Friday, December 25, 2009

aakanksha और shubhkaamnayein.

काफी दिनों के baad  यह पोस्ट बेज प् रहा हूँ. पिछले दिनों बनारस यात्रा के दौरान बनारस हिन्दू वि.वि. की पहली  vigyan patrika प्राप्त हुई जिसमें मेरा एक लेख - " आतंकवाद की चुनौतियाँ और साहित्य' चयनित और प्रकाशित हुआ था. इसे इस पोस्ट के साथ आत्ताच कर रहा हूँ. आशा है इसके कुछ विचारों से कहीं-न- कहीं आप भी सहमत होंगे.
 
आज पुनः फिएल्ड जा रहा हूँ, लगभग २ महीनों के लिए. इन्टरनेट के अपने स्टार पर यथासंभव असहयोग के बावजूद यह पोस्ट करने और इसी के साथ आप sabhi ko krismas और nav varsh की shubhkaamnayein dene ka pryas कर रहा हूँ.
hardik shubhkaamnayein.

Monday, November 9, 2009

सूर्योदय के प्रदेश का सूर्योदय



जब तक यह पोस्ट आपके सामने होगी मैं पुनः फिल्ड में होऊंगा. साइबर कैफे पर निर्भरता ने पिछले फिल्ड वर्क की तस्वीरें तो आपतक पहुँचाने में बाधा जरुर डालीं, मगर वापस लौट इस कमी को पूरा करने का प्रयास जरुर करूँगा.
इस पोस्ट के साथ हैं मेरी फोटोग्राफी जीवन की कुछ अत्यंत कठिन तस्वीरों में से एक- 'अरुणाचल का सूर्योदय'. सूर्योदय के प्रदेश में इस दृश्य को कैमरे में कैद करना कितना मुश्किल है यह मैं ही जानता हूँ. यहाँ आने के एक महीने बाद सूर्य को पकड़ सका और ये छवियाँ कैद कर आप तक पहुंचा रहा हूँ. अगली मुलाकात तक नए सूर्योदय और नई शुरुआत की कामना के साथ-

Friday, November 6, 2009

ब्लॉग जगत के 2 स्तंभ

जिनके बिना अधूरी थी चर्चा
अटैचमेंट में इन्टरनेट का असहयोग फोटोज के साथ पोस्ट्स पर भारी पड़ रहा है. ऐसे में ब्लौगिंग जारी रह पा रही है इसमें कुह महत्त्वपूर्ण ब्लौगिंग हस्तियों का भी योगदान रहा है।

अपनी पिछली एक पोस्ट में मैंने अपने संपर्क में आये कुछ ब्लौगर्स की चर्चा की थी, यह चर्चा अधूरी है यदि इनमें दो और नामों को शामिल न कर लूँ. ये दो सज्जन हैं - हिंदी ब्लॉग टिप्स के आशीष खंडेलवाल जी और हिन्दयुग्म के शैलेश भारतवासी
आशीष जी औरों की नजर में चाहे जो हों, मैं तो उन्हें ब्लॉग जगत का 'मुग़ल - ऐ - आजम' मानता हूँ। उनके दिए टिप्स ने ब्लॉग जगत की तस्वीर बदलने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.किसी भी तकनिकी समस्या के लिए उनकी सहज उपलब्धता हम ब्लौगर्स को कितनी राहत देती है इसकी अभिव्यक्ति सहज नहीं। उनकी तारीफ में शब्द भी कम हैं और मेरे पास समय भी. (क्योंकि आज पुनः फिल्ड जा रहा हूँ) इसलिए बस इतना ही.

शैलेश जी से मेरी मुलाकात 'रांची ब्लौगर्स मीट' में हुई थी। हिंदी ब्लौगिंग को लोकप्रिय बनाने में इनका भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस संबंध में किसी भी सहयोग के लिए वो सदा तत्पर रहते हैं. अपनी घुमक्कड़ नियती और साइबर कैफे आदि पर निर्भरता से मैं उनका ज्यादा लाभ नहीं उठा सका हूँ मगर वजह - बेवजह उन्हें परेशान करने का मौका हाथ से जाने नहीं देता.
आशा है हिंदी ब्लॉग जगत की ये विभूतियाँ इस ब्लॉग परिवार को आगे भी सदा यूँ ही समृद्ध करती रहेंगीं. शुभकामनाएं.

Monday, November 2, 2009

आज इन नजारों को तुम देखो...

(अरुणाचल का अनदेखा - अनछुआ सौंदर्य पहली बार सिर्फ आपके लिए)

जाते थे जापान, पहुँच गए चीन- मेरे लिए इस कहावत का भावात्मक ही नहीं, शब्दात्मक संबंध भी है.  कैसे! यह कभी और बताऊंगा. फिलहाल तो यही की अकादमिक जगत में कैरियर की संभावनाएं तलाशता अब कन्ष्ट्रक्शन के क्षेत्र में आ गया हूँ; और इस सुदूर अरुणाचल में 'आने वाले कल की बुनियाद' रख रहा हूँ. हाल के फिल्ड वर्क के अनुभवों की चर्चा अगली पोस्ट्स में करूँगा.

इस बार आप तक पहुंचा रहा हूँ इस सुदूरवर्ती क्षेत्र के अछूते और अप्रतिम सौंदर्य को झलकाती चंद तस्वीरें :

1. हुस्न पहाडों का
2. इजाजत हो तो इसे 'मन्दाकिनी फाल नाम दे दूँ ?
3. झर-झर झरते पड़ी झरने
4. नवयौवना नदी की अल्हड़ मस्ती

Saturday, October 31, 2009

Arunachal Mein Chath II

Yeh Internet ki suvidha (!) ka natija hai.

Arunachal mein Chath

NE aadi pradeshon ko patrachar ki samay sima mein chut to milti hi hai, fir yeh to apna blog parivar hai.
 
Prastut hai Arunachal mein kafi utsah se manaye gaye 'Chath Parv' ki ek jhalak :-

Monday, October 19, 2009

गंगा से ब्रह्मपुत्र तक





यूँ पहुंचा मैं अरुणाचल प्रदेश
बनारस से हावडा तक के सफ़र का हाल तो आप पिछली पोस्ट्स में पढ़ ही चुके हैं। हावडा से अगली ट्रेन जो शाम 4 बजे प्रस्तावित थी पुनर्निर्धारित हो रात 8 बजे हो गई थी. दिन भर के इस अतिरिक्त समय का सदुपयोग दक्षिणेश्वर काली भ्रमण ओर दो बार नेट सर्फिंग के रूप में किया.
नॉर्थ-ईस्ट की यात्रा का कार्यक्रम बनाने वालों को मेरा सुझाव रहेगा कि वो इधर पोस्ट-पेड सिम लेकर आयें, अन्यथा असम में प्रवेश के साथ ही सिम डिस्कनेक्ट होने की समस्या से मेरी तरह उन्हें भी दो-चार होना पड़ सकता है।
खैर सफ़र का मुख्य आकर्षण तो अभी बाकी ही था., जब गोहाटी से डिब्रूगढ़ होता ब्रह्मपुत्र तट पर पहुंचा. समझ गए न आप - यानी कि रेल ओर बस के सफ़र के बाद नौका यात्रा अभी बाकी ही थी. मध्यम आकार की बोट्स पर गाडियां, कार, बाइक्स आदि चढा ब्रह्मपुत्र पार आना - जाना ही मुख्य भूमि से जुड़ने का तत्कालीन एकमात्र माध्यम था।इस जीवनधारा पर अत्यधिक वर्षा या पानी की कमी के भी संभावित परिणामों का आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं. खैर, स्वदेश के शाहरुख़ के साथ "ये जो देश है तेरा ...." गुनगुनाता अरुणाचल पहुँच ही गया.

यहाँ मेरा अगला लक्ष्य था पुनः ब्लॉग जगत से जोड़ने वाली मेरी जीवनधारा साइबर कैफे की खोज, जो एकमात्र कैफे के रूप में पूरी तो हुई मगर 50 रु। / घं की कीमत पर. किन्तु इस आभासी जगत से वास्तविक रूप से जुड़े रहने की संतुष्टि का मूल्य इससे कहीं अधिक था.

आगामी पोस्ट्स में अरुणाचल ओर अपने फिल्ड वर्क से जुड़ी और भी बातें बांटने का प्रयास करूँगा।

इस पोस्ट के साथ संलग्न है - विक्टोरिया मेमोरियल के पास इतराती मेरी, जीवनधारा ब्रह्मपुत्र पर निर्भर जनजीवन की और अरुणाचल में मेरे नए आशियाने की झलक।

Thursday, October 15, 2009

जाना न दिल से दूर ...





अरुणाचल से देव साहब और मन्ना दे को शुभकामनाएं

एक लम्बे मगर स्थानीय व्यवधान की वजह से अधूरे फिल्ड वर्क, साइबर कैफे संचालक की चुनावी व्यस्तता (यहाँ चुनावों में काफी सहभागिता रहती है आम लोगों की) आदि की वजह से एक लम्बे अंतराल के बाद आपसे मुखातिब हो पाया हूँ।
पिछले दिनों मार्केट में यूँ ही गुजरता हिंदी फिल्मों की सीडी देख ठिठक गया। कई हिंदी फिल्मों के बीच देवसाहब की 'मैं सोलह बरस की' का होना वाकई आश्चर्यजनक था. फिल्म देखता याद आया कि बीते 26 सितम्बर को देव साहब का जन्मदिन भी था.
देव आनंद नाम है हिंदी फिल्मों की आडंबरी मान्यताओं को चुनौती देते हुए भविष्य की और देखने की प्रेरणा का। आज भी किसी भी तथाकथित युवा को जोश और जज्बे में चुनौती देने वाले देवानंद ने वाकई वह स्थान प्राप्त कर लिया है, जहाँ -"न सुख है - न दुःख है, न दिन है-न दुनिया, न इंसान - भगवान्; सिर्फ मैं हूँ, मैं, सिर्फ मैं".
जीवन के रोमांटिक सफ़र के इस सदाबहार यात्री को शुभकामनाएं।
साथ ही शुभकामनाएं मन्ना डे साहब को भी जिनकी संगीत साधना को फाल्के अवार्ड के द्वारा सम्मानित किया जा रहा है।
जरा याददाश्त पर जोर दें और बताएं कि क्या ये दो हस्तियां कभी किसी गाने में इकट्ठी हुई हैं !
अब वापस अरुणाचल की ओर -
किसी इंसान की तरह स्थान की विशेषता भी छोटी-छोटी बातों से ही देखी जाती है। पिछले दिनों यहाँ बैंक में मेरे छूटे सामान का आधे घंटे बाद भी वहीँ पड़ा रह जाना कुछ तो इंगित करता ही है; और यह भी की यहाँ डुप्लीकेट चाभियाँ नहीं बनतीं. यहाँ के आम लोगों की ईमानदारी और स्पष्टवादिता वाकई सराहनीय है.
प्रयास करूँगा की कुछ पोस्ट्स ड्राफ्ट में सेव कर जाऊं ताकि इस आभासी जगत से वास्तविक संपर्क कायम रह सके।
इस पोस्ट के साथ संलग्न है पिछले माह मनाई गई विश्वकर्मा पूजा और हिंदी में चुनाव प्रचार की एक झलक।
बीते त्योहारों की विलंबित और आने वाले त्योहारों की अग्रिम शुभकामनाएं.
















Monday, September 14, 2009

ब्लौगर्स देख लो मिट गईं दूरियां ...

(हिंदी दिवस विशेष)

मैं  यहाँ-हूँ यहाँ...जी हाँ अरुणाचल से ब्लौगिंग में वापस. और दूरियां वाकई कम हो गई हैं न सिर्फ मेरे और ब्लौगिंग के बीच, बल्कि हिंदी के ह्रदय प्रदेश से संबद्ध मैं और इस सुदूर उत्तर-पूर्व क्षेत्र के बीच भी. लगभग 1 सप्ताह से गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में ही हूँ, मगर भाषा को लेकर कोई विशेष समस्या नहीं पाई है. अपनी लचीली शैली में हिंदी यहाँ भी पूरी शान से विद्यमान है. गोहाटी से काफी दूरी तक तो 'विविध भारती' का भी साथ रहा, अलबत्ता यहाँ इससे संपर्क कायम नहीं हो सका है.

ऐसे में क्या यह स्वीकार करने के लिए किसी औपचारिक दिवस की प्रासंगिकता का कोई औचित्य है कि -
"हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तां हमारा..."

हाँ इतना जरुर कहूँगा कि व्यक्तिगत स्तर पर मैंने पाया है कि बहुतया हिंदी भाषी क्षेत्र अपने - आप में ही एक आत्ममुग्धता में रहते हैं, और अन्य भाषा तथा भाषियों के प्रति सामान्यतः एक उपहास तथा उपेक्षा सा भाव रखते हैं. अक्सर यही प्रवृत्ति विवादों का आधार बनती है और संकीर्ण राजनीति के बाजीगर इसका लाभ उठाकर 'राज' करते हैं.

तो आइये क्यों न हम भी प्रयास करें हिंदी के अलावे कम-से-कम एक क्षेत्रीय भाषा की कम-चलाऊ जानकारी का ही सही. यही प्रयास तो मूल होगा भारत की वास्तविक एकता का. क्योंकि यदि हम देशवासी एक-दुसरे की बोली ही नहीं समझेंगे तो गलतफहमियां और मनभेद तो होंगे ही.

यहाँ के अपने अनुभव आगे भी बांटूंगा और विश्वास करता हूँ कि वे सभी अपने - आप में एक 'धरोहर' ही होंगे.

