Saturday, September 10, 2011

सलमान: ' बॉडीगार्ड ' वाया 'मैंने प्यार किया ' और कुछ यादें



यूँ तो सलमान ने स्वयं को 'मास' के स्टार के रूप में स्थापित व स्वीकार भी कर लिया है. मगर फिर भी 90 के दशक में कैरियर की शुरुआत करने वाले सलमान में कुछ खास बातें ऐसी भी हैं जो उन्हें आम जनता में बिना किसी प्रयोगवादिता के भी लगातार लोकप्रिय और सफल बनाये हुए है.

अपने अन्य साथी कलाकारों की तरह सलमान किसी नामचीन बैनर के साथ बंधे नहीं रहे. उन्होंने विभिन्न किस्म की भूमिकाओं को निभाते हुए बिना किसी विशेष छवि में टाईप्ड हुए अपनी राह बनाई. रोमांटिक से कॉमेडी तक का सफर तय करते हुए अब बह रही हवा के विरुद्ध एक्शन की कमान संभाले दिखाई दे रहे हैं. कभी चौकलेटी और रोमांटिक स्टार के रूप में प्रचारित इस स्टार ने कॉमेडी और पीरियड भूमिकाएं निभाने लग गए कलाकारों को भी वापस एक्शन की ओर लौटा दिया है. 

जैसा कि सलमान खुद ही अपनी फिल्म में कहते हैं -"मुझ पर एक एहसान करना कि मुझपर कोई एहसान न करना" की तर्ज पर अब खुले रूप से अपने निर्माता - निर्देशकों की सफलता के भी सुनिश्चित बॉडीगार्ड  बन गए हैं. सलमान ने अपना एक मैनरिज्म या 'सलामनिज्म' विकसित कर लिया है, जो उनके द्वारा निभाए जा रहे चरित्रों पर भी हावी हो जाता है. अभिनय के कद्रदान चाहे इसे अनुचित समझें मगर उनके विशिष्ट दर्शक वर्ग को उनके अपने 'भाईजान' का यही रूप ही भाता है. 

इस सफर में उन्हें कम उतार-चढाव से गुजरना पड़ा ऐसा भी नहीं है. जिस इंडस्ट्री ने उन्हें इतना कुछ दिया, उसी ने उन्हें 'बैड बॉय' की छवि भी दी. फिर भी दर्शकों और प्रशंसकों का प्यार सलमान के लिए बरक़रार है तो उनकी स्वाभाविक और निश्चल मासूमियत की भी वजह से, जो उनसे छिनी नहीं जा सकी है. 

सलमान की पिछली चंद फिल्में किसी भी दृष्टिकोण से स्तरीय नहीं कही जा सकतीं, भले व्यवसाय उन्होंने काफी किया हो. स्वयं मैं भी दबंग, रेडी के बाद अब बॉडीगार्ड को भी इसी श्रेणी में रखता हूँ.

उलजलूल कहानी, विशिष्ट साऊथ इंडियन शैली के स्टंट्स (जिसका नया सम्मिश्रण शुरू किया है सलमान ने अपनी फिल्मों में), शोर गुल भरे गाने, अपरिहार्य इंट्रो और आइटम सौंग इन सभी फिल्मों में कॉमन पक्ष हैं. इसके अलावे इस फिल्म में डार्क शेड में डार्क कपड़ों का सम्मिश्रण तो और भी हैरतंगेज और प्रयोगधर्मी है ! (गीत - 'तेरी मेरी प्रेम कहानी...'). मगर एक और चीज जो कॉमन है वो है सलमान की आँखों और चेहरे में छुपी मासूमियत जिसमें आज भी पहले सी ही ताजगी है, और जो अब भी किसी विशेष दृश्य में उभर कर दर्शकों के दिलोदिमाग में बैठ जाती है. 


याद कीजिये 'सिर्फ़ तुम' में प्रिया गिल द्वारा शादी से नकार दिये जाने पर सलमान का कहना कि " ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है ! " या "कुछ-कुछ होता है" का क्लाइमेक्स. बॉडीगार्ड में भी जिस भरोसे के साथ कहना कि "...जरूर फोन करेगी, छाया मुझसे प्यार करती है" या बिना देखे प्यार करने का जवाब " पसंद तो दिल से करते हैं मैडम, प्यार तो दिल से किया जाता है न ! " और जब छाया से मिलने से पहले पूर्वाभ्यास करते हुए जब वो कहते हैं " छाया तुम मुझसे सच्चा प्यार करती हो न, मुझसे मजाक तो नहीं कर रही ना ! "  तब वो दर्शकों को अपनी कुछ त्रासद यादों की ओर भी मोड़ लेते हैं. 

