Friday, December 31, 2010

दशक के दस सबक



(जिंदगी से जो रोज एक नया सबक सिखाती है)

1. दिल की आवाज को पहचानो जो अक्सर दिमाग और बाहर के शोर में दब जाती है.

2. कोई भी निर्णय पूरे सोच – विचार के बाद लो और उसपर अडिग रहो ताकि बाद में कभी पछतावा न हो.

3. आज के दौर में कैरियर इस देश का सबसे विचारणीय मुद्दा है. अपने शौक और क्षमताओं की पहचान कर उसे कैरीयर का रूप दे सको तो महज duty की formality पूरी नहीं करोगे बल्कि उसका लुत्फ़ भी उठाओगे.

4. Problems को opportunities के रूप में लेना. याद रखना कि – “ जिस काम में जितनी ज्यादा समस्याएं आयें, समझ लेना वो काम उतना ही बेहतर होने वाला है.”

5. NCC की ट्रेनिंग कभी अनिवार्य हो या नहीं, कम – से - कम 1 वर्ष के रिसर्च का अनुभव किसी उपयुक्त गाईड के अंतर्गत जरुर ले लेना. भावार्थ समझने का मौका जीवनपर्यंत मिलता रहेगा; 1 उम्र तो थोड़ी कम ही पड़ेगी. J

6. परिवर्तन एक शाश्वत प्रक्रिया है, इससे कभी घबडाना मत. Evolution के लिए परिवर्तन भी आवश्यक है.

तो – “ सैर कर दुनिया की गाफिल, ये जिंदगानी फिर कहाँ;

जिंदगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ ! “

7. असफलता सिर्फ यही नहीं सिखाती कि सफलता का प्रयास पुरे मन से नहीं हुआ बल्कि यह भी कि – “ सितारों के आगे जहाँ और भी हैं;

अभी मंजिलों के इम्तिहाँ और भी हैं “

8. दोस्ती सबसे बड़ी नेमत है. यह ऐसी शै है, जिसे इश्वर आपको खुद चुनने का मौका देता है. तो इस मौके को व्यर्थ मत जाने देना ताकि कल बता सको कि रिश्ते जोडने में अपनी काबिलियत उससे कम भी नहीं.

9. शादी ??? (अहूँ – अहूँ) – “ उसी से करो जिससे दोस्ती कर सकते हो, घंटों बातें कर सकते हो ”

10. और यह भी कि – “ जो तुम्हारे मन का हो अच्छा, जो न हो वो और भी अच्छा; क्योंकि उसमें भगवान की मर्जी छुपी होती है “

Wednesday, December 29, 2010

अरुणाचल से दिल्ली - शुक्रिया '2010'




पिछले वर्ष जब लगभग इसी समय, गुजर रहे वर्ष का लेखा - जोखा संकलित कर रहा था, तब जहाँ एक ओर एक अधूरे सपने के साथ बनारस को छोडने की कसक थी, तो वहीँ दूसरी ओर देश के एक सुदूरतम प्रदेश से जीवन के एक नए सफर की शुरुआत की एक उम्मीद भी.

गुजरा वर्ष कई नए अनुभवों और उपलब्धियों का वर्ष रहा. कैरियर की दृष्टि से जहाँ काफी कुछ सीखने को मिला; वहीँ विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच और काम के प्रति समर्पण ने नई जिम्मेदारियां और उन्हें संभालने का आत्मविश्वास भी दिया.

एक तरह से खुद को नए परिवेश के प्रति समर्पित ही कर दिया था,, मगर बुझते दीपक की तरह एक अंतिम कोशिश की लपट कहीं बाकि थी. और अंततः इस देश के बहुसंख्यक युवाओं की सबसे बड़ी आकांक्षा - 'सरकारी सेवा में आना ' - यह स्वप्न भी पूरा हुआ; और वर्षों से बंद इस दरवाजे को आखिर अंतिम धक्के में खोल पाने (या यूँ कहें कि तोड़ पाने) * में सफल रहा. और अब लगभग एक वर्ष अधिक के नेटवर्क जोन से वनवास के बाद देश और नेटवर्क जोन की राजधानी दिल्ली आखिरकार दूर नहीं रह गई.