साथ ही आप सभी ब्लौगर्स से एक रियायत देने का अनुरोध भी करूँगा. वो यह कि इन्टरनेट की सुविधा और उसकी परिस्थितियों के अनुरूप संभव है आगामी पोस्ट्स में कभी रोमन हिंदी का प्रयोग भी करना पड़े. हिंदी की अभिव्यक्ति के लचीलेपन की इस सुविधा का लाभ उठाते हुए यथासंभव आपतक इस सुदूर प्रान्त के अनुभव पहुँचाने का प्रयास करता रहूँगा.

शुभकामनाएं.

Wednesday, September 9, 2009

ये मेरा दिवानापन है, या...

अब इसे ब्लॉग्गिंग का जुनून कह लीजिये, या मन का फितूर. सुबह से ट्रेन का इन्तेजार करता, अब जब ट्रेन के 4 घंटे लेट होने की सूचना पाई तो आस-पास कैफे ढूंढने से खुद को रोक नहीं पाया। इसी बीच देव साहब की फिल्मों की कुछ क्लासिक collection भी मिल गई है, जो आशा है अरुणाचल में काफी साथ देंगीं. तसल्ली की बात यह है की वहां इन्टरनेट की uplabdhata की सूचना मिली है, albatta यह बात digar है की इसका rate 50 ru . / घंटे है. अब वहां पहुँच कर आगे की daastan bayan करने की कोशिश karunga . तब तक के लिए enjoy blouging।

(tatkalik internet suvidha के sucharu रूप से काम न कर pane के लिए हुई asuvidha के लिए खेद है। )

Wednesday, September 2, 2009

ये रातें, ये मौसम....और बस डकैती

हम छात्रों के बीच अक्सर मजाक में यह कहा जाता है कि BHU में एड्मीसन और माईग्रेशन दोनों ही काफी कठिन हैं। ढेरों फॉर्मेलिटीज़ से गुजरते हुए आपके पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम में थोडा बदलाव तो हो ही जाता है। मेरा भी 30 अगस्त का निर्धारित कार्यक्रम 1 सितम्बर तक एक्सटेंड हो गया। इस बीच पूरी शोध बिरादरी और मित्रों से भावुकतापूर्ण मुलाकातों के दौर भी चले। BHU के इन दिनों और माहौल की यादें जो कभी भुला नहीं पाउँगा को दिल में संजोये बस से ही हजारीबाग के लिए चल पड़ा।
रास्ते में दिखलाई देते विश्वनाथ मंदिर (BHU), माँ गंगा के नयनाभिराम दृश्यों को आँखों में भरता सफ़र बढ़ता जा रहा था; तभी इस रोमांटिक, इमोशनल कहानी का एक्शनमय क्लाइमेक्स जो अब तक बाकी था आ गया।
झाड़खंड का काफी क्षेत्र जंगलों और पहाडों से भरा-पूरा है,जो आपराधिक तत्वों के लिए काफी सुविधाजनक पनाहगार का काम देते हैं। गरीबी, बेरोजगारी और पैसे कमाने के शार्टकट में दिग्भ्रमित नौजवान अपराध की ओर भी उन्मुख हो रहे हैं। ऐसे ही चंद आपराधिक तत्वों का एक समूह हमारी बस में भी कल रात घुस आया। तारीफकरनी होगी उनकी आत्मसंयम और कार्यशैली की! बिना किसी को शारीरिक नुकसान पहुंचाए, बिना ज्यादा समय गंवाए काफी प्रभावशाली ढंग से रुपये और मोबाइल छीन उन्होंने बस को मुक्त कर दिया। इस क्रम में सड़क पर से गुजरते कुछ ट्रक भी उनके शिकार बने।
आम आदमी से जुड़े इस क्लाइमेक्स में पुलिस जैसे महत्वपूर्ण तत्त्व की भूमिका की तो कोई गुंजाईश नहीं थी; इसीलिए थोडा दिन निकलने पर अपने सुरक्षित जोन में पुलिस के मिलने पर सवारियों ने निःशब्द प्रतिरोध ही दर्ज कराया। अन्दर से तो वे उन अपराधियों के शुक्रगुजार ही थे कि इस निरीह, असहाय जनता के साथ उन्होंने कोई और बदसलूकी नहीं की (जिससे उन्हें भला रोक भी कौन सकता था !)।
सभी शुभचिंतकों की शुभकामनाओं और दुआओं के साथ मैं भी अभी सानंद अपने घर पर हूँ , जहाँ से कुछ दिनों में अगली यात्रा की ओर रवाना होऊंगा।
मेरे भी बस थोड़े पैसे ही गए हैं और महत्वपूर्ण सामान और कागजात सुरक्षित हैं।
मेरे जीवन के इस पहले अनुभव ने आगे आने वाले सफ़र के लिए थोडी और परिपक्वता भी दी है।
इस परिपक्वता को एक सुझाव के रूप में इन पंक्तिओं में व्यक्त कर रहा हूँ -
साईं इतना दीजिये, कि जब बुरा वक्त आये;
डकैत भी खाली न रहे, पास थोड़े पैसे भी बच जायें।
(इस यात्रा वृत्तान्त के साथ पहली बार नीरज मुसाफिर जी को चुनौती पेश कर रहा हूँ. मगर मेरी यही कामना है कि अन्य किसी भी ब्लौगर को ऐसे यात्रा - संस्मरण लिखने की नौबत न आये। )
शुभकामनाएं।

Saturday, August 29, 2009

ये है ब्लौगिंग मेरी जाँ...

ब्लौगिंग फेयरवेळ हो गया तो इसका मतलब सभी ने यह तो नहीं लगा लिया कि ब्लौगिंग समाप्त हो गई ! अजी कहानी अभी बाकी है...


ब्लौगिंग के सफ़र में कई सहयात्री मिले, और कई ब्लौगरों से जान-पहचान भी हुई। आज की पोस्ट ऐसे ही कुछ ब्लौगर्स पर, जिन्हें जैसा मैंने पाया -


1) अरविन्द मिश्र - इन्हें यदि ब्लॉग जगत का देवानंद कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। हर विषय पर (तथाकथित बोल्ड विषयों पर भी) स्पष्ट सोच, अभिव्यक्ति, बेबाकी, भविष्य पर नजर, नयी प्रतिभाओं को प्रोत्साहन. क्या इतनी खूबियाँ काफी नहीं इन्हें ब्लॉग जगत का देवानंद साबित करने के लिए !

2) रंजना भाटिया - 'अमृता प्रीतम' की अनछुई दुनिया से रु-ब-रु करने के इनके प्रयास की जितनी सराहना की जाये कम है। इनका यह ब्लॉग एक अलग ही दुनिया में ले जाता है पढने वालों को।

3) संगीता पूरी - इन्हें इनकी दृढ़ता और आत्मविश्वास के लिए ब्लॉगजगत की 'लौहमहिला' के रूप में विभूषित करूँ तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जहाँ किसी के एक छींक आने पर लोग ब्लौगिंग से हाथ झाड़ लेते हैं, ये अपने 'गत्यात्मक ज्योतिष' की सार्थकता को सिद्ध करने के लिए तमाम झंझावातों के बावजूद अपनी पूरी क्षमता के साथ लगी हुई हैं।

4)विनीता यशस्वी - सादगी, निश्चलता और सुन्दर अभिव्यक्ति क्या होती है कोई इन के ब्लॉग 'यशस्वी' से सीखे। नैनीताल की खुबसूरत वादियों से अपने यात्रा संस्मरण बांटती विनीता जी को पढना उन राहों से गुजरने सा अहसास देता है।

5) नीरज मुसाफिर - ये तो नाम से ही 'मुसाफिर' हैं। इनका ब्लॉग क्या है, एक टूरिस्ट गाइड साईट है। यात्रा अनुभवों का इनके पास भी भरपूर खजाना है, मगर इनके साथ भ्रमण में धीमे चलने की गुंजाईश नहीं। इनके कदम-से-कदम मिलाने के लिए इनके भ्रमण तथा लेखन शैली की गतिशीलता अपनानी होगी।

6) जीशान जैदी - सच्चे अर्थों में कर्मयोगी। टिप्पणियों की संख्या से बे-परवाह नित नई विज्ञान कथाओं की रचना में संलग्न। इनके ब्लॉग पर जाना फंतासी भरी दुनिया की यात्रा से कम अहसास नहीं देता।

७) डॉ. अमर कुमार - इनके 'काकोरी के शहीद' ब्लॉग से इनसे आत्मीयता बढ़ी । राम प्रसाद बिस्मिल जी के शब्दों को ब्लॉग जगत में उतार ब्लौगिंग को एक अमूल्य भेंट दी है इन्होने। इनके इस ब्लॉग को ब्लॉग जगत की एक धरोहर मानता हूँ मैं।

8) पी. एन. सुब्रमणियन - इनके 'मल्हार' ब्लॉग ने इस देश की विविधतापूर्ण संस्कृति को काफी नजदीक से जानने का अवसर दिया।


श्रंखला काफी लंबी जा सकती है, जिसे पूरा करने के लिए शायद मुझे कुछ और जन्म भी लेने पड़ें (क्योंकि मैं पुनर्जन्म में अविश्वास नहीं करता); किन्तु यहाँ मैंने उन कुछ ब्लोग्स और ब्लौगर्स का जिक्र बिना किसी विशेष वरीयता क्रम के करने का प्रयास किया जिनसे इस ब्लौगावधि में काफी प्रभावित हुआ। शेष फिर कभी, क्योंकि कहानी तो अभी बाकी है ही...




Thursday, August 27, 2009

ब्लौगिंग फेयरवेळ


कहने को ब्लॉग जगत आभासी कहलाता है, मगर यहाँ बनने वाले रिश्ते जाने कब वास्तविक जीवन से जुड़ जाते हैं, आभास ही नहीं होता। ब्लौगिंग से अस्थाई विराम के अनचाहे निर्णय के बाद अरविन्द मिश्र जी से औपचारिक विदाई मुलाकात का कार्यक्रम बना था। मगर यह कार्यक्रम सिर्फ उनके और मेरे बीच ही सीमित नहीं रह सका. रास्ते में ही नीरज मुसाफिर, और उनके यहाँ पहुँचते ही लवली जी ने संपर्क कर एक अन्य ब्लौगर्स गोष्ठी या यों कहें कि ब्लॉग जगत की ओर से फेयरवेळ सा ही अहसास दिला दिया।
मैं स्वीकार करता हूँ कि आभासी जगत को अपने वास्तविक जगत से जोड़ने में मुझे शुरू से ही हिचकिचाहट रही थी; मगर कुछ अनदेखे-अनजाने रिश्ते कैसे इतने पुष्पित और पल्लवित हो जाते हैं, यह हिंदी ब्लॉग जगत में देख मैं अभिभूत हूँ।
अरविन्द जी से चलते-चलते ब्लौगिंग से जुड़े कुछ विषयों के अलावे कई और मुद्दों पर भी चर्चा हुई। अभी तो विज्ञान ब्लौगिंग की राह पर हमें काफी लंबा सफ़र तय करना था, फिर भी उन्होंने मुझे अपना नया सफ़र प्रारंभ करने के लिए हौसला और प्रोत्साहन दिया। इस दरम्यान उनके परिवार से भी एक आत्मिक संबंध कायम हो गया था, जिससे बिछड़ने की टीस को भुलाना आसान नहीं होगा।
इन आत्मीय यादों को थोडी और भी दृढ़ता देने के प्रयासों के रूप में हमने एक-दुसरे को कुछ प्रतीकात्मक उपहार देते हुए फिर मिलने की कामनाओं के साथ विदा ली।
ब्लॉग जगत से इतने थोड़े समय में जो संबंध और यादें जुड़ गईं हैं उन्हें भुलाना मेरे लिए आसान नहीं होगा।
शुक्रिया ब्लॉग जगत - शुक्रिया ब्लौगर्स।

Monday, August 24, 2009

अलविदा बनारस, अल्पविराम ब्लौगिंग

कहते हैं सच्चे दिल से किसी को चाहो तो सारी कायनात उसे तुम से मिलाने की कोशिश में लग जाती है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। M. Sc. के बाद ही बनारस छोड़ने की परिस्थितियां बनीं थीं मगर कहानी अभी बाकी थी। बनारस में पिछले लगभग 2 वर्ष वास्तविक जगत के सन्दर्भ में तो ऐसे रहे जिन्हें अपने जीवन की किताब से खुरच-खुरच कर मिटा ही देना चाहूँगा। मगर आभासी जगत ने वो दिया जिसने कहीं मेरे वास्तविक जीवन को भी स्पर्श किया है। ब्लॉगजगत के माध्यम से मेरी रचनात्मक प्रवृत्ति न सिर्फ जीवित रह पाई, बल्कि इसे एक नया आयाम भी मिला। विज्ञान लेखन को लेकर बचपन से ही रुझान था, जिसे 'साइंस ब्लौगर्स असोसिएशन' और 'कल्कि ओं' से एक नई दिशा मिली। इस सन्दर्भ में श्री अरविन्द मिश्र जी के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन ने मेरी एक विज्ञान कथा को 'विज्ञान प्रगति' तक भी पहुँचाया; जो इसके अगस्त, 09 अंक में प्रकाशित हुई।

गांधीजी के प्रति मेरे जुडाव के प्रतीक ब्लॉग 'गांधीजी' को भी सभी ब्लौगर्स का स्नेह और समर्थन मिला।

'मेरे अंचल की कहावतें', 'कबीरा खडा बाजार में' , 'भड़ास' और अब डा० अमर कुमार जी के 'वेबलोग' आदि से भी जुडाव संभव हो सका; जिनसे अपनी भावनाएँ अन्य मंचो से भी साझा कर सका।

मगर यथार्थ जगत में सबकुछ इतना सहज नहीं चल रहा था। बीच में एक बार फिर बनारस से सब-कुछ छोड़ वापस चल देने की तैयारी थी, मगर बाबा की नगरी में इंसानों की मर्जी चलती तो आज बनारस, बनारस रह पाता!

