Saturday, February 21, 2009
मैं भी चला ब्लौगर्स मीट
लवली जी द्वारा प्राप्त 'ब्लौगर्स मीट' के आमंत्रण और इसी बहाने अपने गृहराज्य झाड़खंड की राजधानी पुनः घूम आने का प्रलोभन छोड़ न सका और लगे हाथों इस कार्यक्रम के आयोजक शैलेश भारतवासी जी को सूचित कर स्वयं को 'आधिकारिक स्वामंत्रित' भी करा लिया. किन्तु इस मीट में शामिल होने के लिए बड़े खेद के साथ अपने अजीज ब्लॉग मित्र नीरज मुसाफिर जी के हरिद्वार चलने के आमंत्रण को अस्वीकार भी करना पड़ा. आशा है ब्लौगिंग का सफर हमें मुसाफिरी का और भी अवसर देगा.
अब जब रवानगी में चंद ही घंटे शेष हैं एक दुविधा में हूँ. ब्लॉग एक आभासी दुनिया है, जहाँ हर ब्लौगर के लिए हमारे दिलों में एक काल्पनिक छवि बसी हुई है. यह थोडी रूमानी भी है, थोडी भ्रामक भी; किंतु है सुखद. ऐसे आयोजन आभासी दुनिया से एक मजबूत संबंधों की शुरुआत में सहायक होते हैं. किंतु क्या यह उस आकर्षक भ्रम का अंत नहीं ! काल्पनिकता और वास्तविकता के इस द्वंद के उत्तर की तलाश करता हूँ 22 फरवरी को रांची में....
Friday, February 13, 2009
पराया नहीं है वैलेंटाईन डे
पराया नहीं है वैलेंटाईन डेक्या कारण है की वैलेंटाईन डे तभी मनाया जाता है जब की हमारे यहाँ वसंत अपने पूरे शबाब पर होता है, जबकि पश्चिमी 'डेज' ऋतुओं पर आश्रित नहीं होते। हमारे यहाँ प्राचीन काल से ही वसंत में 'वन-विहार', 'झुला दोलन' , 'पुष्प-श्रृंगार' आदि की परम्परा रही है। 'मदन-उत्सव', 'शालभंजिका पर्व' आदि का उल्लेख हमारे आदि साहित्यिक और धार्मिक ग्रंथों में भी है। कालिदास व बाणभट्ट की रचनाओं तथा 'जातक कथाओं' में भी वसंत क्रीडाओं का अनूठा वर्णन किया गया है। 'वसंत पंचमी' से आरम्भ होकर'फाल्गुन पूर्णिमा' तक जारी रहने वाला प्रकृति के संग उल्लास का यह पर्व किसी विदेशी 'डे' या 'वीक' का मोहताज नहीं है।
अंध विरोध और गुंडागर्दी के साथ-साथ अत्याधुनिक होने के भ्रम में जीने वालों के लिए भी इस उत्सव का प्रतिषेध के बजाय इसका वास्तविक भारतीयकरण ही सही समाधान होगा. क्यों न हम मौका दें इस भटके हुए अतीत के एक अंश को उसका सुंदर स्वरुप लौटाने का ! मगर है कोई असली भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने में सक्षम कोई संगठन !
Monday, February 9, 2009
रंग बसंती आ गया.....

Thursday, February 5, 2009
और ये फरमाइश भेजी है झुमरीतिलैया के.....
विविध भारती के अलावे कई अन्य रेडियो स्टेशनों पर यह पंक्ति हमने कई बार सुनी होगी. मगर क्या कभी यह भी जानने की कोशिश की है कि यह जगह आख़िर है कहाँ, या यह वास्तव में कहीं है भी या नहीं!
झुमरी और तिलैया जो कि दो अलग-अलग गाँव हैं झारखण्ड के कोडरमा जिले के खुबसूरत जंगलों और पहाडों के बीच. कहा जाता है कि इन दो क्षेत्रों के मध्य किसी राजा का कभी गढ़ था जिसके कारण यह क्षेत्र झुमरी तिलैया कहलाया.
इस क्षेत्र के दो जुनूनी रेडियो श्रोताओं श्री रामेश्वर वर्णवाल और श्री गंगा प्रसाद मगधिया ने फ़रमाइश वाले कार्यक्रमों में चिट्ठियां भेजना का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि हर रेडियो केन्द्र के ऐसे कार्यक्रमों में इस क्षेत्र का नाम होता ही था. ऐसा न हो पाने पर कभी-कभी उद्घोषक भी चर्चा करते थी कि आज झुमरी तिलैया से कोई फ़रमाइश नहीं आई है.