रचनात्मक जगत से अवान्क्षनीय दूरी के बावजूद आंशिक रूप से ब्लौगिंग भी जारी रही, जिसे मेरी विवशताओं को समझते हुए ब्लॉग परिवार का प्रोत्साहन भी मिलता रहा.

पत्रिका 'विज्ञान प्रगति ' और विज्ञान वेबसाईट 'कल्किओं' पर विज्ञान कथाएँ भी प्रकाशित हुईं.

इनके अलावे प्रत्यक्ष संपर्क में न रह पाने पर भी कुछ आभासी तो कुछ साभासी मित्रों से इस वनवास ने घनिष्ठता को और प्रगाढ़ ही किया. दोस्तों की पहचान रोज चाय या फ़ोन पर लंबी और अनर्थक बातों से ही नहीं होती, बल्कि ख़ामोशी भी दोस्तों के बीच भाषा सी ही काम कराती है.

"एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों,
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों."

बीता वर्ष यह सिखाता हुआ गया कि वाकई जीवन चलने का नाम है, पीछे मुड़-मुड़ कर देखते रहने का नहीं; और यह भी कि "सच्चे दिल से किसी को चाहो तो सारी कायनात उसे तुमसे मिलाने कि कोशिश में लग जाती है....."

नए शहर में नई जिम्मेदारियों को निभाता हुआ, ब्लॉग जगत से भी पुनः सक्रिय रूप से जुड़ने का नए वर्ष में प्रयास रहेगा, जिसमें आशा है सभी ब्लौगर्स का अपेक्षित सहयोग मिलेगा.

नववर्ष और नवदशक भी आप सभी के लिए खुशियाँ लाये; शुभकामनाएं.....

Sunday, December 26, 2010

नववर्ष का उपहार : दिल्ली पुस्तक मेला

दिल्ली का प्रगति मैदान एक बार फिर तैयार है पुस्तक प्रेमियों के स्वागत के लिए, 25 दिसंबर से २ जनवरी तक आयोजित दिल्ली पुस्तक मेले के साथ. कॉमनवेल्थ गेम्स की वजह से प्रस्तावित तिथी में बदलाव के साथ अनजाने में ही यह नववर्ष के लिए एक विशेष destination बन गया है. मेले का मुख्य थीम है – ‘ग्रामीण भारत हेतु पुस्तकें’. यूँ तो इस थीम की रस्मअदायगी कुछ सरकारी प्रकाशन केंद्र ही करते दीखते हैं, मगर रस्मों से ऊपर पुस्तकों के विशाल महासागर में एक बार फिर गोते लगाने का अवसर तो है ही यह पुस्तक मेला.
कई देशी-विदेशी प्रकाशन समूहों के साथ पुस्तक प्रेमियों के लिए पलक – पांवड़े बिछाये प्रस्तुत है यह आयोजन. तो चलें इस बार पुस्तक मेला इस निश्चय के साथ कि नववर्ष की शरुआत अपनी पसंदीदा पुस्तकों से करेंगे और उपहार में पुस्तकें देने की परंपरा को और भी सुदृढ़ कर पुस्तक पठन - पाठन की संस्कृति विकसित करने में अपना भी योगदान देंगे.

लगभग एक वर्ष से अधिक लंबे वनवास से वापसी के बाद मुख्यधारा से जुड़ने के अवसर को enjoy करने के लिए मेरे लिए तो यह आयोजन काफी महत्वपूर्ण था, मगर अपने बारे में बात अपनी अगली किसी पोस्ट में. अभी तो बस पुस्तक मेले का ही लुत्फ़ उठाएं.

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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