बाबा ने कुछ दिन और रोक लिया और कुछ नाटकीय परिदृश्य के बाद उन्हीं की आज्ञा से अरुणाचल प्रदेश जा रहा हूँ। अब वहां देश के लिए हाईड्रो - पॉवर उत्पन्न करने में अपना योगदान देने का प्रयास करूँगा। कभी - न - कभी आभासी दुनिया और अपने कल्पित ख्वाबों से बाहर निकल यथार्थ से मोर्चा लेना ही था। शायद अब वो समय आ गया है। आभासी जगत में जिस तरह आपकी शुभकामनाएं साथ रहीं, आशा है वो यथार्थ जगत में भी उतनी ही प्रभावी रहेंगीं।

किसी अनचाही परिस्थिति में भले ही शारीरिक रूप से बनारस छुट रहा हो, मगर अब यह मेरे व्यक्तित्व का एक अंग भी बन गया है, जिसे कोई मुझसे जुदा नहीं कर सकता। इसी तरह ब्लौगिंग भी उस आग से कम नहीं जो 'लगाये न लगे, बुझाये न बुझे'। तो शायद एक बार को बनारस को तो अलविदा कह दूँ मगर ब्लौगिंग - 'उहूँ, लागी छुटे ना'. तो जब तक संभव हुआ पोस्ट्स आती रहेंगीं, मगर अचानक संपर्क टूट जाये उससे पहले ही वादा - 'फिर मिलेंगे',

क्योंकि 'कहानी अभी बाकी है.....'

Saturday, August 22, 2009

दिल आज शायर है...

मैं समझ नहीं पाता कि प्रोफेशनली कवितायें कैसे लिख ली जाती हैं। मैं तो लेखों में ही खुद को ज्यादा सहज पाता हूँ। हाँ कभी-कभी कुछ भावनाएं सिर्फ कविताओं में ही व्यक्त हो पाती हैं, और यहीं आकर यह पंक्तियाँ सच ही लगती हैं कि 'वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान'। ऐसी ही कुछ मनःस्थितियों से गुजरते हुए कुछ पंक्तियाँ स्वयं ही मेरे अंतर से बाहर आने को अकुला रही हैं -

मैं और मेरा मौन
कुछ यादें, कुछ आंसू और जाने कौन
आज फिर साथ है मेरे - वही मौन,

एक - एक कर साथ सारे छुटते गए,
हम भीड़ में पीछे छुटते रहे ।
साथ था तब भी वही - और कौन
मैं और मेरा मौन।
संजोने से पहले ही सपने सारे लूटते रहे ,
हम बार- बार बिखरते और टूटते रहे
पलट कर देखा कंधे पर हाथ रखे है कौन
फिर वही- मैं और मेरा मौन।
आज फिर एक ठेस कहीं खाई है
और दर्द अन्दर ही कहीं छुपाई हैं ।
दर्द बांटू जिससे है कहीं ऐसा कौन ,
चलो फिर वही - मैं और मेरा मौन
शायद बन चुका मौन मेरी परछाई है,
इसीने तो हमेशा साथ निभाई है।
फिर भी कहूँगा मेरी इस बिखरती कहानी में
तेरा भी स्वरुप नहीं है गौण।
अब मुझे छोड़ दे तन्हा मेरे मौन.....

Wednesday, August 19, 2009

ब्लौगिंग से मौडलिंग की ओर !

ऊपर  की तस्वीर को देख कर आपको भी कहीं ऐसा तो नहीं लग रहा कि हमारे अजीज ब्लौगर आदरणीय अरविन्द मिश्र जी  मॉडलिंग की ओर रुख कर रहे हैं !  भई तस्वीर को देख कर तो ऐसा लगना अस्वाभाविक भी नहीं है, मगर धैर्य रखें हकीकत में ऐसा है नहीं. दरअसल ये कमाल है एक अनूठी वेबसाइट  'फोतोफुनिया'  (http://www.photofunia.com) का.
 
यहाँ आपको कई विकल्प मिलेंगे, जिनमें से अपनी पसंद के इफेक्ट का चयन कर आप अपनी तस्वीर browse  कर सकते है. बस इतना ही और आपकी तस्वीर अपने पसंदीदा इफेक्ट के साथ आपके सामने होगी. जैसा कि एक प्रयोग मैंने ऊपर किया है.

साईट की खूबियों और खामियों पर काफी चर्चा की गुंजाईश तो है ही, मगर यह एक अच्छा-खासा मनोरंजन और चंद पलों के लिए ही सही मोडल्स सा अहसास तो देता ही है.  तो क्यों न एक बार आप भी आजमा कर देखें फोतोफुनिया को.
 
आल द बस्ट एंड एन्जॉय.

Monday, August 3, 2009

धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग !


धार्मिक स्थलों के नाम पर भूमि के अवैध अतिक्रमण के प्रयासों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका सराहनीय है। कोई भी धर्म या संप्रदाय धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर नाजायज लाभ उठाने के लोभ के संवरण से आज पीछे नहीं है। व्यक्तिगतरूप से मैं भी यह महसूस करता हूँ कि अनाधिकृत रूप से निजी हितों की पूर्ति के लिए पूजन स्थलों के नाम पर अर्जित की गई भूमि पर ईश्वर निवास कर ही नहीं सकते। कोई भी शिवलिंग या धार्मिक चिह्न स्थापित कर अच्छी-खासी भूमि का अधिग्रहण हम सभी ने देखा है, हद तो तब हो जाती है जबकि अपने निवासस्थानों जिनकी बाउंड्री अमूमन अतिक्रमित ही होती है को बचाने के लिए बाहरी कोने में एक छोटा मंदिर या आराधनालय स्थापित कर दिया जाता है। इसी भगवान की व्यक्तिगत उपासना ही उन्हें नगरनिगम के अतिक्रमण विरोधी अभियान से बचाने में ढाल का काम देती है। इस पापकर्म में जबरन भागी बनवाये जाते प्रभु के ह्रदय पर क्या गुजरती होगी, भला सोचा है उनके भक्तों ने।


कई बार काफी सावधानीपूर्वक चलाये जा रहे अभियानों में भी एक छोटी सी असावधानी जैसे 'प्रभु की एक ऊँगली का टूटना' जैसी घटनाओं ने बड़े दंगों का रूप भी ले लिया है। ऐसी घटनाओं का लाभ उठाने में कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहे हैं।


जरुरत है कि सभी धर्मों के प्रतिनिधि और राजनीतिक दल व्यक्तिगत हितसाधन के इस शर्मनाक प्रयास के विरोध में एकजुट हों। अतिक्रमित धर्मस्थलों को उपासना के लिए अयोग्य घोषित किया जाये और भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कर उसका उपयुक्त उपयोग सुनिश्चित किया जाये। साथ ही साथ धार्मिक आयोजनों के नाम पर सावर्जनिक स्थलों के असंतुलित अतिक्रमण के विरुद्ध भी जनमानस बनाये जाने की जरुरत है।


Wednesday, July 29, 2009

तस्वीरों के आईने में पूर्ण सूर्यग्रहण


पूर्ण सूर्यग्रहण की यादों को शब्दों में समेटना दुःसाध्य ही है, इसीलिए एक प्रयास इसे तस्वीरों में अभिव्यक्त करने का जो मेरे और अरविन्द मिश्र जी के संयुक्त प्रयास का परिणाम हैं:

सूर्यग्रहण देखने की पृष्ठभूमि तैयार करते प्रियेषा और कौस्तुभ

लो शुरू हो गया ग्रहण, और इसे निहारते अरविन्द मिश्र

सभी ने संभाल ली है अपनी-अपनी कमान: कहीं छुट न जाये एक भी क्षण

और ये लग गया पूर्ण सूर्यग्रहण !

वाराणसी के घाटों पर उतर आया अन्धकार

लौट चले पक्षी भी
छुपी नहीं ग्रहण के उतरने की ख़ुशी : Smiling Surya
इस अद्भुत खगोलीय दृश्य से अभिभूत हमारी टीम :
जिसमें शामिल हैं प्रियेषा, श्रीमति संध्या मिश्रा, श्री अरविन्द मिश्र, मैं, प्रो. मधु प्रसाद (ज़ाकिर हुसेन कालेज; डी यू ), नीचे इजराईल की नोआ और श्री कनिष्क प्रसाद


Wednesday, July 22, 2009

यूँ देखा मैंने पूर्ण सूर्यग्रहण


पूर्ण सूर्यग्रहण

सदी के इस सबसे महत्वपूर्ण सूर्यग्रहण को देखने की उत्कंठा पिछले कई दिनों से थी। मगर मौसम का ख्याल भी नकारात्मक विचार उत्पन्न कर रहा था (वैसे बारिश को लेकर बनारस के मौसम के प्रति मैं अतिआश्वस्त ही रहता हूँ)। फ़िर भी कल शाम हुई हलकी बारिश ने मेरे जैसे कई खगोल्प्रेमियों के दिलों की धड़कनें तो बढ़ा ही दी थीं।
दूसरी ओर हमारे अरविन्द मिश्र जी भी इस परिघटना के अवलोकन के लिए उतने ही उतावले थे , हमने साथ ही बनारस के 'सामने घाट' नामक घाट पर गंगा के किनारे अन्य खगोल्प्रेमियों के साथ इस ग्रहण का साक्षात्कार करने का निर्णय ले लिया था।
डाक विभाग की मेहरबानी से १ सप्ताह पहले ही चल पड़े 'सन गोगल्स' कल शाम तक नहीं पहुँच पाए थे, ऐसे में देर रात वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर मैं एक 'वेल्डिंग ग्लास' प्राप्त करने में सफल हो ही गया।
सुबह साफ़ आसमान ने जहाँ हमें तसल्ली दी, वहीं अरविन्द जी के कुछ अतिथियों को भी कार्यक्रम में शामिल करने की आकांशा ने कार्यक्रम स्थल में आंशिक परिवर्तन भी करा दिया। अंततः यह खगोल प्रेमी गंगा तट पर एक उपयुक्त स्थल पर इकट्ठी हो ही गई। इसमें हमारे साथ अरविन्द जी की धर्मपत्नी, उनके पुत्र कौस्तुभ, पुत्री, दिल्ली से आईं प्रो. मधु प्रसाद तथा उनके पुत्र कनिष्क उपस्थित थे। बनारस यात्रा पर आए कुछ विदेशी सैलानी भी हमारे इस आयोजन में शामिल हो गए।
5:30AMसे ही सूर्य पर चंद्रमा की छाया नजर आने लगी थी। कौस्तुभ द्वारा आनन-फानन में तैयार 'पिन होल कैमरा', X -Ray प्लेट तथा वेल्डिंग ग्लास ने इस दृश्य को सुलभ बनने में अविस्मर्णीयभूमिका निभाई। अपने कैमरों की लिमिट के बावजूद हमने तस्वीरें तो ली हीं ; मगर कनिष्क जी जो सिर्फ़ ग्रहण देखने के ही उद्देश्य से बनारस पधारे थे अपनी कमाल की तस्वीरों से तो बस छा गए !
पूर्ण सूर्यग्रहण, डायमंड रिंग, कोरोना जैसी घटनाओं का साक्षी बनना, सुबह-सुबह ही शाम सा माहौल, घाटों पर बत्तियां जल जन, थोडी सी ठंढ और पक्षियों का अपने घोसलों की ओर वापसी अविस्मरनीय अनुभव थे।
अरविन्द जी ने ग्रहण के दौरान स्नैक्स वितरित कर ग्रहण के दौरान खान-पान को लेकर भ्रान्ति दूर करने का भी एक सार्थक प्रयास किया।
सपरिवार अरविन्द मिश्र जी, प्रो. मधु प्रसाद, कनिष्क, मैं और उपस्थित सैलानी
कुछ ग्रुप फोटोग्राफ्स और अनिवर्चनीय यादों के साथ एक तरफ़ हमारा यह कार्यक्रम समाप्त हो रहा था, जबकि दूसरी ओर घाटों पर अपार जनसमूह धर्म और आस्था के संगम में दुबकी लगाने को बढ़ता चला जा रहा था। इसे देख मैं इसी प्रश्न का उत्तर तलाशने को उत्सुक था कि अन्धविश्वास में विज्ञान की तुलना में ज्यादा आकर्षणआख़िर कैसे उत्पन्न हो जाता है !

Thursday, July 16, 2009

बोल- बम का नारा है...


