Sunday, November 4, 2012

राजनीतिक आस्था के नाम पर: ओह माई गौड !!!



जिनलोगों ने परेश रावल अभिनीत ‘ओह माई गौड’ देखी होगी वो जाने-अनजाने कहीं-न-कहीं आज के अरविन्द केजरीवाल को इससे रिलेट कर रहे होंगे. वेदांत, सनातन... किसी भी नाम से धर्म के वास्तविक रूप से कितनी भी बार लोगों को जागरूक बनाने की कोशिश की गई, मगर धर्म जैसे ब्रांड के हाथों अपनी सत्ता मजबूत करने वाले ठेकेदारों ने हर नई परिभाषा को अपने ही सांचों में ढाल लिया और सदियों से धर्म के नाम पर भय को अपने अंदर तक स्थापित कर चुकी आम जनता ने बार-बार नई स्थिति बिना किसी विशेष प्रतिरोध के स्वीकार कर ली. बुद्ध, मोहम्मद साहब, साईं बाबा जैसी विभूतियों ने आम जनता को जागरूक करने के अथक प्रयास किये, मगर धर्मसुधार के प्रयासों की जरुरत आज भी कम नहीं हुई है...

धार्मिक व्यवस्था की ही तरह राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के भी समस्त विश्व में कई प्रयास हुए. कई विचारधाराएं अस्तीत्व में आईं. मगर सत्ता को अपने हित साधन का एक जरिया समझने वाले वर्ग ने लगभग हर देश में हर नई व्यवस्था को अपने अनुकूल तोड़-मडोड़ ही लिया, और जनता बस नई उम्मीद के साथ नए कलेवर में लिपटी उसी व्यवस्था की अनुगामिनी बनती रही. मार्क्स, माओ और गांधी जैसे विचारकों के आदर्शों पर आधारित व्यवस्था आज हकीकत में कहाँ हैं !!!

अरविन्द केजरीवाल इन विचारकों की श्रंखला में नहीं आते. मगर व्यवस्था में कमियों की ओर उन्होंने ‘व्हिसल ब्लोअर’ की अपनी भूमिका निभा दी है. उन्हें अब गंभीरता से लिया जाये अथवा नहीं, वो सत्ता का अंग बनते हैं और अपनी क्या भूमिका निभाते हैं वो अलग विषय है. मगर सत्ता के ठेकेदारों को फिल्म के कांजी भाई की तरह उन्होंने कटघरे में तो ला खड़ा किया ही है. हर प्रयास की विवेचना सिर्फ उसकी सफलता-असफलता के आधार पर ही नहीं की जा सकती, छला जाता रहा आम आदमी अबतक जिन बातों को मात्र महसूस ही करता आ रहा था, उसे किसी भी बहाने अभिव्यक्ती देने की पहल कर एक हिम्मत तो दी ही है केजरीवाल ने. एक शक्तिशाली और एकजुट गुट के आगे आम आदमी द्वारा अपनी आवाज उठाना कोई छोटी बात नहीं, चाहे वो आज शक्तिशाली अट्टहासों में दबती सी प्रतीत हो रही हो.

केजरीवाल पर आरोप लगाया जा रहा है कि वो हर राजनीतिक दल को भ्रष्ट बता विकल्प की उम्मीदों को धुंधला कर रहे हैं, जनता को असमंजस में डाल अस्थिरता बढ़ा रहे हैं. केजरीवाल कोई राजनीतिक मसीहा नहीं, वो विकल्प न बन सकते हों, मगर यह असमंजस मात्र उन्ही के आगे आएगा जिसने उस व्यक्ति की आवाज अनसुनी की हो जिसके विचार इस देश की मिट्टी और परिस्थितियों को आत्मसात करते हुए उभरे थे. लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए गाँधी जी ने कहा था – “ सच्चे लोकतंत्र में, प्रत्येक स्त्री-पुरुष को स्वयं विचार करने की शिक्षा दी जाती है....”

“भारत के सच्चे लोकतंत्र में गाँव को इकाई माना जायेगा... सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे बीस लोगों द्वारा  नहीं चलाया जा सकता. इसका संचालन तो नीचे से, हर गाँव के लोग करेंगे.”

और ग्राम शासन की रुपरेखा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा था “... गाँव में पूर्ण लोकतंत्र चलेगा जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित होगा. व्यक्ति ही अपनी सरकार का निर्माता होगा....”

स्पष्ट है कि यूँ ही नहीं भारत का संविधान ‘हम भारत के लोग...” पर ही आधारित है.  भारत की समस्याओं का हल भारत के ही मनीषियों के विचारों में छुपा हुआ है और इसे उजागर और आत्मसात भी हम ही कर सकते हैं. समय के कई थपेडों का हमारी धार्मिक व्यवस्था ने सामना किया है और खुद को परिमार्जित करते हुए हर बार और बेहतर स्वरुप में उभर कर सामने आई है, यह प्रक्रिया आज भी जारी है. यह प्रयोग हम अपनी राजनीतिक व्यवस्था में भी अपना सकते हैं. राजनीतिक व्यवस्था में आस्था दूसरों पर दोषारोपण करके नहीं बल्कि खुद में बदलाव करके सुदृढ़ की जा सकती है. इस संस्था पर विश्वास और आस्था का टूटना ही अराजकता का मूल कारण होगा और हम जानते हैं कि “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना...”

Tuesday, October 2, 2012

गांधीजी की वसीयत.....



वर्तमान में भारत सहित पूरे विश्व में जारी राजनीतिक, आर्थिक, वैचारिक उथल-पुथल के इस दौर में इस बात को दोहराने की आवश्यकता नहीं कि गांधीजी के विचारों की प्रासंगिकता कितनी शिद्दत से उभरती है.  गांधीजी के विचार जिनकी प्राथमिक झलक उनकी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ से मिलती है से न सिर्फ भारत बल्कि समस्त विश्व को सर्वांगीण स्वराज की दिशा मिलती है. मगर गांधीजी के विचारों की एक मुख्य खासियत यह है कि वो मात्र सैद्धांतिक ही न होते हुए व्यावहारिक रूप से अमल करने का मार्ग भी दर्शाता है. शायद तभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिससे वो राजनीतिक रूप से जुड़े थे की उन्होंने ‘लोक सेवक संघ’ के रूप में परिकल्पना की थी; जो हरिजन’ में ‘हिज लास्ट विल एंड टेस्टामेंट’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ था.....

राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर चुकने के बाद वो एक संसदीय तंत्र के रूप में कॉंग्रेस की कोई भूमिका नहीं देखते थे. उनका अगला लक्ष्य अपने गांवों को सामाजिक, नैतिक और आर्थिक स्वाधीनता हासिल कराना था. स्वदेशी समर्थक, छुआछूत - सांप्रदायिक वैमनस्य से रहित कार्यकर्ताओं द्वारा पंचायत को इकाई मानते हुए गाँवों के सर्वांगीण विकास द्वारा प्राथमिक स्तर से उच्चतम स्तर तक विकास के क्रम को सुनिश्चित करवाना उनका लक्ष्य था.

निःसंदेह गांधीजी की हत्या के बाद सुनियोजित ढंग से उनके विचारों की हत्या के भी निरंतर प्रयास होते रहे, फिर भी विभिन्न कारणों से विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं द्वारा अपने कई विचारों के साथ ‘गाँधीवादी’ सदृश्य उपमा भी जोड़नी ही पड़ी...

आज देश में कोई और संगठन तो गांधीजी की इस अंतिम इच्छा को एक बड़े पैमाने पर उतारने को इच्छुक और समर्थ तो दिखता नहीं. फिर भी मन में कहीं एक विचार है जिसके मूर्त रूप में उतर पाने की संभावना नगण्य देखता हुआ भी कहना तो चाहूँगा ही. कहते हैं गांधीजी ने 1934 में वर्धा प्रवास के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा का अवलोकन किया था, जहाँ वे उसके स्वयंसेवकों की अनुशासन और गैरजातिवादी भावनाओं से काफी प्रभावित भी हुए थे. मगर उनके जैसे दूरदर्शी व्यक्ति ने कुछ सोचकर ही इसी तर्ज पर एक पृथक ‘लोक सेवक संघ’ की स्थापना की परिकल्पना पर विचार किया होगा. अगर राष्ट्रसेवा को समर्पित, गांधीजी के विचारों पर आधारित एक अति शक्तिशाली संगठन अस्तित्व में होता तो आज इस देश का वर्तमान कुछ और ही होता..........

खैर इतने बड़े स्तर पर न सही मगर गाँधीवादी विचारों को व्यवहार में लाने के यथासंभव प्रयास पूरे देश में किसी - न - किसी स्तर पर तो चल ही रहे हैं, जो अक्सर हमारी आँखों के सामने से गुजरते रहते हैं. हम चाहे इस दिशा में इतनी बड़ी भूमिका न निभा सकें मगर व्यक्तिगत रूप से ही गाँधीवादी सिद्धांतों को यथासंभव अपने अंदर ही उतारने की सच्ची कोशिश करें तो गांधीजी के बलिदान के प्रति यह हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.....

Tuesday, August 21, 2012

अविश्वास के ड्रैगन के पंजों में भारतीय समरसता...



कुछ माह पूर्व हमारे एक सशक्त पड़ोसी देश से जुड़ी एक खबर चर्चा में थी, जिसमें एक रिसर्च ग्रुप ने अपने शोध अध्ययन से निष्कर्ष निकाला था कि भारत सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विविधतापूर्ण देश है, अतः आने वाले समय में इसके इसी आधार पर कई भागों में विभक्त होने की संभावना काफी प्रबल है...।  अब यह संभावना ही मात्र इंगित की गई थी अथवा इस दिशा में प्रयास करने की भी नीति झलक रही थी – यह कहना सहज तो नहीं; मगर हाल ही में देश के पूर्वोत्तर सहित कई भागों में घटी हिंसक घटनाओं को इस परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है।

महज सोशल नेटवर्किंग साइट्स, या एसएमएस या एमएमएस के प्रभाव में अनगिनत लोगों का पलायन या हिंसा सिर्फ बाहरी षड्यंत्र ही नहीं मनोवैज्ञानिक रूप से आंतरिक अविश्वास भी दर्शाता है – अपने देशवासियों के प्रति भी। और निःसंदेह यह अविश्वास अपने ही लोकतंत्र पर आस्था और विश्वास से कहीं मजबूत हो गया है।

आजादी के पहले से ही हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने देश को एकसूत्र में पिरोने के जो प्रयास किए थे वो अब मात्र प्राथमिक कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों के अध्यायों और सतही शब्दों तक ही सीमित रह गए हैं।

आज जरूरत जातीय अथवा प्रांतीय विविधता के नाम पर कुछ राज्यों को शेष भारत से पृथक महत्व देने भर की नहीं, बल्कि सभी को समानता का बोध कराने की है। हिन्दी जैसी सर्वसुगम भाषा का प्रसार, आबादी का समानुपातिक सम्मिश्रण आदि प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति के आधार पर सुनीश्चित किए जाने चाहिए।

अफवाहों के सूत्र भले पाकिस्तान से मिलने के संकेत मिले हों, मगर उसके प्यादों की चाल कौन तय कर रहा है इसे भी समझना होगा। बार-बार हर जाँच का घुमफिरकर पाकिस्तान पर ही केंद्रित रह जाना इसके मूल नीतिकारों को आवरण प्रदान कर सकता है।  समस्या के मूल पर अभी और समय रहते ठोस प्रहार करने की जरूरत है, वरना भारत की ऐतिहासिक – सांस्कृतिक समरसता की विरासत हमारी आँखों के सामने ही ध्वस्त हो जाएगी..... 

Sunday, August 19, 2012

अन्ना आंदोलन या जनांदोलन : कोई दिशा निकलनी चाहिए...




जब मैं BHU में था, बनारस के मेहंदीगंज में कोका-कोला संयंत्र के सालाना विरोधी आयोजन में मेधा पाटेकर से मुलाकात हुई. उन दिनों मैं उनसे बड़ा प्रभावित था. मैंने उनसे पुछा कि जब मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से इतनी शिकायतें हैं तो आप जैसे लोग खुद चुनावों में उतर हमें उनको चुनने का विकल्प क्यों नहीं देते ? - उनका जवाब यही था कि उनका प्रयास सिर्फ जनजागरूकता का है और परिवर्तन का निर्णय जनता को ही करना है.

