Friday, February 27, 2009

सफल ब्लौगर्स मीट के आयोजन के मूल तत्त्व-II (अंतिम कड़ी)

पिछली पोस्ट में मैंने आयोजन की भूमिका से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की थी। इस पोस्ट में आयोजन की मुख्य संरचना पर विचार किया जायेगा.
(i) कार्यक्रम का उद्देश्य- यह बिलकुल स्पष्ट होना चाहिए की कार्यक्रम 'ब्लौगर्स मीट' है या 'ब्लौगिंग वर्कशॉप'. ब्लौगर्स मीट - जहाँ समीर लाल जी और अरविन्द मिश्र जी जैसे ब्लौगर बैठे हों, वहां यदि आयोजकों ने "ब्लॉग कैसे बनाएं" पर लेक्चर दिला दिया तो हम गरीब ब्लौगरों पर क्या बीतेगी भला! यही दृश्य इसकी विपरीत परिदृश्य में भी हो सकता है।
(ii) वक्ताओं का चयन- ब्लौगिंग सिर्फ पत्रकारों का शगल नहीं। यहाँ साहित्यकार भी हैं, तो इतिहासकार और आध्यात्मिक चिन्तक भी। इसलिए वक्ता ऐसे चुने जायें जिनसे लगभग सभी वर्ग के ब्लौगर्स लाभ उठा सकें। और हाँ, इन वक्ताओं को ब्लौगिंग की बुनियादी समझ लाज़िमी होनी चाहिए; नहीं तो कहीं वो हम ब्लौगर्स को 'भुनगे' टाइप समझ ज्ञान बांटने का अतिरिक्त दबाव न ले लें!
(iii) ब्लौगर्स के वर्गीकरण से परहेज- कहीं कुछ सेलिब्रिटी ब्लौगर्स की चर्चा भी सुनी थी। एक टिप्पणीकार ने पूर्वी और पश्चिमी ब्लौगर्स जैसे शब्दों पर भी आपत्ति चाहे व्यंग्य में ही सही जताई थी। स्वाभाविक ही ब्लौगर्स को सेलिब्रिटी और आम ब्लौगर्स की श्रेणी में बांटने से परहेज किया जाना चाहिए; नहीं तो कहीं यहाँ भी वर्ग-संघर्ष न शुरू हो जाये! वैसे भी व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं लगता की ब्लौगर समुदाय अभी सभ्य समाज के इन उच्चतम आदर्शों तक पहुँच सका है!
(iv) कार्यक्रम की दिशा- जब अपना अमूल्य समय, साधन आदि व्यय कर कोई ब्लौगर ऐसे कार्यक्रम में शामिल होता है तो लाज़िमी है कि कार्यक्रम के अंत में उसे संतुष्टि का अहसास हो। और यह संतुष्टि तभी मिल सकेगी जबकि कार्यक्रम की कोई सार्थक पहल या उपलब्धि हो। मेरा मानना है कि - "मिल कर बैठें, और व्यर्थ की ही बात हो;
इससे बेहतर है, न ऐसी कोई मुलाकात हो।"
वैसे भी, "वाह-वाह" तो हम टिप्पणियों में कर ही देते हैं।
(v) उत्कृष्ट ब्लौगिंग को प्रोत्साहन- यह एक प्रतीकात्मक प्रयास ही होना चाहिए। किन्तु जब हिंदी ब्लौगर्स के स्तरीय लेखन और निश्चित चरित्र के अभाव की बात होती है, तो इस दिशा में अपेक्षयाकृत बेहतर प्रयास कर रहे ब्लौग्स की चर्चा या उसे पुरस्कृत करने का प्रयास नए ब्लौगर्स को प्रेरणा और मार्गदर्शन देने के काम आ सकता है।
(vi) वैकल्पिक मंच की सम्भावना- हम सभी ब्लौगर्स में जो एक चीज common है वह है 'सृजनात्मकता' और समाज के लिए योगदान की आकांक्षा। मुख्यधारा से कट चुके विषय आज ब्लौगिंग में ही जीवित हैं. ऐसे में एक वैकल्पिक वैचारिक और रचनात्मक समाज के निर्माण के माध्यम के रूप में भी ब्लौगिंग का विकास ऐसे आयोजनों का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए.
जैसा की राज जी ने जानना चाहा था, आयोजन का खर्च इसके स्वरुप के अनुसार परस्पर भागीदारी शुल्क या प्रायोजक की तलाश के माध्यम से पूरा करने का प्रयास किया जा सकता है। मगर बेहतर हो प्रायोजक या दानदाता का इसमें अपनी छवि विज्ञापित करने का माध्यम न बन जाएँ ऐसे अवसर.
मात्र एक 'ब्लौगर मीट' से यदि इतने विचार उभर कर आये हैं तो यह भी इस मीट की एक अन्य उपलब्धि है। आप सभी ने इन विचारों को साझा करने हेतु प्रोत्साहित किया, धन्यवाद।
(नोट:- एक समर्पित ब्लौगर इस विधा की धरोहर ही है. ऐसे में मैं नहीं समझता की ब्लौगिंग पर इन पोस्ट्स से मैंने अपने ब्लॉग के चरित्र से कोई छेड़खानी की हो. वैसे भी एक ब्लौगर के नाते ब्लौगिंग की बेहतरी में अपना अंशदान करना मेरी जिम्मेदारी भी बनती हमेरे प्रयास का मूल्यांकन आप टिप्पणीकारों व भविष्य के हाथों में है. )