सावन की शुरुआत के साथ ही देश भर से काँवडीये अपने भोले बाबा को जल अर्पित करने निकल पड़े हैं। सटीक रूप से कोई नहीं बता सकता कि यह परंपरा कब से शुरू हुई है, मगर कांवड़ यात्रा, कुम्भ आदि ऐसे अवसर हैं, जो हमारे पूर्वजों द्वारा संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोने की अनूठी सूझ-बुझ के प्रतीक हैं; जब सारा भारत अपनी तमाम प्रांतीयता, जातीयता, अमीरी-गरीबी के मिथ्या बंधनों को नकार सर्वशक्तिमान सत्ता के प्रति अपने समर्पण का इजहार करता है.
शास्त्रीय रूप से देखें तो 'देवशयनी एकादशी' पर भगवन विष्णु के शयन में चले जाने पर जनमानस को भोले शंकर का ही सहारा रहता है। कृषि प्रधान समाज वाले भारत की मूल आत्मा, सावन में भगवान शिव को जल अर्पित कर शायद 'तेरा तुझको अर्पण' के भाव को ही अभिव्यक्ति देती है.
धार्मिक आस्था से खिलवाड़ की 'फिराक' में रहने वालों की बात छोड़ दें तो यह यात्रा हिन्दू-मुस्लिम एकता की भी जिवंत अभिव्यक्ति है। कांवड़ निर्माण से लेकर प्रसाद निर्माण और मेले के आस-पास व्यापार आदि में मुस्लिम संप्रदाय की भी समान भूमिका रहती है. कांवड़ लेकर चलने वालों में अन्य धर्मावलंबी भी पीछे नहीं हैं.
इस तरह की पद यात्राएं मनुष्य को पुनः प्रकृति से साक्षात्कार का भी अवसर देती है। प्रायः हर धर्म में पदयात्राओं सदृश्य परम्परा इस ओर शोधपूर्ण दृष्टिकोण रखने को भी प्रेरित करती हैं.
आधुनिकता ने ऐसी यात्राओं की असुविधाओं को काफी कम कर दिया है, फलतः अक्सर कम आस्थावान लोग भी इस यात्रा में शामिल हो इसकी पवित्रता और सहयात्रियों सहित स्थानीय जनता को भी परेशान कर इस उत्सव की गरिमा को खंडित करते हैं। निष्ठावान कांवडियों को ही खुद अपने बीच छुपे ऐसे तत्वों को पहचान उन्हें स्वयं से दूर करना चाहिए. इस दिशा में उन्हें स्वयं ही अपने लिए आचार संहिता तैयार करनी चाहिए. छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रख वे इस पावन पर्व के स्वरुप को खंडित होने से बचा सकते हैं.
सभी कांवडियों को उनकी सफल और मंगलमय यात्रा की शुभकामनाएं।
हर-हर महादेव.

Wednesday, July 1, 2009

झाड़खंड के आदिवासी लोकगीत


आदिवासी संस्कृति के नाम पर अपनी सांस्कृतिक विविधता के आधार पर बिहार से अलग हुआ झाड़खंड वाकई सांस्कृतिक विविधता की अनुपम मिसाल है। यहाँ संथाल, मुंडा, बिरहोर आदि कई छोटी-बड़ी जनजातियाँ अपनी पृथक सांस्कृतिक विविधता को जीवित रखते हुए आधुनिक सभ्यता के साथ चलने का प्रयास भी कर रही हैं। अलग राज्य बनने के बाद इनकी परम्पराओं, संस्कृति आदि को जानने-समझने के प्रति भी रुझान बढा है।
यूँ तो हर जनजाति की लोककथाओं आदि साहित्य का अपना अलग अंदाज है, मगर आज चर्चा मुंडा जनजाति की. निःसंदेह इस चर्चा के लिए प्रेरित करने में विनीता जी द्वारा भेजी गई कुछ चुनिन्दा मुंडा रचनाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान है, जो उन्होंने 'साझी विरासत' पत्रिका से ली थीं, जिनका संकलन वासवी कीडो द्वारा किया गया था।
हाल ही में 'मदर्स डे' काफी चर्चा में रहा, मगर माँ-बेटी के संबंधों की सहज अभिव्यक्ति जो इस कविता में है वो अद्भुत है, जिसके हिंदी अनुवाद को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
ऐ बेटी- तुम बड़ी नदी की चिरपी मछली के समान,
चमकती फिरती हो;
ऐ बेटी- तुम छोटी नदी की अयरा मछली के समान,
फुदकती फिरती हो;

ऐ बेटी- जब तक तुम्हारी माँ है,
तभी तक चमकती फिरती हो;
ऐ बेटी- जब तक तुम्हारा बाप है,
तभी तक फुदकती फिरती हो;

ऐ बेटी- जब तुम्हारी माँ मर जायेगी,
तब तुम किसी दिकु की दासी बन जाओगी;
ऐ बेटी- जब तुम्हारा बाप मर जायेगा,
तब तुम किसी सरगा की दासी बन जाओगी।
आशा है माँ-बेटी के आपसी मनोभावों को अभिव्यक्त करता यह मुंडा गीत आपको पसंद आया होगा। लोकगीतों की इस चर्चा को कभी फिर आगे बढाऊंगा।
तस्वीर: साभार गूगल

Wednesday, June 24, 2009

झाड़खंड की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा

जगन्नाथ मन्दिर, रांची
झाड़खंड में रथयात्रा की ऐतिहासिक और समृद्ध परंपरा रही है। यूँ तो पूरे झाड़खंड में ही किसी-न-किसी रूप में रथयात्रा सोल्लास मनाई जाती है, मगर इसमें रांची और हजारीबाग के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलराम के विग्रहों के प्रति आम जनता में अद्भुत श्रद्धा देखी जाती है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीय को आयोजित होने वाला यह पर्व रांची में 17 वीं सदी के उत्तरार्ध से मनाया जाता रहा है। इसका शुभारम्भ राजा ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव द्वारा किया गया था। HEC क्षेत्र के एक मनोरम स्थल में पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर यहाँ का एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में मान्यताप्राप्त है।
यहाँ रथयात्रा से जुड़े अनुष्ठानों का आरम्भ ज्येष्ठ पूर्णिमा से ही प्रारंभ हो जाता है, जब तीनों विग्रहों को गर्भगृह से बाहर स्नान मंडप में लाकर महाऔषधि मिश्रित जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद इन्हें पुन: गर्भगृह में स्थापित कर गर्भगृह के पट आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रथमा तक बंद कर दिए जाते हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा से अमावस्या तक तीनों विग्रह गर्भगृह में एकांत वास में रहते हैं। आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रथमा को विग्रहों का नेत्रदान एवं मंगल आरती होती है। आषाढ़ द्वितीय को तीनों श्रीविग्रह रथ पर सवार हो मौसी बाड़ी के लिए प्रस्थान करते हैं। मौसी बाड़ी में आठ दिनों तक विश्राम के पश्चात नौवें दिन अर्थात एकादशी के दिन मौसी बाड़ी से इन विग्रहों की पुन: वापसी होगी, जिसे 'घुरती रथ यात्रा' कहते हैं।
हजारीबाग में 'सिलवार पहाड़ी' पर 1953 से स्थापित जगन्नाथ मंदिर और रथयात्रा मेले ने यहाँ के धार्मिक आयोजनों में अपना एक अलग ही स्थान बना लिया है।
उड़ीसा में बहुप्रचलित इस परंपरा के झाड़खंड के अलावा देश के अन्य भागों भी से इतनी घनिष्ठता भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक एकीकरण का एक अद्भुत उदाहरण है।
भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलराम जी को इस पावन अवसर पर शत-शत नमन।
तस्वीर- साभार विकीपेडिया

Monday, June 8, 2009

हबीब तनवीर के प्रति ...

हबीब तनवीर (1923-2009)
प्रख्यात साहित्यकार और रंगकर्मी हबीब तनवीर नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद आज (8/06/09) को भोपाल में उनका निधन हो गया। हबीब अहमद खान उनका मूल नाम था, मगर 'तनवीर' उपनाम से जारी उनका लेखन ही उनकी वास्तविक पहचान बन गया। भारतीय रंगमंच को नई गरिमा देने में उनका अप्रतिम योगदान रहा। 'आगरा बाज़ार' (1954), 'चरणदास चोर' (1975) उनके सर्वाधिक चर्चित नाटकों में से थे। छत्तीसगढ़ की 'पांडवानी' जैसी लोक कलाओं को संजोने में भी उन्होंने अप्रतिम योगदान दिया। रंगमंच को भी उन्होंने अपने रचनात्मक प्रयोगों से नई दिशा दी।
कला के प्रति उनके योगदान से न सिर्फ उन्हें राज्यसभा की सदस्यता (1972-1978) का सम्मान मिला, बल्कि वो 'संगीत नाटक अकादमी', 'पद्म श्री' और 'पद्म भूषण' से भी नवाजे गए. रंगमंच के अलावा 'गाँधी' और 'ब्लैक एंड व्हाइट' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने भावपूर्ण अभिनय के रंग भी बिखेरे.
भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि इस प्रख्यात रंगकर्मी को भावभीनी श्रद्धांजलि।
स्रोत- साभार विकिपेडिया,
तस्वीर- साभार गूगल

Wednesday, June 3, 2009

झाड़खंड का लाल

संजीत महतो
'गुदडी का लाल' - यही शब्द किसी के भी मुंह से निकलेगा, जब वो संजीत कुमार के बारे में सुनेगा। झाड़खंड एकेडमिक काउंसिल की 12 वीं की परीक्षा में कला वर्ग में पूरे राज्य में टौपर रहे - संजीत महतो। जिन विपरीत परिस्थितियों में इन्होने सफलता प्राप्त की वह इसी शेर को दोहराने पर विवश करता है कि - "कौन कहता है आसमान में सुराख़ हो नहीं सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। "
संजीत के पिता किसान हैं, जो किसी तरह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह कर पा रहे हैं। इन्ही परिस्थितियों में संजीत ने अपने गाँव से ही 10 वीं की पढाई पूरी की. आगे की शिक्षा की वहां व्यवस्था न होने के कारण उसने 2007 में रांची के रविन्द्रनाथ टैगोर इंटर कॉलेज में दाखिला लिया. यहाँ उसने चुटिया नामक स्थान पर एक लौज में रहने की व्यवस्था की. खाने-पीने की व्यवस्था के लिए लौज में रहने वाले 15 दोस्तों के लिए सुबह - शाम खाना बनता और खुद भी खाता. साथ-साथ पढाई के प्रति उसकी लगन और समर्पण ने उसे आज इस मुकाम पर पहुंचा दिया है.
जाहिर है आगे उसकी तमन्ना उच्च और गुणवत्तायुक्त शिक्षा पाने की होगी, मगर उसकी गरीबी फिर कहीं उसके आड़े न आ जाये ! ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों के हित का दावा करने वाली सरकारी-गैरसरकारी घोषणाओं का कर्मकांड अभी शेष है, मगर आवश्यक है कि इनपर ईमानदारी से अमल भी हो।
ऐसे गुदडी के लालों की चर्चा गाहे-बगाहे होती रहती है मगर उचित कार्यनीति के अभाव में ये कहीं गुमनामी में खो जाते भी देखे गए हैं। सुजीत और ऐसी ही अन्य प्रतिभाओं के साथ ऐसा न हो हमारी तो यही कामना रहेगी। सुजीत और ऐसे सभी प्रतिभाशाली छात्रों को उनके उज्ज्व्वल भविष्य की शुभकामनाएं.
तस्वीर- साभार दैनिक जागरण





Sunday, May 24, 2009

ये दिल्ली है मेरे यार


घुमने और जानकारियों का संग्रह करने के इच्छुक मेरे जैसे लोगों के लिए दिल्ली एक आदर्श जगह है। जिसने हिंदुस्तान को बार-बार बनते-बिगड़ते, बिखरते - उभरते देखा हो, वहां का चप्पा- चप्पा इतिहास के एक अध्याय का किस्सा सुना रहा होता है।
दिल्ली की महरौली में स्थित कुतुबमीनार की भी अपनी एक अलग ही दास्तान है। मामुलक वंश के कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा 12 वीं सदी के अंत में यानि सन 1193 में आरम्भ करवाया गया, परन्तु वो केवल इसका आधार ही बनवा पाया। उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसकी तीन मंजिलें और बढ़वायीं। 1368 ई। में फीरोजशाह तुगलक ने पाँचवीं और अन्तिम मंजिल बनवाई। निर्माताओं की यह विविधता इसकी निर्माण शैली में भी झलकती है। मीनार की वास्तु कला में 20 प्राचीन जैन मंदिरों के ध्वन्शावशेष का भी इस्तेमाल किया गया है।
मीनार के परिसर में विश्व प्रसिद्ध 'लौह स्तम्भ' भी स्थित है, इस स्तम्भ को पीछे की ओर दोनों हाथों से छुने पर मुरादें पूरी होने की भी मान्यता है। मगर अब इसे लोहे की जाली से घेर दिए जाने के कारण यह प्रयास मनसः ही किया जा पा रहा है।
यहाँ आ कर इतिहास को एक ओर रख थोडी देर मैं गुम हो गया देव साहब और नूतन के साथ 'दिल के भंवर की पुकार में '। अनायास ही मैंने अपने मोबाइल में यह गीत ऑन कर दिया और थोडी ही देर में पूरा परिसर 'देवमय' हो गया था। यही तो जादू है देवसाहब की अदायगी और पुराने गीतों की मिठास का। इसी जादू में खोया मैं चल पड़ा अगले सफ़र की ओर- जिसके बारे में फिर कभी।
(टिप्पणी के रूप में कोई पॉडकास्ट पर इस गीत को सुना दे तो क्या बात हो!)
स्रोत- विकिपेडिया,
तस्वीर- साभार Google