इस देश के अधिसंख्य मतदाता विभिन्न कारणवश विकल्पहीनता की सी ही स्थिति में पृथक राजनीतिक दलों को समर्थन देने पर विवश हैं. धार्मिक, सामाजिक, जातीय, आर्थिक किसी भी  वजह से किसी भी दल को समर्थन देते हुए भी बदलाव की एक उम्मीद कहीं-न-कहीं तो सभी के मन में थी.

अन्ना आंदोलन के प्रथम चरण को समर्थन के रूप में इन्ही भावनाओं का उभार दिखा. विभिन्न कारणों से दूसरे चरण को उसी स्तर का समर्थन न मिलता देख इस आकलन पर पहुंचना सही नहीं होगा कि जनता में विकल्प की चाहत खत्म हो गई है. यदि धर्म, संप्रदाय, जाति  आदि संकुचित भावनाओं के ‘ प्रकटीकरण ‘ के लिए तत्पर किसी समूह को राजनीतिक स्वीकार्यता मिल जा सकती है तब टीम अन्ना के पास तो ऐसी संकीर्ण मानसिकता से हटकर ही मुद्दे हैं. वैसे भी यह भारत है जहाँ हर मान्यता और विचारधारा के लिए समुचित स्थान की कभी कोई कमी नहीं रही है...

हमारा संविधान तो सदा से ही अलगाववादी और नक्सली विचारधारा को भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने को आमंत्रित करता रहा है, ऐसे में टीम अन्ना के राजनीति में आने पर इतनी हायतौबा भला कैसी !!!

           



हाँ, बेहतर होगा कि वो किसी ठोस रणनीति के साथ एक सार्थक विकल्प के रूप में चुनाव में उतरें. जनता उनका हर कदम एक अलग नजरिये से देख रही है, जो बाकि राजनीतिक दलों के प्रति दृष्टिकोण से अलग है. इस दबाव का इन्हें एहसास होना चाहिए. बदलाव की दिशा में एक छोटे कदम का भी अपना महत्व है, मगर इतिहास सफल लोगों को ही स्थान देता है. तो टीम अन्ना से भी बस एक हंगामा खड़ा करने वाली ही नहीं बल्कि तस्वीर बदलने वाली कोशिश पर खरे उतरने की भी अपेक्षा यह देश रखेगा.

और गांधीजी की यह उक्ति शायद उन्हें प्रेरित कर सके (यदि वो वाकई प्रेरणा पाना चाहें) कि – “ पहले वो आपको नजरअंदाज करेंगे, फिर वो आप पर हँसेंगे, इसके बाद वो आप से लड़ेंगे और फिर आपकी जीत होगी.....”

देश को कभी परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखलाने वाले आज उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, और उन्ही की ओर से इस नई कवायद का ज्यादा मुखर विरोध भी हो रहा है. भारतीय जनता के विश्वास को एक बार फिर से न छले जाने के उम्मीद व आग्रह के साथ एक सार्थक विकल्प दे पाने की शुभकामनाएं.....

Monday, August 13, 2012

एक महापाषाणीय स्थल की अभूतपूर्व पुनर्स्थापना.....





इस ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास मुख्यतः अपनी विरासत के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करना रहा है. ऐसी ही एक विरासत पंखुड़ी बरवाडीह, हजारीबाग; झाड़खंड के ‘स्टोन सर्कल’ भी हैं जिनका जिक्र मैंने अपनी ब्लौगिंग की प्रारंभिक पोस्ट में भी किया था. पुनः जब स्थानीय लोगों ने इसपर अपने प्रेम प्रदर्शन की निशानियाँ छोडीं तब भी ‘ विश्व विरासत दिवस ‘ के बहाने इस घृणित प्रवृत्ति पर भी मैंने चर्चा की.  कोल माइनिंग से संभावित खतरे और स्थानीय जनता तथा प्रशासन की उपेक्षा के बीच फिर भी इसके बरकरार होने की फिर भी कहीं एक मनबह्लाऊ तसल्ली थी, जो भी हाल में टूट सी गई जब इनमें से एक स्टोन (मेन्हीर) के गिर जाने की सुचना मिली. इन दोनों महापाषाणों के मध्य से बनी ‘V’ आकृति से समदिवारात्री  ( Equinox ) के कई दृश्यों को निहारने के संस्मरण मानसपटल पर उभर आये. दूर से ही इस स्थल को देख उभर आने वाला रोमांच अद्भुत था, मगर इस रोमांच का केन्द्र ‘V’ आकृति बनाने वाले मेनहीर में से एक के प्रकृति, प्रशासन और स्थानीय लोगों की अपेक्षाओं के बोझ तले ध्वस्त हो चुका था.  


ऐसे में राहत यह जानकर मिली कि हजारीबाग निवासी मेगालिथ अन्वेषक श्री शुभाशीष दास ने जिन्होंने इस स्थल के खगोलिय पक्षों को उभारने के महत्वपूर्ण प्रयास करते हुए राष्ट्रिय-अन्तराष्ट्रीय कई विशेषज्ञों का ध्यान इस ओर खिंचा था, के द्वारा इसे मूल स्वरुप वापस देने के त्वरित प्रयास शुरू किये गए. इन् महापाषाणों (Megaliths) को अपनी संतान सादृश्य मानने वाले श्री दास के लिए इनका ये स्वरुप देख पाना कितना कठिन रहा होगा इसकी कल्पना भी नाहीं की जा सकती. अपने कई कई वर्षों के सतत अध्ययन के दौरान इन्होने इन् मेगालिथ्स की दिशा, कोनों पर झुकाव जैसे कई तकनिकी देता संकलित कर रखे थे, वो अभी काम आये और संभवतः भारत में पहली बार किसी ध्वस्त महापाषाण को उसका मूल स्वरुप पुनः दे पाने का प्रयास किया गया. एक अमेचर मेगालिथ अन्वेषक के लिए यह कार्य कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा इसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है...


श्री दास के अनुसार इस संरचना को संपूर्ण वास्तविक स्वरुप दे पाना तो असंभव सा ही है, किन्तु इन्हें पूर्व सदृश्य स्वरुप तो दिया ही जा चूका है; और अब इसकी ‘ V ‘ आकृति में से ‘Equinox’ का अवलोकन पुनः संभव है.....