Thursday, February 26, 2009

सफल ब्लौगर्स मीट के मूल तत्त्व

आदरणीय विष्णु बैरागी जी तथा कुछ अन्य वरीय ब्लौगर्स ने आग्रह किया था कि 'ब्लौगर्स मीट' जैसे आयोजनों की बढती संभावनाओं को देखते हुए इनपर विस्तार से चर्चा की जाए। मैं भी मानता हूँ कि कार्यक्रम का मात्र संपन्न हो जाना ही नहीं बल्कि इसकी समग्र विवेचना ही इसकी वास्तविक सफलता और भविष्य की आधारशिला होती है। अपने अनुभवों और अन्य ब्लौगर्स की प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन सम्बन्धी अपनी राय क्रमवार रख रहा हूँ -
(i) व्यवस्थित टीम का गठन - किसी भी कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए यह एक अनिवार्य शर्त है. अतिउत्साही आत्मविश्वास या अविश्वास के कारण भी एक ही व्यक्ति पर कार्यक्रम का सम्पूर्ण भार नहीं छोड़ा जा सकता। कार्यक्रम कि जिम्मेदारी के अनुरूप दायित्वों का विभाजन और टीम के सदस्यों की अपनी जिम्मेवारी के प्रति गंभीरता पर ही कार्यक्रम की दशा-दिशा निर्भर करेगी.
(ii) कार्यक्रम की तिथि- ब्लौगिंग में हर उम्र, वर्ग और व्यवसाय के लोग संलग्न हैं, इसीलिए सभी के लिए उपयुक्त तिथि का चयन सरल नहीं; किन्तु अधिकाधिक लोगों के अनुकूल तिथि का चयन किया जाना चाहिए। यदि 2-3 दिनों की लगातार छुट्टी सा संयोग हो तो सोने-पे-सुहागा. 22 फरवरी का 'रांची ब्लौगर मीट' इस पैमाने पर बिलकुल खरा उतरता था.
(iii) कार्यक्रम का स्वरुप- यह स्पष्ट होना चाहिए कि कार्यक्रम का स्वरुप स्थानीय है, राज्यस्तरीय या राष्ट्रीय. आयोजकों तथा आगंतुकों की भी सुविधा कि दृष्टि से यह जरुरी है।
(iv) कार्यक्रम की सूचना- कार्यक्रम के स्वरुप के अनुसार अपेक्षित ब्लौगर्स तक सूचना की उपलब्धता अगला महत्वपूर्ण विषय है. इसके लिए सामुदायिक ब्लोग्स, ई-मेल्स के अलावे स्थानीय समाचार पत्रों का भी प्रयोग किया जा सकता है. ब्लौगर्स की चैन-श्रृंखला भी उपयोगी हो सकती है, जैसा रांची में हुआ.
(v) ब्लौगर्स की स्वीकृति- आयोजन में शामिल होने के इच्छुक ब्लौगर्स के लिए भी अपेक्षित है कि वो अपनी भागीदारी की स्वीकृति कार्यक्रम से यथापूर्व ही दे दें, ताकि आयोजकों को असुविधा न हो।
(vi) प्रबंधन द्वारा प्रत्युत्तर- आयोजकों की टीम में संपर्क प्रभारी जैसा कोई दायित्व निर्धारित होना चाहिए जिससे इच्छुक प्रतिभागी संपर्क कर सकें, और जो उन्हें आगमन की स्वीकृति और कार्यक्रम के सम्बन्ध में औपचारिक सूचना देने में सक्षम हो। यह अतिथियों को संतुष्टि और आयोजकों की गंभीरता को दर्शायेगा।
क्रमशः
(नोट:- यह सीरीज़ शायद कुछ लोगों को उबाऊ और गैरजरूरी लगे किन्तु जो ब्लौगर्स एक-दुसरे से सिर्फ भावनात्मक रूप से जुड़े हैं उनकी ऐसे आयोजनों के प्रति उत्साह और अपेक्षा की दृष्टि से छोटी-छोटी बातें ही महत्वपूर्ण हो जाती हैं. अगले अंक में कार्यक्रम के स्वरुप पर चर्चा करूँगा).