Sunday, May 17, 2009

इंडिया राइजिंग - जय हो

कम मतदान की अनिश्चितताओं से घिरती 15 वीं लोकसभा ने 16 तारीख की दोपहर से ही राहत की साँस लेनी शुरू कर दी होगी।
बहुमत और सरकार बनाने की प्रक्रिया चाहे जो रूप ले, मगर जनता ने अपनी ओर से 'माननीयों' को यथासंभव यह संकेत दे दिया है कि लोकतंत्र की प्रक्रिया में धार्मिक, जातीय और आपराधिक समीकरण उसे स्वीकार नहीं। ब्लैकमेलिंग को लालायित 'किंगमेकरों' को भी उनकी वास्तविक जगह दिखाने के पर्याप्त संकेत भेज दिए गए हैं। अगर मतदान का प्रतिशत थोडा ओर बढ़ जाता तो यह संकेत और भी बेहतर होते।
नई सरकार को मतदान के लिए घटती लोकप्रियता के सम्बन्ध में भी गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोकतंत्र का महापर्व एक खास सुविधासंपन्न वर्ग के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह जाये। पोस्टर, बैनर, दीवार लेखन जैसे माध्यम लाखों परिवारों की आजीविका के भी स्रोत थे। 60 % आबादी जो गांवों में बिजली के बिना रहती है, उसे अख़बारों ओर टीवी विज्ञापनों के द्वारा कितना 'जगाया' जा सकता है, विचारणीय है। इस चुनाव में अख़बारों ओर मीडिया की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। लोकतंत्र की गरिमा को बचाने के लिए चुनाव आयोग को इस दिशा में भी ध्यान देने की जरुरत है।
इस चुनाव में राहुल गाँधी चाहे ब्रांड के रूप में ही पेश किये गए हों, मगर दूरदर्शिता इसी में है कि अगले चुनाव जो निश्चित ही उन्हीं के नेतृत्व में लड़े जायेंगे की सार्थक रणनीति पर अभी से ही मनन आरंभ हो जाये।
भारतीय मतदाताओं को शुभकामनाएं।

तस्वीर- साभार गूगल

Wednesday, May 13, 2009

घाघ-भड्डरी की खोज में


भारत में ज्ञान-विज्ञान की एक प्राचीन और गौरवपूर्ण परंपरा रही है। गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा आदि में तो हमारा योगदान सर्वविदित तो है ही; कृषि तथा मौसम विज्ञान में भी हमारी भूमिका किसी से कम नहीं। एक मानसून आधारित और कृषि पर आश्रित समाज में ऐसा होना स्वाभाविक ही था। सदियों के अनुभवों को लोक स्मृतियों में संजोये हुए वाक्क् परंपरा से आगे बढाया जाता रहा। भारतीय जन-मानस में रचे बसे घाघ-भड्डरी इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं.
कृषि या मौसम वैज्ञानिक सदृश्य छवि बना चुके घाघ और भड्डरी के अस्तित्व के सम्बन्ध में कई मान्यताएं प्रचलित है। उत्तर भारत में अति प्रचलित इन दोनों पात्रों की कहावतों के रूप में मौसम सम्बन्धी निर्देश आज भी आम ग्रामीण मानस के लिए मौसम के पूर्वानुमान का अचूक स्रोत है। इस क्षेत्र का प्रायः हर प्रदेश इन्हें अपनी मिट्टी से जुड़ा मानता है। उपलब्ध लोकोक्तियों की भाषा शैली इन्हें बिहार तथा उत्तरप्रदेश के भी करीब पाती है, मगर इनका जुड़ाव बंगाल और राजस्थान से भी उतना ही है। इस प्रकार कहें तो कृषि तथा वर्षा पर आश्रित हर प्रदेश के शायद एक अपने ही घाघ-भड्डरी हैं; जो वहां की प्रचलित बोली में उन्हें मौसम सम्बन्धी ज्ञान बाँट रहे हो सकते हैं। वैसे भी इस क्षेत्र में प्रचलित शब्द 'घाघ' एक चतुर व्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया जाता है, ऐसे में 'घाघ' व्यक्ति विशेष को दी जाने वाली एक उपाधि भी हो सकती है।
लोक मान्यताओं के अनुसार घाघ एक प्रसिद्ध ज्योतिषी भी थे, जिन्होंने भड्डरी जो संभवतः गैर सवर्ण स्त्री थी (क्या कहें आज हर शब्द बड़े नपे-तुले ढंग से प्रयोग करना पड़ता है, जाने किसकी आस्था को कहाँ चोट पहुँच जाये !) की विद्वता से प्रभावित हो उससे विवाह किया था। इस प्रकार लोक जीवन में घाघ के साथ भड्डरी की कहावतों को भी न सिर्फ समान स्थान मिला हुआ है, यह तत्कालीन समाज में विद्वता के वर्गीकरण को नकार प्रतिभा की स्वीकृति के नजरिये को भी दर्शाता है। समय के साथ इनकी कहावतों में संभावित हेर-फेर से इनकार नहीं किया जा सकता, मगर लाखों कृषकों की आस्था में जीवित घाघ-भड्डरी की लोकोक्तियों पर सार्थक वैज्ञानिक चिंतन अपेक्षित तो है ही।
इनकी लोकोक्तियों पर केन्द्रित एक पोस्ट यहाँ भी मौजूद है।
तस्वीर- साभार गूगल

Wednesday, May 6, 2009

मीटिंग @ दि मेट्रो

पिछला सप्ताह काफी व्यस्तताओं भरा रहा. बनारस से मुंबई और मुंबई से दिल्ली होता वापस बनारस. इस व्यस्तता ने ब्लौगिंग से तो दूर रखा ही मगर ब्लौगर्स से दूर रह पाना कहाँ संभव था. अपने नीरज मुसाफिर जिन्होंने हाल ही में दिल्ली मेट्रो ज्वाइन की है से मैंने कभी उम्मीद जताई थी कि शायद अब हमारी मुलाकात मेट्रो में ही हो। और यह उम्मीद आखिरकार सत्य हो ही गई. मेट्रो स्टेशन पहुँच मैंने नीरज जी से संपर्क किया और थोड़े इंतजार के बाद हम एक-दुसरे के सामने थे, हाथों में मोबाइल लिए एक-दुसरे को तलाशते; बिलकुल डेविड-धवन की फिल्मों की तरह.  यही तो रोमांच है ब्लौगिंग का!

नीरज जी के बारे में इतना बता दूँ कि ये भी एक सेलेब्रिटी ब्लौगर हैं, और रविश जी की ब्लॉग चर्चा से इनकी एक अलग ही कहानी जुडी हुई है. आजकल अपनी पहेलियों से हम ब्लौगर्स के सामान्य ज्ञान का जायजा लेने में भी जुड़े हुए हैं ये.

उनकी मेहमाननवाजी का लुत्फ़ उठाते हुए हमने मेट्रो म्यूज़ियम का भ्रमण किया. मुसाफिर भाई तो मुसाफिर ही थे. अपनी शिमला यात्रा का रूट डाईवर्ट कर उन्हें इस ओर का रुख करना पड़ा था. इसलिए हमने जल्द ही एक-दुसरे से विदा ली. मुलाकात छोटी ही रही किन्तु इसने साथ-साथ हरिद्वार न जा पाने की पुरानी कसक को थोडा कम तो किया ही. आशा है जल्द ही नीरज जी की शिमला यात्रा का विवरण उनके ब्लॉग पर मिलेगा.

Saturday, April 18, 2009

विश्व विरासत दिवस पर कुछ सवाल ?

पिछले दिनों गांधीजी के स्मृति चिह्नों को वापस लाने की बहस के बीच यह सवाल भी उठा था कि क्या वाकई हम भारतीय अपनी विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीर हैं! ऐतिहासिक इमारतों पर प्यार भरी छाप और औटोग्राफ, टैगोर के पदकों का चोरी हो जाना, आये दिन प्राचीन मूर्तियों की चोरी या तोड़-फोड़ तथा पर्यटन स्थलों की स्वछता में हमारा अप्रतिम योगदान (!) जैसी घटनाएं हमारे सभ्य होने पर भी प्रश्न चिह्न लगाती हैं.

ऐसी ही घटनाओं की कड़ी में अब हजारीबाग के पाषाण वृत्त (Stone Circle) भी आ गए हैं. जिस प्राकैतिहसिक धरोहर के साथ इस क्षेत्र को अन्तराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र में देखने की कल्पना की जा रही थी, उसकी दुर्दशा दिल को तोड़ देने वाली है. अन्वेषक श्री शुभाषिस दास के एकल प्रयासों से यह स्थल 'समदिवारात्रि' (Equinox) देखने के विश्व में एकमात्र प्राकैतिहसिक स्थल के रूप में विकसित हो रहा था. विरासत की सुरक्षा से जुड़े उच्चतम संस्थानों के अलावा प्रशासन भी इस स्थल की महत्ता से वाकिफ था, मगर इस स्थल की सुरक्षा को तमाम आग्रह के बावजूद नजरअंदाज किया गया. परिणाम ? आज यह स्मारक भी किसी की प्यार की निशानी के घाव अपने सीने पर झेलने को विवश है.

प्रशासन से भी कहीं ज्यादा ऐसे मामलों में स्थानीय जनता दोषी है जो अपनी विरासत के प्रति उपेक्षा का भाव रखती है. हो सकता है रोटी-रोजगार का दबाव इस विषय को हमारी प्राथमिकता सूची में नहीं आने देता, मगर खास ऐसे उद्देश्यों के लिए निर्मित सरकारी विभाग भला किस काम के हैं? 'विश्व विरासत दिवस' पर रूटीन जुमलों और औपचारिकताओं के अलावे अपने आस-पास बिखरी अमूल्य धरोहर को सहेजने की दिशा में सार्थक पहल ही हमें अपनी विरासत पर गर्व करने के अवसर उपलब्ध करा सकेगी.

Thursday, April 9, 2009

झाड़खंड की अनूठी रामनवमी

 
 
रामनवमी का पर्व हाल में ही सोल्लास संपन्न हुआ. यूँ तो यह पर्व पुरे देश में अपार भक्ति-भाव से मनाया जाता है; मगर झारखण्ड और विशेषकर हजारीबाग की रामनवमी की बात ही और है. इस अवसर पर पूरे झारखण्ड में महावीरी झंडों, पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र के परिचालन के साथ पौराणिक मिथकों से जुडी झांकियां निकली जाती हैं. रांची और हजारीबाग में इस पारंपरिक आयोजन का अपना ही अंदाज और इतिहास है.

सारे देश में जब रामनवमी का उल्लास ढलान पर होता है, हजारीबाग में यह आयोजन जोर पकड़ रहा होता है. चैत माह के शुक्ल पक्ष की दशमी से आरम्भ झांकियों का क्रम त्रयोदशी की शाम तक जारी रहता है. इसमें आस-पास के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से भी सैकड़ों झांकियां शामिल होती हैं जिन्हें देखने के लिए अपार जनसमूह उमड़ पड़ता है. महिलायें और बच्चे अपनी सुविधानुसार जुलूस मार्ग के मकानों की छतों पर कब्जा जमा लेते हुए इस आयोजन की छाप अपने दिलों में बसा लेते हैं.

इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा मुस्तैदी दिखानी होती है प्रशासन को. पारंपरिक मार्ग से जुलूस का शांतिपूर्वक गुजर जाना ही प्रशासन की प्राथमिकता होती है.

प्रारंभ में तो यह आयोजन महावीरी झंडों और पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र के प्रदर्शन और परिचालन के रूप में एक प्रकार का शक्ति पर्व ही था, मगर युवा पीढी पर हावी होती आधुनिकता और आडम्बरों से अब यह पर्व भी अछूता नहीं रहा है. फिर भी रामनवमी के इस स्वरुप का अवलोकन अपने-आप-में एक अलग अनुभव है, जिसके साक्षात्कार का अवसर पाने का प्रयास जरुर किया जाना चाहिए.

Friday, April 3, 2009

एक रात- काशी के महामूर्खों के साथ


विद्वानों की नगरी मानी जाने वाली उत्सवप्रिय काशी में एक शाम महामूर्खों के नाम करने की भी परंपरा है. पहली अप्रैल को गंगा तट पर सालाना आयोजित होने वाले 'महामूर्ख सम्मलेन' ने एक पारंपरिक आयोजन का रूप ले लिया है.

1980 में स्व. चकाचक बनारसी और पं. श्री धर्मशील चतुर्वेदी के सम्मिलित प्रयासों से महामूर्ख सम्मलेन का आयोजन आरम्भ किया गया. विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए और काशी के आम जन से जुड़ते हुए इस आयोजन ने गंगा तट पर अपना स्थाई आशियाना जमा लिया है. लोकप्रिय कवि सांढ़ बनारसी वर्तमान में इस आयोजन के एक प्रमुख स्तम्भ हैं.

इस 1 अप्रैल को भी यह आयोजन अपने पुरे शबाब पर रहा. कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत दूल्हा-दुल्हन के विवाह के साथ की गई, जिसमें दुल्हे की भूमिका स्त्री पात्र और दुल्हन की भूमिका पुरुष पात्र ने निभाई. दुल्हन की मूंछें होने की शिकायत पर शादी के फ़ौरन बाद ही दोनों का तलाक़ भी करा दिया गया. 

पारंपरिक धोबी नृत्य आदि सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद हास्य कवियों ने महामूर्ख मेले का शमा ही बाँध दिया. नेता व पुलिस की शान में इस चुनावी मौसम में कुछ ज्यादा ही कसीदे गढे गए.

कार्यक्रम के दौरान हास्य पत्रिका 'पहली अप्रैल' का लोकार्पण भी किया गया. रहमान की 'जय हो' यहाँ भी छाई  रही; जो कि सम्मलेन की थीम भी थी.

