Monday, October 19, 2020

बचपन के दिन भी क्या दिन थे...!

हम बड़े नहीं होंगे- कॉमिक्स जिंदाबाद

कॉमिक्स प्रेमियों का यह प्रिय नारा है। वो भी दिन थे जब रविवार को बेताबी से अखबार वाले का इंतजार रहता था जिसकी थैली में ढ़ेरों रोचक कहानियों का घर बाल पत्रिकाएं होती थीं। होली-दिवाली आदि विशेषांकों की तो बात ही और थी। छुट्टियों का मज़ा कई गुना बढ़ जाता था। भूख-पाया भूल पहले सारी कहानियां ख़त्म करनी होती थीं। पत्र मित्रता में कभी कुछ भेजा तो नहीं लेकिन उन बच्चों का परिचय देख लगता था जाने कहाँ होंगें कैसे होंगे! अभी ऐसी ही एक पुरानी तस्वीर पर नजर पड़ी तो लगा अब कितने बड़े हो गए होंगे ये चेहरे, क्या अपने बच्चों को बताते होंगे उन दिनों की बातें!



ऐसी ही एक पुरानी याद है जिसे याद करते आज भी चेहरे पर मधुर मुस्कान उभर आती है- मधु मुस्कान। ऐसी ही एक बाल पत्रिका थी मधु मुस्कान। उसके पात्रों की कुछ छवियां आज भी मन में कहीं छुपी बैठी हैं, जैसे 'डैडी जी'।

कल कपिल के शो में शत्रुघ्न सिन्हा आये थे। उसी दौरान सर्च करते इस कॉमिक्स में उनसे जुड़ा एक कार्टून भी मिला, जिसमें आज से दशकों पहले हीरो के कारण एक्सट्रा के शोषण पर करारा व्यंग्य किया गया था। 

उन दिनों एक अंक या भाग छूट जाने पर फिर मिल पाना अत्यंत कठिन होता था। कई लोगों से पूछना होता था। कॉमिक्स और फिल्मों का लंबा इंतजार, बेचैनी यूँ ही नहीं होती थी। आज तो सब उंगलियों की नोंक पर है। कुछ भी ढूंढ़ना कितना सरल! वो लोग भी कम बड़ा योगदान नहीं कर रहे जो इंटरनेट के विशाल संग्रह को इनसे समृद्ध करते जा रहे हैं। यह अलग बात है कि हम अब कुछ नॉस्टेल्जिया सी याद की तलाश में कुछ पन्ने पलट लें, आज के बच्चों की प्राथमिकता भी अलग है, पसंद भी। फिर भी उस दौर में यह एक ख़्वाब भी नहीं था कि कभी यह भी संभव हो पायेगा। मगर यही साइंस है और यही साइंस फिक्शन।

सुकून की तलाश में दिल कभी-कभी बच्चा हो जाना चाहता है, पर यह भी एक पल से ज्यादा अब मुमकिन नहीं...



2 comments:

शिवम् कुमार पाण्डेय said...

कॉमिक्स पढ़ने का मज़ा ही कुछ अलग था। बाकी कॉमिक्स जिंदाबाद!

अभिषेक मिश्र said...

सही कहा आपने। धन्यवाद।

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