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Wednesday, June 24, 2009

झाड़खंड की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा

जगन्नाथ मन्दिर, रांची
झाड़खंड में रथयात्रा की ऐतिहासिक और समृद्ध परंपरा रही है। यूँ तो पूरे झाड़खंड में ही किसी-न-किसी रूप में रथयात्रा सोल्लास मनाई जाती है, मगर इसमें रांची और हजारीबाग के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलराम के विग्रहों के प्रति आम जनता में अद्भुत श्रद्धा देखी जाती है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीय को आयोजित होने वाला यह पर्व रांची में 17 वीं सदी के उत्तरार्ध से मनाया जाता रहा है। इसका शुभारम्भ राजा ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव द्वारा किया गया था। HEC क्षेत्र के एक मनोरम स्थल में पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर यहाँ का एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में मान्यताप्राप्त है।
यहाँ रथयात्रा से जुड़े अनुष्ठानों का आरम्भ ज्येष्ठ पूर्णिमा से ही प्रारंभ हो जाता है, जब तीनों विग्रहों को गर्भगृह से बाहर स्नान मंडप में लाकर महाऔषधि मिश्रित जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद इन्हें पुन: गर्भगृह में स्थापित कर गर्भगृह के पट आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रथमा तक बंद कर दिए जाते हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा से अमावस्या तक तीनों विग्रह गर्भगृह में एकांत वास में रहते हैं। आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रथमा को विग्रहों का नेत्रदान एवं मंगल आरती होती है। आषाढ़ द्वितीय को तीनों श्रीविग्रह रथ पर सवार हो मौसी बाड़ी के लिए प्रस्थान करते हैं। मौसी बाड़ी में आठ दिनों तक विश्राम के पश्चात नौवें दिन अर्थात एकादशी के दिन मौसी बाड़ी से इन विग्रहों की पुन: वापसी होगी, जिसे 'घुरती रथ यात्रा' कहते हैं।
हजारीबाग में 'सिलवार पहाड़ी' पर 1953 से स्थापित जगन्नाथ मंदिर और रथयात्रा मेले ने यहाँ के धार्मिक आयोजनों में अपना एक अलग ही स्थान बना लिया है।
उड़ीसा में बहुप्रचलित इस परंपरा के झाड़खंड के अलावा देश के अन्य भागों भी से इतनी घनिष्ठता भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक एकीकरण का एक अद्भुत उदाहरण है।
भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलराम जी को इस पावन अवसर पर शत-शत नमन।
तस्वीर- साभार विकीपेडिया
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