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Sunday, September 11, 2011

पाकिस्तान से पहुंचे हिंदुस्तान तक ' बोल '


"  दिन परेशां है, रात भारी है ;
जिंदगी है कि, फिर भी प्यारी है " (बोल) 

पिछले दिनों पाकिस्तान से आई नसीरुद्दीन शाह अभिनीत फिल्म 'खुदा के लिए' काफी चर्चित रही थी, जिसमें 9/11 के बाद बदले हालत में इस्लाम की मनमाफिक व्याख्या पर अंकुश लगाने की झलक थी. उसके निर्देशक शोएब मंसूर की अगली पेशकश 'बोल' एक उद्देश्यपरक सिनेमा की अगली कड़ी है. सन्देश देने की अपनी जिम्मेवारियों से बौलीवुड अब खुल कर हाथ झाड चुका है, ऐसे में क्षेत्रीय सिनेमा और पडोसी देशों से आने वाली ये फिल्में सार्थक सिनेमा की एक उम्मीद तो जगाये ही रखती हैं.

बोल में पाकिस्तान के एक परिवार के माध्यम से आम आदमी के जीवनसंघर्ष और परिस्थितियों की जटिलताओं का ही निदर्शन है, मगर अपने अर्थों में यह किसी एक देश या समुदाय की नहीं बल्कि पूरे विश्व की सामाजिक असमानताओं का चित्रण करती है. स्क्रिप्ट के लिहाज से कहीं यह फिल्म कमजोर सी लगती है, मगर जिन सवालों को इसने छुने का साहस किया है, वो तथाकथित प्रगतिशील समाज में भी अश्पृश्य ही हैं. 

कहानी लाहौर के एक हकीम साहब की है, जो बेटे की चाहत में 14 बच्चे पैदा करते गए, जिनमें सिर्फ़ सात ही जीवित हैं. 6 बेटियां और एक संतान जो बेटी भी नहीं हो पाया. इस आश्वस्ति  के साथ कि "जब अल्लाह ने पैदा किया है तो चुग्गा भी देगा". उनकी अब भी अधूरी हसरत को देखते हुए बड़ी बेटी जेनब आवाज उठती है. वह न सिर्फ़ अपनी माँ के आगे संतान होने की संभावनाओं को समाप्त करवाती है, बल्कि अपने भाई जैसे सैफी को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी प्रयास करती है. मगर सैफी के साथ हुए एक हादसे से परिवार में तूफान आ जाता है, और हकीम साहब 'ऑनर कीलिंग' के नाम पर उसकी हत्या कर देते हैं. इसके बाद भी धर्म और सामाजिक मान्यताओं के नाम पर स्त्रियों की आवाज को दबाने की उनकी कोशिश जारी रहती है, और जेनब के तर्कों का उनका एकमात्र प्रतिकार हिंसा ही बचती है. परिस्थितियां उन्हें एक ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहाँ जेनब के हाथों उसके पिता की हत्या हो जाती है, और उसे फांसी की सजा. 

फिल्म में पाकिस्तानी समाज के जिन चंद पहलूओं की भी झलक मिलती है, ईमानदारी से देखें तो वो हमारे यहाँ भी विद्यमान हैं. 

यहाँ मीडिया का भी एक पहलू है, जब फांसी से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करती हुई जेनब के लिए एक महिला पत्रकार बार-बार उच्चाधिकारियों से राष्ट्रपति महोदय को जगाने की गुहार करती है, ताकि वो उसकी फांसी की सजा माफ कर दें. राष्ट्रपति महोदय की नींद टूटती है मगर फांसी की सजा के बाद और उन गूंजते सवालों के बीच जो जेनब ने उठाये हैं - "अगर मारना गुनाह है तो पैदा करना गुनाह क्यों नहीं ? हराम का बच्चा पैदा करना जुर्म क्यों है, जायज बच्चा पैदा कर उसकी जिंदगी हराम करना जुर्म क्यों नहीं?? जब खिला नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हो ??? "

जरा गौर से सोचिये क्या ये सवाल सिर्फ़ पाकिस्तान के लिए ही मौजूं हैं ? क्या इनके जवाब तलाशने की जरुरत हमारे आस-पास भी नहीं ? मगर गंभीर सवालों से मुंह मोड़कर तमाशों में ही समय काटने की आदत बनाकर हम इस पूरी मानवता के भविष्य के साथ विश्वासघात ही कर रहे हैं.