अंत में कवि अशोक सुन्दरानी की चंद पंक्तियाँ आपकी नजर-

"देश में मेरे नफरतों का मौसम है,
नफरत की सीढ़ी से सत्ता पाने का सीजन है;
जनता के दर्दो से इनका लेना देना क्या,
इनका तो कुत्ता भी नखरे से करता भोजन है."

Wednesday, April 1, 2009

इतिहास के आईने में 1st अप्रैल

1st अप्रैल को मनाये जाने की शुरुआत कब से हुई यह अस्पष्ट है, किन्तु सर्वाधिक मान्य मत यह है कि 1584 ई. में फ्रांस के चार्ल्स IX ने ग्रेगरियन कैलेंडर को लागू किया. इसने पूर्व में प्रचलित न्यू इयर सप्ताह जो 25 मार्च-1 अप्रैल तक आयोजित होता था, को स्थानांतरित कर दिया. सूचना की धीमी रफ़्तार तथा कुछ अपनी परम्पराप्रियता की वजह से भी कई लोगों ने पुराने कैलेंडर के अनुसार ही नव-वर्ष मनाना जारी रखा. इन लोगों के उपहास के लिए इन्हें मूर्ख समझा गया, और 1st अप्रैल ने कालांतर में 'अप्रैल फूल'  का रूप ले लिया.
 
 स्वस्थ मनोरंजन के इस अवसर पर एक-दुसरे को मूर्ख  बनाना एक परंपरा बन गई. आगे चलकर मूर्ख बनाने की समय सीमा भी निर्धारित कर दी गई, जो दोपहर तक ही थी. आज भी अमूमन इसका पालन होता है.

मगर यह समय यह विचार करने का भी है कि क्या पुराने कैलेंडर की तिथि और हमारे नव संवत की तिथि की निकटता और इनपर नए कैलेंडर की वरीयता तथा होली पर मूर्ख सम्मेलन जैसे दृष्टान्त में साम्य कुछ गौर से सोचने की जरुरत महसूस नहीं कराती है!
 
तस्वीर: साभार गूगल

Tuesday, March 31, 2009

झारखण्ड का प्रकृति पर्व- सरहुल

झारखण्ड के प्रकृति प्रेमी आदिवासियों द्वारा मनाये जाने वाले त्योहारों में एक प्रमुख प्रकृति पर्व है - 'सरहुल'. चैत्र कृष्ण पक्ष तृतीय से प्रारंभ हो बैसाख तक यानि दो माह तक चलने वाला यह एक अद्भुत धार्मिक त्यौहार है.
 
'साल' के वृक्ष में फूलों का आना इस त्यौहार के आने का द्योतक है. साल के वृक्ष के अलावे प्रकृति में उपजने वाली सभी वन-सम्पदा का अपनी आराध्य देवी पर अर्पण करने के बाद ही स्वयं इनका प्रयोग आरम्भ करते हैं ये प्रकृति-पूजक.

मुख्यतः संथालों और उरावों द्वारा आयोजित इस पर्व में 'फूल गईल सारे फूल, सरहुल दिना आबे गुईयाँ' जैसे गीतों की ताल पर प्रसिद्द 'सरहुल' नृत्य पर झूमते हुए प्रकृति से अपने जुडाव और आत्मीयता का परिचय देते हैं ये. इस अवसर पर इनके पुजारी जिसे 'पाहन' कहते हैं द्वारा आने वाले समय में मौसम की भविष्यवाणी भी की जाती है. इस वर्ष राज्य में अच्छी बारिश और खेती में समृद्धि की सम्भावना जताई गई है.

एक प्रकार से देखें तो नव वर्ष पर धरती की उर्वरा शक्ति का सम्मान ही है- 'वासंतिक नवरात्र' के ही सामान. ऐसे में इन पारंपरिक त्योहारों और इनके शास्त्रीय स्वरुप में सम्बन्धओं पर एक नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता भी महसूस होती है.
 
तस्वीर: साभार गूगल

Thursday, March 19, 2009

बनारस का 'बुढ़वा मंगल' मेला


उत्सवप्रिय बनारस का प्रसिद्द 'बुढ़वा मंगल' मेला हाल ही में संपन्न हुआ. होली के अगले मंगल को आयोजित होने वाला यह आयोजन बनारसी मस्ती और जिन्दादिली की एक नायाब मिसाल है. मान्यता है कि होली जिसमें मुख्यतः युवाओं का ही प्रभुत्व रहता है, को बुजुर्गों द्वारा अब भी अपने जोश और उत्साह से परिचित कराने का प्रयास है- 'बुढ़वा मंगल' मेला.
बनारस के इस पारम्पिक लोक मेले से हिंदी साहित्य शिरोमणि भारतेंदु हरिश्चंद्र का भी जुडाव रहा है. बनारस राजपरिवार ने भी इस परंपरा को अपना समर्थन दिया. इस मेले के आयोजन को कई उतार-चढाव से भी गुजरना पड़ा. किन्तु आम लोगों की सहभागिता और दबाव ने प्रशासन को भी इस समारोह के आयोजन से तत्परता से जुड़ने को बाध्य किया. पिछले कई वर्षों से प्रशासन के सहयोग से गंगा तट पर इस आयोजन को कराया जा रहा है. गंगा की लहरों पर एक बड़े बजडे (नौका) पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, सर पर बनारसी टोपी सजाए बैठे संस्कृतिप्रेमी और आस-पास छोटी-बड़ी नौकाओं तथा घाटों पर बैठे सुधि दर्शकगण इस सांस्कृतिक नगरी की पारम्परिकता को एक नया आयाम देते हैं. राजपरिवार द्वारा रामनगर दुर्ग में भी इस कार्यक्रम का विधिवत आयोजन किया जाता है.

Saturday, March 14, 2009

पीड़ा: एक पत्रकार होने की

पढाई पूरी करने के बाद मैं भी किसी अच्छी सरकारी नौकरी में जा सकता था। किन्तु मैं पत्रकारिता में आया, क्योंकि मैं आम जनता से सीधा संवाद करना चाहता था. सुना था लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है पत्रकारिता, तो इस स्तम्भ को और मजबूती देना चाहता था मैं.
इसीलिए पुरे उत्साह के साथ इलेक्ट्रोनिक मीडिया में गया। सोचा था मेरे न्यूज़ की एक-एक बाईट से समाज की सच्चाई झलकेगी और समाज को बदलने में मैं भी सहभागी बन सकूँगा. मगर यहाँ आकर पता चला कि जिस बाजारवाद के विकल्प की तलाश की आशा में मैंने इस और रुख किया था, वो तो पूरी तरह इसे अपने शिकंजे में ले चुका है. साबुन और शैम्पू की तरह न्यूज़ की भी मार्केटिंग हो रही है और इसे ऐसे सजा-धजा कर बेचा जा रहा है जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना ही नहीं.
भूत-प्रेतों के इंटरव्यू लेने से बेहतर मैंने प्रिंट मीडिया की राह चुनी। बड़े मीडिया घरानों की राजनीतिक प्रतिबद्धता में तटस्थ पत्रकारिता की उम्मीद कम ही दिख रही थी, इसलिए मैने हिंदी के ह्रदय प्रदेश के इस छोटे से शहर से कलम की अपनी लडाई जारी रखी.
छोटे शहरों में बाजार तो ज्यादा हावी होता नहीं साथ ही आम लोगों से संवाद भी आसानी से कायम हो जाता है। इसी क्रम में मैं भूल गया कि मैं एक पत्रकार हूँ समाज-सुधारक नहीं. स्थानीय फैक्ट्रियों में दुर्दशा और शोषण के शिकार बाल-मजदूरों को जब मेरी रिपोर्टिंग ने बाल-सुधार गृह पहुंचा दिया तो एक बार को लगा कि मेरा पत्रकारिता में आना सार्थक हो गया. किन्तु जब से पता चला है कि बड़े ही सौहाद्रपूर्ण माहौल में वो बच्चे वापस अपनी कर्मस्थली पहुँच गए हैं, मैं खुद से ही निगाहें नहीं मिला पा रहा.
बात यहीं तक रहती तो भी ठीक थी, कि मैने अपनी ओर से प्रयास तो किया। मगर मैं इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पा रहा कि मुख्यालय में मेरे द्वारा भेजी ख़बरों की चीड़-फाड़ ऐसा व्यक्ति करे जिसे स्थानीय मुद्दों, सरोकारों और जज्बातों का जरा भी भान नहीं.
हममें से जो हवा के रुख के साथ स्वयं को बदलने में सक्षम हैं वो तो ऐसी परिस्थितियों के अनुकूल खुद से समझौता कर ले रहे हैं, मगर मेरे जैसे लोग जिनके लिए पत्रकारिता एक पेशा नहीं आदर्श और जीने का ढंग है वो क्या करें! नया विकल्प तलाशें! ब्लॉग को आजमा कर देखें! हमें तो अभिव्यक्ति और आत्मसंतुष्टि का माध्यम मिल जायेगा, मगर पत्रकारिता जो हमारे लोकतंत्र की जिवंत धरोहर है को इससे जो क्षति पहुँच रही है और पहुँचेगी उसके लिए क्या किसी ने कुछ सोचा है ?
(अपने तथा कुछ पत्रकार मित्रों के अनुभवों पर आधारित)

Tuesday, March 10, 2009

फागुन आयो रे...

वसंत - पंचमी से ही शुरू हो चुकी फाग की उमंग अब चरमोत्कर्ष पर है. गैर आयातित और हमारे मौलिक त्योहारों में होली भी एक है. आदिम कृषक समाज जब फसल की कटाई संपन्न कर चैन की साँस ले रहा होता था और प्रकृति भी नए रंगों में सज-धज कर नया रूप धारण कर रही होती थी तो अपने उत्साह के प्रकटीकरण के लिए रंगों के इस त्यौहार का स्वस्फूर्त सृजन और रंग-गुलाल के साथ नव वर्ष का स्वागत स्वाभाविक ही था।
वसंत - पंचमी से 'होलिका-दहन' की तैयारी भी शुरू हो जाती है, जो दरिद्रता, बुराई और अधर्म के नाश का प्रतीक है; जिसकी सदबुद्धि 'माँ शारदा' ही तो दे सकती हैं।
थोड़े बदले स्वरुप में कमोबेश हर महाद्वीप और प्रत्येक देश में होली सर्दृश्य त्यौहार की उपस्थिति के बीज हमारे विस्मृत हो चुके अतीत में छुपे हो सकते है. ऐसे में इस त्यौहार की मौलिक भावनाओं को विरूपित होने से बचाने के संकल्प के साथ आइये Let's Play Holi.आप सभी को होली की रंग, उमंग और भंग भरी ढेरों शुभकामनाएं.....

Monday, March 9, 2009

क्या वो कॉमेट 'लुलिन' था?

कल मैं भी एक कॉमेट की तरह ही नवाबों के शहर लखनऊ से गुजरा। प्लान में तो 'तस्लीम' के रजनीश जी से मिलना भी था, जो पूरा न हो सका। मगर सुबह-सुबह एक अद्भुत खगोलीय नज़ारे ने मेरा स्वागत किया। सूर्योदय की लालिमा की शुरुआत के साथ ही (लगभग 6:15 पर) आकाश में मैंने एक 'कॉमेट' को गुजरते देखा। वो तो अपने अजीजों के नींद के ख्याल ने मुझे रोक लिया, वर्ना exitement में मैं उसी समय उन्हें भी इस अवलोकन में शामिल करने वाला था। आस-पास के लोगों का ध्यान मैंने इस और खिंचा मगर आलमबाग में बसों के इंतजार में खड़े लोग इस दिशा में विशेष उत्सुक नहीं थे। तकरीबन 15 मिनट तक मैं इस पिंड की गतिशीलता को देखता रहा। अपने मोबाइल कैमरे से मैंने तस्वीर तो ली मगर वह इतनी प्रभावशाली नहीं थी कि उसे ब्लॉग पर लगा पाता। अब तो हमारी वैज्ञानिक चेतना वाले ब्लौगर्स ही बता सकेंगे कि वो कॉमेट 'लुलिन' था या कोई और; और इसके भारत में दिखने की सम्भावना थी भी या नहीं!

Monday, March 2, 2009

दो ब्लौगर्स शहर में...

ब्लौगर मीट की यादों के साये से अभी पुरी तरह निकला भी नहीं था की आभासी जगत के प्रत्यक्ष साक्षात्कार का और अवसर सामने आ ही गया।
विज्ञान लेखन और हिंदी ब्लौगिंग के सशक्त प्रतिनिधि श्री अरविन्द मिश्र जी से पिछले वर्ष 'विज्ञान लेखन कार्यशाला' में मुलाकात हुई थी। हिंदी ब्लौगिंग और विज्ञान लेखन पर और भी कई जिज्ञासाओं की पूर्ति के लिए चाहते हुए भी बनारस में ही रहने के बावजूद उनसे दोबारा मुलाकात नहीं हो पा रही थी. अंततः इस रविवार को आभासी जगत से परे उनसे मिलना तय हो ही गया.
नियत समय पर उनके बताये स्थान पर मैं पहुँच गया, जहाँ से उनके सुपुत्र कौस्तुभ मुझे घर तक ले गए। अपने व्यक्तित्व के अनुरूप पूरी गर्मजोशी से उन्होंने मेरा स्वागत किया और कहीं-से-भी आभासी जगत की दीवार को हमारे बीच नहीं आने दिया.
विज्ञान लेखन और हिंदी ब्लौगिंग की दशा-दिशा सम्बन्धी विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई, जिसमें गंभीर और समर्पित प्रयास की आवश्यकता काफी शिद्दत से महसूस की गई।
भोजन में सारे परिवार की आत्मीयता की झलक तो थी ही, साथ ही था इस परिवार की अभिन्न, शरारती किन्तु आज्ञाकारी सदस्य 'डेजी' का साथ भी।
ब्लौगिंग के बेहतर भविष्य और इसमें अपने सकारात्मक योगदान की आशाओं के साथ हम एक-दुसरे से विदा हुए। मगर यह विदा आभासी ही है वास्तविक नहीं !
हाँ दो दिन व्यस्ततावश इन्टरनेट से दूर रहने के बाद आज एक surprise भी रखा देखा अरविन्द जी के ब्लॉग पर. अपनी चिट्ठाकार चर्चा में मुझे भी शामिल कर उन्होंने मुझपर एक जिम्मदारी डाल दी है. सेलिब्रिटी कांसेप्ट पर तो मैं कुछ नहीं कहूँगा, अलबत्ता इस मुलाकात के बाद उनकी अब मेरे प्रति क्या धारणा है इसकी उत्सुकता मुझे भी रहेगी !





