मैं सलमान की दिमाग घर में छोड़ कर आने का आह्वान करने वाली छवि से सहमत नहीं और न ही कोई अंध समर्थक. मगर मैं सलमान को हमेशा याद करूँगा 'मैंने प्यार किया' के लिए. फिल्में देखना मेरा शौक है, मगर अकेले ताकि निर्देशक या कहानी के साथ तारतम्य / संवाद स्थापित कर सकूँ. यह उस दशक में आई फिल्म थी जो आज की युवा आबादी का प्रतिनिधित्व करती है. इसने पहली बार इस पीढ़ी को 'प्रेम' को समझने का दृष्टिकोण दिया था. कई मायनों में ट्रेंड सेटर थी यह फिल्म, जिसके बारे में फिर कभी. तब इसके गाने और डायलौग कैसेट्स काफी लोकप्रिय थे; मगर मैंने इस वादे के साथ इन्हें नहीं खरीदा कि इन्हें कभी अपनी सैलरी से ही खरीदूंगा, और यह वादा भी पूरा किया.  इस फिल्म में कुछ था जिसने मुझसे यह निश्चय करवा लिया कि "  मैं कभी भी-कहीं भी रहूँ, अगर वहाँ यह फिल्म लगी; तो मैं इसे जाकर देखूंगा . "   अब तक तो यह कमिटमेंट भी निभाया है; शायद इसलिए भी कि - 
"   एकबार कमिटमेंट कर ली, तो मैं अपने-आप की भी नहीं सुनता....."

[ * एक निवेदन:  इस पोस्ट को इस फिल्म का प्रचार या प्रशंसा  के रूप में न लें. फिल्म देखने के बाद मिलने वाले आनंद या अवसाद की जिम्मेवारी इस पोस्ट के लेखक की नहीं होगी. :-)]

चलते-चलते इस फिल्म का एक प्रोमो : 


Thursday, September 8, 2011

क्योंकि एक स्वप्न है नैनीताल .....


 


नैनीताल, एक स्वप्निल शहर. प्रकृति की अनमोल विरासत का एक जिवंत दस्तावेज. जाने कब से यहाँ आने के सपने संजो रहा था, मगर किसी न किसी कारण से कार्यक्रम टल ही जा रहा था. और अब जब जाना हुआ भी तो जैसे इम्तहान की घड़ियाँ खत्म होने का नाम ही न ले रही हों. मेरे सारे धैर्य की परीक्षा इसी भ्रमण में ले लेनी हो जैसे. सोमवार की छुट्टियों का उपयोग करने के उद्देश्य से कुछ बैचमेट्स के साथ नैनीताल जाने का कार्यक्रम बना. दोपहर तीन बजे से आरंभ हुआ सफर रात के एक बजे तक मात्र हाइवे तक पहुँच पाने में ही सिमटा रहा. महानगरों की ट्रैफिक व्यवस्था के दबाव की स्थिति में बिखरने का यह एक भयावह उदाहरण था.

                
                                                               सुबह से लेकर शाम तक, शाम से लेकर रात तक...  

खैर रात के नौ की बजाये सुबह के आठ बजे हम हल्द्वानी पहुंचे और थोड़े विश्राम के बाद नैनीताल के लिए रवाना हो गए. थोड़ी ही देर में हमलोग यहाँ की प्रसिद्ध नैनी झील पहुँच गए. पौराणिक मान्यता के अनुसार यह झील सती की बायीं आँख के गिरने से निर्मित हुई है. इसके पार्श्व में ही श्रद्धा व आस्था का केन्द्र माँ नैना देवी का मंदिर भी है. अपनी पसंदीदा लेखिका शिवानी की कई कहानियों में वर्णित यह स्थल, यहाँ के मंदिर और मन्नत के प्रतीक घंटियों तथा चुनरियों को प्रत्यक्ष देखना एक अविस्मरणीय अनुभव था.  

