Saturday, August 27, 2011

तस्वीरों में रामलीला मैदान

रामलीला मैदान में प्रवेश के लिए लंबी लाइन 

'कल हमारा है...'

शूटिंग चालू आहे.....

"बोल जमूरे" : Mediya Madaris

समर्थन 

भजन-कीर्तन : "सबको सन्मति दे भगवान" 

चिकित्सा जांच करवाते अन्ना हजारे और संबोधित करतीं मेधा पाटेकर 

इनके भी तो हैं अन्ना !!!

देह व्यापार को विवश करने वाले एक शख्स के खिलाफ 
अपनी आवाज को किसी मंच तक पहुँचाने को इच्छुक महिलाएं 



24 अगस्त की रात अन्ना की भावुक अपील से प्रभावित 
एक बच्ची की कविता का वीडियो :
"स्कूल से सीधे चलकर आई, हाल जानने तेरा अन्ना"


Wednesday, August 24, 2011

फ़ाइनल डेस्टिनेशन 5, डेजा वू या सिक्स्थ सेन्स

मेरे साथ ऐसा पहले भी कभी हो चुका है !!!

जी हाँ हमारे आस-पास आपको कई ऐसे लोग मिले होंगे, जिन्हें आपने यह कहते सुना होगा कि जो घटना उनकी आँखों के सामने से गुजर रही है, उसे वो उसी रूप में पहले भी देख चुके हैं. क्या यह उनकी विशिष्ट योग्यता है, कोई सिक्स्थ सेन्स या यूँ ही कोई संजोग. कल यह सवाल पुनः मन में कौंधा जब  रात अपने कुछ मित्रों के साथ  अचानक ही बने कार्यक्रम के अंतर्गत 'फ़ाइनल डेस्टिनेशन 5' देख रहा था.


पहले आप को इस फिल्म की पृष्ठभूमि से अवगत करा दूँ. इस सीरीज की फिल्मों में किसी ग्रुप में से एक व्यक्ति को सहसा ही यह आभास हो जाता है कि उनके साथ कोई आकस्मिक दुर्घटना होने वाली है. इस पूर्वाभास के कारण तत्क्षण तो उनके प्राण बच जाते हैं, मगर फिल्म के अनुसार 'मौत अपने साथ छल पसंद नहीं करती, और वह अपना निर्धारित काम उसी क्रम से करके ही रहती है." इस फिल्म में भी नायक अपने साथियों को एक स्वप्न के आधार पर एक बस दुर्घटना से तो बचा लेता है, मगर अंततः जिस क्रम से उसने अपने साथियों को दुर्घटनाग्रस्त होते देखा था, उसी क्रम में ही उसके साथियों को मौत के इंतकाम का शिकार होने से रोक नहीं ही पाता.


यह तो खैर फिल्मकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी विषय है, मगर सवाल यह तो उठता ही है कि क्या वाकई अवचेतन में ऐसी किसी पूर्वानुमान की संभावना छुपी हुई है ???

दैनिक कार्यकलापों में कई बार कई ऐसे संकेत मिलते हैं जिन्हें किसी कारणवश हमारा चेतन मन अनदेखा करता रहता है. जैसे कोई ऐसी गंध, जिसकी खुशबू बचपन में माँ के द्वारा बनाई किसी सामग्री से मिलती हो. जाहिर तौर पर हम इसे अपनी तार्किकता से नकारते हुए अपने आप को व्यस्तता में डुबोए रखते हैं. मगर इस तरह के संकेत हमारे चेतन मन में स्थान न पाकर अवचेतन में संग्रहीत होते जाते हैं. और कभी न कभी सपने में गाँव के घर, बचपन की कोई घटना का रूप लेकर उभर आते हैं, हमें एक पशोपेश में छोड़कर.