Friday, February 27, 2009

सफल ब्लौगर्स मीट के आयोजन के मूल तत्त्व-II (अंतिम कड़ी)

पिछली पोस्ट में मैंने आयोजन की भूमिका से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की थी। इस पोस्ट में आयोजन की मुख्य संरचना पर विचार किया जायेगा.
(i) कार्यक्रम का उद्देश्य- यह बिलकुल स्पष्ट होना चाहिए की कार्यक्रम 'ब्लौगर्स मीट' है या 'ब्लौगिंग वर्कशॉप'. ब्लौगर्स मीट - जहाँ समीर लाल जी और अरविन्द मिश्र जी जैसे ब्लौगर बैठे हों, वहां यदि आयोजकों ने "ब्लॉग कैसे बनाएं" पर लेक्चर दिला दिया तो हम गरीब ब्लौगरों पर क्या बीतेगी भला! यही दृश्य इसकी विपरीत परिदृश्य में भी हो सकता है।
(ii) वक्ताओं का चयन- ब्लौगिंग सिर्फ पत्रकारों का शगल नहीं। यहाँ साहित्यकार भी हैं, तो इतिहासकार और आध्यात्मिक चिन्तक भी। इसलिए वक्ता ऐसे चुने जायें जिनसे लगभग सभी वर्ग के ब्लौगर्स लाभ उठा सकें। और हाँ, इन वक्ताओं को ब्लौगिंग की बुनियादी समझ लाज़िमी होनी चाहिए; नहीं तो कहीं वो हम ब्लौगर्स को 'भुनगे' टाइप समझ ज्ञान बांटने का अतिरिक्त दबाव न ले लें!
(iii) ब्लौगर्स के वर्गीकरण से परहेज- कहीं कुछ सेलिब्रिटी ब्लौगर्स की चर्चा भी सुनी थी। एक टिप्पणीकार ने पूर्वी और पश्चिमी ब्लौगर्स जैसे शब्दों पर भी आपत्ति चाहे व्यंग्य में ही सही जताई थी। स्वाभाविक ही ब्लौगर्स को सेलिब्रिटी और आम ब्लौगर्स की श्रेणी में बांटने से परहेज किया जाना चाहिए; नहीं तो कहीं यहाँ भी वर्ग-संघर्ष न शुरू हो जाये! वैसे भी व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं लगता की ब्लौगर समुदाय अभी सभ्य समाज के इन उच्चतम आदर्शों तक पहुँच सका है!
(iv) कार्यक्रम की दिशा- जब अपना अमूल्य समय, साधन आदि व्यय कर कोई ब्लौगर ऐसे कार्यक्रम में शामिल होता है तो लाज़िमी है कि कार्यक्रम के अंत में उसे संतुष्टि का अहसास हो। और यह संतुष्टि तभी मिल सकेगी जबकि कार्यक्रम की कोई सार्थक पहल या उपलब्धि हो। मेरा मानना है कि - "मिल कर बैठें, और व्यर्थ की ही बात हो;
इससे बेहतर है, न ऐसी कोई मुलाकात हो।"
वैसे भी, "वाह-वाह" तो हम टिप्पणियों में कर ही देते हैं।
(v) उत्कृष्ट ब्लौगिंग को प्रोत्साहन- यह एक प्रतीकात्मक प्रयास ही होना चाहिए। किन्तु जब हिंदी ब्लौगर्स के स्तरीय लेखन और निश्चित चरित्र के अभाव की बात होती है, तो इस दिशा में अपेक्षयाकृत बेहतर प्रयास कर रहे ब्लौग्स की चर्चा या उसे पुरस्कृत करने का प्रयास नए ब्लौगर्स को प्रेरणा और मार्गदर्शन देने के काम आ सकता है।
(vi) वैकल्पिक मंच की सम्भावना- हम सभी ब्लौगर्स में जो एक चीज common है वह है 'सृजनात्मकता' और समाज के लिए योगदान की आकांक्षा। मुख्यधारा से कट चुके विषय आज ब्लौगिंग में ही जीवित हैं. ऐसे में एक वैकल्पिक वैचारिक और रचनात्मक समाज के निर्माण के माध्यम के रूप में भी ब्लौगिंग का विकास ऐसे आयोजनों का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए.
जैसा की राज जी ने जानना चाहा था, आयोजन का खर्च इसके स्वरुप के अनुसार परस्पर भागीदारी शुल्क या प्रायोजक की तलाश के माध्यम से पूरा करने का प्रयास किया जा सकता है। मगर बेहतर हो प्रायोजक या दानदाता का इसमें अपनी छवि विज्ञापित करने का माध्यम न बन जाएँ ऐसे अवसर.
मात्र एक 'ब्लौगर मीट' से यदि इतने विचार उभर कर आये हैं तो यह भी इस मीट की एक अन्य उपलब्धि है। आप सभी ने इन विचारों को साझा करने हेतु प्रोत्साहित किया, धन्यवाद।
(नोट:- एक समर्पित ब्लौगर इस विधा की धरोहर ही है. ऐसे में मैं नहीं समझता की ब्लौगिंग पर इन पोस्ट्स से मैंने अपने ब्लॉग के चरित्र से कोई छेड़खानी की हो. वैसे भी एक ब्लौगर के नाते ब्लौगिंग की बेहतरी में अपना अंशदान करना मेरी जिम्मेदारी भी बनती हमेरे प्रयास का मूल्यांकन आप टिप्पणीकारों व भविष्य के हाथों में है. )

Thursday, February 26, 2009

सफल ब्लौगर्स मीट के मूल तत्त्व

आदरणीय विष्णु बैरागी जी तथा कुछ अन्य वरीय ब्लौगर्स ने आग्रह किया था कि 'ब्लौगर्स मीट' जैसे आयोजनों की बढती संभावनाओं को देखते हुए इनपर विस्तार से चर्चा की जाए। मैं भी मानता हूँ कि कार्यक्रम का मात्र संपन्न हो जाना ही नहीं बल्कि इसकी समग्र विवेचना ही इसकी वास्तविक सफलता और भविष्य की आधारशिला होती है। अपने अनुभवों और अन्य ब्लौगर्स की प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन सम्बन्धी अपनी राय क्रमवार रख रहा हूँ -
(i) व्यवस्थित टीम का गठन - किसी भी कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए यह एक अनिवार्य शर्त है. अतिउत्साही आत्मविश्वास या अविश्वास के कारण भी एक ही व्यक्ति पर कार्यक्रम का सम्पूर्ण भार नहीं छोड़ा जा सकता। कार्यक्रम कि जिम्मेदारी के अनुरूप दायित्वों का विभाजन और टीम के सदस्यों की अपनी जिम्मेवारी के प्रति गंभीरता पर ही कार्यक्रम की दशा-दिशा निर्भर करेगी.
(ii) कार्यक्रम की तिथि- ब्लौगिंग में हर उम्र, वर्ग और व्यवसाय के लोग संलग्न हैं, इसीलिए सभी के लिए उपयुक्त तिथि का चयन सरल नहीं; किन्तु अधिकाधिक लोगों के अनुकूल तिथि का चयन किया जाना चाहिए। यदि 2-3 दिनों की लगातार छुट्टी सा संयोग हो तो सोने-पे-सुहागा. 22 फरवरी का 'रांची ब्लौगर मीट' इस पैमाने पर बिलकुल खरा उतरता था.
(iii) कार्यक्रम का स्वरुप- यह स्पष्ट होना चाहिए कि कार्यक्रम का स्वरुप स्थानीय है, राज्यस्तरीय या राष्ट्रीय. आयोजकों तथा आगंतुकों की भी सुविधा कि दृष्टि से यह जरुरी है।
(iv) कार्यक्रम की सूचना- कार्यक्रम के स्वरुप के अनुसार अपेक्षित ब्लौगर्स तक सूचना की उपलब्धता अगला महत्वपूर्ण विषय है. इसके लिए सामुदायिक ब्लोग्स, ई-मेल्स के अलावे स्थानीय समाचार पत्रों का भी प्रयोग किया जा सकता है. ब्लौगर्स की चैन-श्रृंखला भी उपयोगी हो सकती है, जैसा रांची में हुआ.
(v) ब्लौगर्स की स्वीकृति- आयोजन में शामिल होने के इच्छुक ब्लौगर्स के लिए भी अपेक्षित है कि वो अपनी भागीदारी की स्वीकृति कार्यक्रम से यथापूर्व ही दे दें, ताकि आयोजकों को असुविधा न हो।
(vi) प्रबंधन द्वारा प्रत्युत्तर- आयोजकों की टीम में संपर्क प्रभारी जैसा कोई दायित्व निर्धारित होना चाहिए जिससे इच्छुक प्रतिभागी संपर्क कर सकें, और जो उन्हें आगमन की स्वीकृति और कार्यक्रम के सम्बन्ध में औपचारिक सूचना देने में सक्षम हो। यह अतिथियों को संतुष्टि और आयोजकों की गंभीरता को दर्शायेगा।
क्रमशः
(नोट:- यह सीरीज़ शायद कुछ लोगों को उबाऊ और गैरजरूरी लगे किन्तु जो ब्लौगर्स एक-दुसरे से सिर्फ भावनात्मक रूप से जुड़े हैं उनकी ऐसे आयोजनों के प्रति उत्साह और अपेक्षा की दृष्टि से छोटी-छोटी बातें ही महत्वपूर्ण हो जाती हैं. अगले अंक में कार्यक्रम के स्वरुप पर चर्चा करूँगा).

Tuesday, February 24, 2009

कौफी विद ब्लौगर्स

Jab We Met
पूर्वी भारत के पहले ब्लौगर्स मीट में शामिल होने के उत्साह में 350 किमी का रेल सफर और 150 किमी का बस सफर कैसे तय हो गया, पता ही नहीं चला। अपनी तरफ़ से तो मैं देर हो ही चुका था, भला हो परंपरागत भारतीय समय पद्धति का जिसने 'दीप प्रज्ज्वलन' शायद मेरे ही इंतजार में रोक रखा था।
कार्यक्रम की पंच लाइन थी - "A Cup of Coffee With Healthy Minds" और वास्तव में यह कार्यक्रम व्यर्थ की औपचारिकताओं से परे कुछ क्रियेटिव और Healthy Minds के साथ उत्साह, प्रेम और रोमांच की अनौपचारिक त्रिवेणी ही रहा। ऐसा नहीं था की कार्यक्रम को व्यवस्थित सांचे में ढालने में व्यवस्थापकों ने कोई कसर छोड़ी हो किंतु वो ब्लोगर्स ही कैसे जो बंधी-बंधाई लीक पर चलें !
मीडिया के तमाम प्रमुख हस्तियों द्वारा ब्लॉग के महत्त्व को स्वीकारना कार्यक्रम की सफलता रही, और इसके पीछे निश्चित रूप से आयोजक डॉ भारती कश्यप जी और उनकी टीम की उल्लेखनीय भूमिका रही। घनश्याम जी का कार्यक्रम संयोजन और शैलेष भारतवासी जी का ब्लौगिंग पर बुनियादी जानकारी कार्यक्रम की सफलता के अन्य निर्णायक बिन्दु रहे। शिव कुमार मिश्रा जी, मनीष जी और प्रभात जी ने सफल ब्लौगिंग के मूल तत्वों पर प्रकाश डाला; तो अन्य ब्लोगर्स ने अपने अनुभव बांटे। मैंने भी वैचारिक व् सूचनाओं पर आधारित पोस्ट्स के स्वामित्व के प्रश्न पर अपने विचार रखे, जिसे बाद में यहाँ भी चर्चा करूँगा। श्यामल सुमन जी और पारुल जी की ग़ज़लों और अमिताभ मीत जी के शेरों ने कार्यक्रम को जिवंत कर दिया.
कुछ ब्लौगर्स ने आभासी और वास्तविक दुनिया के मध्य मेरी दुविधा पर उत्सुकता जताई थी। जैसा कि उन्मुक्त जी ने कामना व्यक्त की थी- सभी ब्लौगर्स अपनी छवि के अनुरूप ही उत्साही, सृजनशील और मित्रवत थे. पारुल जी के व्यक्तित्व में वास्तव में 'सरगम' की झलक थी, तो रंजना जी के व्यक्तित्व में 'संवेदना संसार' की झलक. प्रभात जी 'गपशप' के ही मूड में थे तो संगीता जी में 'गत्यात्मक ज्योतिष' का बड़प्पन. लवली जी अपने नाम के ही अनुरूप थीं, हाँ किसी 'भुजंग' स्वामिनी की इमेज आपके दिलों में हो तो उसे भुला दीजियेगा ! 'भूतनाथ' नहीं भाई राजीव थपेड़ा ही सही रहेगा; क्योंकि इस उपनाम के साथ हम पर इमोशनल अत्याचार कर रहे हैं वो।
इस क्षेत्र के ब्लौगर्स को जोड़ने में यह कार्यक्रम काफी हद तक सफल रहा, किंतु अभी ऐसे आयोजनों को एक लंबा सफर तय करना है. कई सक्रिय ब्लौगर्स और नए ब्लौगर्स को भी प्रेरित करने की नई संभावनाएं दर्शा गया यह 'ब्लौगर्स मीट'.