                                      

मुख्य नैनीताल इसी झील के आस-पास का ही भाग है. जहाँ माल रोड, तिब्बत मार्केट आदि स्थित हैं. मगर यही असली नैनीताल नहीं है. यह तो मात्र एक एड है टूरिस्ट्स के लिए. जो नैनीताल घूमने आते हैं, समझने आते हैं और अपनी यादों में संजोने आते हैं उनके लिए तो असली नैनीताल इस भीड़-भाड़ से परे है. यहाँ आये हों, तो यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता को निहारें, पुरानी इमारतों की विशिष्ट बनावट और साज-सज्जा पर गौर करें, ब्रिटिश और भारतीय पर्वतीय परंपराओं के संजोग से विकसित एक नई संरचना को महसूस करें. और निश्चित रूप से यह आप या तो अकेले कर सकते हैं या चंद ऐसे ही समानमना मित्रों के समूह के साथ.




मेरा दृढ रूप से मानना है कि इन पहाड़ी स्थलों का वास्तविक आनंद टूरिस्ट बनकर सिर्फ़ नौका विहार और मॉल में मार्केटिंग करने से ही नहीं उठाया जा सकता. पहाड़ों के साथ एक आत्मीयता विकसित कर ही हम इनका वास्तविक आनंद प्राप्त कर सकते हैं. पर्यटकों की भीड़-भाड़ और उसमें खो सी गई स्थानीय आबादी और उसकी विशिष्ट संस्कृति को देख मुझे वाकई महसूस हुआ कि पर्यटन के नाम पर हम इन राज्यों के स्वाभाविक स्वरुप को विकृत तो नहीं कर रहे. अच्छा हो हम इन्हें अपनी सुविधा से मोडिफाईड करने का मोह त्याग कर इन्हें इनके स्वाभाविक रूप में ही स्वीकार करें.

और अगर अगली बार कभी नैनीताल जायें तो इन स्थानों को देखने का भी प्रयास अवश्य करें – 

और चलते -चलते आपको छोड़े जाता हूँ एक खुबसूरत गीत के साथ जिसे नैनीताल में ही फिल्माया गया है - 
संजोग से आज आशा भोंसले जी का जन्मदिन भी है, शुभकामनाएं.


Monday, September 5, 2011

रंगमंच से शिक्षक दिवस पर - ' रामदास '

कक्षा में  शिक्षक सुनील सातोकर 
आज तो शायद शिक्षक दिवस पर ही आधारित पोस्ट लिखने का प्रयास होता, मगर संजोग से कल एक ऐसा नाटक भी देखने को मिला जो एक शिक्षक और छात्र  के संबंधों पर ही  आधारित था. शिक्षक दिवस के पावन अवसर  पर आदरणीय गुरुजनों को सादर स्मरण करता हुआ यह पोस्ट समर्पित करता हूँ.

सक्षम आर्ट्स ग्रुप द्वारा प्रख्यात साहित्यकार श्री लक्ष्मण राव जी के चर्चित उपन्यास 'रामदास' पर आधारित नाटक 'रामदास'  छात्र जीवन में आने वाली दुविधाओं और उनमें एक शिक्षक की भूमिका पर आधारित है. 

अपने शिक्षकीय दायित्व को निभाने के नए स्वप्न के साथ अध्यापक सुनील सातोकर महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव में आते हैं. उनके विद्यालय का एक छात्र रामदास अपने शिक्षकों और सहपाठियों की नजर में बिलकुल ही नाकारा और नालायक है. एक आदर्श शिक्षक की तरह ही सातोकर उसे एक चुनौती की तरह लेते हैं और उसे पुनः नियमित रूप से विद्यालय आने को प्रेरित करते हैं. उनके प्रयासों से रामदास में वांछित सुधार दृष्टिगत होते जाते हैं. रामदास में आते परिवर्तन को देख उसके सहपाठियों की भी धारणा उसके प्रति परिवर्तित होती जाती है. 
रंजना और रामदास को पढाते शिक्षक 
रामदास को सातोकर अलग से भी पढाने का समय देते हैं, जहाँ काफी आग्रह पर उसी की कक्षा की एक अन्य छात्रा रंजना को भी पढाने की स्वीकृति दे दी जाती है. साथ-साथ पढते, एक-दूसरे की मदद करते दोनों के ही बीच एक आकर्षण पनपने लगता है, जिसे ये दोनों ही प्रेम समझ लेते हैं. इनका अव्यक्त प्रेम सातोकर की अनुभवी नजरों से छुप नहीं पाता, और वे दोनों को ही सामाजिक – ग्रामीण परिप्रेक्ष्य में संभावित दुष्परिणामों के प्रति आगाह करते हैं. एक शिक्षक के रूप में वो अपने प्रभाव का यथासंभव इश्तेमाल करते हैं; मगर रामदास और अंजलि का निश्चल व मासूम प्रेम उनके तमाम तर्कों पर भारी पड़ता है. 
रंजना और रामदास को समझते सातोकर 
एक मोड़ पर रंजन के माता-पिता उसका विवाह कहीं और तय कर देते हैं. सातोकर अधूरी पढाई और  अपरिपक्वता का हवाला देकर उसके अभिभावकों को भी समझाना चाहते हैं, मगर ग्रामीण रूढियां उन्हें भी अपने निश्चय से डिगा नहीं पातीं. 
विदा होती रंजना 