इसी प्रकार जब हम किसी नई जगह पर जाते हैं तो अचानक ऐसा लगता है जैसे हम यहाँ पहले भी आ चुके हैं, या कोई घटना घटित होते देखने पर लगता है जैसे यह मेरे साथ पहले भी घट चुकी है. मनोविज्ञान की शब्दावली में ऐसे अनुभव 'डेजा वू' कहलाते हैं. फ्रेंच में इस शब्द का अर्थ है 'पूर्व में देखा हुआ'. इसकी कार्यविधि को समझने के लिए दिमाग की संरचना को समझना पड़ेगा. मगर संछिप्त में मैं इतना ही कह सकता हूँ कि मनुष्य का मष्तिष्क कई विभागों में बंटा होता है जिसमें दीर्घावधि की याददाश्त, अल्पावधि की याददाश्त या किसी खास घटना से जुडी तात्कालिक याददाश्त संचित होती है. जब इस स्मृति प्रणाली में कोई व्यवधान आता है तब उसे स्मृति भ्रम या दिशा भ्रम जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. 'डेजा वू' भी एक ऐसी ही स्मृति भ्रम की घटना का प्रभाव है जिसमें मस्तिष्क के दो हिस्से न्यूरो कार्टेक्स और हिप्पोकैम्पस परस्पर विपरीत अनुभूतियाँ उत्पन्न करते हैं और अंततः इस लोचे में बेचारा मष्तिष्क भ्रमित हो जाता है. 

इस परिघटना को विस्तार से समझने के लिए वरिष्ठ ब्लौगर श्री अरविन्द मिश्र जी की यह पोस्ट तथा मनोवैज्ञानिक विषयों की विशेषज्ञ लवली जी की यह पोस्ट भी देख सकते हैं. 

इस पोस्ट को लिखने का एक कारण यह भी है कि इस लोचे से प्रभावग्रस्त लोगों में मैं भी एक हूँ, और खुद भी ऐसे ही कई सवालों के जवाब ढूँढ रहा हूँ. :-)

Thursday, August 18, 2011

प्रकाश झा का 'आरक्षण' और एक विमर्श


प्रकाश झा की बहुप्रचारित, बहुप्रतीक्षित 'आरक्षण' अंतत प्रदर्शित हो ही गई. इस फिल्म ने कई प्रायोजित तो संभवतः कुछ स्वतः स्फूर्त विरोधों की भी भूमिका तैयार कर दी. यह 'आरक्षण' जैसे संवेदनशील विषय का भी प्रभाव है.

भारत को अन्य किसी भी 'तथाकथित राष्ट्रवादी विचारक' से कहीं बेहतर समझने वाले युवा सन्यासी विवेकानंद भी इस देश की परतंत्रता को सदियों से अपने समाज के एक अभिन्न अंग के प्रति असंवेदनशीलता का ही दुष्परिणाम मानते थे.

गांधीजी ने भी देश में इस वर्ग की महती भूमिका को स्वीकार करते हुए ही 'पृथक निर्वाचन' का विरोध किया था ताकि प्रमुख लक्ष्य स्वतंत्रता के लिए एकजुट संघर्ष कमजोर न पड़ जाये. इसे प्रतीकात्मक रूप से आमिर खान की 'लगान' में काफी खूबसूरती से दर्शाया गया है जिसमें अंग्रेजों के विरुद्ध 'भुवन' की 'राष्ट्रीय टीम' तब तक पूर्ण नहीं हो पाती जबतक की उसमें तमाम पूर्वाग्रहों और विरोध के बावजूद 'दलित' कचरा को शामिल नहीं कर लिया जाता.

निश्चित रूप से सदियों से इस देश के एक बड़े वर्ग को उसके वाजिब और स्वाभाविक अधिकारों से वंचित रखा गया. मगर यह किसी 'मनुवादी व्यवस्था' का परिणाम नहीं था. किसी भी सभ्य और विकसित समाज में कर्म का विभाजन अपरिहार्य है. यह तथ्य हमारे घरों से लेकर संवैधानिक/प्रशासनिक व्यवस्था में भी दृष्टिगोचर होता है. समस्या और विरोध तब उत्पन्न होते हैं जब व्यवस्था 'वंशानुगत' रूप लेती जाती है. और यह संभवतः मानव की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति ही है, जो आज भी विश्व के लगभग सभी भागों में दिख रही है. इसके अलावे प्राकैतिहसिक काल से ही विभिन्न नस्लों के 'माइग्रेशन', परस्पर संबंध, साहचर्य और संघर्ष आदि ने भी इस व्यवस्था को पल्लवित ही किया. मगर जाने-अनजाने किसी भी कारण से पूरे विश्व में ही एक बड़ी आबादी अपने स्वाभाविक अधिकारों से वंचित रह गई. इतिहास में चाहे जो हुआ हो, सभ्यता की ओर बढते मानवजाति के क़दमों का तकाजा यही था कि हम इस गलती को सुधारते और नई व्यवस्था विकसित करते. लगभग हर युग में विश्व के विभिन्न भागों में ऐसे विचारक और समाज सुधारक इस दिशा में आगे बढे. आधुनिक युग में भी गाँधी, अंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग, नेल्शन मंडेला आदि इसी सुदीर्घ परंपरा की एक कड़ी हैं.

