गाँधी और अंबेडकर दो ऐसी शख्शियतें रही हैं, जिन्होंने विचारधारा के स्तर पर मानवता को काफी प्रभावित किया है, जिनके विचारों को धरातल पर उतारने में आज भी काफी हद तक सफलता तो नहीं ही मिल पाई है, अपने मानस पटल पर भी इन्हें पूर्णतः स्वीकृति दे पाने में हम समर्थ सिद्ध नहीं हो सके हैं. तत्कालीन परिस्थितियों में देश की राजनीतिक आजादी को दोनों द्वारा प्राथमिकता दिए जाने के बाद भी सामाजिक मुद्दों पर इन दोनों शख्सियतों ने अपनी परस्पर विरोधी विचारधाराओं को भी आपसी संवाद द्वारा एक रचनात्मक दिशा देने का प्रयास जारी रख एक अनूठा और आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया था (जो आज दुर्लभ है).
स्वतंत्रता प्राप्ति जैसे महत्वपूर्ण विषय की पृष्ठभूमि में सामाजिक परिवर्तन के इस अद्भुत विचारधारात्मक संघर्ष के संबंध में आम जनता या तो अनभिज्ञ ही है अथवा उसे काफी सतही जानकारी है. या फिर इसे लेकर अंबेडकर और गाँधी दोनों की ही परस्पर एक वर्ग विशेष में नकारात्मक छवि ही बना दी गई है अथवा दोनों ही व्यक्तियों को ‘मसीहा’ और ‘महात्मा’ की श्रेणी में बाँट कर इनके विचारों पर पुनर्संवाद की संभावना ही खत्म कर दी गई है. इतिहास के इसी अध्याय पर एक बार और पुनर्विचार का प्रयास था – अस्मिता थिएटर द्वारा 10/07/2011 को दिल्ली के श्री राम केन्द्र में मंचित नाटक – ‘ अंबेडकर और गाँधी ’.
श्री राजेश कुमार द्वारा लिखित और श्री अरविन्द गौड़ द्वारा निर्देशित यह नाटक एक सफल प्रयास था इन दो समकालीन विभुतिओं की विचारधाराओं के संघर्ष को वर्तमान पीढ़ी के सामने पुनर्प्रस्तुति का, जिसकी सफलता मंचन के बाद दर्शकों से संवाद के क्रम में स्पष्ट भी हो गई. कल्पना और इतिहास के सम्मिलन को दर्शकों तक प्रभावशाली ढंग से पहुँचाने में नाटक के संगीत पक्ष का भी उल्लेखनीय योगदान रहा है जिसकी कमान संभाली है श्रीमती संगीता गौड़ ने.
दलितोद्धार के लिए दोनों ही व्यक्तिओं की गंभीर चिंताएं थीं, और उन्होंने इस दिशा में काफी प्रयास भी किये थे. अंबेडकर जहाँ दलितों के प्रति हिन्दुत्ववादी विचारधारा के भुक्तभोगी थे, तो गाँधी को मात्र इसके एक संवेदनशील प्रत्यक्षदर्शी के रूप में ही नहीं देखा जा सकता. अश्पृश्यता के एक और घृणित रूप का व्यक्तिगत साक्षात्कार उन्होंने द. अफ्रीका में भी किया था, और इसके विरुद्ध उन्होंने एक विशाल सामाजिक आंदोलन खड़ा कर कम-से-कम आत्मसम्मान की स्थापना तो करवा ही दी थी. मगर भारत में अंतर्मन तक धंसी अश्पृश्यता को धार्मिक स्वीकृति भी मिली हुई थी, इसलिए यहाँ परिवर्तन के प्रयास थोड़े अलग स्तर पर करने थे और यह प्रक्रिया काफी श्रम के साथ समयसाध्य भी थी; जो स्वतंत्रता जैसे प्रथम लक्ष्य की प्राप्ति के साथ-साथ दूसरे मोर्चे पर भी अपेक्षित तीव्रता के साथ कर पाना संभव नहीं था. गांधीजी और अंबेडकर का दृष्टिकोण समान होते हुए भी उनकी कार्यशैली अलग थी. यही बात अंबेडकर के मन में गांधीजी के प्रति असंतोष उत्पन्न करती थी. इसके अलावे गांधीजी द्वारा अपने परिभाषित हिंदुत्व में वर्णाश्रम को सहमति भी अंबेडकर को कचोटती थी. मगर यहीं गांधीजी के व्यक्तित्व का वो पहलू सामने आ जाता है जो सत्य और स्वयं के साथ उनके प्रयोगों द्वारा उनकी विचारधारा में परिवर्तन का परिचायक है और इसे गांधीजी ने कभी नकारा भी नहीं.