रंजना के मुखर प्रतिरोध के बावजूद सामाजिक रीतियों और पारिवारिक प्रतिष्ठा की बलिवेदी पर इनके प्रेम की बलि चढ़ा दी जाती है. रंजन की शादी हो जाती है, और रामदास अब कुछ और ही गुमसुम और स्वयं में ही खोया रहने लगता है. सातोकर उसे भविष्य की ओर देखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए एक शिक्षक के रूप में अपने कर्तव्य का यथासंभव निर्वाह करते हैं; मगर एक दिन वो यह सुन कर अचंभित रह जाते हैं कि रामदास ने उसी वर्धा नदी में डूब कर अपने प्राण त्याग दिए हैं जो उसकी और रंजन की जाने कितनी वादों और इरादों की साक्षी थी. 
रामदास की मृत्यु पर शोकाकुल रंजना 

आकाश में लगा सूर्यग्रहण रंजना की जिंदगी को भी अपने घेरे में ले लेता है और उसके अंतर्मन से निकलती चीखों में सारा वातावरण निमग्न हो जाता है.

नाटक का पूर्वार्ध जहाँ एक शिक्षक के पक्ष को मजबूती से उजागर करता है, वही दूसरी ओर उत्तरार्ध एक मासूम प्रेम कहानी से दर्शकों को सहज ही जोड़ लेता है. रामदास के चरित्र की निश्चलता को जहाँ कलाकार आर्यन चौधरी ने बखूबी साकार किया है, वहीं एक ओर रंजना के  व्यक्तित्व की मुखरता और वहीं दूसरी ओर भावुक पक्ष को अत्यंत कुशलता से अभिव्यक्त कर अदाकारा विनीता नायक दर्शकों से प्रत्यक्ष तारतम्य बना लेने में सर्वाधिक सफल रही हैं. 

यहाँ मैं इस तथ्य को विशेष रूप से रेखांकित करना चाहूँगा कि रामदास की मृत्यु दर्शकों को व्यथित तो करती ही हैं, मगर उसके बाद परिदृश्य में रंजना के आगमन और उसके द्वारा अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति में स्वयं को पूर्णतः डुबो चुकी विनीता न तो खुद ही उस पात्र में से सहजता से बाहर आ पाईं न ही अपने दर्शकों को आने दिया. 

लेखक श्री लक्ष्मण राव के साथ निर्देशक सुनील रावत
मूल लेखक श्री लक्ष्मण राव की इस रचना को निर्देशक श्री सुनील रावत जी ने रंगमंच पर सार्थक अभिव्यक्ति दी है. 


Sunday, September 4, 2011

रंगमंच पर मंटो के नाटक



पिछले दिनों दिल्ली के प्यारे लाल भवन में 'सक्षम' थियेटर समूह द्वारा सआदत हसन मंटो के नाटकों की प्रस्तुति की गई. मंटो की कहानी हतक (Insult, अपमान) पर आधारित इस नाटक में समाज में देह व्यापर से जुडी महिलाओं और उनके प्रति तथाकथित सभ्य सोसाइटी की मानसिकता पर एक करारा प्रहार किया गया है.

