Friday, November 4, 2011

अस्तित्व को जूझती हक़सर हवेली


देश की राजधानी दिल्ली, जो कई बार बसी और कई बार उजड़ी. मगर इस बसने-उजड़ने के क्रम के बीच कुछ ऐसे चिह्न भी छोड़ गई जो आज भी इसके इतिहास के कई हिस्सों की परतें खोल कर सामने रख देते हैं, बशर्ते कोई उन्हें तस्दीक से देखना-समझना चाहे. पिछले दिनों पुरानी दिल्ली के एक भीड़-भाड़ वाले हिस्से में आयोजित एक हेरिटेज वाक  का हिस्सा बनने का मौका मिला. दिल्ली की  पुरानी हवेलियों से रु-ब-रु करवाते इस वाक के बारे में विस्तार से फिर कभी; मगर आज जिक्र इस वाक के अंत में समक्ष आई उस ईमारत का जिसने कभी इस देश के इतिहास को निर्धारित करने वालों की जिंदगी का काफी करीबी से साक्षात्कार किया था.



मैं बात कर रहा हूँ पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार में स्थित ' हक़सर हवेली' की. 1850  से 1900  ई. के बीच कश्मीरी ब्राह्मणों के कई परिवार अलाहाबाद, आगरा और पुरानी दिल्ली  आकर बस गए; जिनमें  कमला नेहरु के माता-पिता श्रीमती राजपति कॉल और श्री जवाहर मल कौल  भी थे. इन्होने पुरानी दिल्ली के गली कश्मीरिया और सीता राम बाजार के पास के इस भाग में यह हवेली बनवाई जहाँ कमला नेहरु जी का जन्म हुआ और उनका बचपन बीता. इसी हवेली में 8  फरवरी, 1916  को पं. जवाहरलाल नेहरु की बारात आई थी. 



सांस्कृतिक और राजनीतिक सरगोशियों का प्रमुख केंद्र रही यह हवेली 1960  में बेच दी गई. तब से विभिन्न व्यक्तिगत और व्यावसायिक गतिविधियों के सँचालन से गुजरती हुई यह हवेली अपने वास्तविक स्वरुप को  पूर्णतः खो बैठी है, और अब बस इसके खंडहर ही इसके गौरवशाली इतिहास की दास्ताँ बयां कर रहे हैं.

1983  में इंदिरा जी भी अपनी माँ  के जन्मस्थल पर आई थीं और काफी देर पुरानी यादों को भावुकता से टटोलती रहीं. इसे विरासत स्थल जैसे स्तर देने के भी प्रयास हुए मगर स्थानीय सहभागिता न होने के कारण योजनायें परवान न चढ़ पाईं.

अपने इतिहास और विरासत के प्रति आम भारतीयों की उपेक्षा काफी दुखद है. जब तक वो खुद अपने आस-पास बिखरे इतिहास के चिह्नों को सहेजने का प्रयास नहीं करेंगे हम अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को ध्वंश होते देखते रहेंगे.

15 comments:

संगीता पुरी said...

अपने इतिहास को लेकर गौरवान्वित हों .. तब तो रक्षा करेंगे इसकी !!

Rajesh Kumari said...

bahut achchi jankari deti hui post.apne itihaas ki suraksha karni chahiye.

ASHA BISHT said...

behtreen post...abhar..

मनोज कुमार said...

बहुत ही दुर्लभ चित्र के साथ आपने अनोखा पोस्ट दिया है। और बाकी तो आपने अंतिम दो पंक्तियों में सारी बातें कह ही दी है। ---

अपने इतिहास और विरासत के प्रति आम भारतीयों की उपेक्षा काफी दुखद है. जब तक वो खुद अपने आस-पास बिखरे इतिहास के चिह्नों को सहेजने का प्रयास नहीं करेंगे हम अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को ध्वंश होते देखते रहेंगे.

Ratan Singh Shekhawat said...

बढ़िया जानकारी

Gyan Darpan
Matrimonial Service

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति सम्मान और उन्हें सहेजने की सोच सरकार से लेकर आम नागरिक तक सभी में होना ज़रूरी है.....

Rahul Singh said...

कुछ और तस्‍वीरें होतीं तो बेहतर.

sushma 'आहुति' said...

सार्थक पोस्ट....

ajit gupta said...

असल में इस देश में पग-पग पर इतिहास बिखरा है इस कारण इसे सहेजने के प्रति हम उदासीन बन गए हैं। यदि आज सारे ही इतिहास को सहेजा जाए तो आधा भारत दर्शनीय हो जाएगा। लेकिन जिसके पास ज्‍यादा होता है उसकी वह कद्र नहीं करता। आपने अच्‍छी जानकारी दी है।

सागर said...

sargarbhit post...

Subhashis Das said...

Bahit hi shandar post Bittu. Tumhara language and the way of expression bahuj sahaj hota ja raha hai, you seem to be a real good author on the making.
Mausaji

Arvind Mishra said...

अपने देश के लोगों की मानसिकता का बस कुछ मत पूछिए
चोरी चकारी और बेईमानी से फुर्सत मिले तब न ?

रचना दीक्षित said...

बड़ी सुंदर जानकारी दी. और पढकर दुःख भी बहुत हुआ.

डॉ. जेन्नी शबनम said...

bahut dukhad hai aise dharohar ka yun mitna. sthaaniye logon ka sahyog na bhi ho parantu sarkaar ko to ise sanrakshit karne ka prayaas awashya karna haahiye. chitra dekhkar khushi hui. shubhkaamnaayen.

Vaanbhatt said...

ये हवेली निश्चय ही...इतिहास की साक्षी रही है...जिसे संवारने की आवश्यकता लगती है...

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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