Thursday, December 25, 2008

राही मासूम रजा: हिंदुस्तानियत के प्रतीक पुरूष


राही मासूम रजा : हिंदुस्तानियत के प्रतीक पुरूष

राही मासूम रजा भारत की गंगा-यमुनी संस्कृति और हिन्दी व उर्दू की स्वाभाविक एकता के प्रतीक पुरूष थे। दुर्भाग्यवश उनको आज तक मुख्यतः ' आधा गाँव 'के लेखक या दूरदर्शन धारावाहिक 'महाभारत' तथा 'नीम का पेड़' के लेखक के रूप में ही जाना जाता रहा। सौभाग्य से यदि मुझे डॉ. एम. फिरोज़ अहमद के संपादन में आई त्रैमासिक 'वांग्मय' का 'राही मासूम रजा अंक' न मिला होता तो उनके बारे में मुझे भी मात्र यह सतही जानकारी ही रहती।
जयशंकर प्रसाद ने कहा था- 'हर अमंगल के पीछे मंगल कामना होती है.' राही साहब की जिंदगी इसकी प्रत्यक्ष मिसाल है. परिस्थितियों के दबाव ने यदि उन्हें अलीगढ छोड़ने को विवश न किया होता तो शायद हम हिन्दी सिनेमा के संभवतः सबसे रचनात्मक व्यक्तित्व से रूबरू न हो पाते।
क्या आप विश्वास कर पाएंगे कि हृषिकेश मुखर्जी की कालजयी कृति 'गोलमाल' के संवाद लेखक राही साहब थे ! सुभाष घई की 'क़र्ज़' अमिताभ की 'आखरी रास्ता', यश चोपडा की 'लम्हें' और बी. आर. चोपडा की 'निकाह' आदि उनकी बहुमुखी प्रतिभा की झलक मात्र हैं।
साहित्यकार के अलावे एक भाई, पति या पिता के रूप में उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को उनकी बहन और उनकी पत्नी के साथ लिए गए साक्षात्कारों के माध्यम से जानना एक नवीन अनुभव रहा. राही साहब के लेखों और साक्षात्कारों से उनकी इस देश की मिटटी और संस्कृति से जुड़े होने की कसक भी दिखी।
राही साहब के विविधतापूर्ण व्यक्तित्व को हम तक सहजता से उपलब्ध कराने के दुसाध्य प्रयास में सफलता के लिए 'वांग्मय' की पुरी टीम बधाई की पात्र है. आशा करता हूँ की इसके संपादक फिरोज अहमद जो स्वयं भी राही साहब के क्रितित्व पर आधारित ब्लॉग (rahimasoomraza.blogspot.com) का संचालन करते हैं, को उनके इस अभिनव प्रयास में अन्य साथी ब्लौगर्स का भी सक्रिय सहयोग व समर्थन मिलेगा.




11 comments:

विनीता यशस्वी said...

Bahut napetule shabdo mai apne RAHI ji ka pura parichay de diya.

bahut achha

डा. फीरोज़ अहमद said...

बहुत खूब .अच्छा प्रयास.थोड़ा विस्तार और होता तो और अच्छा होता . बधाई.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छा कहा आपने मैंने भी वांग्मय में उनके बारे में पढ़ा था ...बहुत सी नई बातें पता चली उनके बारे में ..शुक्रिया

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लिखा आप ने सुंदर ओर रोवक जानकारी के लिये धन्यवद

तरूश्री शर्मा said...

राही मासूम रजा साहब को पढ़ना जैसे जिंदगी की तंग गलियों से गुजर कर चौड़े सपाट रास्तों पर आ जाना लेकिन स्मृतियों में अतीत को हमेशा जीवीत रखने जैसा होता है। वांग्मय का वह अंक मैंने भी पढ़ा था...वाकई बहुत खूब था। आपने उनकी रचनाओं व जानकारी वाले नए ब्लॉग के बारे में बताकर उपकार किया। धन्यवाद।

प्रदीप मानोरिया said...

लाज़बाब हर बार की तरह यथार्थ परक आलेख !!!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

राही साहब का आधा गाँव हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासो मे है।
आपको इस महत्वपूर्ण लेख के लिये बधाई।

hem pandey said...

जानकारी भरे लेख के लिए साधुवाद.

hem pandey said...

जानकारी भरे लेख के लिए साधुवाद.

BrijmohanShrivastava said...

नया साल आपको मंगलमय हो

nidhi said...

dharohar kafi samay bad dekh paai.khoobsurat blog hai.rahi ji ke "aadha ganv 'or usse bhi jyada 'topi shukla' ki mai itni prshansk hu ki muh jbaani yad hai.mujhe lagta hai rahi ji ke saamprdaayikta pr likhe lek re publish hone chaahiye.

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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