सुगंधा जो कि एक वैश्या है के चरित्र के माध्यम से मंटो ने समाज में स्त्री के दोयम दर्जे को भी रेखांकित किया है. पुरुषवादी समाज एक स्त्री को एक उपभोग्य बस्तु बना देता है, जिसे सुगंधा स्वीकार भी कर चुकी है, फिर  भी उसके अंदर कहीं एक सच्चे प्यार की मृगतृष्णा शेष है. उसकी इसी कमजोरी का भी लाभ उठाने एक अन्य पुरुष माधो उसकी जिंदगी में आता है; जो एक म्युनिशिपैलीटी हवलदार है और खुद उसी के शब्दों में उसकी एक काफी प्यार करने वाली, उसका इंतज़ार करने वाली बीवी भी है. यह जानते हुए भी बिना कोई शिकायत किये सुगंधा उसमें अपने प्यार को तलाशती है. मगर उसका यह भ्रम भी तब टूट जाता है जब उसे उक्त प्रेमी (!) द्वारा छल द्वारा वो पैसे हड़पने का प्रयास करते हुए देखती है, जिसे उसने अपने शरीर को हर रात बेचकर जमा किये हैं. उसके यथास्थिति को स्वीकार करने का धैर्य तब बिलकुल ही टूट जाता है जब एक ग्राहक उसे अस्वीकार कर देता है. 

इन परिस्थितियों में उभरा सुगंधा का आक्रोश समाज में हाशिए पर डाल दी गई नारी के उस वर्ग की अभिव्यक्ति है, जिसके पास स्वयं चयन का कोई अधिकार नहीं. स्वीकार और अस्वीकार करना दोनों ही पर पुरुष का ही नियंत्रण है. और दोनों ही परिस्थितियों में दोष सदा स्त्री के इसी रूप का ही माना जाता रहा है और जाने कब तक इसे ही माना जाता रहेगा.



मंटो के संवेदनशील नाटकों को साकार रूप देना सहज नहीं, मगर निर्देशक श्री सुनील रावत ने इसकी बेहतर प्रस्तुति को सुनिश्चित करने में अपना यथोचित योगदान दिया है. नाटक में विभिन्न पात्रों यथा सुगंधा के रूप में अनामिका वशिष्ठ और माधो के रूप में प्रवीण यादव ने सराहनीय अभिनय किया है. या यूँ कहूँ कि सुगंधा के चरित्र को उजागर करने में अनामिका वशिष्ठ ने अविस्मरणीय योगदान दिया है, तो अतिशयोक्ति न होगी. नाटक एक संवेदनशील विषय पर संवाद आरंभ करने में सफल रहा है. 

Saturday, August 27, 2011

तस्वीरों में रामलीला मैदान

रामलीला मैदान में प्रवेश के लिए लंबी लाइन 

'कल हमारा है...'

शूटिंग चालू आहे.....

"बोल जमूरे" : Mediya Madaris

समर्थन 

भजन-कीर्तन : "सबको सन्मति दे भगवान" 

चिकित्सा जांच करवाते अन्ना हजारे और संबोधित करतीं मेधा पाटेकर 

इनके भी तो हैं अन्ना !!!

देह व्यापार को विवश करने वाले एक शख्स के खिलाफ 
अपनी आवाज को किसी मंच तक पहुँचाने को इच्छुक महिलाएं 



24 अगस्त की रात अन्ना की भावुक अपील से प्रभावित 
एक बच्ची की कविता का वीडियो :
"स्कूल से सीधे चलकर आई, हाल जानने तेरा अन्ना"


Wednesday, August 24, 2011

फ़ाइनल डेस्टिनेशन 5, डेजा वू या सिक्स्थ सेन्स

मेरे साथ ऐसा पहले भी कभी हो चुका है !!!

जी हाँ हमारे आस-पास आपको कई ऐसे लोग मिले होंगे, जिन्हें आपने यह कहते सुना होगा कि जो घटना उनकी आँखों के सामने से गुजर रही है, उसे वो उसी रूप में पहले भी देख चुके हैं. क्या यह उनकी विशिष्ट योग्यता है, कोई सिक्स्थ सेन्स या यूँ ही कोई संजोग. कल यह सवाल पुनः मन में कौंधा जब  रात अपने कुछ मित्रों के साथ  अचानक ही बने कार्यक्रम के अंतर्गत 'फ़ाइनल डेस्टिनेशन 5' देख रहा था.


