Friday, March 16, 2012

एक पत्र कॉंग्रेस के नाम.....

विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद इससे पहले कि कॉंग्रेस इसके परिणामों पर मंथन करती वो अब बजट की प्रक्रिया में व्यस्त हो गई है. चुनावों और फिर बजट के परस्पर प्रतिरोधी आवाजों के शोर-गुल के मध्य स्वाभाविक है कि वो उस आम आदमी की आवाज को न सुन पाए जिसके साथ अपने हाथ के होने का दावा पार्टी करती रही है. यह पोस्ट भी ऐसी ही कुछ क्षीण सी आवाजों को अभिव्यक्ति देने का प्रयास है.

देश एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, प्रतिनिधि राजनीतिक पार्टियां और जनता के मध्य एक स्पष्ट संवाद होना नितांत आवश्यक है क्योंकि अब यही भारत के भविष्य की दशा-दिशा निर्धारित करेगा. आम जनता से संवाद की अप्रासंगिकता के बीच यह पोस्ट इसी दिशा में एक शुरुआत है.

स्वतंत्र भारत को एक नई दिशा देने की जिम्मेवारी जनता ने आपको दी. आपने इसे काफी सक्षमता के साथ निभाया भी. देश को इस अवधि में कई उल्लेखनीय सफलता मिली जिसका क्रेडिट साधिकार आप लेते भी रहे हैं, मगर इसके साथ यदि देश ने कहीं कुछ नुकसान उठाया है, कहीं पीछे रह गया है तो उसकी जिम्मेदारी से भी आप मुंह नहीं मोड सकते. 

आज जातियता, क्षेत्रीयता और सांप्रदायिकता  देश के लिए काफी बड़ी आतंरिक समस्या का रूप ले चुकी है. नक्सलवाद और अलगाववाद की भावना भी इन्ही की साइड इफेक्ट्स हैं. निःसंदेह इसके पीछे इनकी पोषक शक्तियों का हाथ है, मगर क्या इनके पनपने के पीछे इन वर्गों से जुड़े आम आदमी की अपेक्षाओं का पूरा न हो पाना कारण नहीं था ! आपकी ओर से विकल्पहीनता और नाउम्मीदी ने उसे अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने को विवश कर दिया और आज यही लोग इन्ही के कन्धों पर चढ कर अपने क्षद्म नेताओं की 'राईजिंग' में अपनी आत्मतुष्टि ढूँढ रहे हैं. समाज के जिन सभी धर्मों और वर्गों को साथ लेकर चलने का सफर जो आपने शुरू किया था, बीच राह में उससे कहाँ और कैसे भटक गए, इस पर आत्मचिंतन करने की जरुरत है. 

उप्र चुनावों के कुछ और सबक -

क्या इससे वाकई कॉंग्रेस को नकारा गया है ? 

शायद नहीं क्योंकि परिवर्तन की आकांक्षी जनता ने राज्य में जिसे सक्षम देखा उसे अपना पूर्ण समर्थन दिया, पिछले विस चुनावों की तरह ही. राज्य के चुनाव के बिंदु अलग होते हैं और यहाँ भी जनता के लिए यही महत्वपूर्ण थे.

केंद्रीय चुनावों में संभावना :

जाहिर है जब जनता केन्द्र के लिए विकल्प ढूंढेगी तो उसमें क्षेत्रीय दलों की वो भूमिका नहीं रहेगी, ऐसा पिछले लोस चुनावों में देखा भी गया. मगर अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए कॉंग्रेस को जनता के सामने वैकल्पिक दल के विरुद्ध अपनी नीतियां और कार्ययोजना प्रभावी ढंग से स्पष्ट करनी होंगीं. ऐसे में प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार की घोषणा को टालते रहने जैसी नीति प्रभावी नाहीं मानी जा सकती.

