विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद इससे पहले कि कॉंग्रेस इसके परिणामों पर मंथन करती वो अब बजट की प्रक्रिया में व्यस्त हो गई है. चुनावों और फिर बजट के परस्पर प्रतिरोधी आवाजों के शोर-गुल के मध्य स्वाभाविक है कि वो उस आम आदमी की आवाज को न सुन पाए जिसके साथ अपने हाथ के होने का दावा पार्टी करती रही है. यह पोस्ट भी ऐसी ही कुछ क्षीण सी आवाजों को अभिव्यक्ति देने का प्रयास है.
देश एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, प्रतिनिधि राजनीतिक पार्टियां और जनता के मध्य एक स्पष्ट संवाद होना नितांत आवश्यक है क्योंकि अब यही भारत के भविष्य की दशा-दिशा निर्धारित करेगा. आम जनता से संवाद की अप्रासंगिकता के बीच यह पोस्ट इसी दिशा में एक शुरुआत है.
स्वतंत्र भारत को एक नई दिशा देने की जिम्मेवारी जनता ने आपको दी. आपने इसे काफी सक्षमता के साथ निभाया भी. देश को इस अवधि में कई उल्लेखनीय सफलता मिली जिसका क्रेडिट साधिकार आप लेते भी रहे हैं, मगर इसके साथ यदि देश ने कहीं कुछ नुकसान उठाया है, कहीं पीछे रह गया है तो उसकी जिम्मेदारी से भी आप मुंह नहीं मोड सकते.
आज जातियता, क्षेत्रीयता और सांप्रदायिकता देश के लिए काफी बड़ी आतंरिक समस्या का रूप ले चुकी है. नक्सलवाद और अलगाववाद की भावना भी इन्ही की साइड इफेक्ट्स हैं. निःसंदेह इसके पीछे इनकी पोषक शक्तियों का हाथ है, मगर क्या इनके पनपने के पीछे इन वर्गों से जुड़े आम आदमी की अपेक्षाओं का पूरा न हो पाना कारण नहीं था ! आपकी ओर से विकल्पहीनता और नाउम्मीदी ने उसे अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने को विवश कर दिया और आज यही लोग इन्ही के कन्धों पर चढ कर अपने क्षद्म नेताओं की 'राईजिंग' में अपनी आत्मतुष्टि ढूँढ रहे हैं. समाज के जिन सभी धर्मों और वर्गों को साथ लेकर चलने का सफर जो आपने शुरू किया था, बीच राह में उससे कहाँ और कैसे भटक गए, इस पर आत्मचिंतन करने की जरुरत है.
उप्र चुनावों के कुछ और सबक -
क्या इससे वाकई कॉंग्रेस को नकारा गया है ?
शायद नहीं क्योंकि परिवर्तन की आकांक्षी जनता ने राज्य में जिसे सक्षम देखा उसे अपना पूर्ण समर्थन दिया, पिछले विस चुनावों की तरह ही. राज्य के चुनाव के बिंदु अलग होते हैं और यहाँ भी जनता के लिए यही महत्वपूर्ण थे.
केंद्रीय चुनावों में संभावना :
जाहिर है जब जनता केन्द्र के लिए विकल्प ढूंढेगी तो उसमें क्षेत्रीय दलों की वो भूमिका नहीं रहेगी, ऐसा पिछले लोस चुनावों में देखा भी गया. मगर अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए कॉंग्रेस को जनता के सामने वैकल्पिक दल के विरुद्ध अपनी नीतियां और कार्ययोजना प्रभावी ढंग से स्पष्ट करनी होंगीं. ऐसे में प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार की घोषणा को टालते रहने जैसी नीति प्रभावी नाहीं मानी जा सकती.
चेहरों की प्रासंगिकता -
राजनीती में नए चेहरों और प्रतीकों की प्रासंगिकता सदा से रही है और इसे आपसे बेहतर समझ भी कौन सकता है. आप ही से अलग होकर आप ही के समर्थन से संघर्ष कर जुझारू क्षवि बनाने में सफल रहीं सुश्री ममता बनर्जी की ऐतिहासिक जीत एक प्रत्यक्ष उदाहरण है. राहुल जिस युवा नेतृत्व और टीम की बात कर रहे थे वो उप्र में क्यों नहीं उभारा गया ? उप्र में पार्टी का वोट बैंक और सीटें बढ़ी हैं और इसमें राहुल गाँधी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, मगर आपने वहाँ की जनता को स्पष्ट विकल्प नहीं दिया, कि वो सुश्री मायावती और मुलायम सिंह के विकल्प के रूप में किसे पायेगी ! इसी दुविधा ने मतदान को भी प्रभावित किया. क्या राहुल गाँधी के लगातार चल रहे अभियानों में एक स्थानीय जुझारू चेहरा ढूँढना इतना कठिन था, जिसे जनता अपने साथ जोड़ सकती !!! उत्तराखंड में भी इसी अनिश्चितता ने ही नई समस्याएं खड़ी की हैं.
खैर अब आगामी लोस चुनाव आर-पार की लड़ाई है. कॉंग्रेस का कमजोर होना देश को विभिन्न पैमानों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने वालों के आगे फेंक देने के समान होगा. इस परिस्थिति में आपको ये हक़ नहीं दिया जा सकता कि सिर्फ बैठ कर तमाशा देखते रहें. अपनी तमाम क्षमताओं के साथ इस निर्णायक लड़ाई में भाग लें. जनता को अपनी नीतियों की स्पष्टता से प्रभावित करें. 'कोई नृप हो हमें क्या हानि' की धारना को मजबूत करने में जाने-अनजाने आपकी भागीदारी से उदासीन हो जाने वाली जनता अभी नहीं समझ पायेगी कि वो अपने लिए कितना बड़ा आत्मघाती कदम उठाने जा रही है... आपके द्वारा उठाये जा रहे 'ठोस कदम' भले ही बीच में 'आन्दोलनों', चुनावों और विभिन्न कारणों से ढीले पड़ गए हों, मगर अब निर्णायक कदम उठाने का समय आ चूका है. बस ध्यान इस बात का रखें कि आपके क़दमों से कोई तबका उपेक्षित न महसूस करने लगे. सभी को बराबर अधिकार मिले, सम्मान और न्याय भी. इन् मुलभूत अपेक्षाओं के पूरा न हो पाने पर ही अवांक्षित शक्तियां उसकी जगह ले लेती हैं; उसी प्रकार जैसे प्रशासन और क़ानूनी ढांचे के लचर होने पर कोई 'वैकल्पिक मसीहा'/'भगवान' या व्यवस्था विकसित होने लगती है...
प्रिय कॉंग्रेस, यदि दलीय व्यवस्था में ही चलना है तो देश के संविधान और क्षवि को बनाये रखने में आपकी भूमिका सबसे अहम है, और आपको ये जिम्मेवारी उठानी ही होगी. वर्ना देश को होने वाले संभावित नुकसान की जिम्मेदारी किसी अन्य राजनीतिक दल की सफलता से कहीं ज्यादा आपकी असफलता को माना जायेगा. आशा है आप अपनी जिम्मेदारी को शिद्दत से समझेंगे.
बातें तो कई हैं, मगर थोडा कहा ज्यादा समझना. (जानता हूँ कि ये 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' भी ज्यादा दिनों तक नहीं.....)
राष्ट्र का शुभाकांक्षी
एक आम आदमी





























