Tuesday, March 31, 2009

झारखण्ड का प्रकृति पर्व- सरहुल

झारखण्ड के प्रकृति प्रेमी आदिवासियों द्वारा मनाये जाने वाले त्योहारों में एक प्रमुख प्रकृति पर्व है - 'सरहुल'. चैत्र कृष्ण पक्ष तृतीय से प्रारंभ हो बैसाख तक यानि दो माह तक चलने वाला यह एक अद्भुत धार्मिक त्यौहार है.
 
'साल' के वृक्ष में फूलों का आना इस त्यौहार के आने का द्योतक है. साल के वृक्ष के अलावे प्रकृति में उपजने वाली सभी वन-सम्पदा का अपनी आराध्य देवी पर अर्पण करने के बाद ही स्वयं इनका प्रयोग आरम्भ करते हैं ये प्रकृति-पूजक.

मुख्यतः संथालों और उरावों द्वारा आयोजित इस पर्व में 'फूल गईल सारे फूल, सरहुल दिना आबे गुईयाँ' जैसे गीतों की ताल पर प्रसिद्द 'सरहुल' नृत्य पर झूमते हुए प्रकृति से अपने जुडाव और आत्मीयता का परिचय देते हैं ये. इस अवसर पर इनके पुजारी जिसे 'पाहन' कहते हैं द्वारा आने वाले समय में मौसम की भविष्यवाणी भी की जाती है. इस वर्ष राज्य में अच्छी बारिश और खेती में समृद्धि की सम्भावना जताई गई है.

एक प्रकार से देखें तो नव वर्ष पर धरती की उर्वरा शक्ति का सम्मान ही है- 'वासंतिक नवरात्र' के ही सामान. ऐसे में इन पारंपरिक त्योहारों और इनके शास्त्रीय स्वरुप में सम्बन्धओं पर एक नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता भी महसूस होती है.
 
तस्वीर: साभार गूगल

Thursday, March 19, 2009

बनारस का 'बुढ़वा मंगल' मेला


उत्सवप्रिय बनारस का प्रसिद्द 'बुढ़वा मंगल' मेला हाल ही में संपन्न हुआ. होली के अगले मंगल को आयोजित होने वाला यह आयोजन बनारसी मस्ती और जिन्दादिली की एक नायाब मिसाल है. मान्यता है कि होली जिसमें मुख्यतः युवाओं का ही प्रभुत्व रहता है, को बुजुर्गों द्वारा अब भी अपने जोश और उत्साह से परिचित कराने का प्रयास है- 'बुढ़वा मंगल' मेला.
बनारस के इस पारम्पिक लोक मेले से हिंदी साहित्य शिरोमणि भारतेंदु हरिश्चंद्र का भी जुडाव रहा है. बनारस राजपरिवार ने भी इस परंपरा को अपना समर्थन दिया. इस मेले के आयोजन को कई उतार-चढाव से भी गुजरना पड़ा. किन्तु आम लोगों की सहभागिता और दबाव ने प्रशासन को भी इस समारोह के आयोजन से तत्परता से जुड़ने को बाध्य किया. पिछले कई वर्षों से प्रशासन के सहयोग से गंगा तट पर इस आयोजन को कराया जा रहा है. गंगा की लहरों पर एक बड़े बजडे (नौका) पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, सर पर बनारसी टोपी सजाए बैठे संस्कृतिप्रेमी और आस-पास छोटी-बड़ी नौकाओं तथा घाटों पर बैठे सुधि दर्शकगण इस सांस्कृतिक नगरी की पारम्परिकता को एक नया आयाम देते हैं. राजपरिवार द्वारा रामनगर दुर्ग में भी इस कार्यक्रम का विधिवत आयोजन किया जाता है.