मैं बार-बार कहता आ रहा हूँ कि भारत-पाकिस्तान और तमाम दुनिया के नौजवानों की सोच, जरूरतें, शिकायतें  काफी एक सी हैं और इनका समाधान भी ये एक साथ मिलकर निकाल सकते हैं, बस ये सरहदों और प्रशासन की बंदिशें कम हों. यह नई पीढ़ी आजाद परिंदों की तरह है, इन्हें अपनी लकीरों में मत बांधो - घुटन होती है.....

एक वीडियो इसी मूवी से - 

एक बार जरुर देख सकते हैं इस फिल्म को यदि कड़वी सच्चाई से रूबरू होने का हौसला हो तो .....

Saturday, July 16, 2011

रंगमंच से : दब न जाये कहीं भारत-पाक की एक सम्मिलित आवाज


भारत-पाक संबंध इनके स्थापना काल से ही एक तलवार की धार पर चलने सरीखे हैं, जिन्हें इनकी राह से भटकाने में कई स्वार्थजन्य तत्व भी छुपे हुए हैं. कहते हैं मो. अली जिन्ना को भी आगे चलकर अपने इस निर्णय के औचित्य पर संदेह होने लगा था, मगर तबतक राजनीति की शतरंज के खिलाडी अपने खेल में काफी दूर निकल चुके थे. उस दौर की विभीषिका झेल चुकी एक पीढ़ी अपने स्तर पर इतिहास की इस भूल को सुधारने के प्रयास करती रही. अब जब दोनों मुल्कों में एक ऐसी पीढ़ी अस्तित्व में आ चुकी है जो इतिहास के उस कटु अनुभव की छाया से पूर्णतः मुक्त है. इन दोनों पीढ़ियों के मध्य एक विरासत के रूप में हस्तांतरण हो रहा है एक स्वप्न का जिसमें दोनों देशों के अपनी साझी संस्कृति, इतिहास की पृष्ठभूमि में एक साझे भविष्य की आधारशिला रखने के प्रयास हो रहे हैं. राजनयिक दांव-पेंचों के परे दोनों मुल्कों के आम बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा की जा रही ऐसी ही पहलों में से एक थी 15 जुलाई, 2011 को 'गाँधी स्मृति और दर्शन समिति' के तत्वावधान में पाकिस्तान की सीमा किरमानी जी द्वारा संचालित 'तहरीक-ए-निस्वां' (Tehrik-E-Niswan) समूह द्वारा प्रस्तुत नाटक 'जंग अब नहीं होगी'.

411 BCE  में एरिस्तोफेन्स (Aristophanes) रचित ग्रीक नाटक 'लिसिस्त्राटा' (Lysistrata), जो कि दुनिया की पहली स्त्रीवादी और युद्धविरोधी कृति मानी जाती है, से प्रभावित इस  नाटक का नए परिवेश में एडाप्टेशन फहमीदा रियाज और अनवर जाफरी ने किया था, जबकि इसके निर्देशन की कमान संभाली थी अनवर जाफरी और शीम किरमई ने. 