पहले आप को इस फिल्म की पृष्ठभूमि से अवगत करा दूँ. इस सीरीज की फिल्मों में किसी ग्रुप में से एक व्यक्ति को सहसा ही यह आभास हो जाता है कि उनके साथ कोई आकस्मिक दुर्घटना होने वाली है. इस पूर्वाभास के कारण तत्क्षण तो उनके प्राण बच जाते हैं, मगर फिल्म के अनुसार 'मौत अपने साथ छल पसंद नहीं करती, और वह अपना निर्धारित काम उसी क्रम से करके ही रहती है." इस फिल्म में भी नायक अपने साथियों को एक स्वप्न के आधार पर एक बस दुर्घटना से तो बचा लेता है, मगर अंततः जिस क्रम से उसने अपने साथियों को दुर्घटनाग्रस्त होते देखा था, उसी क्रम में ही उसके साथियों को मौत के इंतकाम का शिकार होने से रोक नहीं ही पाता.


यह तो खैर फिल्मकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी विषय है, मगर सवाल यह तो उठता ही है कि क्या वाकई अवचेतन में ऐसी किसी पूर्वानुमान की संभावना छुपी हुई है ???

दैनिक कार्यकलापों में कई बार कई ऐसे संकेत मिलते हैं जिन्हें किसी कारणवश हमारा चेतन मन अनदेखा करता रहता है. जैसे कोई ऐसी गंध, जिसकी खुशबू बचपन में माँ के द्वारा बनाई किसी सामग्री से मिलती हो. जाहिर तौर पर हम इसे अपनी तार्किकता से नकारते हुए अपने आप को व्यस्तता में डुबोए रखते हैं. मगर इस तरह के संकेत हमारे चेतन मन में स्थान न पाकर अवचेतन में संग्रहीत होते जाते हैं. और कभी न कभी सपने में गाँव के घर, बचपन की कोई घटना का रूप लेकर उभर आते हैं, हमें एक पशोपेश में छोड़कर.

इसी प्रकार जब हम किसी नई जगह पर जाते हैं तो अचानक ऐसा लगता है जैसे हम यहाँ पहले भी आ चुके हैं, या कोई घटना घटित होते देखने पर लगता है जैसे यह मेरे साथ पहले भी घट चुकी है. मनोविज्ञान की शब्दावली में ऐसे अनुभव 'डेजा वू' कहलाते हैं. फ्रेंच में इस शब्द का अर्थ है 'पूर्व में देखा हुआ'. इसकी कार्यविधि को समझने के लिए दिमाग की संरचना को समझना पड़ेगा. मगर संछिप्त में मैं इतना ही कह सकता हूँ कि मनुष्य का मष्तिष्क कई विभागों में बंटा होता है जिसमें दीर्घावधि की याददाश्त, अल्पावधि की याददाश्त या किसी खास घटना से जुडी तात्कालिक याददाश्त संचित होती है. जब इस स्मृति प्रणाली में कोई व्यवधान आता है तब उसे स्मृति भ्रम या दिशा भ्रम जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. 'डेजा वू' भी एक ऐसी ही स्मृति भ्रम की घटना का प्रभाव है जिसमें मस्तिष्क के दो हिस्से न्यूरो कार्टेक्स और हिप्पोकैम्पस परस्पर विपरीत अनुभूतियाँ उत्पन्न करते हैं और अंततः इस लोचे में बेचारा मष्तिष्क भ्रमित हो जाता है. 

इस परिघटना को विस्तार से समझने के लिए वरिष्ठ ब्लौगर श्री अरविन्द मिश्र जी की यह पोस्ट तथा मनोवैज्ञानिक विषयों की विशेषज्ञ लवली जी की यह पोस्ट भी देख सकते हैं. 

इस पोस्ट को लिखने का एक कारण यह भी है कि इस लोचे से प्रभावग्रस्त लोगों में मैं भी एक हूँ, और खुद भी ऐसे ही कई सवालों के जवाब ढूँढ रहा हूँ. :-)

Thursday, August 18, 2011

प्रकाश झा का 'आरक्षण' और एक विमर्श


प्रकाश झा की बहुप्रचारित, बहुप्रतीक्षित 'आरक्षण' अंतत प्रदर्शित हो ही गई. इस फिल्म ने कई प्रायोजित तो संभवतः कुछ स्वतः स्फूर्त विरोधों की भी भूमिका तैयार कर दी. यह 'आरक्षण' जैसे संवेदनशील विषय का भी प्रभाव है.

भारत को अन्य किसी भी 'तथाकथित राष्ट्रवादी विचारक' से कहीं बेहतर समझने वाले युवा सन्यासी विवेकानंद भी इस देश की परतंत्रता को सदियों से अपने समाज के एक अभिन्न अंग के प्रति असंवेदनशीलता का ही दुष्परिणाम मानते थे.