लगभग सभी देशों में इस ऐतिहासिक भूल को क्रमिक रूप से सुधारने के प्रयास किये गए. बराक ओबामा का अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर पहुंचना इसी कड़ी का भाग है. हमारे यहाँ भी दलितों ने यह उपलब्धि काफी पहले पा ली थी, मगर इसे पूरी तरह से सामाजिक चेतना का प्रभाव नहीं माना जा सकता.  कहते हैं तुर्की में लोकतंत्र की स्थापना के साथ जब मुर्तजा कमाल पाशा ने अपने सहयोगियों से पूछा कि पिछड़े वर्गों को बराबरी पर लाने में हमें कितना समय लगेगा, उत्तर मिला दस साल. उनकी दृढनिश्चयी प्रतिक्रिया थी - "तो समझ लो, वो दस वर्ष आज से खत्म हो गए. " दुर्भाग्यवश  हमारे  भारतवर्ष  में  कोई  सार्थक  और  कठोर  निर्णय  लिए  बिना  आरक्षण  का  शौर्टकट  निकाल  लिया  गया. जो  उर्जा और संसाधन इस महत्वपूर्ण आबादी को समान सुविधा, शिक्षा, अवसर उपलब्ध करने में लगाये जाने थे वो 'आरक्षण' में सिमट कर रह गए. और भी दुर्भाग्यजनक दलित नेताओं का व्यवहार रहा जिसने इस कमजोर और त्रुटिपूर्ण व्यवस्था को स्वीकार भी कर लिया. स्वयं को बाबा अंबेडकर का अनुयायी बताने वाले नेतागण अंबेडकर की आरक्षण को एक निश्चित समय सीमा तक ही लागु किये जाने के सुझाव को भूल गए और अब यह इस देश में एक अनिश्चितकालीन या यूँ कहें कि स्थायी व्यवस्था बन कर रह गई है. जहाँ होड़ स्वयं को प्रतिस्पर्धी बना कर आगे बढ़ने की होनी चाहिए थी, वहीं नए-से-नए वर्ग की मांग स्वयं को आरक्षण के दायरे में लाने की है. जिस उद्देश्य से इस व्यवस्था को स्वीकार किया गया था, वह भी मूलतः अधूरी ही रह गई है. इस व्यवस्था ने समाज के एक वर्ग को आर्थिक सुदृढ़ता तो दी है मगर दलित और गैर दलित 'युवाओं' के मन में एक ऐसी खाई भी रच दी है जो लगातार चौड़ी ही होती जा रही है. यह खाई दलित जातियों में भी अन्य उपजातियों और 'महादलित' जैसी नई आविष्कृत श्रेणियों में भी दिख रही है. गैर दलितों की छोड़ें दलित जातियों में ही पिछले साठ वर्षों में कम-से-कम दो पीढ़ियों ने आरक्षण का लाभ तो उठा ही लिया है. तो वो खुद आगे आकर क्यों नहीं कहतीं कि उन्हें अब इसकी जरुरत नहीं, और अब यह अवसर उनके किसी अन्य दलित भाई को मिले. उनका बर्ताव अब तक वंचित रहे उनके भाइयों के साथ क्या वैसा ही नहीं जैसा कि आरोप वे 'तथाकथित सवर्णों' पर लगाते रहे हैं !!!