Tuesday, February 24, 2009

कौफी विद ब्लौगर्स

Jab We Met
पूर्वी भारत के पहले ब्लौगर्स मीट में शामिल होने के उत्साह में 350 किमी का रेल सफर और 150 किमी का बस सफर कैसे तय हो गया, पता ही नहीं चला। अपनी तरफ़ से तो मैं देर हो ही चुका था, भला हो परंपरागत भारतीय समय पद्धति का जिसने 'दीप प्रज्ज्वलन' शायद मेरे ही इंतजार में रोक रखा था।
कार्यक्रम की पंच लाइन थी - "A Cup of Coffee With Healthy Minds" और वास्तव में यह कार्यक्रम व्यर्थ की औपचारिकताओं से परे कुछ क्रियेटिव और Healthy Minds के साथ उत्साह, प्रेम और रोमांच की अनौपचारिक त्रिवेणी ही रहा। ऐसा नहीं था की कार्यक्रम को व्यवस्थित सांचे में ढालने में व्यवस्थापकों ने कोई कसर छोड़ी हो किंतु वो ब्लोगर्स ही कैसे जो बंधी-बंधाई लीक पर चलें !
मीडिया के तमाम प्रमुख हस्तियों द्वारा ब्लॉग के महत्त्व को स्वीकारना कार्यक्रम की सफलता रही, और इसके पीछे निश्चित रूप से आयोजक डॉ भारती कश्यप जी और उनकी टीम की उल्लेखनीय भूमिका रही। घनश्याम जी का कार्यक्रम संयोजन और शैलेष भारतवासी जी का ब्लौगिंग पर बुनियादी जानकारी कार्यक्रम की सफलता के अन्य निर्णायक बिन्दु रहे। शिव कुमार मिश्रा जी, मनीष जी और प्रभात जी ने सफल ब्लौगिंग के मूल तत्वों पर प्रकाश डाला; तो अन्य ब्लोगर्स ने अपने अनुभव बांटे। मैंने भी वैचारिक व् सूचनाओं पर आधारित पोस्ट्स के स्वामित्व के प्रश्न पर अपने विचार रखे, जिसे बाद में यहाँ भी चर्चा करूँगा। श्यामल सुमन जी और पारुल जी की ग़ज़लों और अमिताभ मीत जी के शेरों ने कार्यक्रम को जिवंत कर दिया.
कुछ ब्लौगर्स ने आभासी और वास्तविक दुनिया के मध्य मेरी दुविधा पर उत्सुकता जताई थी। जैसा कि उन्मुक्त जी ने कामना व्यक्त की थी- सभी ब्लौगर्स अपनी छवि के अनुरूप ही उत्साही, सृजनशील और मित्रवत थे. पारुल जी के व्यक्तित्व में वास्तव में 'सरगम' की झलक थी, तो रंजना जी के व्यक्तित्व में 'संवेदना संसार' की झलक. प्रभात जी 'गपशप' के ही मूड में थे तो संगीता जी में 'गत्यात्मक ज्योतिष' का बड़प्पन. लवली जी अपने नाम के ही अनुरूप थीं, हाँ किसी 'भुजंग' स्वामिनी की इमेज आपके दिलों में हो तो उसे भुला दीजियेगा ! 'भूतनाथ' नहीं भाई राजीव थपेड़ा ही सही रहेगा; क्योंकि इस उपनाम के साथ हम पर इमोशनल अत्याचार कर रहे हैं वो।
इस क्षेत्र के ब्लौगर्स को जोड़ने में यह कार्यक्रम काफी हद तक सफल रहा, किंतु अभी ऐसे आयोजनों को एक लंबा सफर तय करना है. कई सक्रिय ब्लौगर्स और नए ब्लौगर्स को भी प्रेरित करने की नई संभावनाएं दर्शा गया यह 'ब्लौगर्स मीट'.