गांधीजी ने भी देश में इस वर्ग की महती भूमिका को स्वीकार करते हुए ही 'पृथक निर्वाचन' का विरोध किया था ताकि प्रमुख लक्ष्य स्वतंत्रता के लिए एकजुट संघर्ष कमजोर न पड़ जाये. इसे प्रतीकात्मक रूप से आमिर खान की 'लगान' में काफी खूबसूरती से दर्शाया गया है जिसमें अंग्रेजों के विरुद्ध 'भुवन' की 'राष्ट्रीय टीम' तब तक पूर्ण नहीं हो पाती जबतक की उसमें तमाम पूर्वाग्रहों और विरोध के बावजूद 'दलित' कचरा को शामिल नहीं कर लिया जाता.

निश्चित रूप से सदियों से इस देश के एक बड़े वर्ग को उसके वाजिब और स्वाभाविक अधिकारों से वंचित रखा गया. मगर यह किसी 'मनुवादी व्यवस्था' का परिणाम नहीं था. किसी भी सभ्य और विकसित समाज में कर्म का विभाजन अपरिहार्य है. यह तथ्य हमारे घरों से लेकर संवैधानिक/प्रशासनिक व्यवस्था में भी दृष्टिगोचर होता है. समस्या और विरोध तब उत्पन्न होते हैं जब व्यवस्था 'वंशानुगत' रूप लेती जाती है. और यह संभवतः मानव की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति ही है, जो आज भी विश्व के लगभग सभी भागों में दिख रही है. इसके अलावे प्राकैतिहसिक काल से ही विभिन्न नस्लों के 'माइग्रेशन', परस्पर संबंध, साहचर्य और संघर्ष आदि ने भी इस व्यवस्था को पल्लवित ही किया. मगर जाने-अनजाने किसी भी कारण से पूरे विश्व में ही एक बड़ी आबादी अपने स्वाभाविक अधिकारों से वंचित रह गई. इतिहास में चाहे जो हुआ हो, सभ्यता की ओर बढते मानवजाति के क़दमों का तकाजा यही था कि हम इस गलती को सुधारते और नई व्यवस्था विकसित करते. लगभग हर युग में विश्व के विभिन्न भागों में ऐसे विचारक और समाज सुधारक इस दिशा में आगे बढे. आधुनिक युग में भी गाँधी, अंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग, नेल्शन मंडेला आदि इसी सुदीर्घ परंपरा की एक कड़ी हैं.

लगभग सभी देशों में इस ऐतिहासिक भूल को क्रमिक रूप से सुधारने के प्रयास किये गए. बराक ओबामा का अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर पहुंचना इसी कड़ी का भाग है. हमारे यहाँ भी दलितों ने यह उपलब्धि काफी पहले पा ली थी, मगर इसे पूरी तरह से सामाजिक चेतना का प्रभाव नहीं माना जा सकता.  कहते हैं तुर्की में लोकतंत्र की स्थापना के साथ जब मुर्तजा कमाल पाशा ने अपने सहयोगियों से पूछा कि पिछड़े वर्गों को बराबरी पर लाने में हमें कितना समय लगेगा, उत्तर मिला दस साल. उनकी दृढनिश्चयी प्रतिक्रिया थी - "तो समझ लो, वो दस वर्ष आज से खत्म हो गए. " दुर्भाग्यवश  हमारे  भारतवर्ष  में  कोई  सार्थक  और  कठोर  निर्णय  लिए  बिना  आरक्षण  का  शौर्टकट  निकाल  लिया  गया. जो  उर्जा और संसाधन इस महत्वपूर्ण आबादी को समान सुविधा, शिक्षा, अवसर उपलब्ध करने में लगाये जाने थे वो 'आरक्षण' में सिमट कर रह गए. और भी दुर्भाग्यजनक दलित नेताओं का व्यवहार रहा जिसने इस कमजोर और त्रुटिपूर्ण व्यवस्था को स्वीकार भी कर लिया. स्वयं को बाबा अंबेडकर का अनुयायी बताने वाले नेतागण अंबेडकर की आरक्षण को एक निश्चित समय सीमा तक ही लागु किये जाने के सुझाव को भूल गए और अब यह इस देश में एक अनिश्चितकालीन या यूँ कहें कि स्थायी व्यवस्था बन कर रह गई है. जहाँ होड़ स्वयं को प्रतिस्पर्धी बना कर आगे बढ़ने की होनी चाहिए थी, वहीं नए-से-नए वर्ग की मांग स्वयं को आरक्षण के दायरे में लाने की है. जिस उद्देश्य से इस व्यवस्था को स्वीकार किया गया था, वह भी मूलतः अधूरी ही रह गई है. इस व्यवस्था ने समाज के एक वर्ग को आर्थिक सुदृढ़ता तो दी है मगर दलित और गैर दलित 'युवाओं' के मन में एक ऐसी खाई भी रच दी है जो लगातार चौड़ी ही होती जा रही है. यह खाई दलित जातियों में भी अन्य उपजातियों और 'महादलित' जैसी नई आविष्कृत श्रेणियों में भी दिख रही है. गैर दलितों की छोड़ें दलित जातियों में ही पिछले साठ वर्षों में कम-से-कम दो पीढ़ियों ने आरक्षण का लाभ तो उठा ही लिया है. तो वो खुद आगे आकर क्यों नहीं कहतीं कि उन्हें अब इसकी जरुरत नहीं, और अब यह अवसर उनके किसी अन्य दलित भाई को मिले. उनका बर्ताव अब तक वंचित रहे उनके भाइयों के साथ क्या वैसा ही नहीं जैसा कि आरोप वे 'तथाकथित सवर्णों' पर लगाते रहे हैं !!!