और क्या सवर्ण होना ही संपन्न होने की भी गारंटी है कि वो महँगी शिक्षा और प्रतियोगिता परीक्षाओं के दबाव को झेलता ट्रेन में खड़ा-खड़ा एग्जाम देने जाये और उसकी बगल में बैठा एक दलित प्रशासनिक अधिकारी का पुत्र मुफ्त के पास और फ्री में मिल गए एडमिट कार्ड पर मूंगफली खाता लेटा रहे !!! और इस आश्वस्ति के साथ कि उसका तो 40% में चयन तो हो ही जाना है, और गैरदलित का तो कोई कट ऑफ ही नहीं है. क्या यह व्यवस्था एक समान समाज बना रही है ? मेरे एक मित्र ने कहा कि 40/50 % लाना भी कम नहीं है उनके लिए. मैं पूछता हूँ कि क्या वो ईश्वर पर भी संदेह कर रहा है ? क्या ईश्वर ने भी दलित और सवर्ण के लिए अलग से दिमाग की बनावट की है? समान परिवेश में दोनों ही एक समान विकसित हो सकते हैं तो हम इंसानों का अपनी जिम्मेवारी से पलायन क्यों ??? और क्या दलित कर्मचारी द्वारा निपटाई गई 5 फाइलें भी गैर दलित की 12 फाइलों के बराबर है ! तो भला अब सेवाकार्य के दौरान भी आरक्षण का क्या औचित्य है !!!

मैं तो यही आशा करता हूँ कि इस वर्ग के युवा भी कभी जागेंगे और स्वयं आगे बढ़कर एक समान शिक्षा नीति,  समान शैक्षणिक सुविधाओं की मांग करेंगे. सरकार प्राथमिक से लेकर वि.वि. तक मुफ्त शिक्षा दे, सारी आवश्यक सुविधायें दे और फिर बराबर की लाईन पर खड़ा कर रेस शुरू करे. ऐसा नहीं कि एक को बैसाखी और दूसरे को घुटने के बल दौड़ा दे. ऐसा करना सिर्फ़ इस देश के भविष्य के प्रति अपनी लापरवाही ही होगी. इस भारत के अंदर दो नहीं अनगिनत भारत बन जायेंगे और ध्यान रखें कि हमारे पडोसी देश ही इन भारतों की गिनती करने हेतु पहले से ही काफी इच्छुक और सक्रिय हैं. 

प्रकाश झा साहब ने अपनी फिल्म में यह गाना तो बिल्कुल सही चुना मगर व्यवसायिक दबाव में इसके फिल्मांकन में दीपिका के ठुमकों का मोह नहीं छोड़ पाए वर्ना कोई और 'मौका' इस गाने का और भी बेहतर प्रभाव छोड़ता. आप भी देखें ही नहीं सुनें भी. एड नहीं हो पाया इसलिए सखेद सिर्फ़ सुझाव ही दे पा रहा हूँ. 


Monday, August 15, 2011

एक आम भारतीय का पत्र अन्ना के नाम

A Common Indian to Anna Hazare 


आदरणीय अन्ना जी,
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं,

मैं आपके कार्यों का प्रशंसक हूँ, और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आपके संघर्ष का समर्थन करता हूँ. देश के करोड़ों आम आदमी की तरह मैं भी इस देश में एक ऐसी व्यवस्था चाहता हूँ जो इस देश को अब असह्य हो चुके भ्रष्टाचार से राहत दिला सके. 

इस दिशा में व्यक्तिगत रूप से आपके अब तक के प्रयास काफी सटीक रहे हैं. सरकार चाहे-अनचाहे आपकी मांगों के दबाव में ही सही मगर एक लोकपाल के लिए सहमत हुई है. मगर सामूहिक प्रयास सामूहिक जिम्मेदारी भी मांगते हैं. आप शुरू से ही अपनी टीम के सदस्यों में से कुछ के प्रति अपनी जानकारी की संपूर्णता से विभीन्न परिस्थितिवश इंकार करने को विवश हो चुके हैं. अब जब आपके साथ लाखों की भीड़ होगी क्या आप उसके व्यवहार या प्रतिक्रिया का आकलन कर सकते हैं. भीड़ का मनोविज्ञान अलग होता है. अनियंत्रित, गैरअनुशासित, अप्रशिक्षित भीड़ ज्यादा समय सब्र नहीं रख सकती. इसका अनुभव गांधीजी को भी चौरीचौरा में हो चुका था. और इसके बाद वो भी 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' या प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के साथ आंदोलन का समर्थन करने लगे थे. उन्मादी भीड़ सिर्फ़ ध्वंश करती है सृजन नहीं और इसका एक और ज्वलंत उदहारण 'बाबरी मस्जिद कांड' तो है ही. 'क्रिया-प्रतिक्रिया' के दंगे भी भीड़ की इसी वहशी ताकत को ही दर्शाते हैं. आप सिर्फ़ ऐसे संभावित हादसों को शरारती तत्वों की साजिश बता कर निर्लिप्त नहीं रह सकते. 