चेहरों की प्रासंगिकता - 

राजनीती में नए चेहरों और प्रतीकों की प्रासंगिकता सदा से रही है और इसे आपसे बेहतर समझ भी कौन सकता है. आप ही से अलग होकर आप ही के समर्थन से संघर्ष कर जुझारू क्षवि बनाने में सफल रहीं सुश्री ममता बनर्जी की ऐतिहासिक जीत एक प्रत्यक्ष उदाहरण है. राहुल जिस युवा नेतृत्व और टीम की बात कर रहे थे वो उप्र में क्यों नहीं उभारा गया ? उप्र में पार्टी का वोट बैंक और सीटें बढ़ी हैं और इसमें राहुल गाँधी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, मगर आपने वहाँ की जनता को स्पष्ट विकल्प नहीं दिया, कि वो सुश्री मायावती और मुलायम सिंह के  विकल्प के रूप में किसे पायेगी ! इसी दुविधा ने मतदान को भी प्रभावित किया. क्या राहुल गाँधी के लगातार चल रहे अभियानों में एक स्थानीय जुझारू चेहरा ढूँढना इतना कठिन था, जिसे जनता अपने साथ जोड़ सकती !!! उत्तराखंड में भी इसी अनिश्चितता ने ही नई समस्याएं खड़ी की हैं.

खैर अब आगामी लोस चुनाव आर-पार की लड़ाई है. कॉंग्रेस का कमजोर होना देश को विभिन्न पैमानों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने वालों के आगे फेंक देने के समान होगा. इस परिस्थिति में आपको ये हक़ नहीं दिया जा सकता कि सिर्फ बैठ कर तमाशा देखते रहें. अपनी तमाम क्षमताओं के साथ इस निर्णायक लड़ाई में भाग लें. जनता को अपनी नीतियों की स्पष्टता से प्रभावित करें. 'कोई नृप हो हमें क्या हानि' की धारना को मजबूत करने में जाने-अनजाने आपकी भागीदारी से उदासीन हो जाने वाली जनता अभी नहीं समझ पायेगी कि वो अपने लिए कितना बड़ा आत्मघाती कदम उठाने जा रही है... आपके द्वारा उठाये जा रहे 'ठोस कदम' भले ही बीच में 'आन्दोलनों', चुनावों और विभिन्न कारणों से ढीले पड़ गए हों, मगर अब निर्णायक कदम उठाने का समय आ चूका है. बस ध्यान इस बात का रखें कि आपके क़दमों से कोई तबका उपेक्षित न महसूस करने लगे. सभी को बराबर अधिकार मिले, सम्मान और न्याय भी. इन् मुलभूत अपेक्षाओं के पूरा न हो पाने पर ही अवांक्षित शक्तियां उसकी जगह ले लेती हैं; उसी प्रकार जैसे प्रशासन और क़ानूनी ढांचे के लचर होने पर कोई 'वैकल्पिक मसीहा'/'भगवान' या व्यवस्था विकसित होने लगती है...

प्रिय कॉंग्रेस, यदि दलीय व्यवस्था में ही चलना है तो देश के संविधान और क्षवि को बनाये रखने में आपकी भूमिका सबसे अहम है, और आपको ये जिम्मेवारी उठानी ही होगी. वर्ना देश को होने वाले संभावित नुकसान की जिम्मेदारी किसी अन्य राजनीतिक दल की सफलता से कहीं ज्यादा आपकी असफलता को माना जायेगा. आशा है आप अपनी जिम्मेदारी को शिद्दत से समझेंगे.

बातें तो कई हैं, मगर थोडा कहा ज्यादा समझना. (जानता हूँ कि ये 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' भी ज्यादा दिनों तक नहीं.....)

राष्ट्र का शुभाकांक्षी 
एक आम आदमी  

Tuesday, March 6, 2012

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली (25 फरवरी - 4  मार्च) समाप्त हो गया. पुस्तकों से आत्मीयता को शब्दों में तो बांधा नहीं जा सकता, मगर मेले में कुछ नए लोगों से मुलाकात, परिचय और संभावित मित्रता की उम्मीदों के साथ यादगार रहा ये आयोजन. तस्वीरों के माध्यम से एक भ्रमण - 

पुस्तकें ही पुस्तकें...






