड़ता दिख रहा है। देखें कब तक महफूज़ रह पाती है ये हमारी साझी विरासत !!!

Saturday, March 7, 2015

होली के रंग: गीतों के संग...





गीत-संगीत का हमारे जीवन में अहम् स्थान है। यही कारण है कि हिंदुस्तानी सिनेमा से भी गानों को अलग नहीं किया जा सकता। होली गीतों के साथ भी यही बात है। कई बेहतरीन गाने जुड़े हैं इस पर्व से। कुछ गाने कहानी को आगे बढ़ाते हैं (जैसे शोले), तो कुछ इसी लिए डाल दिए गए कि होली के बहाने थोड़ी 'लिबर्टी' ले ली जाये। मगर यादों में वही गाने रह जाते हैं जो कहीं न कहीं आपको भी कहीं छु जाते हों। वैसे भी होली के इतने रंगों में कोई भी आपको छु न जाये ये हो भी नहीं सकता। इन गानों की सफलता भी इसी में है कि आज नहीं तो कल कभी न कभी आपको खुद से जोड़ते ही हैं। अपने मनपसंद कुछ फ़िल्मी होली गानों का जिक्र कर रहा हूँ, आप भी अपने पसंदीदा गानों को जोड़ना चाहें तो अच्छा लगेगा... 
मोहे पनघट पे:- क्लासिकल 
होली आई रे कन्हाई:- हिंदुस्तानी मिट्टी की सुगंध लिए 
जा रे हट नटखट:- राधा-कृष्ण की होली एक ही पात्र के द्वारा अभिव्यक्त 
रंग बरसे:- होली के राष्ट्रीय गीत सदृश्य मान्यता प्राप्त यह गीत मुझे चारों मुख्य कलाकारों के बेहतरीन अभिनय के लिए ही पसंद है 
सात रंग में खेल रही है:- 'आखिर क्यों' प्रश्न की शुरुआत ही इस गाने से है 
होली आई होली आई:- अनिल कपूर का टपोरी अंदाज 
आज न छोड़ेंगे:- राजेश खन्ना का आमंत्रण और आशा पारेख की बेबसी... 
इनके अलावे 'सौदागर' में राज कुमार-दिलीप कुमार का होली दृश्य भी यादगार था... 
ये तो थे मेरे मनपसंद सात रंग। आप चाहें तो अपने रंग भी जोड़ इसे आगे बढ़ा सकते हैं.....

Friday, December 26, 2014

मैंने प्यार किया के 25 बरस...







29 दिसंबर 1989 को रिलीज हुई ‘मैंने प्यार किया’ के 25 साल पूरे हो रहे हैं। इसके साथ एक पूरी पीढ़ी जवाँ हुई है जिसकी यादों में यह फिल्म रची-बसी है। किशोर वय प्रेम के रोमानी अहसासों को अभिव्यक्ति देती यह फिल्म कई मायनों में ट्रेंड सेटर थी। शायद इसके पीछे युवा निर्देशक सूरज बड़जात्या की युवा सोच भी थी जिसने राजश्री बैनर की परंपरा को भी एक युवा अंदाज दिया। घिसी-पीटी ऐक्शन फिल्मों के दौर में युवा प्रेम कहानी को बिल्कुल फ़्रेश अंदाज में प्रस्तुत करने का यह प्रयास एक नए दौर के शुरू होने की कहानी कह रहा था। ‘एक लड़का और लड़की दोस्त हो सकते हैं’ के सवाल को स्पर्श करती यह फिल्म युवा पीढ़ी की बदलती सोच को भी अभिव्यक्त कर रही थी। 





स्थापित कलाकारों की भीड़ से अलग नए चेहरों को स्वीकार करने की दर्शकों की चाहत को इस फिल्म की अपार सफलता ने दृढ़ता से स्थापित किया। भाग्य श्री की सरल और घरेलू छवि घर-घर में बस गई, युवा दिलों पर छा गई, सलमान खान नई पीढ़ी के एक रोल मौड़ल के रूप में उभरे। कोई शक नहीं कि शरीर सौष्ठव पर ध्यान देने का ट्रेंड स्थापित करने में भी सलमान की छवि की प्रमुख भूमिका रही जो आज भी कायम है। 


हिन्दी सिनेमा में काफी समय से हाशिये पर पड़ी सहायक भूमिकाओं में माँ की छवि को एक नया आयाम मिला। अपने बेटे को असीम प्यार करने वाली ममतामयी माँ जो उसे संस्कार देती है और जिन संस्कारों पर खड़ा प्रेम जब अपने प्यार की पसंदगी का इज़हार करता है तो सही गलत के पक्ष को समझते हुये वह अपने पति के बजाए बेटे के पक्ष में मजबूती से खड़ी होती है। अथाह लाड़-प्यार में पला बेटा अपने प्यार को पाने के लिए शौर्टकट नहीं अपनाता बल्कि एक ऐसा कठिन रास्ता चुनता है जो उसके प्यार की राह में दीवार बने सभी लोगों को उसके समर्थन में ले ही आता है। विदेश से लौटे प्रेम के माध्यम से पश्चिम और भारतीय परंपराओं का टकराव भी इसके बाद की कई फिल्मों में बखूबी आजमाया गया। दोस्ती, अमीरी-गरीबी, सही-गलत, चालबाजियाँ और सच्चाई तथा प्यार की ताकत जैसी हिन्दी सिनेमा के कई पारंपरिक विषयों को प्रभावी तरीके से स्पर्श किया गया ‘मैंने प्यार किया’ में। तमाम आधुनिकता के बावजूद राजश्री की पारिवारिक फिल्मों की प्रचलित छवि इस फिल्म में भी कायम रखी गई जो इस फिल्म के प्रसिद्ध बिना प्रत्यक्ष संपर्क में आए फिल्माए ‘किस सीन’ से भी झलकती है जो सलमान की नजर में हिन्दी सिनेमा का बेस्ट किस सीन है। 



गौरतलब है कि ‘बीवी हो तो ऐसी’ में अपनी परफ़ौर्मेंस से निराश सलमान ने सूरज से खुद को इस फिल्म में न लेने का भी आग्रह किया था, जिसे सूरज ने नकार दिया और उनका यह सफल साथ आज भी कायम है। इसी तरह भाग्य श्री से पहले यह भूमिका दूरदर्शन के धारावाहिक ‘फिर वही तलाश’ फेम पूनम को औफ़र की गई थी। अगर उन्होने यह भूमिका स्वीकार कर ली होती तो घर-घर और हर जवाँ दिल में बसने वाली सुमन की छवि उन्ही की होती...



इसके साथ राम-लक्ष्मण के संगीत को याद न किया जाना भी अनुचित होगा जिनके माध्यम से हिन्दी सिनेमा में अर्से बाद सुरीले गीतों की पुनः वापसी हुई... 




बहरहाल अपने बेहतरीन अभिनय, संवाद, गीत-संगीत और निर्देशन आदि से सजी यह फिल्म बौलीवुड के इतिहास का एक मील का पत्थर है जो आगे भी कई फिल्म प्रेमियों को आकर्षित और प्रेरित करती रहेगी.......

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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