Saturday, March 14, 2009

पीड़ा: एक पत्रकार होने की

पढाई पूरी करने के बाद मैं भी किसी अच्छी सरकारी नौकरी में जा सकता था। किन्तु मैं पत्रकारिता में आया, क्योंकि मैं आम जनता से सीधा संवाद करना चाहता था. सुना था लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है पत्रकारिता, तो इस स्तम्भ को और मजबूती देना चाहता था मैं.
इसीलिए पुरे उत्साह के साथ इलेक्ट्रोनिक मीडिया में गया। सोचा था मेरे न्यूज़ की एक-एक बाईट से समाज की सच्चाई झलकेगी और समाज को बदलने में मैं भी सहभागी बन सकूँगा. मगर यहाँ आकर पता चला कि जिस बाजारवाद के विकल्प की तलाश की आशा में मैंने इस और रुख किया था, वो तो पूरी तरह इसे अपने शिकंजे में ले चुका है. साबुन और शैम्पू की तरह न्यूज़ की भी मार्केटिंग हो रही है और इसे ऐसे सजा-धजा कर बेचा जा रहा है जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना ही नहीं.
भूत-प्रेतों के इंटरव्यू लेने से बेहतर मैंने प्रिंट मीडिया की राह चुनी। बड़े मीडिया घरानों की राजनीतिक प्रतिबद्धता में तटस्थ पत्रकारिता की उम्मीद कम ही दिख रही थी, इसलिए मैने हिंदी के ह्रदय प्रदेश के इस छोटे से शहर से कलम की अपनी लडाई जारी रखी.
छोटे शहरों में बाजार तो ज्यादा हावी होता नहीं साथ ही आम लोगों से संवाद भी आसानी से कायम हो जाता है। इसी क्रम में मैं भूल गया कि मैं एक पत्रकार हूँ समाज-सुधारक नहीं. स्थानीय फैक्ट्रियों में दुर्दशा और शोषण के शिकार बाल-मजदूरों को जब मेरी रिपोर्टिंग ने बाल-सुधार गृह पहुंचा दिया तो एक बार को लगा कि मेरा पत्रकारिता में आना सार्थक हो गया. किन्तु जब से पता चला है कि बड़े ही सौहाद्रपूर्ण माहौल में वो बच्चे वापस अपनी कर्मस्थली पहुँच गए हैं, मैं खुद से ही निगाहें नहीं मिला पा रहा.
बात यहीं तक रहती तो भी ठीक थी, कि मैने अपनी ओर से प्रयास तो किया। मगर मैं इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पा रहा कि मुख्यालय में मेरे द्वारा भेजी ख़बरों की चीड़-फाड़ ऐसा व्यक्ति करे जिसे स्थानीय मुद्दों, सरोकारों और जज्बातों का जरा भी भान नहीं.
हममें से जो हवा के रुख के साथ स्वयं को बदलने में सक्षम हैं वो तो ऐसी परिस्थितियों के अनुकूल खुद से समझौता कर ले रहे हैं, मगर मेरे जैसे लोग जिनके लिए पत्रकारिता एक पेशा नहीं आदर्श और जीने का ढंग है वो क्या करें! नया विकल्प तलाशें! ब्लॉग को आजमा कर देखें! हमें तो अभिव्यक्ति और आत्मसंतुष्टि का माध्यम मिल जायेगा, मगर पत्रकारिता जो हमारे लोकतंत्र की जिवंत धरोहर है को इससे जो क्षति पहुँच रही है और पहुँचेगी उसके लिए क्या किसी ने कुछ सोचा है ?
(अपने तथा कुछ पत्रकार मित्रों के अनुभवों पर आधारित)

Tuesday, March 10, 2009

फागुन आयो रे...

वसंत - पंचमी से ही शुरू हो चुकी फाग की उमंग अब चरमोत्कर्ष पर है. गैर आयातित और हमारे मौलिक त्योहारों में होली भी एक है. आदिम कृषक समाज जब फसल की कटाई संपन्न कर चैन की साँस ले रहा होता था और प्रकृति भी नए रंगों में सज-धज कर नया रूप धारण कर रही होती थी तो अपने उत्साह के प्रकटीकरण के लिए रंगों के इस त्यौहार का स्वस्फूर्त सृजन और रंग-गुलाल के साथ नव वर्ष का स्वागत स्वाभाविक ही था।
वसंत - पंचमी से 'होलिका-दहन' की तैयारी भी शुरू हो जाती है, जो दरिद्रता, बुराई और अधर्म के नाश का प्रतीक है; जिसकी सदबुद्धि 'माँ शारदा' ही तो दे सकती हैं।
थोड़े बदले स्वरुप में कमोबेश हर महाद्वीप और प्रत्येक देश में होली सर्दृश्य त्यौहार की उपस्थिति के बीज हमारे विस्मृत हो चुके अतीत में छुपे हो सकते है. ऐसे में इस त्यौहार की मौलिक भावनाओं को विरूपित होने से बचाने के संकल्प के साथ आइये Let's Play Holi.आप सभी को होली की रंग, उमंग और भंग भरी ढेरों शुभकामनाएं.....