' पवित्र कुरान ' की मुफ्त प्रतियों का वितरण आकर्षण का केंद्र रहा,  आर्य समाज प्रकाशन की और से 'सत्यार्थ प्रकाश' की प्रति भी मात्र दस रु. में उपलब्ध कराई गई. 
' हिंद युग्म ' के स्टॉल पर प्रसिद्ध ब्लौगर शैलेष भारतवासी 



राजधानी नई दिल्ली के सौ वर्ष पर एक प्रदर्शनी भी...



मेला की थीम - भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष पर एक विशेष दीर्घा भी.....





अंतर्राष्ट्रीय  प्रकाशक - 




चंद नामचीन अतिथि भी...



ये तो मात्र एक झलक ही है जो मैं अपने भ्रमण के दौरान जुटा पाया..... 

Thursday, February 9, 2012

कला जगत का एक उभरता नाम - दीपाली साहा


शान्तिनिकेतन की मिटटी से उठने वाली खुशबू कला-संस्कृति, संगीत आदि विभिन्न पक्षों के रग-रग में  रसी - बसी है. इसी खुशबू को अपने अन्दर बसाये और अपने चारों ओर धीमे-धीमे महका रहे कलाकारों में एक नाम दीपाली साहा का भी है. हाल ही में इनके चित्रों की एक प्रदर्शनी नई दिल्ली के इण्डिया हैबिटेट सेंटर  में देखने को मिली, जिसने वाकई काफी प्रभावित किया. ' Ecological Agonies :- Tribute to Rabindranath Tagore ' नामक इस कला प्रदर्शनी में इस कलाकार के कई पक्षों  को देखने का अवसर मिला. 


उनकी कला में पर्यावरण, शान्तिनिकेतन के उनके अनुभव, टैगोर के विचारों का प्रभाव तथा निश्चित रूप से उनके व्यक्तिगत अनुभवों की भी प्रचुर झलक मिलती है.  


आसनसोल में जन्मीं और विश्व भारती से बैचलर ऑफ़ फाइन आर्ट्स की शिक्षा प्राप्त कर चुकीं दीपाली के देश-विदेश में कई एकल और ग्रुप प्रदर्शनियां आयोजित हो चुकी हैं. कला जगत के कई महत्वपूर्ण पुरष्कारों से भी वो सम्मानित हो चुकी हैं. उनकी कृतियों में दार्शनिक और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण की बखूबी झलक मिलती है जो उनके द्वारा प्रयोग किये गए रंगों के विशिष्ट चयन में और भी प्रखरता से उभर कर सामने आती है. 

उनकी कृतियाँ उनके एक उत्कृष्ट कलाकार के रूप में उभरने की तमाम संभावनाएं दर्शाती हैं. ऐसे कलाकारों के माध्यम से ही गुरुदेव और शान्तिनिकेतन की माटी की खुशबू समस्त विश्व में व्याप्त होती रह सकेगी. कला जगत में उनके स्वर्णिम भविष्य की शुभकामनाएं. 