एक मेगालिथ अन्वेषक और एक जागरूक नागरिक के रूप में श्री दास ने अपनी जिम्मेवारी तो निभा दी, मगर क्या अब इन अपाहिज मेगालिथ्स के प्रति प्रशासन और आम जनता से अपनी विरासत के प्रति उनकी जिम्मेदारी निभाने की कोई उम्मीद भी की जानी चाहिए ?????

Wednesday, July 25, 2012

अमरनाथ यात्रा...




“इस दर पे वही आता है, जिसे वो बुलाता है...”; ये पंक्तियाँ कुछ समय पहले तक मेरे लिए शब्द मात्र ही थीं; मगर वाकई इनपर विश्वास सा होने लगा है। घर से निकला तो था जम्मू में वैष्णो देवी के दर्शन कर श्रीनगर और इसके आस-पास की कुछ जगहें घूमने की योजना बनाकर, मगर जम्मू की जबर्दस्त गर्मी और श्रीनगर में कुछ संवेदनशील कारणों से कर्फ्यू लगे होने के कारण योजना परिवर्तित करनी पड़ी। संयोग से अमरनाथ यात्रा शुरू हो गई थी और कई यात्रियों के जत्थे जाते देख हमने भी बाबा अमरनाथ के दर्शनों का निश्चय कर लिया। इस बिल्कुल अन्प्लान्न्ड जर्नी में संयोग ही कहा जाएगा कि भगवती नगर में बने कैंप से अगले दिन का रजिस्ट्रेशन मिल गया, और तमाम शंका-आशंकाओं के मध्य ही चंद ही बची छुट्टियों में बिना किसी व्यवधान के यात्रा संपन्न हो ही गई। 

अपने पास छुट्टियाँ काफी गिनी-चुनी थीं, मगर फिर भी हमने पहलगाम मार्ग से चढ़ाई और बालटाल मार्ग से वापसी का निर्णय लिया। बालटाल मार्ग से कठिन चढ़ाई होने पर भी दूरी मात्र 14 किमी होने के कारण दो दिनों में यात्रा संपन्न होने की संभावना रहती है, मगर पहलगाम मार्ग में मिलने वाले प्राकृतिक दृश्यों के अवलोकन के आनंद से वंचित रह जाने की कसक भी रह जाएगी। वैसे भी धार्मिक मान्यताओं  के अनुसार भी पहलगाम मार्ग को ही वरीयता दी गई है. 


जम्मू से बस द्वारा सुबह रवाना होकर शाम तक पहलगाम पहुँचे जहाँ हजारों तीर्थयात्रियों के रहने और भोजन के लिए टेंट और भंडारे की अच्छी व्यवस्था की गई थी। मगर यहाँ कुछ स्टाल्स पर गुटके आदि की बिक्री ने थोडा विचलित भी किया. तंबुओं का मानो जंगल सा बसा हुआ था। ऐसी तीर्थयात्रा का पहला अनुभव और इतनी भीड़ में थोड़ी असुविधाओं के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करता हुआ रात वहाँ बिताई और और अगले दिन सुबह चंदनबाड़ी के लिए निकले। यहाँ तक के लिए वाहन उपलब्ध थे. चन्दनबाड़ी से रजिस्ट्रेशन चेकिंग की औपचारिकता पूरी होने के बाद यात्रियों के जत्थे अपनी सुविधानुसार पैदल, घोड़े या पालकी के द्वारा रवाना हुए. पहला चरण चन्दनबाड़ी से शेषनाग तक का था. इस मार्ग के प्रमुख पड़ावों में पिस्सू टॉप , जोजी बल और नागा टोपी आते हैं; जिसमें पिस्सू टॉप की चढाई वाकई यात्रिओं के धैर्य की परीक्षा लेती है. बर्फ से ढंकी पहाड़ियां और खूबसूरत झरने यात्रियों के मन को आनंद जरुर देते हैं मगर संकरे रस्ते पर सावधानीपूर्वक चलने की अपरिहार्यता  सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है. कार्यक्षेत्र की विशिष्टता मुझे इन पहाड़ों की खूबसूरती से रूबरू कराती रही है, मगर शेषनाग झील का अवलोकन वाकई एक अविष्मरणीय अनुभव था. रात्री पड़ाव हमने शेषनाग में ही किया. यहाँ भी यात्रियों के लिए रियायती दर पर टेंट्स की व्यवस्था थी और भंडारे भी चल रहे थे, इसलिए सुबह जल्द ही पंचतरणी के लिए रवाना हो गए. बर्फीले रास्ते और हलकी बारिश ने सफर को थोडा और कठिन बना दिया था, मगर दूर-दराज से आये बुजुर्ग स्त्री-पुरुषों के उत्साह और जज्बे से प्रेरणा लेते हम आगे बढते रहे. इस मार्ग के प्रमुख पड़ावों में वरबल, गणेश टॉप, पोषपत्री आदि थे. पंचतरणी हमलोग दोपहर तक पहुँच गए थे, मगर समय और साधनों को ध्यान में रखते हुए हम बीच राह में कहीं न रुक सीधे अमरनाथ ही पहुंचना चाहते थे; इसलिए हमने अपना सफर जारी रखा और उसी दिन शाम तक अमरनाथ पहुँच गए. मार्ग में संगम एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. यहाँ पर बताया गया कि ठहरने के लिए कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है और स्थानीय लोगों द्वारा उपलब्ध टेंटस् और भोजन की व्यवस्था पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. ज्यादा खोजबीन और तहकीकात की स्थिति में हम रह भी नहीं गए थे, इसीलिए इसी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया. 


अगले दिन पवित्र अमरनाथ गुफा की ओर अपने निर्णायक सफर पर निकले और अपने पीछे बढती लाइन से प्रेरित होते शनैः-शनैः आगे खिसकते हुए अंततः बाबा के सामने पहुँच ही गए. 

जो वाकया, जो शब्द बस यहाँ-वहाँ पढ़े थे वो खुद पर चरितार्थ होता पाया. बाबा बर्फानी के दर्शन ने वाकई अभिभूत और भावुक ही कर दिया. अपलक प्रकृति की इस अनूठी लीला को निहारता रहा. दर्शनों की प्यास बुझ नहीं रही थी, मगर इस दृश्य का दर्शनाकांक्षी मैं अकेला ही तो नहीं था.....



भोलेनाथ के इस स्वरुप को मन में बसा बालताल मार्ग से वापस उतरा.  