इन जुनूनी श्रोताओं के जूनून को आज भी न सिर्फ़ उनके परिवार वाले बल्कि सारे क्षेत्र के लोग आगे बढ़ा रहे हैं.
तो है न यह चिट्ठियों के माध्यम से अपने क्षेत्र को सारे देश में प्रसिद्धि दिलाने का अनूठा प्रयास.
Tuesday, February 3, 2009
सरस्वती पूजा और विद्यार्थी
और विसर्जन के नाम पर स्थानीय नदियों और तालाबों की जो शामत आती है, क्या उस और देश के इस प्रबुद्ध भविष्य को नहीं सोचना चाहिए. क्या यह सम्भव नहीं कि मूर्तियों की जगह तस्वीरों का या ऐसे किसी वैकल्पिक माध्यम का प्रयोग किया जाए जिससे जल प्रदुषण में एक वर्ग की हिस्सेदारी आंशिक रूप से ही मगर कम तो हो.
माँ शारदे सभी को सद्बुद्धि दें.
Friday, January 30, 2009
गांधीजी के साथ- गावों की ओर
(यह पोस्ट मेरे अन्य ब्लॉग gandhivichar.blogspot.com से)
भारत की आत्मा गावों में बसती रही है, मगर आजादी के बाद अर्थव्यवस्था का केन्द्र शहरों को मान विकास के मॉडल को अपनाया गया, जिसने देश की जड़ें खोखली कर दीं। यही कारण है कि आज विश्व के किसी दूसरे कोने में चले एक झोंके से भी हमारी विकास की ईमारत लड़खडाने लगती है।
भारत की आत्मा को आत्मसात करने वाले गांधीजी ने कहा था कि- " अब तक गाँव वालों ने अपने जीवन की बलि दी है ताकि हम नगरवासी जीवित रह सकें। अब उनके जीवन के लिए हमको अपना जीवन देने का समय आ गया है। ... यदि हमें एक स्वाधीन और आत्मसम्मानी राष्ट्र के रूप में जीवित रहना है तो हमें इस आवश्यक त्याग से पीछे नहीं हटना चाहिए। " "भारत गावों से मिलकर बना है, लेकिन हमारे प्रबुद्ध वर्ग ने उनकी उपेछा की है। ... शहरों को चाहिए कि वे गावों की जीवन-पद्धति को अपनाएं और गावों के लिए अपना जीवन दें। "
गांधीजी के विचारों को ही उनकी विरासत मानते हुए ग्रामोत्थान और 'ग्राम स्वराज' की दिशा में हमारा अंशदान ही उस महानात्मा के प्रति हमारी विनम्र श्रद्धांजलि होगी।
Friday, January 23, 2009
विद्रोही सुभाष की दुविधा

अपने विद्रोही स्वाभाव से ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर देने वाले सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि किसी भी युग में युवाओं कि बुनियादी सोच समान होती है। उन्हें अंजान राहें ज्यादा लुभाती हैं, जबकि समाज उन्हें अपनी आजमाई हुई लकीर की ओर ही खींचना चाहता है।
असमंजस कि यह स्थिति सुभाष जी कि तरुणाई में भी देखने को मिलती है। लन्दन में ICS के प्रशिक्षण के दौरान ही देशसेवा में आने का उन्होंने निर्णय ले लिया था, किंतु यह किस रूप में हो इसे लेकर वह दुविधा में थे। तभी उन्होंने बंगाल के वरिस्थ नेता देशबंधु चित्तरंजन दास को पत्र लिखा कि - "नौकरी करने की उनकी इच्छा बिल्कुल नहीं है, और वे स्वतंत्रता संग्राम में किसी भी रूप में भागीदारी के इच्छुक हैं।" कोई प्रत्युत्तर न पाने और अपनी संभावित भूमिका कुछ और स्पष्ट होने पर उन्होंने पुनः देशबंधु से पत्रकारिता आदि से जुड़े क्षेत्र में अपनी सेवाएं देने की पेशकश की, और स्वीकृति मिलने पर ICS से इस्तीफा देकर भारत लौट आए।
नेताजी के जीवन से आज की पीढी यदि यह संदेश भी ले सके कि कोई जन्मजात महान नहीं होता, बल्कि लक्ष्य स्पष्ट हो तो राहें ख़ुद निर्धारित की जा सकती हैं; तो यह सुभाष जी के बलिदान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
नेताजी की कुछ पसंदीदा पंक्तियाँ दोहराते हुए-
कदम-कदम बढाये जा, खुशी के गीत गए जा;
ये जिंदगी है कौम की, तूँ कौम पर लुटाये जा।