नाटक की विषयवस्तु उन दो कबीलों के इर्द - गिर्द घुमती है जिन्होंने कभी एक साथ मिलकर विदेशी शत्रुओं का मुकाबला कर विजय पाई थी, मगर बाद में आपस में ही हिंसक संघर्ष में शामिल हो गए. अपने संघर्ष की आग में ये अपने समाज की सुख, समृद्धि, विकास, महत्वकांक्षाएं सबकुछ झोंकते चले जा रहे थे. जाहिरा तौर पर युद्धों से होने वाले नकारात्मक प्रभाव सबसे ज्यादा महिलाओं को ही भुगतने पड़ते हैं. किसी का सुहाग उजड़ता है तो किसी की गोद और विजयी पक्ष की प्रतिहिंसा का भी आसान लक्ष्य स्त्री ही बनती है. ऐसे में दोनों कबीलों की औरतों ने एकजुट हो इस संघर्ष को रोकने के लिए दबाव बनने की ठान ली. 

औरतें यहाँ प्रतीक हैं दोनों कबीलों की उस आवाज का जो अक्सर नेताओं द्वारा अनसुनी कर दी जाती हैं.

नाटक का एक दृश्य 
इसके लिए उन्होंने दो माध्यम चुने - पहला - 'मर्दों को अपने पास न आने दो' और दूसरा 'अपने खजाने पर कब्ज़ा कर लो क्योंकि हमारा धन समाज के विकास के लिए है गोले-बारूद और एटम बम खरीदने के लिए नहीं. ' इसके प्रत्युत्तर में पुरुषवादी मानसिकता और स्त्रियों के बीच गहरा द्वन्द होता है. धार्मिक प्रतिनिधि के रूप में मुल्ले-मौलवियों को भी स्त्रियों की तर्कशक्ति के आगे झुकना पड़ता है. 

गोले-बारूद खत्म हो जाने के बाद भी अपने वजूद की तलाश की छटपटाहट, जो इन कबीलों में संघर्ष की स्थिति बने रहने पर ही निर्भर करती है;  दोनों देशों के सैन्य प्रमुखों को मथ रही है.. मगर स्त्रियों का दबाव इन्हें भी अपने दंभ को परे रख वार्ता के लिए संग बैठने को विवश करता है. दोनों देशों के सैनिक आम दोस्तों की तरह उन्ही के शब्दों में 'पहली बार जंग की दोपहर में नहीं, बल्कि एक खूबसूरत शाम' में बैठते हैं, और कहीं दबे पड़े उस एहसास को पुनर्जीवित करते हैं कि आखिर उनकी भाषा, संस्कृति, सभ्यता सब तो एक ही थी फिर यह जंग बीच में कहाँ से आ गई !
नाटक का एक अन्य दृश्य 
इस भाव के पुनर्जीवित होने के साथ ही यह नाटक तो खत्म हो जाता है मगर यह सवाल भी छोड़ जाता है कि भारत-पाक जैसे देशों की आम जनता के उस वर्ग की क्षीण सी आवाजें क्या अपने हुक्मरानों तक पहुँच पाएंगीं, जिसमें वो बार-बार इन सहोदरों के बीच उपजे अविश्वास को दूर करने के आग्रह करते आ रहे हैं. कुलदीप नैयर, गुलजार साहब जैसी शख्शियतें भारत से इस विचारधारा की एक प्रखर आवाज हैं तो सीमापार से भी प्रतिध्वनि न आ पा रही हो ऐसा भी नहीं है. 

वरिष्ठ पत्रकार श्री कुलदीप नैयर कलाकारों का उत्साहवर्धन करते हुए 

मुंबई धमाकों जैसी घटनाओं के माध्यम से उभरती कट्टरपंथी ताकतों के शोर में चाहे ये आवाजें दब जा रही हों, मगर ये खामोश नहीं होंगीं. दोनों देशों की अंधवैचारिक और कट्टरपंथी पूर्वाग्रहों से मुक्त युवा पीढ़ी अपने हुक्मरानों को भी एक-न-एक दिन आत्ममंथन के लिए जरुर विवश कर देगी. और तबतक के लिए गाँधी दर्शन एक माध्यम है इस भाव का कि -

"अन्धकार से क्यों घबड़ायें,
अच्छा है एक दीप जलाएं."

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