यात्रा तो वाकई सफल और यादगार रही मगर कुछ बातें वाकई ध्यान देने वाली हैं. इधर आस-पास कोई गाँव न होने के कारण स्थानीय व्यवस्था जो मुस्लिम समुदाय द्वारा ही की जाती है, हर छोटी -से- छोटी चीज के लिए नीचे के स्थानों पर ही निर्भर है. इसलिए ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ हर चीज महँगी होती जाती है. घोड़े और पालकी वाले मनचाहे रेट मांगते हैं, जिनमें मोलभाव की भी थोड़ी गुंजाईश रहती है. वैसे कहीं बेहतर होता यदि सरकारी दर तय कर दी जाती. मगर शायद अल्पावधि में इनके जीविकोपार्जन की संभावनाओं के दबाव को देखते हुए वो कुछ ठोस पहल न कर पा रही हो. बेहतर है कि ये घोड़ेवाले जो सामान्यतः रजिस्टर्ड होते हैं के पहचानपत्र सफर तक अपने ही पास रखे जायें, इससे इनकी मनमानी पर किंचित नियंत्रण की संभावना तो रहती ही है. 

रजिस्ट्रेशन के पूर्व मेडिकल चेकअप की सामान्यतः औपचारिकता ही होती है, इसलिए अपने स्वास्थ्य को परखने के बाद ही यात्रा पर रवाना हों. क्योंकि ऊँचे स्थानों पर ऑक्सीजन की कमी सहित कुछ अन्य परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है. कोई भी असुविधा होने पर राह में बने आर्मी कैम्पस की सहायता लें. सेना की सक्रिय और सराहनीय भूमिका इस यात्रा को थोड़ा सहज तो बना ही देती है. 

लौटते वक्त आश्चर्यजनक रूप से जम्मू का बारिश से भीगा मौसम मानो मुसकुराता हुआ सवाल कर रहा था – “क्यों ! हो गया न !!!”

Wednesday, June 13, 2012

कश्मीर का एक अछूता सौंदर्य – राजधन पास




धरती पर अगर कहीं जन्नत है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है; कश्मीर के संदर्भ में यदि यह उक्ति कही गई थी तो यह सर्वथा सटीक है। यूँ तो कश्मीर का नाम लेने पर सामान्यतः श्रीनगर, सोनमर्ग, गुलमर्ग जैसे प्रचलित नाम ही ज़हन में उभरते हैं, मगर वाकई देश के इस मुकूट का हर अंश कहीं से भी एक-दूसरे से कमतर नहीं है। चाहे आप इस प्रदेश के सुदूरतम स्थल तक चले जाएँ यहाँ की सुंदरता से आप मंत्रमुग्ध हुये बिना रह नहीं सकेंगे। और वाकई भीड़-भाड़, शोर-शराबे, गंदगी आदि ( जो कि मशहूर पर्यटन स्थलों की पहचान बन गई है) से दूर प्रकृति का संपूर्ण आनंद लेना हो तो कुछ कदम और आगे तो बढ्ना ही पड़ेगा।
प्रकृति के अलौकिक दृश्यों को उनकी पूरी भव्यता के साथ प्रकृति प्रेमियों के समक्ष रखने वाले स्थलों में एक प्रमुख नाम है ‘ राजधन पास । श्रीनगर से लगभग 100 किमी और बांदीपूर – गुरेज मार्ग पर लगभग 3000 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह पास प्रसिद्ध सिल्क रूट से भी जुड़ता है। हिमालय की ऊँची चोटियों में से एक पर खड़े होकर समकक्ष स्थित चोटियों को निहारना एक अलग ही अनुभूति देता है। सर्दियों में यह मार्ग बर्फ से ढँका होने के कारण आवागमन बाधित रहता है, मगर गर्मियों की शुरुआत में इसपर सहेजी हुई बर्फ की चादर इसकी सुंदरता और भव्यता को और भी आकर्षक बना देती है।
राजधन पास पर ही एक पीर बाबा की दरगाह भी है, जो स्थानीय जनता की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। कहते हैं 30 के दशक में लाहौर से यहाँ आ बसे थे बाबा, जो अपनी साधना से बाहर निकल कभी-कभी ही स्थानीय वाशिंदों से मिल पाते थे। उनकी मृत्यु के बाद श्रद्धालुओं ने उनके शव को दफनाने के लिए बाँदीपुर ले जाना चाहा, मगर आस-पास की मधुमक्खियों ने उनपर हल्ला बोल दिया। अंततः इसी स्थल पर ही उनकी क़ब्र स्थापित की गई। आज यह स्थल एक प्रसिद्ध दरगाह का रूप ले चुका है, जिसका प्रबंधन भारतीय सेना करती है।

मई-सितंबर तक यह स्थल भ्रमण के उपयुक्त माना जाता है। अप्रैल में मेरे इस ओर से गुजरने के दौरान अचानक हुई हल्की बर्फबारी ने इस स्थल के अपने एक अत्यंत ही मनमोहक रूप को हमारे सामने पेश कर दिया था।
अगर आप वाकई एक प्रकृति प्रेमी हैं तो इसे अकेले ही एंजॉय करें या फिर आपही की तरह कुछ और चाहने वालों का साथ हो.....

Q�x�  

Thursday, April 12, 2012

दिल्ली की यादों में शामिल सीमा तोमर

लगभग एक साल दिल्ली में रहता हुआ अब जब इसे छोड़ने के दिन करीब आ रहे हैं तब एक बार पलट कर देखता हूँ तो निश्चित रूप से इस अरसे में दिल्ली के कई रूपों को देखने का अवसर मिला. यहाँ की कला-संस्कृति और साहित्यिक हलचलों से तो रूबरू हुआ ही देश की कुछ प्रमुख राजनीतिक घटनाक्रमों के भी साक्षी बनने का अवसर पाया. इनके अलावे कुछ मानवीय पहलुओं को भी जानने के अवसर मिला. महानगरीय संस्कृति में अक्सर समयाभाव और दबाव में रिश्तों के टूटने और कायम न रह पाने के किस्से सुनने को मिलते रहे हैं मगर कुछ उदाहरण इसके विपरीत भी होते हैं. अपने अकेलेपन के साथ जब दिल्ली की सांस्कृतिक सरगोशियों में खुद को डुबो सा चूका था, तभी एक ऐसी शख्शियत से मुलाकात हुई शायद जिस तरह के लोगों के लिए ही कभी दिल्ली को दिल वालों की नगरी कहा गया होगा ! और यह संपर्क भी हुआ तो आभासी दुनिया के प्रमुख माध्यम फेसबुक के जरिये. 