Thursday, February 2, 2012

संस्कृति के सरोकारों से जुड़े - श्री रणबीर सिंह

जुलाई 2011  में श्री अरविन्द मिश्र जी ने अपने दिल्ली प्रवास के दौरान ICMR में बिताये लम्हों का यहाँ  जिक्र करते हुए मुझे श्री  रणबीर सिंह जी से मिलने और उनकी शागिर्दी स्वीकार करने का निर्देश दिया था. सृजनात्मक प्रवृत्ति के व्यक्तियों से मिलने का अवसर मैं छोड़ना नहीं चाहता और कला तथा संस्कृति में तो मेरी रुची है ही. रणबीर जी से संपर्क तो पिछले काफी समय से रहा, मगर मिलना उनकी अथवा मेरी कार्यालयीय बाध्यताओं के कारण संभव न हो पा रहा था. आख़िरकार बीती जनवरी के अंत में उनसे मिलने का सुखद संयोग आ ही गया. और यह वाकई एक संजोग ही कहा जायेगा कि  उनसे मिलने की परिस्थितियां काफी कुछ अरविन्द जी से पहली मुलाकात के ही समरूप थीं, जब उनसे मिलने सुबह-सुबह बनारस से कालीन नगरी भदोही जाना पड़ा था, और अब इस बार भी 26  जनवरी की सुबह मैं बस से रोहतक जा रहा था, जहाँ कला व  संस्कृति की एक नई ही दुनिया से परिचय प्राप्त होने वाला था.  

श्री  रणबीर सिंह जी 

रनबीर सिंह जी नई दिल्ली स्थित इन्डियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च में पी. आर. ओ. हैं. अपनी कार्यालयीय जिम्मेवारियों के कुशल निर्वहन के साथ ही उनका अपनी विरासत, कला और संस्कृति के प्रति काफी गहरा जुडाव है, जिसने उन्हें लगभग पिछले 30  वर्षों से इस विषय में स्वतंत्र शोध व अनुसन्धान के लिए प्रेरित  कर रखा है. इसका परिणाम आज उनकी जयपुर और हरियाणा की कला और वास्तु से परिचित कराती दो पुस्तकों  के अलावे 1000  से ज्यादा लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं. विज्ञान से जुड़े विषयों पर भी उनके 300  से ज्यादा पेपर और लेख आदि प्रकाशित हो चुके हैं. हाल ही में हरियाणा के इनसाइक्लोपीडिया के निर्माण में भी उनके अनुभवों का लाभ उठाया गया है. हरियाणा और राजस्थान सहित देश के कई भागों में वो अपनी जिज्ञासु और शोधपूर्ण दृष्टि के साथ भ्रमण कर जानकारियां एकत्र करते रहे हैं. अपनी संस्कृति और विरासत के प्रति उनके लगाव को इस एक उदाहरण से ही समझा जा सकता है कि अपनी खोज के क्रम में मात्र अपने स्कूटर से ही वो 2 लाख किमी से ज्यादा की दूरी तय कर चुके हैं. सच कहूँ तो इस पूरे परिदृश्य में उनके योगदान को किसी एक ब्लॉग पोस्ट में समेत पाना कम-से-कम मेरे बस की तो बात नहीं ही है..... 

बिना किसी सरकारी या बाह्य सहायता के वो इस सांस्कृतिक अभियान में अपनी अंतरप्रेरणा से दृढसंकल्पित   भाव से लगे हुए हैं. कहने को तो वो फेसबुक जैसी ' सोशल नेट्वर्किंग साइट्स' से भी जुड़े हुए हैं. पिछले कुछ समय से वो अपने ब्लॉग के साथ भी अपने विचारों को शेयर कर रहे हैं, मगर अपनी मूल प्राथमिकताओं को नजरंदाज न करने का उनका दृढसंकल्प वाकई हम सभी के लिए प्रेरक है.

यह मैं अपना बहुत बड़ा सौभाग्य मानता हूँ कि मुझे श्री रणबीर सिंह जी के साथ उनके कार्यक्षेत्र को देखने-समझने का मौका मिला. इतने अनुभवी और समर्पित व्यक्तित्व के ज्ञान को एक मुलाकात में आत्मसात कर पाने की बात अकल्पनीय ही है. मेरा प्रयास तो मात्र उनकी कार्य पद्धति, अपनी विरासत को देखने के उनके नजरिये को समझना ही था. और शागिर्दी का तो ये आलम था कि जहाँ -तहां अब तक क्लिक कर आत्ममुग्ध होता  रहा मैंने अपना कैमरा  भी उन्ही के हाथों में सौंप दिया ताकि एक-आध वाकई करीने की कुछ तसवीरें ले पाने का सौभाग्य इस कैमरे को भी हासिल हो जाये. 