वैचारिक असहमति के बावजूद इन दोनों के बीच संवाद सदा जारी रहा, जिसने गांधीजी की विचारधारा को काफी परिशोधित भी किया. दलितों की पीड़ा को और भी गहराई से समझने के लिए गांधीजी ने यहाँ तक कामना कर डाली थी कि यदि उनका अगला जन्म हो तो सिर्फ शुद्र ही नहीं बल्कि महाशुद्र के रूप में हो. वो यह भी जानते थे कि जब पाप सामूहिक होता है तो सजा उसे मिलती है जो उस समाज में सबसे निर्दोष होता है.
अंबेडकर ने गांधीजी को आगाह किया था कि जबतक वो हिंदुत्व और ब्राह्मणवादियों* के अनुकूल आचरण करते रहेंगे तबतक तो ठीक है मगर जब वो उनसे पृथक राह पर बढ़ चलेंगे उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. और दुर्भाग्य से उनकी चेतावनी सत्य सिद्ध हुई और बहुत से अन्य सामूहिक पापों की बलिवेदी पर एक ‘सर्वाधिक’ निर्दोष (फैशनेबल गाँधीविरोधी ध्यान दें – कि मैं ‘संपूर्ण निर्दोष’ शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा) महामानव एक बार पुनः भेंट चढ़ा दिया गया, और देश को एक नई रचनात्मक दिशा देने में सक्षम एक अत्यंत संभावनापूर्ण संवाद अधूरा ही रह गया.
नाटक में गांधीजी और अंबेडकर के विचारों के इस टकराव को दर्शाना इससे जुड़े लोगों के लिए काफी जटिल था, जिसे इन्होने काफी प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है, मगर इसे इस पोस्ट के माध्यम से अभिव्यक्त कर पाना स्वयं मेरे लिए काफी कठिन रहा. मुझे भी इन दोनों जटिल व्यक्तित्वों के इस पहलु की जानकारी इतने विस्तार से इस नाटक के माध्यम से ही मिली.
निःसंदेह उस दौर में अपने व्यक्तिगत योगदानों को लेकर कई हस्तियों के संबंध में हमारी जानकारी काफी कम है. अपने इतिहास की सुविधाजनक व्याख्या हमें आत्ममुग्धता में बनाये रखती है. आजादी के इतने वर्षों बाद भी ऐसे कई अनछुए विषयों पर नवीन दृष्टिकोण से पुनरावलोकन की आवश्यकता है. गांधीजी की हत्या के बाद संवाद अधूरा छूट जाने की अंबेडकर की पीड़ा का शमन तब तक नहीं होगा जबतक यह संवाद एक तार्किक अंत तक नहीं पहुँचता, और इसकी जिम्मेवारी वर्तमान पीढ़ी पर है. आज के इस सुविधाभोगी और उपभोक्तावादी दौर में थियेटर के माध्यम से लीक से हटकर किये गए ऐसे प्रयास हमें झिंझोड़ते हैं और अस्मिता थियेटर ने एक बार पुनः इस दिशा में अपनी भूमिका काफी प्रभावशाली ढंग से निभाई है. एक विचारोत्तेजक प्रस्तुति के लिय इस प्रयास से जुड़े दल को बधाई और शुभकामनाएं.
(* अंबेडकर के विचारों में भी ब्राह्मण अलग था और ब्राह्मणवाद विशेषकर उग्र/कट्टर ब्राह्मणवाद अलग, इसी प्रकार क्या आज पुनः हिंदुत्व और क्षद्म हिंदुत्ववादियों की पृथक पहचान और उनके इरादों के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता नहीं है ! )