Saturday, February 21, 2009

मैं भी चला ब्लौगर्स मीट


     लवली जी द्वारा प्राप्त 'ब्लौगर्स मीट' के आमंत्रण और इसी बहाने अपने गृहराज्य झाड़खंड की राजधानी पुनः घूम आने का प्रलोभन छोड़ न सका और लगे हाथों  इस कार्यक्रम के आयोजक शैलेश भारतवासी जी को सूचित कर स्वयं को 'आधिकारिक स्वामंत्रित' भी करा लिया. किन्तु इस  मीट में शामिल होने के लिए बड़े खेद के साथ अपने अजीज ब्लॉग मित्र नीरज मुसाफिर जी के हरिद्वार चलने के आमंत्रण को अस्वीकार भी करना पड़ा. आशा है ब्लौगिंग का सफर हमें मुसाफिरी का और भी अवसर देगा.
     अब जब रवानगी में चंद ही घंटे शेष हैं एक दुविधा में हूँ. ब्लॉग एक आभासी दुनिया है, जहाँ हर ब्लौगर के लिए हमारे दिलों में एक काल्पनिक छवि बसी हुई है. यह थोडी रूमानी भी है, थोडी भ्रामक भी; किंतु है सुखद. ऐसे आयोजन आभासी दुनिया से एक मजबूत संबंधों की शुरुआत में सहायक होते हैं. किंतु क्या यह उस आकर्षक भ्रम का अंत नहीं ! काल्पनिकता और वास्तविकता के इस द्वंद के उत्तर की तलाश करता हूँ 22 फरवरी को रांची में....

Friday, February 13, 2009

पराया नहीं है वैलेंटाईन डे

पराया नहीं है वैलेंटाईन डे


पश्चिम से आ रही किसी परम्परा के नाम पर अंधविरोधी मानसिकता पर पुनर्विचार की जरुरत है। जरा गौर से देखें तो वैलेंटाईन डे हमारी उसी प्राचीन परम्परा का वारिस है जो अतीत के किसी अध्याय में अपनी जड़ों से अलग हो आज पश्चिमी रास्तों से गुजरता अपनी जड़ों को धुन्धता वापस आ रहा है।
क्या कारण है की वैलेंटाईन डे तभी मनाया जाता है जब की हमारे यहाँ वसंत अपने पूरे शबाब पर होता है, जबकि पश्चिमी 'डेज' ऋतुओं पर आश्रित नहीं होते। हमारे यहाँ प्राचीन काल से ही वसंत में 'वन-विहार', 'झुला दोलन' , 'पुष्प-श्रृंगार' आदि की परम्परा रही है। 'मदन-उत्सव', 'शालभंजिका पर्व' आदि का उल्लेख हमारे आदि साहित्यिक और धार्मिक ग्रंथों में भी है। कालिदास व बाणभट्ट की रचनाओं तथा 'जातक कथाओं' में भी वसंत क्रीडाओं का अनूठा वर्णन किया गया है। 'वसंत पंचमी' से आरम्भ होकर'फाल्गुन पूर्णिमा' तक जारी रहने वाला प्रकृति के संग उल्लास का यह पर्व किसी विदेशी 'डे' या 'वीक' का मोहताज नहीं है।
अंध विरोध और गुंडागर्दी के साथ-साथ अत्याधुनिक होने के भ्रम में जीने वालों के लिए भी इस उत्सव का प्रतिषेध के बजाय इसका वास्तविक भारतीयकरण ही सही समाधान होगा. क्यों न हम मौका दें इस भटके हुए अतीत के एक अंश को उसका सुंदर स्वरुप लौटाने का ! मगर है कोई असली भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने में सक्षम कोई संगठन !
तो आइये हम हीं उत्सव मनाएं प्रकृति और प्रेम के इस मिलन का.....

Monday, February 9, 2009

रंग बसंती आ गया.....


जलवायु परिवर्तन की तमाम बहसों के परे जनमानस के बीच बसंत आ गया है। पीली सरसों, नए पुष्पों, नव पल्लवों के बीच कई सुकोमल भावनाओं में भी स्पंदन जागृत हो रहा है। प्रकृति दोनों हाथों से अपनी सुन्दरता के प्रदर्शन को प्रस्तुत है , मगर कंक्रीट के जंगलों के मध्य प्रकृति के लिए स्थान ही कहाँ बचा है!
तो आइये चलें बसंत-विहार के लिए उन आम जगहों से हट कर उस ओर जो तथाकथित विकास की काली छाया से थोड़े परे हैं। ऐसी ही एक खुबसूरत जगह है 'झारखण्ड के कश्मीर' के रूप में चर्चित 'हजारीबाग'। पाषाणयुगीन धरोहर और सांस्कृतिक विरासत को संजोये यह स्थल अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए भी प्रसिद्ध है। नेशनल पार्क, शालपर्णी, कन्हरि पहाड़ी जैसे पर्यटक स्थल ही नहीं छोटे-छोटे गावों और हरे-पीले खेतों में भी वैसी ही कशिश है, बस प्रकृति को निहारने वाली एक पारखी नजर चाहिए।
यह सहज-सरल सुन्दरता आपको अपने शहर के आस-पास भी मिल जायेगी, बस जरुरत है उसे मानवीय लोभ के दुष्प्रभाव से बचाने और संजोने की।
तो आइये मनाएं इस वसंत का उत्सव उसी अछूते सौंदर्य के साथ।

Thursday, February 5, 2009

और ये फरमाइश भेजी है झुमरीतिलैया के.....


     विविध भारती के अलावे कई अन्य रेडियो स्टेशनों पर यह पंक्ति हमने कई बार सुनी होगी. मगर क्या कभी यह भी जानने की कोशिश की है कि यह जगह आख़िर है कहाँ, या यह वास्तव में कहीं है भी या नहीं!
      झुमरी और तिलैया जो कि दो अलग-अलग गाँव हैं झारखण्ड के कोडरमा जिले के खुबसूरत जंगलों और पहाडों के बीच.  कहा जाता है कि इन दो क्षेत्रों के मध्य किसी राजा का कभी गढ़ था जिसके कारण यह क्षेत्र झुमरी तिलैया कहलाया.
     इस क्षेत्र के दो जुनूनी रेडियो श्रोताओं श्री रामेश्वर वर्णवाल और श्री गंगा प्रसाद मगधिया ने फ़रमाइश वाले  कार्यक्रमों में चिट्ठियां भेजना का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि हर रेडियो केन्द्र के ऐसे कार्यक्रमों में इस क्षेत्र का नाम होता ही था. ऐसा न हो पाने पर कभी-कभी उद्घोषक भी चर्चा करते थी कि आज झुमरी तिलैया से कोई फ़रमाइश नहीं आई है.
    इन जुनूनी श्रोताओं के जूनून को आज भी न सिर्फ़ उनके परिवार वाले बल्कि सारे क्षेत्र के लोग आगे बढ़ा रहे हैं.
    तो है न यह चिट्ठियों के माध्यम से अपने क्षेत्र को सारे देश में प्रसिद्धि दिलाने का अनूठा प्रयास.

Tuesday, February 3, 2009

सरस्वती पूजा और विद्यार्थी

     सरस्वती पूजा सोल्लास संपन्न हो गई. मगर अपने पीछे फ़िर छोड़ गई यह प्रश्न भी कि क्या पूजा के नाम पर युवा वर्ग इस पर्व के संदेश को आत्मसात कर पा रहा है. माँ की विदाई के समय जो भोंडा व्यवहार इन 'विद्यार्थियों' द्वारा दिखाया जाता है उसे देख क्या उनकी अपनी माँ को गर्व महसूस होता होगा! तब फ़िर माँ शारदे पर क्या गुजरती होगी!
     और विसर्जन के नाम पर स्थानीय नदियों और तालाबों की जो शामत आती है, क्या उस और देश के इस प्रबुद्ध भविष्य को नहीं सोचना चाहिए. क्या यह सम्भव नहीं कि मूर्तियों की जगह तस्वीरों का या ऐसे किसी वैकल्पिक माध्यम का प्रयोग किया जाए जिससे जल प्रदुषण में एक वर्ग की हिस्सेदारी आंशिक रूप से ही मगर कम तो हो.
    माँ शारदे सभी को सद्बुद्धि दें.

Friday, January 30, 2009

गांधीजी के साथ- गावों की ओर

(यह पोस्ट मेरे अन्य ब्लॉग gandhivichar.blogspot.com से)


भारत की आत्मा गावों में बसती रही है, मगर आजादी के बाद अर्थव्यवस्था का केन्द्र शहरों को मान विकास के मॉडल को अपनाया गया, जिसने देश की जड़ें खोखली कर दीं। यही कारण है कि आज विश्व के किसी दूसरे कोने में चले एक झोंके से भी हमारी विकास की ईमारत लड़खडाने लगती है।
भारत की आत्मा को आत्मसात करने वाले गांधीजी ने कहा था कि- " अब तक गाँव वालों ने अपने जीवन की बलि दी है ताकि हम नगरवासी जीवित रह सकें। अब उनके जीवन के लिए हमको अपना जीवन देने का समय आ गया है। ... यदि हमें एक स्वाधीन और आत्मसम्मानी राष्ट्र के रूप में जीवित रहना है तो हमें इस आवश्यक त्याग से पीछे नहीं हटना चाहिए। " "भारत गावों से मिलकर बना है, लेकिन हमारे प्रबुद्ध वर्ग ने उनकी उपेछा की है। ... शहरों को चाहिए कि वे गावों की जीवन-पद्धति को अपनाएं और गावों के लिए अपना जीवन दें। "
गांधीजी के विचारों को ही उनकी विरासत मानते हुए ग्रामोत्थान और 'ग्राम स्वराज' की दिशा में हमारा अंशदान ही उस महानात्मा के प्रति हमारी विनम्र श्रद्धांजलि होगी।

Friday, January 23, 2009

विद्रोही सुभाष की दुविधा



अपने विद्रोही स्वाभाव से ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर देने वाले सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि किसी भी युग में युवाओं कि बुनियादी सोच समान होती है। उन्हें अंजान राहें ज्यादा लुभाती हैं, जबकि समाज उन्हें अपनी आजमाई हुई लकीर की ओर ही खींचना चाहता है।
असमंजस कि यह स्थिति सुभाष जी कि तरुणाई में भी देखने को मिलती है। लन्दन में ICS के प्रशिक्षण के दौरान ही देशसेवा में आने का उन्होंने निर्णय ले लिया था, किंतु यह किस रूप में हो इसे लेकर वह दुविधा में थे। तभी उन्होंने बंगाल के वरिस्थ नेता देशबंधु चित्तरंजन दास को पत्र लिखा कि - "नौकरी करने की उनकी इच्छा बिल्कुल नहीं है, और वे स्वतंत्रता संग्राम में किसी भी रूप में भागीदारी के इच्छुक हैं।" कोई प्रत्युत्तर न पाने और अपनी संभावित भूमिका कुछ और स्पष्ट होने पर उन्होंने पुनः देशबंधु से पत्रकारिता आदि से जुड़े क्षेत्र में अपनी सेवाएं देने की पेशकश की, और स्वीकृति मिलने पर ICS से इस्तीफा देकर भारत लौट आए।
नेताजी के जीवन से आज की पीढी यदि यह संदेश भी ले सके कि कोई जन्मजात महान नहीं होता, बल्कि लक्ष्य स्पष्ट हो तो राहें ख़ुद निर्धारित की जा सकती हैं; तो यह सुभाष जी के बलिदान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
नेताजी की कुछ पसंदीदा पंक्तियाँ दोहराते हुए-
कदम-कदम बढाये जा, खुशी के गीत गए जा;
ये जिंदगी है कौम की, तूँ कौम पर लुटाये जा।

Tuesday, January 20, 2009

गंगा पर रेतीला संसार



गंगा पर रेतीला संसार

कलाकार अपनी रचनाशीलता की अभिव्यक्ति के लिए कोई--कोई मंच ढूंढ़ ही लेते हैंपानी की कमी के कारण गंगा के बीच उभर आए रेत के टीलों को ही इसबार अपनी अभिव्यक्ति का मध्यम बना लिया गया, और सैकड़ों कलाकारों, स्कूली बच्चों और आम लोगों ने अपनी कल्पनाशीलता का साक्षी बनाया माँ गंगा कोअवसर था राम छात्पार कला न्यास की ओर से अपने गुरु के जन्मदिन 19 जनवरी को 'रेत में आकृति की खोज' विषय पर आयोजित कला प्रतियोगिता कावार्षिक आयोजन का रूप ले चुका यह कार्यक्रम काशी की उत्सवप्रियता और रचनाशीलता को एक नया आयाम देता है, और स्थानीय कलाकारों और नागरिकों को अपनी कला की अभिव्यक्ति का अवसर भीआशा है यह आयोजन अपनी निरंतरता बनते हुए अन्तराष्ट्रीय स्वरुप लेगाइस अभिनव सोच को क्रियान्वित करने वाले जज्बे को सलाम

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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