Monday, June 3, 2013

किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी .....

(बढते महिला अपराधों पर)


रांची जैसे छोटे शहरों से लेकर मुंबई जैसे महानगरों तक महिला अपराधों के बढते सिलसिले चिंताजनक रूप लेते जा रहे हैं. निश्चित रूप से इनमें से अधिकांश के पीछे एकतरफा प्यार जैसे ही मामले हैं. मगर ये कैसा प्यार है जो प्रतिक्रिया में इंसान को इतना हिंसक बना देता है कि उसे अपने प्यार ही नहीं बल्कि अपने भविष्य की भी फ़िक्र नहीं रह जाती. वर्तमान भारतीय मानस को प्रभावित करने में साहित्य और सिनेमा दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है. हमारे साहित्य में भी असफल प्रेमियों ने स्त्री को ही हर दोष की खान माना. बेवफा, स्वार्थी जाने कितने तमगे उन्हें थमाने में पुरुषों की निराशा की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. ‘प्यासा’ के चोट खाए विजय से देवदास द्वारा मानिनी पारो की सुंदरता पर दाग लगा जाने की मानसिकता के पीछे पुरुषत्व को ठेस लगने की मानसिकता भी रही. बाद में डर, अंजाम जैसी फिल्मों ने प्यार पर जबरन अधिकार ज़माने की सोच को वैधता सी ही दे दी. विश्व सिनेमा में भी ऐसे ही बदलाव आ रहे थे. और बेशक इन चीजों के महिमामंडन ने कुंठित युवाओं में खुद को नकारे जाने पर इन्तक़ाम को लेकर उनमें एक शहीदाना एहसास भी भर दिया.

मगर क्या प्रेम मात्र ऐसी सतही भावना है, जो अस्वीकृति की दशा में अपने प्रेम के लिए इतना हिंसक स्वरुप अख्तियार कर ले ! अगर पुरुष को अपने प्रेम की अभिव्यक्ती का अधिकार है तो स्त्रियों को भी उसे स्वीकृत या अस्वीकृत करने का उतना ही अधिकार है. सही या गलत निर्णय की पहचान तो वक्त ही कराएगा. प्रेम में वर्चस्व ज़माने की भावना के पीछे Anthropological और जैविकीय करण भी हैं. जानवरों में तो इन प्रवृत्तियों के कारण समझे जा सकते हैं, मगर सभ्यता की राह पर लगातार आगे बढते जा रहे मनुष्यों में इस प्रवृत्ति का उग्र होना निराशाजनक है, जिसका शमन होना ही चाहिए.

मैं तो प्रेम में निराश पुरुषों से यही कहना कहूँगा कि वो अपने जीवन को ‘प्यासा’ के विजय की तरह निराशा में डुबोने या ‘डर’ के राहुल की तरह प्रतिशोध में बर्बाद कर हीरो जैसी फीलिंग महसूस करने के बजाये खुद को इतना सफल बनाएँ कि अगले को महसूस हो कि उसने क्या खो दिया है, जो कल उसका भी हो सकता था.....

यूँ तो बात पुरुषों के प्रतिशोध की हो रही है, वैसे ध्यान रखें कि कहा तो यह भी जाता है कि बदला लेने और प्रेम करने में नारी पुरुष से अधिक निर्दयी होती है (नीत्शे).

वैसे हमारी सरकार जो बात-बात पर कानून बना देने में ही विश्वास करती है, एसिड की बिक्री और उसके प्रयोग पर भी नियंत्रण के लिए कारगर कदम उठाये. पडोसी बंगलादेश ने जब ऐसा कर पाने में उल्लेखनीय सफलता पा ली है तो हम भी ऐसा कर ही सकते हैं..... 

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वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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