अपने तीन दिवसीय  प्रवास में रणबीर सिंह जी के साथ रोहतक के कुछ भागों विशेषकर गांवों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने का अवसर मिला जो निश्चित रूप से इस सन्दर्भ में मेरे दृष्टिकोण को परिमार्जित करने में सहायक सिद्ध होगा. 

अरबिंद मिश्र जी को भी हार्दिक  धन्यवाद जो उन्होंने इन अनूठे व्यक्तित्व का मुझसे परिचय कराया. 

आशा है रणबीर सिंह जी भी जहाँ अपनी विरासत के प्रति नवीन जानकारियां एकत्र करते हुए इनके डोक्युमेंटेशन को और समृद्ध करेंगे, वहीँ उनके साथ मिलने के और भी कुछ अवसर मुझे मिलते रहेंगे ताकि उनकी शागिर्दगी के रंग में थोडा और सराबोर हो सकूँ. 

चलते-चलते उनकी शागिर्दी में ली गईं कुछ तसवीरें - छायांकन के अलावे अपनी विरासत से जुडी हुईं भी.....

पगडंडियों पर 

एक ग्रामीण चौपाल 


एक ग्रामीण हवेली 

रोहतक में हरियाणवी संस्कृति की पहचान - जाट भवन 


Tuesday, January 24, 2012

नॉर्वे में अपने बच्चों के लिए संघर्षरत भारतीय दंपत्ति...



अपने बच्चों और परिवार के लिए बेहतर भविष्य और संभावनाओं की तलाश में विकसित देशों में जाने वाले भारतीय परिवार पहले भी कई बार विभिन्न असहज परिस्थितियों में पड़ते रहे हैं, मगर ऐसी परिस्थिति की शायद ही किसी ने कल्पना की हो - जो उन्हें अपने बच्चों, अपने परिवार से ही अलग कर दे... 

जी हाँ, ऐसा ही हुआ है भारतीय मूल के भू-भौतिकी शास्त्री अनुरूप भट्टाचार्य और उनकी पत्नी श्रीमती सागरिका भट्टाचार्य के साथ. 2007 से नॉर्वे में रह रहे इस दंपत्ति के बच्चों तीन वर्षीय अभिज्ञान और एक वर्षीय ऐश्वर्या को वहां की एक संस्था ' नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर्स सोसायटी ' ने अपने कब्जे में ले लिया है. इस निर्णय का कारण अभिभावकों द्वारा अपने बच्चो की उचित देखभाल न किये जाने को बताया गया है. और इसके समर्थन में उदाहरण ये दिए गए हैं कि ये लोग अपने बच्चों को हाथ से खाना खिलाते थे और इन्हें सोने के लिए दूसरे कमरे में नहीं रखते !!! 

जाहिर सी बात है कि भारतीय परिवेश में बच्चों के लालन-पालन के जो संस्कार इस दंपत्ति को मिले थे वो वहां की परिस्थितयों से सामंजन नहीं बिठा पा रहे थे. अब यहाँ तकनिकी समस्या ये भी है कि बच्चों की वीजा अवधि फरवरी में समाप्त हो रही है, और इस परिस्थिति में शायद उन्हें अपने माता-पिता के साथ लौटने न दिया जाये. इसके अलावे वहां के क़ानूनी प्रावधानों के अनुसार ये अपने बच्चों के 18 साल के होने तक साल में मात्र दो बार और वो भी एक-एक घंटे के लिए ही मिल पाएंगे. 

इस सन्दर्भ में भटाचार्य दंपत्ति और उनके परिजनों ने अपने स्तर पर कई प्रयास किये हैं. इन्होने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल सहित कई संबद्ध पक्षों तक अपनी बात पहुंचाई है. नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने भी नॉर्वे की सरकार से इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की मांग की है.