Saturday, February 21, 2009

मैं भी चला ब्लौगर्स मीट


     लवली जी द्वारा प्राप्त 'ब्लौगर्स मीट' के आमंत्रण और इसी बहाने अपने गृहराज्य झाड़खंड की राजधानी पुनः घूम आने का प्रलोभन छोड़ न सका और लगे हाथों  इस कार्यक्रम के आयोजक शैलेश भारतवासी जी को सूचित कर स्वयं को 'आधिकारिक स्वामंत्रित' भी करा लिया. किन्तु इस  मीट में शामिल होने के लिए बड़े खेद के साथ अपने अजीज ब्लॉग मित्र नीरज मुसाफिर जी के हरिद्वार चलने के आमंत्रण को अस्वीकार भी करना पड़ा. आशा है ब्लौगिंग का सफर हमें मुसाफिरी का और भी अवसर देगा.
     अब जब रवानगी में चंद ही घंटे शेष हैं एक दुविधा में हूँ. ब्लॉग एक आभासी दुनिया है, जहाँ हर ब्लौगर के लिए हमारे दिलों में एक काल्पनिक छवि बसी हुई है. यह थोडी रूमानी भी है, थोडी भ्रामक भी; किंतु है सुखद. ऐसे आयोजन आभासी दुनिया से एक मजबूत संबंधों की शुरुआत में सहायक होते हैं. किंतु क्या यह उस आकर्षक भ्रम का अंत नहीं ! काल्पनिकता और वास्तविकता के इस द्वंद के उत्तर की तलाश करता हूँ 22 फरवरी को रांची में....

Friday, February 13, 2009

पराया नहीं है वैलेंटाईन डे

पराया नहीं है वैलेंटाईन डे


पश्चिम से आ रही किसी परम्परा के नाम पर अंधविरोधी मानसिकता पर पुनर्विचार की जरुरत है। जरा गौर से देखें तो वैलेंटाईन डे हमारी उसी प्राचीन परम्परा का वारिस है जो अतीत के किसी अध्याय में अपनी जड़ों से अलग हो आज पश्चिमी रास्तों से गुजरता अपनी जड़ों को धुन्धता वापस आ रहा है।
क्या कारण है की वैलेंटाईन डे तभी मनाया जाता है जब की हमारे यहाँ वसंत अपने पूरे शबाब पर होता है, जबकि पश्चिमी 'डेज' ऋतुओं पर आश्रित नहीं होते। हमारे यहाँ प्राचीन काल से ही वसंत में 'वन-विहार', 'झुला दोलन' , 'पुष्प-श्रृंगार' आदि की परम्परा रही है। 'मदन-उत्सव', 'शालभंजिका पर्व' आदि का उल्लेख हमारे आदि साहित्यिक और धार्मिक ग्रंथों में भी है। कालिदास व बाणभट्ट की रचनाओं तथा 'जातक कथाओं' में भी वसंत क्रीडाओं का अनूठा वर्णन किया गया है। 'वसंत पंचमी' से आरम्भ होकर'फाल्गुन पूर्णिमा' तक जारी रहने वाला प्रकृति के संग उल्लास का यह पर्व किसी विदेशी 'डे' या 'वीक' का मोहताज नहीं है।
अंध विरोध और गुंडागर्दी के साथ-साथ अत्याधुनिक होने के भ्रम में जीने वालों के लिए भी इस उत्सव का प्रतिषेध के बजाय इसका वास्तविक भारतीयकरण ही सही समाधान होगा. क्यों न हम मौका दें इस भटके हुए अतीत के एक अंश को उसका सुंदर स्वरुप लौटाने का ! मगर है कोई असली भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने में सक्षम कोई संगठन !
तो आइये हम हीं उत्सव मनाएं प्रकृति और प्रेम के इस मिलन का.....

Monday, February 9, 2009

रंग बसंती आ गया.....


