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Wednesday, July 1, 2009

झाड़खंड के आदिवासी लोकगीत


आदिवासी संस्कृति के नाम पर अपनी सांस्कृतिक विविधता के आधार पर बिहार से अलग हुआ झाड़खंड वाकई सांस्कृतिक विविधता की अनुपम मिसाल है। यहाँ संथाल, मुंडा, बिरहोर आदि कई छोटी-बड़ी जनजातियाँ अपनी पृथक सांस्कृतिक विविधता को जीवित रखते हुए आधुनिक सभ्यता के साथ चलने का प्रयास भी कर रही हैं। अलग राज्य बनने के बाद इनकी परम्पराओं, संस्कृति आदि को जानने-समझने के प्रति भी रुझान बढा है।
यूँ तो हर जनजाति की लोककथाओं आदि साहित्य का अपना अलग अंदाज है, मगर आज चर्चा मुंडा जनजाति की. निःसंदेह इस चर्चा के लिए प्रेरित करने में विनीता जी द्वारा भेजी गई कुछ चुनिन्दा मुंडा रचनाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान है, जो उन्होंने 'साझी विरासत' पत्रिका से ली थीं, जिनका संकलन वासवी कीडो द्वारा किया गया था।
हाल ही में 'मदर्स डे' काफी चर्चा में रहा, मगर माँ-बेटी के संबंधों की सहज अभिव्यक्ति जो इस कविता में है वो अद्भुत है, जिसके हिंदी अनुवाद को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
ऐ बेटी- तुम बड़ी नदी की चिरपी मछली के समान,
चमकती फिरती हो;
ऐ बेटी- तुम छोटी नदी की अयरा मछली के समान,
फुदकती फिरती हो;

ऐ बेटी- जब तक तुम्हारी माँ है,
तभी तक चमकती फिरती हो;
ऐ बेटी- जब तक तुम्हारा बाप है,
तभी तक फुदकती फिरती हो;

ऐ बेटी- जब तुम्हारी माँ मर जायेगी,
तब तुम किसी दिकु की दासी बन जाओगी;
ऐ बेटी- जब तुम्हारा बाप मर जायेगा,
तब तुम किसी सरगा की दासी बन जाओगी।
आशा है माँ-बेटी के आपसी मनोभावों को अभिव्यक्त करता यह मुंडा गीत आपको पसंद आया होगा। लोकगीतों की इस चर्चा को कभी फिर आगे बढाऊंगा।
तस्वीर: साभार गूगल

Wednesday, June 3, 2009

झाड़खंड का लाल

संजीत महतो
'गुदडी का लाल' - यही शब्द किसी के भी मुंह से निकलेगा, जब वो संजीत कुमार के बारे में सुनेगा। झाड़खंड एकेडमिक काउंसिल की 12 वीं की परीक्षा में कला वर्ग में पूरे राज्य में टौपर रहे - संजीत महतो। जिन विपरीत परिस्थितियों में इन्होने सफलता प्राप्त की वह इसी शेर को दोहराने पर विवश करता है कि - "कौन कहता है आसमान में सुराख़ हो नहीं सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। "
संजीत के पिता किसान हैं, जो किसी तरह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह कर पा रहे हैं। इन्ही परिस्थितियों में संजीत ने अपने गाँव से ही 10 वीं की पढाई पूरी की. आगे की शिक्षा की वहां व्यवस्था न होने के कारण उसने 2007 में रांची के रविन्द्रनाथ टैगोर इंटर कॉलेज में दाखिला लिया. यहाँ उसने चुटिया नामक स्थान पर एक लौज में रहने की व्यवस्था की. खाने-पीने की व्यवस्था के लिए लौज में रहने वाले 15 दोस्तों के लिए सुबह - शाम खाना बनता और खुद भी खाता. साथ-साथ पढाई के प्रति उसकी लगन और समर्पण ने उसे आज इस मुकाम पर पहुंचा दिया है.
जाहिर है आगे उसकी तमन्ना उच्च और गुणवत्तायुक्त शिक्षा पाने की होगी, मगर उसकी गरीबी फिर कहीं उसके आड़े न आ जाये ! ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों के हित का दावा करने वाली सरकारी-गैरसरकारी घोषणाओं का कर्मकांड अभी शेष है, मगर आवश्यक है कि इनपर ईमानदारी से अमल भी हो।
ऐसे गुदडी के लालों की चर्चा गाहे-बगाहे होती रहती है मगर उचित कार्यनीति के अभाव में ये कहीं गुमनामी में खो जाते भी देखे गए हैं। सुजीत और ऐसी ही अन्य प्रतिभाओं के साथ ऐसा न हो हमारी तो यही कामना रहेगी। सुजीत और ऐसे सभी प्रतिभाशाली छात्रों को उनके उज्ज्व्वल भविष्य की शुभकामनाएं.
तस्वीर- साभार दैनिक जागरण





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