और क्या सवर्ण होना ही संपन्न होने की भी गारंटी है कि वो महँगी शिक्षा और प्रतियोगिता परीक्षाओं के दबाव को झेलता ट्रेन में खड़ा-खड़ा एग्जाम देने जाये और उसकी बगल में बैठा एक दलित प्रशासनिक अधिकारी का पुत्र मुफ्त के पास और फ्री में मिल गए एडमिट कार्ड पर मूंगफली खाता लेटा रहे !!! और इस आश्वस्ति के साथ कि उसका तो 40% में चयन तो हो ही जाना है, और गैरदलित का तो कोई कट ऑफ ही नहीं है. क्या यह व्यवस्था एक समान समाज बना रही है ? मेरे एक मित्र ने कहा कि 40/50 % लाना भी कम नहीं है उनके लिए. मैं पूछता हूँ कि क्या वो ईश्वर पर भी संदेह कर रहा है ? क्या ईश्वर ने भी दलित और सवर्ण के लिए अलग से दिमाग की बनावट की है? समान परिवेश में दोनों ही एक समान विकसित हो सकते हैं तो हम इंसानों का अपनी जिम्मेवारी से पलायन क्यों ??? और क्या दलित कर्मचारी द्वारा निपटाई गई 5 फाइलें भी गैर दलित की 12 फाइलों के बराबर है ! तो भला अब सेवाकार्य के दौरान भी आरक्षण का क्या औचित्य है !!!

मैं तो यही आशा करता हूँ कि इस वर्ग के युवा भी कभी जागेंगे और स्वयं आगे बढ़कर एक समान शिक्षा नीति,  समान शैक्षणिक सुविधाओं की मांग करेंगे. सरकार प्राथमिक से लेकर वि.वि. तक मुफ्त शिक्षा दे, सारी आवश्यक सुविधायें दे और फिर बराबर की लाईन पर खड़ा कर रेस शुरू करे. ऐसा नहीं कि एक को बैसाखी और दूसरे को घुटने के बल दौड़ा दे. ऐसा करना सिर्फ़ इस देश के भविष्य के प्रति अपनी लापरवाही ही होगी. इस भारत के अंदर दो नहीं अनगिनत भारत बन जायेंगे और ध्यान रखें कि हमारे पडोसी देश ही इन भारतों की गिनती करने हेतु पहले से ही काफी इच्छुक और सक्रिय हैं. 

प्रकाश झा साहब ने अपनी फिल्म में यह गाना तो बिल्कुल सही चुना मगर व्यवसायिक दबाव में इसके फिल्मांकन में दीपिका के ठुमकों का मोह नहीं छोड़ पाए वर्ना कोई और 'मौका' इस गाने का और भी बेहतर प्रभाव छोड़ता. आप भी देखें ही नहीं सुनें भी. एड नहीं हो पाया इसलिए सखेद सिर्फ़ सुझाव ही दे पा रहा हूँ. 


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