गांधीजी के दो आन्दोलनों के बीच योजना और कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त समय रहता था. गांधीजी की राह पर चलने का दावा करने वाले आपने क्या अपने आंदोलन का 'मीडिया मैनेजमेंट' के अलावे  'पब्लिक मैनेजमेंट' पर भी ध्यान दिया है !

एक उत्सुकता और भी है. गांधीजी अपने आंदोलन कैलेण्डर या पंचांग देखकर नहीं करते थे, ताकि अंग्रेजों की 60 वर्ष पहले की किसी कारस्तानी से तिथी का मिलान कर इतिहास को दोहराने का चमत्कारिक संजोग दिखलाने की नौबत आये. आपतो जानते ही हैं कि दोहराया हुआ इतिहास मात्र एक प्रहसन होता है. तो निवेदन है कि आपके मूवमेंट का थिंकटैंक भी आपातकाल, अगस्त क्रांति ..... जैसी ऐतिहासिक तिथियों का प्रहसन न बनाकर किसी  मौलिक और प्रभावशाली स्क्रिप्ट पर अमल करे. अपनी स्वतंत्र इमेज और यादगार डेट विकसित करें, उधार न लें. 

गांधीजी को आप मुझसे ज्यादा जानते और समझते हैं. अतः उनकी 'साध्य' और 'साधन' की शुचिता की भावना को अपने आंदोलन में भी शामिल करते हुए कोई सार्थक उपलब्धि हासिल कर पाएं और अपने आंदोलन को 'हाइजैक' न होने देते हुए इसे संपूर्ण क्रांति का हश्र न पाने देने में सफल हों यह इस देश की भी आकांक्षा है. 

यह देश अब जेपी के बेनकाब हो चुके 'अनुयायियों' की दूसरी पीढ़ी को पल्लवित होते देखने और झेलने को अभिशप्त नहीं होना चाहिये.

यूँ तो आप स्वयं ही सब समझते हैं.

धन्यवाद.

भवदीय

एक अन्य आम भारतीय. 

Monday, August 8, 2011

भ्रष्टाचार, भरोसा और भूल के त्रिकोण में खो गई रूचि भुट्टन



रूचि भुट्टन की याद है आपको. एक महीना भी नहीं हुआ है इस हादसे को, और अखबारों के पन्नों से उतरती यह खबर हमारी यादों से भी उतर सी गई थी. महिला अपराधों की अनगिनत घटनाओं की तरह इसे भी नजरअंदाज कर दिया जाता और शायद एक हाई प्रोफाइल हस्ती के इन्वोल्वमेंट की वजह से इसे रफा-दफा करने की साजिश की भी जा रही हो, मगर शायद पूरी तरह से ऐसा हो पायेगा नहीं. 



रूचि का जीवन भी एक प्रेम त्रिकोण में उलझ कर रह गया. उसका शेयर व्यवसायी सुमित भुट्टन से प्रेम सह अरेंज विवाह हुआ था, और उनका आर्यन नाम का पुत्र भी था. 5 जुलाई की रात रूचि भुट्टन की आत्महत्या की खबर उसके पति द्वारा उसकी बहन प्रीति को दी गई. रूचि की माँ श्रीमती सुधा गुप्ता ने पुलिस में उसकी हत्या की आशंका की रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस की जांच अभी हत्या और आत्महत्या के इर्द-गिर्द ही घूम रही थी कि रूचि की डायरी ने कई नए राज खोल डाले. डायरी के अनुसार सुमित के एक प्रसिद्द Tollywood अभिनेत्री व मॉडल मीरा चोपड़ा के साथ विवाह पूर्व से ही प्रेम संबंध थे. केस को दबाने में साख के इस्तेमाल के संकेत तब मिलने लगते हैं जब यह तथ्य सामने आता है कि मीरा चोपड़ा अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की Cousin हैं, वैसे समाचारों में इन दोनों के परिवारों के मध्य मनमुटाव की भी खबरें आती रही हैं. रूचि के परिवार ने सुमित और मीरा दोनों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया है. सुमित तो इस मामले में जेल जा चुका है, मगर पुलिस मीरा को गिरफ्तार करने में अब तक नाकाम ही रही है. 