फेसबुक पर मित्रों की वालपोस्ट्स और कमेन्ट देखता ही कभी सीमा तोमर जी की कुछ पंक्तियों के अपडेट्स पर नजर पड़ी, जिसने सहसा ही अपनी ओर आकर्षित किया. रचनात्मक लोगों से मित्रता की आकांक्षा ने मुझे उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने को प्रेरित किया और सामान्यतः अन्य महिलाओं की अपेक्षया इन्होने काफी जल्दी मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली. इसी के बाद पता चला कि ये एक उदीयमान चित्रकार और उभरती कवयित्री भी हैं. इनसे और इनकी कला से रूबरू होने का अवसर भी जल्द ही मिला जब ललित कला अकादमी में आयोजित मास्क प्रदर्शनी में इनकी कृति को देखने का मौका मिला. इसी अवसर पर इनके पति श्री राम चित्रांशी जी से मिलने का भी अवसर प्राप्त हुआ. पहली ही मुलाकात में लगा ही नहीं कि जैसे हम पहली बार मिले हों. ऐसा अपनापन, ऐसी आत्मीयता इस अजनबी और अनजाने शहर में अकल्पनीय ही थी. इसके बाद तो एक-दूसरे से मिलने के और भी कई मौके मिले. हमारी साझी अभिरुचियों ने हमें कई मौकों पर मिलवाया; जैसे कला प्रदर्शनी, दिल्ली हाट, सूरजकुंड मेला और गुलज़ार साहब के साथ एक महफ़िल जैसे और भी कई अवसर...
एक साहित्यिक सम्मलेन में कविता पाठ करतीं सीमा जी...

जामिया मीलिया से कला में स्नातक और अपने चित्रों में महिलाओं की भूमिका और अस्तित्व को मजबूती से उभारने वाली सीमा जी एक संवेदनशील कवि भी हैं. गुलज़ार साहब के लेखन से अतिशय प्रभावित सीमा जी अपनी रचनाओं को भी भाषाई क्लिष्टता से दूर रखते हुए बहुत सरल और सहज शब्दों में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं. कुछ उदाहरण - 

1. आज कुछ कमी रहने दो 
आँखो में बरकरार नमी रहने दो
चाँद ख्वाबो के आसमान पर है
पावं के नीचे ज़मीं रहने दो ...........

2. डोर का एक सिरा 
मेरे पास रहा
और एक तुम्हारे
और बीच में बँधी
गाँठ के दो सिरो
में से भी
एक मेरे पास था
और एक तुम्हारे ....
हिसाब के पक्के हो
तो बताओ ज़रा

... कितने बंधनो को 

तुम थामे रहे 
और कितने रिश्तो को
मैने संभाला .....
राम जी, सीमा जी और मैं...

सीमा जी को उनके बेह्तरीन भविष्य और रचनात्मक ऊँचाइयों को छूने की हार्दिक शुभकामनाएं. वाकई आप जैसे लोग काफी कम हैं.....


Sunday, April 1, 2012

ब्लौगिंग से चलते - चलते : साँची से होते हुए..

दिल्ली आये हुए एक साल से थोडा ज्यादा अरसा हो गया, और अब फिर यहाँ से विदाई की बेला है - धरती के स्वर्ग की ओर (कृपया इस सूचना को आज के दिन विशेष से जोड़ कर न देखा जाये...)

जानता था एक इंजीनियरिंग जियोलौजिस्ट  होने के नाते मुख्य भूमि पर ज्यादा दिन नहीं लिखे हैं मेरे लिए, इसलिए इस अवधि को भरपूर जिया. आर्ट और कल्चर से जुडी कई गतिविधियों में शामिल हुआ, कई महत्वपूर्ण लोगों से मिलने का मौका मिला, काफी घुमा, वापस ब्लौगिंग से जुड़ा और अपने अनुभवों को शेयर किया. इस सफ़र में आप लोगों ने भी पूरा साथ दिया और उत्साहवर्धन किया धन्यवाद. इस सफ़र का सारांश फिर कभी. पहले इस सफ़र के संभवतः अंतिम महत्वपूर्ण पड़ाव प्राकैतिहसिक महत्व के ' भीमबेटका' और ऐतिहासिक स्थल 'साँची' की एक झलक चित्रों के माध्यम से...

प्राकऐतिहासिक भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्द भीमबेटका

वो पहली रचना !!!

समय के साथ अपनी पहचान खोते भित्तिचित्र

भोपाल का एक प्राचीन मंदिर

साँची की शांति वाकई महसूस हुई यहाँ.

स्तूप को स्पर्श करने पर महसूस हुए भावों को अभिव्यक्त नहीं कर सकता 

प्रवेश तोरणों पर बुद्ध तथा तत्कालीन जनजीवन को झलकाती झांकियां

प्राचीन बौद्ध मठ

उदयगिरी की गुफाएं जहाँ जैन धर्म का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है

विदिशा का करीब 2000 वर्ष प्राचीन 'गरुड़ स्तंभ' जिसे हेलियोदौरस ने 'वासुदेव' (विष्णु) के सम्मान में स्थापित करवाया था...

 चैत्र नवरात्री और रामनवमी के पावन पर्व की भी हार्दिक शुभकामनाएं...

Tuesday, March 6, 2012

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली (25 फरवरी - 4  मार्च) समाप्त हो गया. पुस्तकों से आत्मीयता को शब्दों में तो बांधा नहीं जा सकता, मगर मेले में कुछ नए लोगों से मुलाकात, परिचय और संभावित मित्रता की उम्मीदों के साथ यादगार रहा ये आयोजन. तस्वीरों के माध्यम से एक भ्रमण - 

पुस्तकें ही पुस्तकें...






' पवित्र कुरान ' की मुफ्त प्रतियों का वितरण आकर्षण का केंद्र रहा,  आर्य समाज प्रकाशन की और से 'सत्यार्थ प्रकाश' की प्रति भी मात्र दस रु. में उपलब्ध कराई गई. 
' हिंद युग्म ' के स्टॉल पर प्रसिद्ध ब्लौगर शैलेष भारतवासी 



राजधानी नई दिल्ली के सौ वर्ष पर एक प्रदर्शनी भी...



