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Saturday, March 7, 2015

होली के रंग: गीतों के संग...





गीत-संगीत का हमारे जीवन में अहम् स्थान है। यही कारण है कि हिंदुस्तानी सिनेमा से भी गानों को अलग नहीं किया जा सकता। होली गीतों के साथ भी यही बात है। कई बेहतरीन गाने जुड़े हैं इस पर्व से। कुछ गाने कहानी को आगे बढ़ाते हैं (जैसे शोले), तो कुछ इसी लिए डाल दिए गए कि होली के बहाने थोड़ी 'लिबर्टी' ले ली जाये। मगर यादों में वही गाने रह जाते हैं जो कहीं न कहीं आपको भी कहीं छु जाते हों। वैसे भी होली के इतने रंगों में कोई भी आपको छु न जाये ये हो भी नहीं सकता। इन गानों की सफलता भी इसी में है कि आज नहीं तो कल कभी न कभी आपको खुद से जोड़ते ही हैं। अपने मनपसंद कुछ फ़िल्मी होली गानों का जिक्र कर रहा हूँ, आप भी अपने पसंदीदा गानों को जोड़ना चाहें तो अच्छा लगेगा... 
मोहे पनघट पे:- क्लासिकल 
होली आई रे कन्हाई:- हिंदुस्तानी मिट्टी की सुगंध लिए 
जा रे हट नटखट:- राधा-कृष्ण की होली एक ही पात्र के द्वारा अभिव्यक्त 
रंग बरसे:- होली के राष्ट्रीय गीत सदृश्य मान्यता प्राप्त यह गीत मुझे चारों मुख्य कलाकारों के बेहतरीन अभिनय के लिए ही पसंद है 
सात रंग में खेल रही है:- 'आखिर क्यों' प्रश्न की शुरुआत ही इस गाने से है 
होली आई होली आई:- अनिल कपूर का टपोरी अंदाज 
आज न छोड़ेंगे:- राजेश खन्ना का आमंत्रण और आशा पारेख की बेबसी... 
इनके अलावे 'सौदागर' में राज कुमार-दिलीप कुमार का होली दृश्य भी यादगार था... 
ये तो थे मेरे मनपसंद सात रंग। आप चाहें तो अपने रंग भी जोड़ इसे आगे बढ़ा सकते हैं.....

Saturday, March 19, 2011

शब्दों और चित्रों के साथ – देख बहारें होली की

हर ओर होली का उल्लास है, मगर ब्रज की होली की बात ही कुछ और है; साथ में अगर कान्हा भी शामिल हों तब तो होली के आनंद अलहदा ही है.
रंगों भरी होली से तो अपनी दूरी ही है, मगर साहित्यिक और आत्मिक होली (अपने-आप के साथ J) का आनंद जरुर उठा लेता हूँ. इस बार वृन्दावन की होली देखने का कार्यक्रम तो अनिश्चित ही है, मगर आपसे साझा कर रहा हूँ नजीर अकबराबादी साहब की देश की गंगा-जमुनी होली की शाब्दिक प्रस्तुति और ब्रज की होली के एक मंचीय प्रस्तुति से एक झलक.

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।

हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की

गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।

ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों,
तब देख बहारें होली की।।

फूलों भरी होली में खुद ही कूद पड़े कृष्ण 
आज न छोडेंगे राधे को...
अलौकिक होली 
यदा - यदा हि धर्मस्य

होली मुबारक. 

Tuesday, March 10, 2009

फागुन आयो रे...

वसंत - पंचमी से ही शुरू हो चुकी फाग की उमंग अब चरमोत्कर्ष पर है. गैर आयातित और हमारे मौलिक त्योहारों में होली भी एक है. आदिम कृषक समाज जब फसल की कटाई संपन्न कर चैन की साँस ले रहा होता था और प्रकृति भी नए रंगों में सज-धज कर नया रूप धारण कर रही होती थी तो अपने उत्साह के प्रकटीकरण के लिए रंगों के इस त्यौहार का स्वस्फूर्त सृजन और रंग-गुलाल के साथ नव वर्ष का स्वागत स्वाभाविक ही था।
वसंत - पंचमी से 'होलिका-दहन' की तैयारी भी शुरू हो जाती है, जो दरिद्रता, बुराई और अधर्म के नाश का प्रतीक है; जिसकी सदबुद्धि 'माँ शारदा' ही तो दे सकती हैं।
थोड़े बदले स्वरुप में कमोबेश हर महाद्वीप और प्रत्येक देश में होली सर्दृश्य त्यौहार की उपस्थिति के बीज हमारे विस्मृत हो चुके अतीत में छुपे हो सकते है. ऐसे में इस त्यौहार की मौलिक भावनाओं को विरूपित होने से बचाने के संकल्प के साथ आइये Let's Play Holi.आप सभी को होली की रंग, उमंग और भंग भरी ढेरों शुभकामनाएं.....
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