Monday, March 9, 2009

क्या वो कॉमेट 'लुलिन' था?

कल मैं भी एक कॉमेट की तरह ही नवाबों के शहर लखनऊ से गुजरा। प्लान में तो 'तस्लीम' के रजनीश जी से मिलना भी था, जो पूरा न हो सका। मगर सुबह-सुबह एक अद्भुत खगोलीय नज़ारे ने मेरा स्वागत किया। सूर्योदय की लालिमा की शुरुआत के साथ ही (लगभग 6:15 पर) आकाश में मैंने एक 'कॉमेट' को गुजरते देखा। वो तो अपने अजीजों के नींद के ख्याल ने मुझे रोक लिया, वर्ना exitement में मैं उसी समय उन्हें भी इस अवलोकन में शामिल करने वाला था। आस-पास के लोगों का ध्यान मैंने इस और खिंचा मगर आलमबाग में बसों के इंतजार में खड़े लोग इस दिशा में विशेष उत्सुक नहीं थे। तकरीबन 15 मिनट तक मैं इस पिंड की गतिशीलता को देखता रहा। अपने मोबाइल कैमरे से मैंने तस्वीर तो ली मगर वह इतनी प्रभावशाली नहीं थी कि उसे ब्लॉग पर लगा पाता। अब तो हमारी वैज्ञानिक चेतना वाले ब्लौगर्स ही बता सकेंगे कि वो कॉमेट 'लुलिन' था या कोई और; और इसके भारत में दिखने की सम्भावना थी भी या नहीं!

Monday, March 2, 2009

दो ब्लौगर्स शहर में...

ब्लौगर मीट की यादों के साये से अभी पुरी तरह निकला भी नहीं था की आभासी जगत के प्रत्यक्ष साक्षात्कार का और अवसर सामने आ ही गया।
विज्ञान लेखन और हिंदी ब्लौगिंग के सशक्त प्रतिनिधि श्री अरविन्द मिश्र जी से पिछले वर्ष 'विज्ञान लेखन कार्यशाला' में मुलाकात हुई थी। हिंदी ब्लौगिंग और विज्ञान लेखन पर और भी कई जिज्ञासाओं की पूर्ति के लिए चाहते हुए भी बनारस में ही रहने के बावजूद उनसे दोबारा मुलाकात नहीं हो पा रही थी. अंततः इस रविवार को आभासी जगत से परे उनसे मिलना तय हो ही गया.
नियत समय पर उनके बताये स्थान पर मैं पहुँच गया, जहाँ से उनके सुपुत्र कौस्तुभ मुझे घर तक ले गए। अपने व्यक्तित्व के अनुरूप पूरी गर्मजोशी से उन्होंने मेरा स्वागत किया और कहीं-से-भी आभासी जगत की दीवार को हमारे बीच नहीं आने दिया.
विज्ञान लेखन और हिंदी ब्लौगिंग की दशा-दिशा सम्बन्धी विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई, जिसमें गंभीर और समर्पित प्रयास की आवश्यकता काफी शिद्दत से महसूस की गई।
भोजन में सारे परिवार की आत्मीयता की झलक तो थी ही, साथ ही था इस परिवार की अभिन्न, शरारती किन्तु आज्ञाकारी सदस्य 'डेजी' का साथ भी।
ब्लौगिंग के बेहतर भविष्य और इसमें अपने सकारात्मक योगदान की आशाओं के साथ हम एक-दुसरे से विदा हुए। मगर यह विदा आभासी ही है वास्तविक नहीं !
हाँ दो दिन व्यस्ततावश इन्टरनेट से दूर रहने के बाद आज एक surprise भी रखा देखा अरविन्द जी के ब्लॉग पर. अपनी चिट्ठाकार चर्चा में मुझे भी शामिल कर उन्होंने मुझपर एक जिम्मदारी डाल दी है. सेलिब्रिटी कांसेप्ट पर तो मैं कुछ नहीं कहूँगा, अलबत्ता इस मुलाकात के बाद उनकी अब मेरे प्रति क्या धारणा है इसकी उत्सुकता मुझे भी रहेगी !





















वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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