Saturday, April 18, 2009

विश्व विरासत दिवस पर कुछ सवाल ?

पिछले दिनों गांधीजी के स्मृति चिह्नों को वापस लाने की बहस के बीच यह सवाल भी उठा था कि क्या वाकई हम भारतीय अपनी विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीर हैं! ऐतिहासिक इमारतों पर प्यार भरी छाप और औटोग्राफ, टैगोर के पदकों का चोरी हो जाना, आये दिन प्राचीन मूर्तियों की चोरी या तोड़-फोड़ तथा पर्यटन स्थलों की स्वछता में हमारा अप्रतिम योगदान (!) जैसी घटनाएं हमारे सभ्य होने पर भी प्रश्न चिह्न लगाती हैं.

ऐसी ही घटनाओं की कड़ी में अब हजारीबाग के पाषाण वृत्त (Stone Circle) भी आ गए हैं. जिस प्राकैतिहसिक धरोहर के साथ इस क्षेत्र को अन्तराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र में देखने की कल्पना की जा रही थी, उसकी दुर्दशा दिल को तोड़ देने वाली है. अन्वेषक श्री शुभाषिस दास के एकल प्रयासों से यह स्थल 'समदिवारात्रि' (Equinox) देखने के विश्व में एकमात्र प्राकैतिहसिक स्थल के रूप में विकसित हो रहा था. विरासत की सुरक्षा से जुड़े उच्चतम संस्थानों के अलावा प्रशासन भी इस स्थल की महत्ता से वाकिफ था, मगर इस स्थल की सुरक्षा को तमाम आग्रह के बावजूद नजरअंदाज किया गया. परिणाम ? आज यह स्मारक भी किसी की प्यार की निशानी के घाव अपने सीने पर झेलने को विवश है.

प्रशासन से भी कहीं ज्यादा ऐसे मामलों में स्थानीय जनता दोषी है जो अपनी विरासत के प्रति उपेक्षा का भाव रखती है. हो सकता है रोटी-रोजगार का दबाव इस विषय को हमारी प्राथमिकता सूची में नहीं आने देता, मगर खास ऐसे उद्देश्यों के लिए निर्मित सरकारी विभाग भला किस काम के हैं? 'विश्व विरासत दिवस' पर रूटीन जुमलों और औपचारिकताओं के अलावे अपने आस-पास बिखरी अमूल्य धरोहर को सहेजने की दिशा में सार्थक पहल ही हमें अपनी विरासत पर गर्व करने के अवसर उपलब्ध करा सकेगी.

15 comments:

Arvind Mishra said...

विश्व विरासत दिवस पर आपने हमें हमारे दायित्वों की याद दिलाई _आभार !

P.N. Subramanian said...

आपने सही लिखा है. जागरूकता का आभाव है. स्मारकों पर नाम गोदने की वैसे पुरानी परंपरा रही है. कुछ बहुत ही पुराने मंदिरों में दीवारों पर कुछ नाम खुदे मिलते हैं. जो तीर्थ यात्रियों के होते हैं. पिल्ग्रिम्स रिकॉर्ड. यह कहने का हमारा कतई उद्देश्य नहीं है कि हमारे धरोहरों के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार किया जावे.

Nirmla Kapila said...

ेआपने सही लिखा है आभार्

परमजीत बाली said...

जागरूकता का अभाव तो सदा से ही रह है।पता नही कब जागेगें ।आप ने अच्छी पोस्ट लिखी।आभार।

विनीता यशस्वी said...

aapne ek bahut gambhir mudde pe bahas shuru ki hai...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

'विश्व विरासत दिवस' पर मर्मस्पर्शी लेख के लिए आपका आभार।

hem pandey said...

अपनी इस विकृत मानसिकता पर केवल अफ़सोस ही जाहिर कर सकते हैं.

महामंत्री - तस्लीम said...

Ye upechha har jagah maujood hai.

Mumukshh Ki Rachanain said...

विश्व बिरासत दिवस पर आपका मर्मस्पर्शी लेख आजकी साक्षर हो रही जनता के वास्तविक अज्ञान को पुख्ता ही करता है, तभी तो वह अनावश्यक हरकते एक चंचल अबोध बालक की तरह कर बैठता है, कारन चाहे जो भी हो पर एक बात सत्य है कि ऐसे गंदी हरकतें साक्षरों का अज्ञान ही प्रतिबिंबित करती हैं.

सुन्दर विचार, सुन्दर प्रस्तुति, मेरा भारत महान, देश के निवासी ?????????????????????

चन्द्र मोहन गुप्त

mark rai said...

आपने सही लिखा है.....
जागरूकता का अभाव तो सदा से ही रह है।पता नही कब.......aawaaj uthegi aur ham ....
kuchh kar payege...

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

हमारे हालात ऐसे हैं की जब तक कुछ बर्बाद न हो जाये हम उस और ध्यान ही नही देते हैं

shama said...

Dharohar pe likha har lekh hame sochneke liye vivash karta hai...mai hamesha padhtee hun...lekin kya tippanee karun...kya ho ke maibhi kuchh kar sakun, is vicharke saath laut jaatee hun...
koshish kar rahee hun apne bunkaronke utthaanke liye...paryawaranke liye...lekin ye tamam koshishe bohot chhoti hain..

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

नमस्कार,
इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की।
आपसे अनुरोध है कि आप एक बार रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को देखे। यदि आपको ऐसा लगे कि इस ब्लाग में अपनी रचनायें प्रकाशित कर सहयोग प्रदान करना चाहिए तो आप अवश्य ही रचनायें प्रेषित करें। आपके ऐसा करने से हमें असीम प्रसन्नता होगी तथा जो कदम अकेले उठाया है उसे आप सब लोगों का सहयोग मिलने से बल मिलेगा साथ ही हमें भी प्रोत्साहन प्राप्त होगा। रचनायें आप shabdkar@gmail.com पर भेजिएगा।
सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार।
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
शब्दकार
रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

BrijmohanShrivastava said...

प्रिय बंधु -बहुत ही समयानुकूल बात कही है आपने और आपका सवाल भी प्रशासन से नहीं बल्कि आम जनमानस से है /नितांत सत्य है कि हमें अपनी विरासत पर गर्व करने के साथ उसकी हिफाजत के प्रति भी सजग रहें /किसी हद तक आपका कहना भी सही है कि रोजी रोटी का दबाव इस विषय को प्राथमिकता की सूची में नहीं आने देता होगा किन्तु जो संपन्न है वे भी तो उदासीन हैं / सरकारी विभाग ठीक है अपनी जगह कार्य कर रहे है ,वहां के कर्मचारी काम कर रहे है क्योंकि उन्हें इस बात की तनखा मिल रही है मगर हमें भी अपना कर्तव्य एक अवैतनिक कर्मचारी के रूप में निभाना चाहिए /धरोहर सहेजने की दिशा में आपका लेख सराहनीय है तथा आपके ब्लॉग के नाम को सार्थक कर रहा है /

Babli said...

आपने बिल्कुल सठिक फ़रमाया है! बहुत खूब!

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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