मेला की थीम - भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष पर एक विशेष दीर्घा भी.....





अंतर्राष्ट्रीय  प्रकाशक - 




चंद नामचीन अतिथि भी...



ये तो मात्र एक झलक ही है जो मैं अपने भ्रमण के दौरान जुटा पाया..... 

Thursday, February 9, 2012

कला जगत का एक उभरता नाम - दीपाली साहा


शान्तिनिकेतन की मिटटी से उठने वाली खुशबू कला-संस्कृति, संगीत आदि विभिन्न पक्षों के रग-रग में  रसी - बसी है. इसी खुशबू को अपने अन्दर बसाये और अपने चारों ओर धीमे-धीमे महका रहे कलाकारों में एक नाम दीपाली साहा का भी है. हाल ही में इनके चित्रों की एक प्रदर्शनी नई दिल्ली के इण्डिया हैबिटेट सेंटर  में देखने को मिली, जिसने वाकई काफी प्रभावित किया. ' Ecological Agonies :- Tribute to Rabindranath Tagore ' नामक इस कला प्रदर्शनी में इस कलाकार के कई पक्षों  को देखने का अवसर मिला. 


उनकी कला में पर्यावरण, शान्तिनिकेतन के उनके अनुभव, टैगोर के विचारों का प्रभाव तथा निश्चित रूप से उनके व्यक्तिगत अनुभवों की भी प्रचुर झलक मिलती है.  


आसनसोल में जन्मीं और विश्व भारती से बैचलर ऑफ़ फाइन आर्ट्स की शिक्षा प्राप्त कर चुकीं दीपाली के देश-विदेश में कई एकल और ग्रुप प्रदर्शनियां आयोजित हो चुकी हैं. कला जगत के कई महत्वपूर्ण पुरष्कारों से भी वो सम्मानित हो चुकी हैं. उनकी कृतियों में दार्शनिक और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण की बखूबी झलक मिलती है जो उनके द्वारा प्रयोग किये गए रंगों के विशिष्ट चयन में और भी प्रखरता से उभर कर सामने आती है. 

उनकी कृतियाँ उनके एक उत्कृष्ट कलाकार के रूप में उभरने की तमाम संभावनाएं दर्शाती हैं. ऐसे कलाकारों के माध्यम से ही गुरुदेव और शान्तिनिकेतन की माटी की खुशबू समस्त विश्व में व्याप्त होती रह सकेगी. कला जगत में उनके स्वर्णिम भविष्य की शुभकामनाएं. 

Thursday, February 2, 2012

संस्कृति के सरोकारों से जुड़े - श्री रणबीर सिंह

जुलाई 2011  में श्री अरविन्द मिश्र जी ने अपने दिल्ली प्रवास के दौरान ICMR में बिताये लम्हों का यहाँ  जिक्र करते हुए मुझे श्री  रणबीर सिंह जी से मिलने और उनकी शागिर्दी स्वीकार करने का निर्देश दिया था. सृजनात्मक प्रवृत्ति के व्यक्तियों से मिलने का अवसर मैं छोड़ना नहीं चाहता और कला तथा संस्कृति में तो मेरी रुची है ही. रणबीर जी से संपर्क तो पिछले काफी समय से रहा, मगर मिलना उनकी अथवा मेरी कार्यालयीय बाध्यताओं के कारण संभव न हो पा रहा था. आख़िरकार बीती जनवरी के अंत में उनसे मिलने का सुखद संयोग आ ही गया. और यह वाकई एक संजोग ही कहा जायेगा कि  उनसे मिलने की परिस्थितियां काफी कुछ अरविन्द जी से पहली मुलाकात के ही समरूप थीं, जब उनसे मिलने सुबह-सुबह बनारस से कालीन नगरी भदोही जाना पड़ा था, और अब इस बार भी 26  जनवरी की सुबह मैं बस से रोहतक जा रहा था, जहाँ कला व  संस्कृति की एक नई ही दुनिया से परिचय प्राप्त होने वाला था.  

श्री  रणबीर सिंह जी 

रनबीर सिंह जी नई दिल्ली स्थित इन्डियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च में पी. आर. ओ. हैं. अपनी कार्यालयीय जिम्मेवारियों के कुशल निर्वहन के साथ ही उनका अपनी विरासत, कला और संस्कृति के प्रति काफी गहरा जुडाव है, जिसने उन्हें लगभग पिछले 30  वर्षों से इस विषय में स्वतंत्र शोध व अनुसन्धान के लिए प्रेरित  कर रखा है. इसका परिणाम आज उनकी जयपुर और हरियाणा की कला और वास्तु से परिचित कराती दो पुस्तकों  के अलावे 1000  से ज्यादा लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं. विज्ञान से जुड़े विषयों पर भी उनके 300  से ज्यादा पेपर और लेख आदि प्रकाशित हो चुके हैं. हाल ही में हरियाणा के इनसाइक्लोपीडिया के निर्माण में भी उनके अनुभवों का लाभ उठाया गया है. हरियाणा और राजस्थान सहित देश के कई भागों में वो अपनी जिज्ञासु और शोधपूर्ण दृष्टि के साथ भ्रमण कर जानकारियां एकत्र करते रहे हैं. अपनी संस्कृति और विरासत के प्रति उनके लगाव को इस एक उदाहरण से ही समझा जा सकता है कि अपनी खोज के क्रम में मात्र अपने स्कूटर से ही वो 2 लाख किमी से ज्यादा की दूरी तय कर चुके हैं. सच कहूँ तो इस पूरे परिदृश्य में उनके योगदान को किसी एक ब्लॉग पोस्ट में समेत पाना कम-से-कम मेरे बस की तो बात नहीं ही है..... 

बिना किसी सरकारी या बाह्य सहायता के वो इस सांस्कृतिक अभियान में अपनी अंतरप्रेरणा से दृढसंकल्पित   भाव से लगे हुए हैं. कहने को तो वो फेसबुक जैसी ' सोशल नेट्वर्किंग साइट्स' से भी जुड़े हुए हैं. पिछले कुछ समय से वो अपने ब्लॉग के साथ भी अपने विचारों को शेयर कर रहे हैं, मगर अपनी मूल प्राथमिकताओं को नजरंदाज न करने का उनका दृढसंकल्प वाकई हम सभी के लिए प्रेरक है.

