Monday, September 5, 2011

रंगमंच से शिक्षक दिवस पर - ' रामदास '

कक्षा में  शिक्षक सुनील सातोकर 
आज तो शायद शिक्षक दिवस पर ही आधारित पोस्ट लिखने का प्रयास होता, मगर संजोग से कल एक ऐसा नाटक भी देखने को मिला जो एक शिक्षक और छात्र  के संबंधों पर ही  आधारित था. शिक्षक दिवस के पावन अवसर  पर आदरणीय गुरुजनों को सादर स्मरण करता हुआ यह पोस्ट समर्पित करता हूँ.

सक्षम आर्ट्स ग्रुप द्वारा प्रख्यात साहित्यकार श्री लक्ष्मण राव जी के चर्चित उपन्यास 'रामदास' पर आधारित नाटक 'रामदास'  छात्र जीवन में आने वाली दुविधाओं और उनमें एक शिक्षक की भूमिका पर आधारित है. 

अपने शिक्षकीय दायित्व को निभाने के नए स्वप्न के साथ अध्यापक सुनील सातोकर महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव में आते हैं. उनके विद्यालय का एक छात्र रामदास अपने शिक्षकों और सहपाठियों की नजर में बिलकुल ही नाकारा और नालायक है. एक आदर्श शिक्षक की तरह ही सातोकर उसे एक चुनौती की तरह लेते हैं और उसे पुनः नियमित रूप से विद्यालय आने को प्रेरित करते हैं. उनके प्रयासों से रामदास में वांछित सुधार दृष्टिगत होते जाते हैं. रामदास में आते परिवर्तन को देख उसके सहपाठियों की भी धारणा उसके प्रति परिवर्तित होती जाती है. 
रंजना और रामदास को पढाते शिक्षक 
रामदास को सातोकर अलग से भी पढाने का समय देते हैं, जहाँ काफी आग्रह पर उसी की कक्षा की एक अन्य छात्रा रंजना को भी पढाने की स्वीकृति दे दी जाती है. साथ-साथ पढते, एक-दूसरे की मदद करते दोनों के ही बीच एक आकर्षण पनपने लगता है, जिसे ये दोनों ही प्रेम समझ लेते हैं. इनका अव्यक्त प्रेम सातोकर की अनुभवी नजरों से छुप नहीं पाता, और वे दोनों को ही सामाजिक – ग्रामीण परिप्रेक्ष्य में संभावित दुष्परिणामों के प्रति आगाह करते हैं. एक शिक्षक के रूप में वो अपने प्रभाव का यथासंभव इश्तेमाल करते हैं; मगर रामदास और अंजलि का निश्चल व मासूम प्रेम उनके तमाम तर्कों पर भारी पड़ता है. 
रंजना और रामदास को समझते सातोकर 
एक मोड़ पर रंजन के माता-पिता उसका विवाह कहीं और तय कर देते हैं. सातोकर अधूरी पढाई और  अपरिपक्वता का हवाला देकर उसके अभिभावकों को भी समझाना चाहते हैं, मगर ग्रामीण रूढियां उन्हें भी अपने निश्चय से डिगा नहीं पातीं. 
विदा होती रंजना 

रंजना के मुखर प्रतिरोध के बावजूद सामाजिक रीतियों और पारिवारिक प्रतिष्ठा की बलिवेदी पर इनके प्रेम की बलि चढ़ा दी जाती है. रंजन की शादी हो जाती है, और रामदास अब कुछ और ही गुमसुम और स्वयं में ही खोया रहने लगता है. सातोकर उसे भविष्य की ओर देखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए एक शिक्षक के रूप में अपने कर्तव्य का यथासंभव निर्वाह करते हैं; मगर एक दिन वो यह सुन कर अचंभित रह जाते हैं कि रामदास ने उसी वर्धा नदी में डूब कर अपने प्राण त्याग दिए हैं जो उसकी और रंजन की जाने कितनी वादों और इरादों की साक्षी थी. 
रामदास की मृत्यु पर शोकाकुल रंजना 

आकाश में लगा सूर्यग्रहण रंजना की जिंदगी को भी अपने घेरे में ले लेता है और उसके अंतर्मन से निकलती चीखों में सारा वातावरण निमग्न हो जाता है.