जलवायु परिवर्तन की तमाम बहसों के परे जनमानस के बीच बसंत आ गया है। पीली सरसों, नए पुष्पों, नव पल्लवों के बीच कई सुकोमल भावनाओं में भी स्पंदन जागृत हो रहा है। प्रकृति दोनों हाथों से अपनी सुन्दरता के प्रदर्शन को प्रस्तुत है , मगर कंक्रीट के जंगलों के मध्य प्रकृति के लिए स्थान ही कहाँ बचा है!
तो आइये चलें बसंत-विहार के लिए उन आम जगहों से हट कर उस ओर जो तथाकथित विकास की काली छाया से थोड़े परे हैं। ऐसी ही एक खुबसूरत जगह है 'झारखण्ड के कश्मीर' के रूप में चर्चित 'हजारीबाग'। पाषाणयुगीन धरोहर और सांस्कृतिक विरासत को संजोये यह स्थल अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए भी प्रसिद्ध है। नेशनल पार्क, शालपर्णी, कन्हरि पहाड़ी जैसे पर्यटक स्थल ही नहीं छोटे-छोटे गावों और हरे-पीले खेतों में भी वैसी ही कशिश है, बस प्रकृति को निहारने वाली एक पारखी नजर चाहिए।
यह सहज-सरल सुन्दरता आपको अपने शहर के आस-पास भी मिल जायेगी, बस जरुरत है उसे मानवीय लोभ के दुष्प्रभाव से बचाने और संजोने की।
तो आइये मनाएं इस वसंत का उत्सव उसी अछूते सौंदर्य के साथ।

Thursday, February 5, 2009

और ये फरमाइश भेजी है झुमरीतिलैया के.....


     विविध भारती के अलावे कई अन्य रेडियो स्टेशनों पर यह पंक्ति हमने कई बार सुनी होगी. मगर क्या कभी यह भी जानने की कोशिश की है कि यह जगह आख़िर है कहाँ, या यह वास्तव में कहीं है भी या नहीं!
      झुमरी और तिलैया जो कि दो अलग-अलग गाँव हैं झारखण्ड के कोडरमा जिले के खुबसूरत जंगलों और पहाडों के बीच.  कहा जाता है कि इन दो क्षेत्रों के मध्य किसी राजा का कभी गढ़ था जिसके कारण यह क्षेत्र झुमरी तिलैया कहलाया.
     इस क्षेत्र के दो जुनूनी रेडियो श्रोताओं श्री रामेश्वर वर्णवाल और श्री गंगा प्रसाद मगधिया ने फ़रमाइश वाले  कार्यक्रमों में चिट्ठियां भेजना का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि हर रेडियो केन्द्र के ऐसे कार्यक्रमों में इस क्षेत्र का नाम होता ही था. ऐसा न हो पाने पर कभी-कभी उद्घोषक भी चर्चा करते थी कि आज झुमरी तिलैया से कोई फ़रमाइश नहीं आई है.
    इन जुनूनी श्रोताओं के जूनून को आज भी न सिर्फ़ उनके परिवार वाले बल्कि सारे क्षेत्र के लोग आगे बढ़ा रहे हैं.
    तो है न यह चिट्ठियों के माध्यम से अपने क्षेत्र को सारे देश में प्रसिद्धि दिलाने का अनूठा प्रयास.

Tuesday, February 3, 2009

सरस्वती पूजा और विद्यार्थी

     सरस्वती पूजा सोल्लास संपन्न हो गई. मगर अपने पीछे फ़िर छोड़ गई यह प्रश्न भी कि क्या पूजा के नाम पर युवा वर्ग इस पर्व के संदेश को आत्मसात कर पा रहा है. माँ की विदाई के समय जो भोंडा व्यवहार इन 'विद्यार्थियों' द्वारा दिखाया जाता है उसे देख क्या उनकी अपनी माँ को गर्व महसूस होता होगा! तब फ़िर माँ शारदे पर क्या गुजरती होगी!
     और विसर्जन के नाम पर स्थानीय नदियों और तालाबों की जो शामत आती है, क्या उस और देश के इस प्रबुद्ध भविष्य को नहीं सोचना चाहिए. क्या यह सम्भव नहीं कि मूर्तियों की जगह तस्वीरों का या ऐसे किसी वैकल्पिक माध्यम का प्रयोग किया जाए जिससे जल प्रदुषण में एक वर्ग की हिस्सेदारी आंशिक रूप से ही मगर कम तो हो.
    माँ शारदे सभी को सद्बुद्धि दें.

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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