मगर जैसा कि मैंने उपर कहा अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता अब हमारे समाज में काफी व्यापक हो चुकी है. रूचि की बहनें शेफाली, प्रीती, परिवार और कई मित्र  रूचि को न्याय दिलाने के लिए सड़क पर उतर आये हैं. कल शाम उन्होंने जंतर - मंतर से इण्डिया गेट तक कैंडल मार्च निकलने का कार्यक्रम तय किया था. पुलिस के प्रति उनकी एक शिकायत भ्रष्टाचार की भी है, और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके इस संघर्ष को 'इण्डिया अगेंस्ट करप्शन' का भी सहयोग मिल रहा है. कल चाहे अरविन्द केजरीवाल के साथ जंतर-मंतर मार्च को पुलिस द्वारा रोक दिए जाने का असर रूचि के प्रति चल रहे मूवमेंट पर भी पड़ा; मगर मुझे यकीन है कि इनका संघर्ष भी अपने तार्किक अंजाम तक पहुंचेगा. 

अपराध और क़ानूनी पहलू के अलावे इस प्रकरण का एक सामाजिक पहलु भी है. हमारे समाज में स्त्री अपराध इतने सहज क्यों हैं. सच कहूँ तो शेफाली की आँखों में छलकते आंसू और भरी-सी आवाज ने मुझे भी भावुक और निःशब्द कर दिया है. शर्मिंदा होने के लिए इस देश में किसी एक राज्य या गाँव पर ही फोकस करने की जरुरत नहीं है. अपने परिवेश में ही कई ऐसी परिस्थितियां हैं जहाँ अपनी बेबसी स्वयं को शर्मिंदा करने के लिए काफी है. 


इस अनुभव ने मुझे काफी अशांत कर दिया है और इस अशांति में मैं रूचि की आत्मा की शांति की प्रार्थना  कर भी कैसे सकता था ! इसीलिए मैंने वहाँ अपना एक सन्देश भी छोड़ा है कि -

 " I don't want to her rest in Peace, till she got Justice ....."

video


इससे संबद्ध यह वीडियो यहाँ भी देख सकते हैं. 

Wednesday, August 3, 2011

देल्ही बेली की कॉपी - पेस्ट नहीं है युवा पीढ़ी

माटी की खुशबु से थिरकता है इसका भी मन




 देल्ही बेली और ऐसी ही कई आईं और अब तो शर्तिया आनेवाली बेसिर-पैर की फिल्में जिनके द्वारा स्वयं को युवा वर्ग की प्रतिनिधि फिल्मों के रूप में प्रचारित करने की आक्रामक कवायद ने कई लोगों को वर्तमान युवा पीढ़ी के प्रति भ्रमित सा कर दिया था. मैं बार-बार कहता आ रहा हूँ कि यह पीढ़ी (न सिर्फ इस उपमहाद्वीप की, बल्कि वैश्विक भी) तमाम रुढिवादी पूर्वाग्रहों से मुक्त हो नवीन परिवर्तन और सृजन करने को उत्सुक है, यह कोई नई बात भी नहीं है, यह इस वर्ग का शाश्वत स्वभाव भी है; जो अक्सर परिवेश के प्रभाव में अपनी दिशा से भटक जाता है. 

इसे 'माटी' की खुशबु और 'शीट' का फर्क बखूबी पाता है; मगर कोई गुलाब उगाने की मेहनत तो करे. यह तथ्य एक बार फिर स्थापित हुआ नई दिल्ली  के 'इन्डियन हैबिटेट सेंटर' में जहाँ 'तीज उत्सव' पर 'सावन के गीत' कार्यक्रम में डॉ. संगीता गौड़ जी द्वारा लोकगीतों की प्रभावशाली प्रस्तुति की गई. 

