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Sunday, June 26, 2011

संडे, देव साहब और 'यही तो हैं वो'.....


आज रविवारीय मूड में यादों के गलियारों से कहीं से आ भटके एक गीत को आपसे साझा करने का दिल किया. 
1958 में प्रदर्शित हुई देव आनंद - वहीदा रहमान अभिनीत  रफ़ी - हेमंत दा के मधुर गीतों और सचिन देव बर्मन साहब के सुमधुर संगीत से सजी राज खोसला निर्देशित फिल्म 'सोलवां साल'  आज भी याद की जाती है. यहाँ यह भी उल्लेख कर दूँ कि इसे हॉलीवुड की ' इट हैपेंड वन नाईट' (1934) से भी प्रभावित माना जाता है, जिससे बौलीवुड की 'चोरी-चोरी' (1956) और 'दिल है कि मानता नहीं' (1991) भी प्रेरित मानी जाती हैं. 

देव आनंद-वहीदा की जोड़ी ने इंडस्ट्री को कई यादगार फिल्में दी हैं, जिनमें से यह भी एक है. तो आइये सुनें यह गीत जिसमें देवसाहब अपनी 'वो' का तार्रुफ करा रहे हैं.



'है अपना दिल तो आवारा' तो आप सभी ने सुना होगा, मगर क्या उसका यह सैड प्रारूप भी सुना है आपने ! 




Thursday, October 15, 2009

जाना न दिल से दूर ...





अरुणाचल से देव साहब और मन्ना दे को शुभकामनाएं

एक लम्बे मगर स्थानीय व्यवधान की वजह से अधूरे फिल्ड वर्क, साइबर कैफे संचालक की चुनावी व्यस्तता (यहाँ चुनावों में काफी सहभागिता रहती है आम लोगों की) आदि की वजह से एक लम्बे अंतराल के बाद आपसे मुखातिब हो पाया हूँ।
पिछले दिनों मार्केट में यूँ ही गुजरता हिंदी फिल्मों की सीडी देख ठिठक गया। कई हिंदी फिल्मों के बीच देवसाहब की 'मैं सोलह बरस की' का होना वाकई आश्चर्यजनक था. फिल्म देखता याद आया कि बीते 26 सितम्बर को देव साहब का जन्मदिन भी था.
देव आनंद नाम है हिंदी फिल्मों की आडंबरी मान्यताओं को चुनौती देते हुए भविष्य की और देखने की प्रेरणा का। आज भी किसी भी तथाकथित युवा को जोश और जज्बे में चुनौती देने वाले देवानंद ने वाकई वह स्थान प्राप्त कर लिया है, जहाँ -"न सुख है - न दुःख है, न दिन है-न दुनिया, न इंसान - भगवान्; सिर्फ मैं हूँ, मैं, सिर्फ मैं".
जीवन के रोमांटिक सफ़र के इस सदाबहार यात्री को शुभकामनाएं।
साथ ही शुभकामनाएं मन्ना डे साहब को भी जिनकी संगीत साधना को फाल्के अवार्ड के द्वारा सम्मानित किया जा रहा है।
जरा याददाश्त पर जोर दें और बताएं कि क्या ये दो हस्तियां कभी किसी गाने में इकट्ठी हुई हैं !
अब वापस अरुणाचल की ओर -
किसी इंसान की तरह स्थान की विशेषता भी छोटी-छोटी बातों से ही देखी जाती है। पिछले दिनों यहाँ बैंक में मेरे छूटे सामान का आधे घंटे बाद भी वहीँ पड़ा रह जाना कुछ तो इंगित करता ही है; और यह भी की यहाँ डुप्लीकेट चाभियाँ नहीं बनतीं. यहाँ के आम लोगों की ईमानदारी और स्पष्टवादिता वाकई सराहनीय है.
प्रयास करूँगा की कुछ पोस्ट्स ड्राफ्ट में सेव कर जाऊं ताकि इस आभासी जगत से वास्तविक संपर्क कायम रह सके।
इस पोस्ट के साथ संलग्न है पिछले माह मनाई गई विश्वकर्मा पूजा और हिंदी में चुनाव प्रचार की एक झलक।
बीते त्योहारों की विलंबित और आने वाले त्योहारों की अग्रिम शुभकामनाएं.
















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