इस सन्दर्भ में विभिन्न समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं में भी कई रिपोर्ट्स आदि प्रकाशित हो चुकी हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स में भी इस मुद्दे को उठाया जा रहा है. स्वयं हमने भी इस विषय पर फेसबुक पर ' Let's Support Anurup Bhattacharya ' नामक Page की शुरुआत की है. 

मामले को सुलझाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत विदेश मंत्री श्री एस. एम्. कृष्णा के इस बयान से भी मिली है जिसमें उन्होंने नॉर्वे सरकार से इस मुद्दे पर शीघ्र और 'यथोचित समाधान' सुनिश्चित करने की मांग की है. इस संबंध में नॉर्वे के संबंधित अधिकारियों से बात होने की संभावना भी जताई जा रही है. माना जा रहा है कि नॉर्वे सरकार बच्चों को उनके माता-पिता के बजाये भारत में उनके दादा-दादी को सौंपे जाने पर सहमत हो सकती है. 

नॉर्वे की चाईल्ड प्रोटेक्टिव सर्विस के सख्त प्रावधानों की दुनिया भर में आलोचना होती रही है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भी इसका जिक्र होने की खबरें आ चुकी हैं. इस नए विवाद ने इस विषय को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. आशा है जहाँ इस प्रसंग में भट्टचार्य दंपत्ति को न्याय मिलेगा, वहीँ दूसरे देशों की सरकारें भी ऐसे मामलों में संबद्ध देशों की संस्कृति - परिवेश आदि को भी ध्यान में रखेंगीं...

(सामग्री और तसवीरें अख़बारों, गूगल और फेसबुक आदि से संकलित)

Monday, January 23, 2012

हजारीबाग की स्मृतियों में - नेताजी सुभाषचन्द्र बोस.....



सुभाषचंद्र  बोस - एक ऐसा नाम जो सदा-सर्वदा के लिए अपने चाहने वाले देशवासिओं  के दिलो-दिमाग पर छा चूका है. यूँ तो इस नाम की छाप  पूरे देश के जर्रे-जर्रे में है, मगर मैं यहाँ उनके झाड़खंड के एक छोटे से शहर हजारीबाग से जुड़े कुछ संस्मरणों की चर्चा करने जा रहा हूँ. 

सन 1940 में हजारीबाग के रामगढ में कांग्रेस का 53 वाँ राष्ट्रिय अधिवेशन हुआ था, जिसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने की थी. इसी के समानांतर सुभाष बाबु ने स्वामी सहजानंद सरस्वती के आह्वान पर 19 मार्च, 1941 को अपना प्रसिद्ध 'समझौता विरोधी सम्मलेन' किया था. हजारीबाग से उनका व्यक्तिगत जुडाव भी रहा. 11 फरवरी, 1940 को सुभाष जी का हजारीबाग आगमन हुआ और एक भव्य शोभायात्रा के पश्चात स्थानीय केशव हॉल में उनका संबोधन भी हुआ था. हजारीबाग स्टेडियम में भी राष्ट्रनायक ने जनता को संबोधित किया था. नेताजी को 1940 में कैद कर हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में भी रखा गया था. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जेल में उनकी एक तस्वीर भी लगे गई थी जिसपर नेताजी के हस्ताक्षर भी थे, जो आजकल गायब है. 

स्थानीय  केशव हॉल 

इतिहास की कई स्मृतियों के साक्षी ये स्थल आज जानकारी और जागरूकता के आभाव में अपने महत्व को खोते जा रहे हैं, मगर स्थानीय बंग समुदाय के प्रयासों से पिछले कई वर्षों से यहाँ एक प्रतीकात्मक 'रंगून मार्च' का आयोजन होता आ रहा है, जिसमें भागीदारी नई पीढ़ी को इस महानतम से जुडी अपनी विरासत के प्रति एक सन्देश तो दे ही रही है. 

देश के इस अमर सेनानी को उनके जन्मदिन के पावन अवसर पर कोटिशः  नमन.....