यह इस देश की विचित्र विडंबना है कि जब आपका कोई व्यक्तिगत कार्यक्रम हो तब ऑफिस में सारे 'अर्जेंट' काम उसी दिन आ पड़ते हैं. खैर अपनी जिम्मेवारियों को समेटता किसी तरह भागता मैं कार्यक्रम स्थल पर विलंब क्या कहिये समाप्त होने से पहले पहुँच ही गया. जारी गीत पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया हौल के बाहर से ही महफ़िल चरम पर पहुँच चुके होने का आभास दे चुकी थी. गीत की समाप्ति के बाद जब उद्घोषिका ने अंतिम गीत की घोषणा की तो एक झटका सा लगा. मगर तब तक श्रोताओं के उस मूड का अंदाजा लग चुका था कि जो अपनी मिट्टी से जुड चुके होने के बाद इतनी जल्दी अलग होने को सहर्ष तैयार नहीं थे. गीत "झूला झूले रे बिहारी बृंदावन में......" पर श्रोताओं विशेषकर युवाओं का उत्साह देखने लायक था.  उनके झूमते नृत्य में माइकल जैक्सन या शकीरा से उधार लिए आयातित स्टेप्स नहीं थे, बल्कि दिल की गहराईयों से उभरे मौलिक सहज भाव और प्रेरणा थी.  स्पष्ट है कि यह जेनरेशन अपनी मिट्टी से भी उतनी ही जुडी हुई है जितनी किसी रौक' या 'पॉप' से जुडी प्रतीत होती है, मगर जरुरत उन तक अपनी संस्कृति की झलक पहुँचाना सुनिश्चित करने की है. मगर जरा सोचिये कि युवा पीढ़ी को संस्कृति के गरिमामय मार्ग से पथभ्रष्ट होने पर दहाड़ें मार रोने वाले स्वयं भी अपनी संस्कृत को वाकई में कितना समझ पाते हैं, और इसी पाखंड के लिए वो युवा पीढ़ी द्वारा नकारे जाते हैं और इसी अंतराल को भरने में आक्रामक अपसंस्कृति अपनी जगह बना लेती है. 

अमेरिका में पाकिस्तान का राग अलापवाने के लिए जिस प्रकार फई दोषी हैं उसी प्रकार भारत की युवा पीढ़ी को उसकी वाजिब विरासत से काट कर पाश्चात्य कूड़े की ओर धकेलने वाले भारतीयों (!) को भी राष्ट्द्रोही की ही श्रेणी में रखना चाहिए.

खैर 'राजनीति', 'राष्ट्रवाद' और 'राष्ट्रप्रेम' जैसे भारी-भरकम शब्दों पर बात करने के लिए बड़ी फ़ौज खड़ी है, मैं वापस आता हूँ अपनी विरासत पर.

अपने प्रशंसकों के अत्यधिक आग्रह को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हुए संगीता जी ने एक और रचना सुनाई और अंततः बारिश की बूंदों से उठी अपनी मिट्टी की खुशबु को मन में बसाये श्रोतागणों से कलाकारों ने विदा ली.

इतना जरुर कहूँगा कि इस अनुभव ने मंत्रमुग्ध ही नहीं भावुक भी कर दिया. 

कार्यक्रम में संगीता जी का साथ दिया था - बांसुरी पर श्री ऋषभ प्रसन्ना ने, गिटार पर श्री सैंडी, Pad पर श्री सोनू, तबला पर श्री अनिल मिश्र और कीबोर्ड पर श्री मोनू ने.

यहाँ बताता चलूँ कि श्रीमती संगीता गौड़ जी प्रख्यात रंगमंच
 निर्देशक श्री अरविन्द गौड़ जी 
की पत्नी हैं और इनके कई नाटकों में संगीत भी दे चुकी हैं. यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे आज संगीता जी से भी मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ. यह अद्वितीय रचनात्मक जोड़ी यूँ ही नित्य-नवीन सार्थक सृजन करती रहे; यही अपेक्षा है. आमीन. 


संगीता जी की जादुई आवाज और अपनी मिट्टी की खुशबु में अलमस्त युवाओं को  यहाँ यू-ट्यूब पर भी देख सकते हैं.

या फिर ब्लॉग के इस पेज के अंत में (सारी पोस्ट्स के बाद भी यह वीडियो है जिसे सेटिंग में एड किया है.)
(मोबाइल से लिए वीडियो को अपलोड नहीं कर पाया, यू-ट्यूब का कोड भी ब्लौगर में वीडियो नहीं सर्च और अटैच कर पाया, इसलिए यह नई खोज की गई. क्या कोई तकनिकी सलाह दे सकता है !) 

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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