Wednesday, January 12, 2011

विवेकानंद के विचारों की कालजयिता


किसी ने कहा था " भारत को समझना हो तो विवेकानंद को पढ़ो. "

देश में भ्रष्टाचार को चरम पर पहुंचते, एक आदर्श के रूप में स्थापित छवियों को खंड - खंड टूटते देख अपनी व्यवस्था के प्रति वितृष्णा देश के बहुसंख्यक युवाओं के साथ मुझे भी कहीं- न कहीं छु सी जा रही है. ऐसे में युवा सन्यासी स्वामी विवेकानंद जैसे व्यक्तित्व का होना आश्चर्यजनक ही लगता है जिसने भारत के इतिहास के सर्वाधिक अंधकारपूर्ण दौर में से एक में भी अपनी हुंकार से पुरे विश्व को उद्वेलित कर दिया. उनका तो सारा जीवन ही एक सन्देश है जिसके बारे में चर्चा करना बिना किसी नयेपन के एक रस्मअदायगी ही होगी. मगर उनके कालजयी विचार पुष्प से कुछ के स्मरण इस घनघोर निराशाजनक माहौल में प्रेरणा का कार्य करेंगे.

स्वामी जी ने देशवासियों विशेषकर युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था - " राष्ट्ररूपी यह जहाज लाखों लोगों को जीवनरूपी समुद्र के पार करता आ रहा है. कई शताब्दियों से इसका यह कार्य चल रहा है, और इसकी सदाशयता से लाखों आत्माएं इस सागर के उस पार अमृतधाम में पहुंची हैं. पर आज शायद तुम्हारे ही दोषों से इसमें कुछ खराबी आ गई है. इसमें एक - दो छेद हो गए हैं; तो क्या तुम इसे कोसोगे ! संसार में जिसने तुम्हारा सबसे अधिक उपकार किया है, उसपर खड़े होकर गाली बरसाना क्या तुम्हे उचित है ? ..... यदि हमारे इस समाज में, राष्ट्रीय जीवनरूपी जहाज में छेद है, तो हम तो इसकी संतान हैं ; आओ चलें इस छेद को भर दें. ..... मैं तुम्हारे पास आया हूँ अपनी सारी योजनाएं तुम्हारे सामने रखने के लिए. मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए तैयार हूँ. और यदि तुम मुझे ठुकराकर अपने देश के बाहर भी निकाल दो तो भी मैं तुम्हारे पास वापस आकर यही कहूँगा कि - भाई हम सब डूब रहे हैं. मैं आज तुम्हारे पास बैठने आया हूँ. और यदि हमें डूबना है तो आओ हम सब साथ ही डूबें, पर सावधान एक भी कटु शब्द अपने होठों पर न आये. ..... "

शायद ऐसे ही विचार होते हैं जो किसी व्यक्ति को युगपुरुष की कोटि में ला खड़ा करते हैं. हम युवा, जिनके पास उत्तराधिकार में स्वामी विवेकानद के विचारों की ऐसी अप्रतिम विरासत है को निराश होने का तो कोई कारण होना ही नहीं चाहिए. आइये, वर्तमान कृत्रिम आदर्शों और छवियों के ध्वंस होने का शोक मनाने में समय नष्ट करने के बजाये देश निर्माण के परम लक्ष्य में अपने योगदान देने में दृढतापूर्वक तबतक लगे रहे - जबतक कि अपने लक्ष्य तक पहुँच न जायें.

6 comments:

विनीता यशस्वी said...

Very thoughtfull post...

राज भाटिय़ा said...

बिलकुल सही कहा जी सहमत हे आप से,

ओर अगर देश में भ्रष्टाचार को पढना हे तो बस इस काग्रेस को पढे

: केवल राम : said...

आपके विचार प्रेरणादायक हैं ...विवेकानंद जी के बारे में क्या कहें ...बस उनके आदर्शों पर चल पायें तो ..उनके विचारों की यही सार्थकता होगी ...बाकि जिस समस्या के बारे में आपने कहा है ..सही कहा है ..शुक्रिया आपका

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सचमुच, आज भी कितने प्रा‍संगिक हैं उनके विचार।

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कावेरी भूत और उसका परिवार।
सांपों को दुध पिलाना पुण्‍य का काम है?

shikha varshney said...

अच्छा लगा आपके विचार जानकार .और स्वामी जी से तो हम थोडा भी प्रेरणा ले पायें तो धन्य हो जाएँ.

Arvind Mishra said...

मेरी दृष्टि में विवेकानद का मानवता को सबसे बड़ा अवदान पोंगा पंथ के विरुद्ध उनका जेहाद था -उन्होंने ही कहा था की अधिकाँश ब्राह्मणों ने रसोई को मंदिर मन लिया है और बर्तनों को देवी देवता !
और क्या युवा क्या वृद्ध वे सबके आदर्श हैं !

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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