नाटक का पूर्वार्ध जहाँ एक शिक्षक के पक्ष को मजबूती से उजागर करता है, वही दूसरी ओर उत्तरार्ध एक मासूम प्रेम कहानी से दर्शकों को सहज ही जोड़ लेता है. रामदास के चरित्र की निश्चलता को जहाँ कलाकार आर्यन चौधरी ने बखूबी साकार किया है, वहीं एक ओर रंजना के  व्यक्तित्व की मुखरता और वहीं दूसरी ओर भावुक पक्ष को अत्यंत कुशलता से अभिव्यक्त कर अदाकारा विनीता नायक दर्शकों से प्रत्यक्ष तारतम्य बना लेने में सर्वाधिक सफल रही हैं. 

यहाँ मैं इस तथ्य को विशेष रूप से रेखांकित करना चाहूँगा कि रामदास की मृत्यु दर्शकों को व्यथित तो करती ही हैं, मगर उसके बाद परिदृश्य में रंजना के आगमन और उसके द्वारा अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति में स्वयं को पूर्णतः डुबो चुकी विनीता न तो खुद ही उस पात्र में से सहजता से बाहर आ पाईं न ही अपने दर्शकों को आने दिया. 

लेखक श्री लक्ष्मण राव के साथ निर्देशक सुनील रावत
मूल लेखक श्री लक्ष्मण राव की इस रचना को निर्देशक श्री सुनील रावत जी ने रंगमंच पर सार्थक अभिव्यक्ति दी है. 


9 comments:

रविकर said...

गुरुजनों को सादर प्रणाम ||

सुन्दर प्रस्तुति पर
हार्दिक बधाई ||

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

नाटक का सीधा प्रसारण दिखा दिया आपने.सामयिक प्रस्तुति हेतु बधाई.

Suresh Kumar said...

भैया अगर मैने यह नाटक लिखा होता तो रामदास और रंजना को अंत मे मिलवा देता वो भी शिक्षक के माध्यम से...
बहुत सुन्दर प्रस्तिति...

रचना दीक्षित said...

शिक्षक दिवस पर एक अनुरूप प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

अध्यापकदिन पर सभी, गुरुवर करें विचार।
बन्द करें अपने यहाँ, ट्यूशन का व्यापार।।

छात्र और शिक्षक अगर, सुधर जाएँगे आज।
तो फिर से हो जाएगा, उन्नत देश-समाज।।
--
अध्यापक दिवस पर बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

रेखा said...

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ ....नाटक अच्छा लगा

रविकर said...

पहली कक्षा की शिक्षिका--
माँ के श्रम सा श्रम वो करती |
अवगुण मेट गुणों को भरती |
टीचर का एहसान बहुत है --
उनसे यह जिंदगी संवरती ||


माँ का बच्चा हरदम अच्छा,
झूठा बच्चा फिर भी सच्चा |
ठोक-पीट कर या समझाकर-
बना दे टीचर सच्चा-बच्चा ||


लगा बाँधने अपना कच्छा
कक्षा दो में पहुंचा बच्चा |
शैतानी में पारन्गत हो
टीचर को दे जाता गच्चा ||

अभिषेक मिश्र said...

आप सभी के प्रोत्साहन का आभार.
रूपचन्द्र जी और रविकर जी ने अपनी पंक्तियों से मेरे इस प्रयास को और भी निखार दिया है. धन्यवाद.

प्रतुल वशिष्ठ said...

दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिवस 'शिक्षक दिवस' के रूप में .... हर वर्ष ५ सितम्बर को मनाया जाता है :)

सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का जन्मदिवस 'मोहरा दिवस' के रूप में ...... हर वर्ष ५ मई को नहीं मनाया जाता :(

नवें राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा का जन्मदिवस 'वफादार दिवस' के रूप में ....... हर वर्ष १९ अगस्त को नहीं मनाया जाता :(

बारहवीं राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का जन्मदिवस 'सेवक दिवस' के रूप में ...... हर वर्ष १९ दिसंबर को नहीं मनाया जाता :(

तेरहवें राष्ट्रपति प्रणब कुमार मुखर्जी का जन्मदिवस 'चाटुकार दिवस' के रूप में ...... हर वर्ष ११ दिसंबर को नहीं मनाया जाता :(

वीडियो - "झूला झूले से बिहारी.....'

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