यह मैं अपना बहुत बड़ा सौभाग्य मानता हूँ कि मुझे श्री रणबीर सिंह जी के साथ उनके कार्यक्षेत्र को देखने-समझने का मौका मिला. इतने अनुभवी और समर्पित व्यक्तित्व के ज्ञान को एक मुलाकात में आत्मसात कर पाने की बात अकल्पनीय ही है. मेरा प्रयास तो मात्र उनकी कार्य पद्धति, अपनी विरासत को देखने के उनके नजरिये को समझना ही था. और शागिर्दी का तो ये आलम था कि जहाँ -तहां अब तक क्लिक कर आत्ममुग्ध होता  रहा मैंने अपना कैमरा  भी उन्ही के हाथों में सौंप दिया ताकि एक-आध वाकई करीने की कुछ तसवीरें ले पाने का सौभाग्य इस कैमरे को भी हासिल हो जाये. 

अपने तीन दिवसीय  प्रवास में रणबीर सिंह जी के साथ रोहतक के कुछ भागों विशेषकर गांवों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने का अवसर मिला जो निश्चित रूप से इस सन्दर्भ में मेरे दृष्टिकोण को परिमार्जित करने में सहायक सिद्ध होगा. 

अरबिंद मिश्र जी को भी हार्दिक  धन्यवाद जो उन्होंने इन अनूठे व्यक्तित्व का मुझसे परिचय कराया. 

आशा है रणबीर सिंह जी भी जहाँ अपनी विरासत के प्रति नवीन जानकारियां एकत्र करते हुए इनके डोक्युमेंटेशन को और समृद्ध करेंगे, वहीँ उनके साथ मिलने के और भी कुछ अवसर मुझे मिलते रहेंगे ताकि उनकी शागिर्दगी के रंग में थोडा और सराबोर हो सकूँ. 

चलते-चलते उनकी शागिर्दी में ली गईं कुछ तसवीरें - छायांकन के अलावे अपनी विरासत से जुडी हुईं भी.....

पगडंडियों पर 

एक ग्रामीण चौपाल 


एक ग्रामीण हवेली 

रोहतक में हरियाणवी संस्कृति की पहचान - जाट भवन 


Tuesday, January 24, 2012

नॉर्वे में अपने बच्चों के लिए संघर्षरत भारतीय दंपत्ति...



अपने बच्चों और परिवार के लिए बेहतर भविष्य और संभावनाओं की तलाश में विकसित देशों में जाने वाले भारतीय परिवार पहले भी कई बार विभिन्न असहज परिस्थितियों में पड़ते रहे हैं, मगर ऐसी परिस्थिति की शायद ही किसी ने कल्पना की हो - जो उन्हें अपने बच्चों, अपने परिवार से ही अलग कर दे... 

जी हाँ, ऐसा ही हुआ है भारतीय मूल के भू-भौतिकी शास्त्री अनुरूप भट्टाचार्य और उनकी पत्नी श्रीमती सागरिका भट्टाचार्य के साथ. 2007 से नॉर्वे में रह रहे इस दंपत्ति के बच्चों तीन वर्षीय अभिज्ञान और एक वर्षीय ऐश्वर्या को वहां की एक संस्था ' नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर्स सोसायटी ' ने अपने कब्जे में ले लिया है. इस निर्णय का कारण अभिभावकों द्वारा अपने बच्चो की उचित देखभाल न किये जाने को बताया गया है. और इसके समर्थन में उदाहरण ये दिए गए हैं कि ये लोग अपने बच्चों को हाथ से खाना खिलाते थे और इन्हें सोने के लिए दूसरे कमरे में नहीं रखते !!! 

जाहिर सी बात है कि भारतीय परिवेश में बच्चों के लालन-पालन के जो संस्कार इस दंपत्ति को मिले थे वो वहां की परिस्थितयों से सामंजन नहीं बिठा पा रहे थे. अब यहाँ तकनिकी समस्या ये भी है कि बच्चों की वीजा अवधि फरवरी में समाप्त हो रही है, और इस परिस्थिति में शायद उन्हें अपने माता-पिता के साथ लौटने न दिया जाये. इसके अलावे वहां के क़ानूनी प्रावधानों के अनुसार ये अपने बच्चों के 18 साल के होने तक साल में मात्र दो बार और वो भी एक-एक घंटे के लिए ही मिल पाएंगे. 

इस सन्दर्भ में भटाचार्य दंपत्ति और उनके परिजनों ने अपने स्तर पर कई प्रयास किये हैं. इन्होने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल सहित कई संबद्ध पक्षों तक अपनी बात पहुंचाई है. नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने भी नॉर्वे की सरकार से इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की मांग की है.

इस सन्दर्भ में विभिन्न समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं में भी कई रिपोर्ट्स आदि प्रकाशित हो चुकी हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स में भी इस मुद्दे को उठाया जा रहा है. स्वयं हमने भी इस विषय पर फेसबुक पर ' Let's Support Anurup Bhattacharya ' नामक Page की शुरुआत की है. 

मामले को सुलझाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत विदेश मंत्री श्री एस. एम्. कृष्णा के इस बयान से भी मिली है जिसमें उन्होंने नॉर्वे सरकार से इस मुद्दे पर शीघ्र और 'यथोचित समाधान' सुनिश्चित करने की मांग की है. इस संबंध में नॉर्वे के संबंधित अधिकारियों से बात होने की संभावना भी जताई जा रही है. माना जा रहा है कि नॉर्वे सरकार बच्चों को उनके माता-पिता के बजाये भारत में उनके दादा-दादी को सौंपे जाने पर सहमत हो सकती है. 

नॉर्वे की चाईल्ड प्रोटेक्टिव सर्विस के सख्त प्रावधानों की दुनिया भर में आलोचना होती रही है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भी इसका जिक्र होने की खबरें आ चुकी हैं. इस नए विवाद ने इस विषय को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. आशा है जहाँ इस प्रसंग में भट्टचार्य दंपत्ति को न्याय मिलेगा, वहीँ दूसरे देशों की सरकारें भी ऐसे मामलों में संबद्ध देशों की संस्कृति - परिवेश आदि को भी ध्यान में रखेंगीं...

(सामग्री और तसवीरें अख़बारों, गूगल और फेसबुक आदि से संकलित)

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...