Sunday, January 8, 2012

रंगमंच से - कालिदास की मालविकाग्निमित्रम

खजुराहो में प्राचीन भारत की समृद्ध संस्कृति और विरासत से रूबरू हो लौटने के तुरंत बाद ही हमारे समृद्ध  इतिहास की एक और विरासत से साक्षात्कार का अवसर मिला - भारत की पारंपरिक 'नौटंकी' शैली में महाकवि कालिदास की सांस्कृतिक रचना 'मालविकाग्निमित्रम' की नाट्य प्रस्तुति के रूप में. 


नई दिल्ली के ' Indian  Habitat  Centre ' के स्टीन ऑडिटोरियम में श्री अतुल यदुवंशी द्वारा परिकल्पित  व निर्देशित ' स्वर्ग रंगमंडल ' की प्रस्तुति मालविकाग्निमित्रम महाकवि कालिदास की प्रथम रचना मानी जाती है. 

लगभग 2200 वर्ष पूर्व के युग का चित्रण करते इस नाटक में शुंग वंश जो कि वैदिक पुनर्जागरण का भी दौर था के काल की कला, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था आदि की उल्लेखनीय झलक मिलती है. इस नाटक में कालिदास जी द्वारा स्वांग, चतुष्पदी क्षंद तथा गायन के साथ अभिनय के भी संकेत किये गए हैं, जो इंगित करते हैं कि उस युग में भी इन लोकनाट्य के तत्व विद्यमान थे.


नाटक की कथावस्तु राजकुमारी मालविका और विदिशा नरेश महाराज अग्निमित्र के मध्य प्रेम पर केन्द्रित है. विदर्भ राज्य पर अधिकार हेतु संघर्ष की स्थिति में माधवसेन अपनी बहन मालविका को सुरक्षा हेतु अन्यत्र भेज देते हैं. परिस्थितिवश मालविका को गुप्त रूप से विदिशा जाना पड़ता है जहाँ वो राजकीय रंगशाला में संगीत-नृत्य आदि का प्रशिक्षण प्राप्त करती है. अग्निमित्र एक चित्र में मालविका को देख उसपर मोहित हो जाते हैं. महारानी धारिणी इनके प्रेम प्रसंग को रोकने के प्रयास करती है, मगर राजा का मित्र और विदूषक (जो कि तत्कालीन नाटकों का एक अभिन्न भाग हुआ करता था) गौतम के प्रयासों से दोनों का मिलन होता है. नाटक के अंत में मालविका की राजसी पृष्ठभूमि के संबंध में ज्ञात होने पर धारिणी स्वयं मालविका और अग्निमित्र का विवाह करवा देती है. 

निर्देशक अतुल यदुवंशी अपनी टीम के साथ...
नाटक के एक दृश्य में तत्कालीन मान्यता कि सुन्दर स्त्रियों के चरण प्रहार से अशोक के फूल पुष्पित हो जाते हैं का भी रोचक वर्णन किया गया है. 

प्रमुख कलाकारों में अग्निमित्र - अजित विक्टर नाथ, मालविका - देविका पांडे, विदूषक गौतम - गौरव के अभिनय ने प्रभावित किया. नाटक के प्रस्स्तुतिकरण में इसके गीत - संगीत की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही...

लोक नाट्य और सांस्कृतिक तत्वों को अमूमन एक दुसरे पर वर्चस्व के रूप में ही कल्पित किया गया है, मगर स्वर्ग ग्रुप की ये प्रस्तुतियां देश के पारंपरिक और सांस्कृतिक विरासत के समन्वय का एक अनूठा उदाहरण हैं. इस ग्रुप ने कालिदास, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, रेणु आदि की कई रचनाओं को भी नौटंकी शैली में अभिव्यक्ति दी है. संस्था को उसके इस अभिनव और सांस्कृतिक समन्वय के प्रयास के लिए शुभकामनाएं.  

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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